(आलेख : राजेंद्र शर्मा)

चुनाव आयोग और उसकी पीठ के पीछे हाथ रखे भाजपा को अगर लग रहा था कि चुनाव गड़बड़ियों का और खासतौर पर मतदाता सूचियों में गड़बड़ियों का मुद्दा दो-चार दिन खबरों में रहने के बाद ठंडा पड़ जाएगा, तो यह उनका मुगालता ही साबित होता लगता है। इस मुद्दे ने करीब संसद के पूरे सत्र को और खासतौर पर ऑपरेशन सिंदूर पर बहस के बाद से तो शब्दश: ही पूरे सत्र को, घेरे रखा है। बेशक, मोदी सरकार ने इस मुद्दे पर, विशेष रूप से बिहार में चुनाव आयोग द्वारा शुरू की गयी मतदाता सूचियों के विशेष सघन पुनरीक्षण (एसआइआर) की प्रक्रिया को लेकर उठे भारी विवादों तथा तीखे सवालों के बावजूद, इस पर कोई चर्चा ही नहीं होने देने की अपनी जिद में, यह पूरा सत्र ही पानी में बह जाने देने का मन बना लिया लगता है। लेकिन, उसके संसद में इस मुद्दे पर चर्चा ही नहीं होने देने से भी, यह मुद्दा किसी तरह से ठंडा नहीं पड़ा है। उल्टे इसी दौरान संसद के बाहर, लोकसभा में विपक्ष के नेता द्वारा किए गए आम तौर पर पिछले कुछ चुनावों और खासतौर पर 2024 के आम चुनाव में, मतदाता सूचियों की रिगिंग के जरिए वोट चोरी के भंडाफोड़ के बाद से, चुनाव आयोग के कार्यकलाप बहुत गहरे संदेहों के घेरे में आ गए हैं। इसी की अभिव्यक्ति के रूप में 11 अगस्त को प्राय: समूचे विपक्ष के सांसदों ने एकजुट होकर, संसद भवन से चुनाव आयोग तक विरोध मार्च निकाला और चुनाव आयोग से तीखे सवाल किए।

बिहार में सर प्रक्रिया को लेकर उठे सवाल, जबकि यह प्रक्रिया बिहार से शुरूआत के बाद, आने वाले महीनों तथा वर्ष में देश भर में लागू करने की चुनाव आयोग ने घोषणा कर रखी है, स्वाभाविक रूप से नेता विपक्ष द्वारा उठाए गए मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियों के माध्यम से चुनाव धांधली के सवालों के साथ जुड़ गए हैं। याद रहे कि मतदाता सूचियों में हेराफेरी के जरिए, चुनाव नतीजों को प्रभावित करने की कोशिश के आरोप भी कोई अब ही अचानक नहीं लग रहे हैं। आम चुनाव से पहले,उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने, दिल्ली में विधानसभाई चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी ने और महाराष्ट्र में विधानसभाई चुनाव से पहले विपक्षी गठबंधन ने, काफी ठोस रूप में फर्जीवाड़े के आरोप लगाए थे, जिनके संबंध अब ये पार्टियां चुनाव आयोग द्वारा कुछ नहीं किए जाने के आरोप लगा रही हैं। इस सबने मिलकर चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवालों को बहुत आगे बढ़ा दिया है।

दूसरी ओर, सत्ताधारी भाजपा के पीठ पर हाथ रखे होने के सहारे चुनाव आयोग, इस सारे विवाद के बीच अपने आचरण में अपारदर्शिता और गैर-जवाबदेही की उसी संस्कृति का खुला प्रदर्शन कर रहा है, जो मोदी निजाम की खास निशानी ही बन चुकी है। एकदम हाल की ही बात करें तो, एक नहीं, दो-दो प्रसंगों में चुनाव आयोग का आचरण खासी दीदादिलेरी का ही लगता है, जो स्वाभाविक रूप से उसकी निष्पक्षता और ईमानदारी पर सवालों को और तीखा ही बना रहा है। जाहिर है कि इनमें पहला प्रसंग तो नेता विपक्ष द्वारा एक खुले संवाददाता सम्मेलन के जरिए, सार्वजनिक मंच पर रखे गए तथ्यों के सामने, चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया का ही है। संवाददाता सम्मेलन में, खुद चुनाव आयोग के ही दस्तावेजों से निकाले गए साक्ष्यों के साथ, नमूने के तौर पर यह दिखाया गया कि बंगलूरु सेंट्रल लोकसभाई क्षेत्र में, आठ में से सात विधानसभाई क्षेत्रों में कांग्रेस उम्मीदवार से पिछड़ने के बावजूद, अगर भाजपा जीतने में कामयाब हो गयी, तो यह ‘चमत्कार’ आठवें विधानसभाई क्षेत्र में, एक लाख से ज्यादा फर्जी मतदाताओं को रोपे जाने का ही नतीजा था।

महादेवपुरा नामक इस विधानसभाई क्षेत्र में फर्जी मतदाताओं को रोपने के लिए एक नहीं, कम से कम पांच अलग-अलग तरीके अपनाए गए थे। इसमें डुप्लीकेट वोटरों का हिस्सा ही 12,000 के करीब था। इसी तरह, करीब 40 हजार मतदाताओं के पते प्रकटत: नकली थे, जिनमें 30 हजार के मामले में पते के रूप में एक या एक से अधिक संख्या में शून्य भर थे, जबकि 9 हजार के मामले में पते के तौर पर इलाके का नाम भर दिया गया था। 10,452 वोट थोक में कुछ पतों पर बनाए गए थे, जिनमें एक-एक कमरे के घरों के पते पर अस्सी-अस्सी वोट तक बनाए गए थे। और 4,132 मतदाता पहचान पत्रों पर या तो तस्वीर थी ही नहीं या इतनी छोटी थी कि उससे किसी की पहचान की ही नहीं जा सकती थी। और पूरे 33,692 मामले फार्म-6 के दुरुपयोग के थे। फार्म-6 का उपयोग नये मतदाता बनाने के लिए किया जाता है, जिनकी उम्र सामान्यत: 18 से 21 वर्ष के बीच होती है। लेकिन, इन तमाम मामलों में एक भी व्यक्ति इस आयु वर्ग में नहीं था, सभी साठ-सत्तर या उससे भी अधिक आयु के थे, जिन्हें पहली बार का मतदाता बनाया जा रहा था! फर्जी वोटों की यह संख्या एक लाख से ऊपर हो जाती है और महादेवपुरा से करीब इतनी लीड के बल पर ही भाजपा, यह लोकसभाई सीट जीतने में कामयाब हो जाती है। और इस ठोस भंडाफोड़ पर चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया क्या रही? नेता विपक्ष ने इस सिलसिले में जो भी दावे किए थे, चुनाव आयोग के अपने दस्तावेजों पर ही आधारित था। लेकिन, अपने दस्तावेजों पर आधारित इन दावों/आरोपों से चुनाव आयोग को एक बार भी यह नहीं लगा कि क्या वाकई, इस तरह की गड़बड़ियां हो सकती हैं, इसकी छान-बीन की जाए। वास्तव में कुछ चीजों के मामले में तो खास छान-बीन की भी जरूरत नहीं है, जैसे एक ही पते पर बने थोक वोट, सरासर फर्जी पते और नाम, डुप्लीकेट वोटर और फार्म-6 का खुल्लमखुल्ला दुरुपयोग कर उसमें साठ-सत्तर साल के मतदाता बनाए जाना। वास्तव में मुख्यधारा के मीडिया पर मोदी राज के लगभग पूर्ण नियंत्रण के बावजूद, कुछ मीडिया संस्थानों ने थोक वोटरों के कुछ चर्चित पतों और कुछ एक से ज्यादा वोट-धारकों की अपनी ओर से छान-बीन भी कर ली थी और आरोपों को सही पाया था।
लेकिन, चुनाव आयोग जांच कराने का किसी भी तरह का आश्वासन तक देने के बजाय, शुरू से इसी पर अड़ा रहा है कि शिकायतकर्ता, शपथपत्र के साथ शिकायत करें। आशय यह कि चुनाव आयोग कोई भी छानबीन तभी और सिर्फ तभी करेगा, जब उसे इसका भरोसा होगा कि शिकायत सही न पाए जाने पर, वह शिकायतकर्ता के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई कर सकेगा। यह तब था, जबकि इस संदर्भ में एक बार फिर बलपूर्वक यह मांग उठायी जा रही थी कि चुनाव आयोग विपक्षी पार्टियों की मांग पर उन्हें कंप्यूटर रीडेबल फार्मेट में मतदाता सूचियां उपलब्ध कराए, न कि जान-बूझकर ऐसे फार्मेट में मतदाता सूचियां दे, जिसमें कंप्यूटर की मदद से सूचियों का विश्लेषण असंभव तो नहीं, पर लगभग असंभव होता है। याद रहे कि एक महादेवपुरा विधानसभाई सीट की पूरी मतदाता सूचियां तस्वीर के रूप में कागज पर छापे जाने पर, आठ फुट ऊंचे बंडल हो गए थे, जिनके अध्ययन/ विश्लेषण में छ: महीने लग गए, जबकि मतदाता सूचियां कंप्यूटर रीडेबल फार्मेट में मिल जाएं, तो यही काम कुछ घंटों में ही संभव है। जाहिर है कि चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया से यह स्पष्ट है कि उसकी मतदाता सूचियों की गड़बड़ियों को पकड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं है, उसकी दिलचस्पी सिर्फ इन गड़बड़ियों पर पर्दा डाले रखने में है।

स्वाभाविक रूप से उसी चुनाव आयोग के बिहार में सर प्रक्रिया के नाम पर, पूरे 65 लाख मतदाताओं के नाम पहले चक्र में ही काटे जाने पर भी, काफी हंगामा हो रहा है। तीस दिन की समय सीमा में काम पूरा करने की अनुचित जल्दबाजी में जिस तरह की कच्ची मतदाता सूची 1 अगस्त को चुनाव आयोग द्वारा जारी की गयी, उसमें कैसे-कैसे चमत्कार देखने को मिल रहे हैं, उसकी खबरें धीरे-धीरे निकल कर आ रही हैं। बहरहाल, अब तक 65 लाख यानी करीब 8 फीसद मतदाताओं का सफाया हो चुका है, जिसके चलते बिहार ऐसा पहला राज्य हो जाने वाला है, जहां आबादी बढ़ने के बावजूद, मतदाताओं की संख्या घट जाएगी। जिन 65 लाख मतदाताओं का नाम कच्ची सूची से बाहर हो गया है, जबकि 2025 की जनवरी के समरी रिवीजन में उनका नाम था, उनमें करीब 22 लाख का नाम, इस दौरान मर चुके होने के नाम पर काटा गया है और 7 लाख का नाम किसी दूसरे स्थान पर भी मतदाता रजिस्टर्ड होने के नाम पर। और 36.2 लाख का नाम कहीं अन्य चले गए या अनुपस्थित होने के नाम पर काटा गया है। लेकिन, ये कौन से मतदाता हैं, जिनके नाम इस तरह काटे गए हैं और किस-किस तरह से काटे गए हैं, इसकी सूची देने से चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के सामने भी इंकार कर दिया है। आयोग का तर्क है कि वह ऐसी सूची देने के लिए कानूनन बाध्य नहीं है और इस तरह नाम काटे जाने के कारण बताने के लिए भी कानून बाध्य नहीं है। इसके जरिए आयोग का मकसद यही सुनिश्चित करना लगता है कि उसने जो 65 लाख नाम पहले चरण में ही काट दिए हैं, उनकी आगे कोई जांच-पड़ताल लगभग असंभव ही हो जाए। याद रहे कि मतदान केंद्र स्तर पर काटे गए नामों की जो सूचियां दी भी गयी हैं, उनमें न तो नाम काटे जाने का कारण है और न ही संबंधित मतदाता का पता है। और जैसे कच्ची मतदाता सूची बनाने की प्रक्रिया को इतना अपारदर्शी बनाना ही काफी नहीं हो, 1 अगस्त को जारी की गयी कच्ची सूची को, बाद में चुनाव आयोग ने सचेत रूप से ‘सुधार’ कर, मशीन रीडेबल से मशीन नॉन-रीडेबल बना दिया, जैसा कि यह चुनाव आयोग अंतिम मतदाता सूचियों के साथ करता रहा है, ताकि उसकी चोरी पकड़ी नहीं जाए। याद रहे कि यह तो कच्ची सूची है, जिसमें आधे से ज्यादा लोगों के फार्म अभी आयोग द्वारा मांगे गए 11 दस्तावेजों की कसौटी पर कसे जाने हैं। साफ है कि ऐसा बहुत कुछ है, जिसे चुनाव आयोग छुपाता आया है, छुपा रहा है और सचेत रूप से छुपाना चाहता है। इसके जरिए, आयोग जनतंत्र को छोड़कर, क्या सत्ताधारियों की सेवा में ही नहीं लगा हुआ है? आने वाले दिनों में इस सवाल की गूंज बहुत बढ़ जाने वाली है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका ‘लोक लहर’ के संपादक हैं।)

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