(आलेख : राजेन्द्र शर्मा)

एक यूट्यूब के खबरिया चैनल के शो में अचानक ‘लाकडॉउन’ का जिक्र आया, तो झटका-सा लगा। डर और हताशा में, हमारे शहरों को छोड़कर, अपनी पूरी गृहस्थी समेटकर, जैसे भी हो सके बस गांव-देहात के अपने घरों की ओर पलायन करते मेहनत-मजदूरी करने वालों के ठट्ठ के ठट्ठ आंखों के सामने घूम गए। अब एक बार फिर, वैसी ही मजबूरी में, उतने बड़े न सही, फिर भी लोगों के ठट्ठ के ठट्ठ राजधानी क्षेत्र के शहर गुड़गांव (अब गुरुग्राम) से बंगाल-असम में अपने घरों की ओर भाग रहे हैं। उनके बीच से ही लाकडॉउन के साथ आज के हालात की यह तुलना उभर कर आयी है। मुद्दा यह नहीं है कि हालात की यह तुलना कितनी उपयुक्त है या कितनी अतिरंजित है। मुद्दा यह है कि यह तुलना उस डर और हताशा को दिखाती है, जिससे हजारों की संख्या में मेहनत-मजदूरी करने वाले, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को छोड़कर भागने पर मजबूर हो रहे हैं।

मुख्यधारा के मीडिया के मुंह फेरे रहने के बावजूद, जितनी भी जानकारियां सामने आयी हैं, उनसे तीन बातें एकदम स्पष्ट हैं। पहली, यह कि ये सब के सब बंगाली हैं, बंगाली भाषा बोलने वाले, जिनमें बड़ी संख्या मुसलमानों की है। दूसरी यह कि ये सब के सब मेहनत-मजदूरी के काम कर के रोटी कमाने के लिए, हजारों किलोमीटर का फासला तय कर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पहुंचे लोग हैं। इनमें खासी बड़ी संख्या मध्यवर्गीय तथा उच्च मध्यवर्गीय परिवारों तथा उनकी सोसाइटियों में, घरेलू कामवालियों का काम करने वाली मजदूरिनों और साफ-सफाई के कामों से लेकर हाउस कीपिंग तक के कामों का बोझ संभाल रहे मजदूरों और ड्राइवरी से लेकर चौकीदारी व छोटे-मोटे दफ्तरी काम तक संभालने वाले, निचले पायदान के अस्थायी कर्मचारियों की है। तीसरी यह कि यह पलायन, कथित रूप से बंगलादेशी अवैध प्रवासी होने के शक के नाम पर, सभी बंगालियों तथा खासतौर पर बंगाली मुसलमानों की हरियाणा पुलिस द्वारा की जा रही पकड़-धकड़, मारपीट तथा खासकर पुरुषों को पकड़-पकड़ कर डिटेंशन सेंटरों में बंद किए जाने से फैली दहशत का परिणाम है। ज्यादातर लोगों ने बताया कि आधार, वोटर कार्ड, राशन कार्ड आदि से लेकर, बंगाल के देहात से अपने संबंध के तमाम साक्ष्य अपने पास होने और पुलिस को दिखाने के बावजूद, उन्हें पुलिस के उत्पीड़न के डर से भागना पड़ रहा है। हालांकि, ज्यादातर के लिए यह पलायन एक तरह की तात्कालिक प्रतिक्रिया ही है और कई ने माना भी कि हालात में सुधार आने पर वे लौट आएंगे, क्योंकि पीछे गांव-देहात में, रोजी-रोटी का साधन तो होगा नहीं, जिसकी वजह से ही वे अपने गांव-घर से निकलकर, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में आए थे।
इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि इस सामूहिक पलायन से, गुड़गांव के मध्यवर्गीय परिवारों में खासे संकट की स्थिति पैदा हो गयी है। घरेलू कामवालियां गायब हैं। सोसाइटियों से लेकर, आम तौर पर उपनगर तक की सफाई की व्यवस्था, अचानक मजदूरों के पलायन से चरमरा गयी है। एक गुड़गांववासी से कहा भी कि गुड़गांव में रहने वाला मध्यवर्ग तो ‘अनाथ’ हो गया है! इसी का नतीजा है कि आम तौर पर इस तरह के ‘बंगलादेशी घुसपैठिया’-विरोधी अभियानों को वैचारिक-नैतिक समर्थन देने वाले, गेटेड कम्युनिटी-वासियों ने भी, ‘सेवक-समुदाय’ के इस पलायन पर चिंता जतायी है और इसके दबाव में हरियाणा पुलिस ने भी इस मुहिम को कुछ धीमा करने के संकेत दिए हैं। इसी का एक संकेत है कि गुड़गांव में कम्युनिटी सेंटरों आदि में पुलिस द्वारा बंगलादेशी-संदिग्धों को बंद कर के रखने के लिए कायम किए गए चार डिटेंशन सेंटरों में से ज्यादातर खाली ही हो गए हैं। जाहिर है कि इन सेंटरों की यातनाओं से निकले लोग ही, गांव-घर के लिए इस पलायन में सबसे आगे हैं।
कहने की जरूरत नहीं है कि यह सिर्फ गुड़गांव तक ही सीमित मामला नहीं है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के अन्य हिस्सों और खासतौर पर राजधानी दिल्ली में भी, बाकायदा पकड़-धकड़ तथा डिटेंशन सेंटरों के साथ ऐसी ही मुहिम छेड़ी गयी थी। वास्तव में इस मुहिम की शुरूआत, इस साल की शुरूआत में विधानसभाई चुनाव से भी पहले हो गयी थी, जब केंद्रीय गृहमंत्रालय के निर्देश पर, उपराज्यपाल ने और दिल्ली पुलिस ने, बंगलादेशियों की तलाश शुरू की थी।

सभी जानते हैं कि बंगलादेशी घुसपैठ का शोर, दिल्ली में हरेक चुनाव में ही संघ-भाजपा के विभाजनकारी प्रचार का एक मुद्दा बना रहा है। फिर भी, दिल्ली में बंगलादेशी घुसपैठ को उस तरह से चुनाव प्रचार में केंद्रीय मुद्दा नहीं बनाया जा सकता था, जिस तरह खुद प्रधानमंत्री ने झारखंड के विधानसभाई चुनाव में इसे अपने प्रचार का केंद्रीय मुद्दा बनाया था। दिल्ली में भाजपा सरकार बनने के बाद, बेशक कथित बंगलादेशी विरोधी मुहिम को और तेज भी किया गया। बाद में गुड़गांव में पुलिस ने, दिल्ली पुलिस द्वारा कायम किए गए इस मॉडल का ही अनुसरण किया है। फिर भी, गुडगांव में हरियाणा पुलिस ने धर-पकड़ के पैमाने से लेकर, यातनाओं के पैमाने तक के मामले में इस अभियान को और इससे पैदा हुई आम दहशत को कहीं बहुत बढ़ा दिया और प्रवासी बंगाली मजदूरों के पलट-पलायन के जरिए, लॉकडाउन की याद दिला दी।

जाहिर है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय के बंगलादेशियों की पहचान संबंधी निर्देश का, अपने-अपने राजनीतिक तकाजों के हिसाब से, अन्य भाजपा-शासित राज्यों में भी परिपालन किया गया है। राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में, जहां बंगाली आबादी बहुत थोड़ी ही है, बंगलादेशी घुसपैठ के डर का चूंकि ज्यादा राजनीतिक दोहन नहीं किया जा सकता था, पकड़-धकड़ के बदनामी ही ज्यादा देने वाले इक्का-दुक्का मामलों के बाद ही, जिनमें दिल्ली की ही तरह बंगलादेशी होने के शक में पकड़े गए लोगों के बंगाल का निवासी होने के प्रमाण जल्द ही सामने आ गए थे, यह मुहिम ठंडी पड़ गयी। इसके विपरीत छत्तीसगढ़, ओडिशा, त्रिपुरा और असम में, संघ-भाजपा शासनों के स्थानीय राजनीतिक एजेंडों के साथ जुड़कर, इस मुहिम ने विकराल रूप ले लिया है। मुद्दा यह नहीं है कि मिसाल के तौर पर ओडिशा में बंगलादेशी होने के संदेह में नजरबंद किए गए सैकड़ों लोगों में से अधिकांश बाद में वैध बंगाल निवासी पाए गए हैं और उन्हें पुलिस को छोड़ना ही पड़ा है। मुद्दा यह है कि इन राज्यों में और सबसे बढ़कर असम में, बहुसंख्यकवादी सांप्रदायिकता के पाले में हिंदुओं के बड़े हिस्से को उग्र तरीके से खींचने के लिए, कथित बंगलादेशी-विरोधी मुहिम का इस्तेमाल संभव नजर आता है।

हैरानी की बात नहीं होगी कि इस मुहिम के सांप्रदायिक आशयों का सबसे पहले तो बिहार के चुनाव में और फिर उसके बाद मुख्य रूप से बंगाल और असम के चुनाव में किंतु विपरीत प्रभाव के लिए इस्तेमाल हो। अगर गुड़गांव में इस मुहिम ने लॉकडाउन की याद दिला दी है, तो असम में इसी के सिलसिले में, और पीछे अस्सी के दशक के उग्र ‘असम आंदोलन’ का याद किया जाना शुरू हो गया है। दूसरी ओर बंगाल में, पिछले विधानसभाई चुनाव की तरह इस बार भी ‘बंगाली अस्मिता’ की रक्षा की चिंता के, सत्ताधारी पार्टी के लिए ही मददगार होने के अनुमान लगाए जाने लगे हैं। जब तक उसे इस मुद्दे से असम में काफी लाभ की उम्मीद है, संघ-भाजपा जोड़ी को इसी मुद्दे के बंगाल और असम के बीच ऐसे विभाजित राजनीतिक परिणाम से भी ज्यादा शिकायत नहीं होगी। उनके लिए इतना ही काफी होगा कि असम हाथ में बना रहे।

भारत जैसे देश में, जहां आम लोगों के पास नागरिकता का कोई प्रामाणिक साक्ष्य है ही नहीं, संदेह के आधार पर पुलिस को नागरिकता की पहचान करने का और इस क्रम में आधार, मतदाता पहचान पत्र, राशन कार्ड जैसे आमतौर पर लोगों के पास पाए जाने वाले पहचान पत्रों को अमान्य करने का अधिकार दे दिया जाता है, तो उसके वही नतीजे होंगे, जो गुड़गांव से बंगाली प्रवासियों के पलायन के रूप में और उससे भी बड़े पैमाने पर मतदाता सूचियों के विशेष सघन पुनरीक्षण या सर में बिहार में, देखने को मिल रहे है। हाशियावर्ती, कमजोर तबकों का बहिष्करण, इसका स्वाभाविक परिणाम है। और चूंकि इस बहिष्करण का संदर्भ राष्ट्रीयता का है, इसके नतीजों की भयानकता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि इस मुहिम के क्रम में हजारों की संख्या में न सही, फिर भी सैकड़ों की संख्या में तो जरूर कथित बंगलादेशियों को, बंगलादेश द्वारा उन्हें नागरिकता की जांच के बाद स्वीकार किए जाने का इंतजार किए बिना, बंगलादेश की सीमा में जबरन धकेलने की कोशिशें की गयी हैं। ये कोशिशें थल सीमा से ही नहीं, जल सीमा में धकेलने की भी गयी हैं। और भारत की शर्मिंदगी का बाइस बनते हुए, इस तरह बंंगलादेश में धकेले गए लोगों में से कई बाद में भारतीय साबित हुए हैं और उन्हें देश में वापस लाना पड़ा है।

फिर भी अगर बंगाली के बंगलादेशी के साथ गड्डमड्ड किए जाने में संघ-भाजपा को कोई दुविधा महसूस नहीं होती है, तो ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं है कि बंगाली ही विशेष रूप से उनके निशाने पर हैं। ऐसा इसलिए है कि एक ओर हाशियावर्ती, कमजोर तबके और दूसरी ओर हिंदी-संस्कृत-इतर सभी भाषायी संस्कृतियां, दबाए जाने के लिए उनके निशाने पर हैं। यह संयोग ही नहीं है कि अभी पिछले ही दिनों वे महाराष्ट्र में प्राइमरी स्कूलों में हिंदी थोपे जाने के विरोध से निपटने के लिए, मराठी को निशाने पर लिए हुए थे। उससे पहले त्रिभाषा फार्मूले के नाम पर ही तमिल, कन्नड़ तथा मलयाली भाषायी संस्कृतियां उनके निशाने पर थीं। उर्दू भाषायी संस्कृति तो खैर हमेशा से ही उनके निशाने पर रही है। उसी के हिस्से के तौर पर कश्मीरी भाषा-संस्कृति निशाने पर रही है और छ: वर्ष से तो खासतौर पर निशाने पर है। दो वर्ष से ज्यादा से मणिपुरी भाषा-इथनिक संस्कृति उनके निशाने पर है। अब बाकायदा बंगाली भाषायी संस्कृति का नंबर लग गया है। नाम है राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने का और काम है, राष्ट्रीय एकता को खंड-खंड कर के तोड़ने का।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)

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