भोपाल। -मुस्ताअली बोहरा,अधिवक्ता एवं लेखक ये तो सभी जानते हैं कि हिंदुस्तान को आजादी दिलाने में हर मजहब, हर समाज, हर वर्ग ने अपने योगदान दिया था। फिर चाहे वो दलित हों या सिख या मुसलमान या किसान और मजदूर। दलितों ने सामाजिक भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई तो सिखों ने पूरे जोश और जिंदादिली के साथ क्रांतिकारियों का साथ दिया, मुसलमानों ने स्वाधीनता सेनानियों के साथ अलख जगाई तो किसानों और मजदूरों ने ब्रितानिया हुकुमत के शोषण के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंक दिया। इतना ही नहीं जो लोग आर्थिक रूप से सम्पन्न थे उन्होंने आजादी के आंदोलन में शामिल लोगों के लिए धनराशि मुहैया कराकर अपना योगदान दिया। दलित समुदाय की बात हो तो बाबा साहब का नाम बरबस ही उभर कर सामने आता है जिन्होंने सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष किया और अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों की खिलाफत की। बाबा साहब आंबेडकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान दलितों के प्रमुख पैरोकार थे। 14 अप्रैल 1891 को एक दलित महार परिवार में जन्मे अंबेडकर को कम उम्र से ही सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा। तमाम जातिगत भेदभाव, प्रताड़ना और अत्याचार के वो शिक्षा हासिल करते रहे। बाबा साहब को बड़ौदा (अब वडोदरा ) के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय ने बॉम्बे के एल्फिंस्टन कॉलेज और बाद में संयुक्त राज्य अमेरिका में कोलंबिया विश्वविद्यालय और ब्रिटेन में लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में अंबेडकर की शिक्षा के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की। भारत लौटने पर अंबेडकर ने इस शिक्षा का उपयोग दलित अधिकारों के लिए किया। उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से सामाजिक विज्ञान और कानून में डिग्री प्राप्त की। आजादी के बाद डाॅ अंबेडकर संविधान की मसौदा समिति के अध्यक्ष भी बने। बाबा साहब के अलावा झलकारीबाई और मातादीन भागी का नाम भी आदर के साथ लिया जाता है। काकोरी डकैती के लिए हथियारों की आपूर्ति करने वाली राजकुमारी गुप्ता और भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल रहीं तारा रानी श्रीवास्तव जैसी महिलाओं ने भी अपनी भूमिका निभाई। दलित अधिकारों के लिए लड़ने वाले इमैनुएल सेकरन ने मात्र 18 वर्ष की आयु में भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया था। ———- दरगाहों को अपवित्र किया, मस्जिद को बनाया बेकरी ———-आजादी के आंदोलन में मुसलमानों के योगदान को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मौलवी अहमदुल्लाह शाह, डॉक्टर जाकिर हुसैन, मौलाना अबुल कलाम आजाद, खान अब्दुल गफ्फार खान, अशफाक उल्ला खान, मौलाना मोहम्मद अली जौहर, बेगम हजरत महल, आबादी बानो बेगम, मुजफ्फर अहमद, मोहम्मद शौकत अली, मौलाना हुसैन अहमद मदनी, पीर अली खान, सैफुद्दीन किचलू, शायर और स्वतंत्रता सेनानी हसरत मोहानी, आबिद हसन सफरानी, युसुफ मेहर अली, अब्दुल कय्युम, मोहम्मद बरकतुल्लाह भोपाली, फजल उल हक, ताजुद्दीन खान, अब्दुल कासिम, जावेद अली, अब्दुल हयात, सैयद अब्दुल्लाह बरेलवी, समरू अल्लाह बख्श, अब्दुल समद खान और हकीम अजमल खान जैसे कई मुस्लिम नेताओं ने स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मुस्लिम संगठनों जैसे ऑल इंडिया मुस्लिम लीग ने भी स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया। दक्षिण में टीपू सुल्तान अंग्रेजों के लिए सिरदर्द बने हुए थे। टीपू सुल्तान ने अपनी सेना को आधुनिक बना लिया था। टीपू सुल्तान और उनके पिता हैदर अली ने अंग्रेजों से लोहा लिया। सन 1799 में टीपू श्रीरंगपट्टनम की जंग में मारे गए। 1857 का विद्रोह मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के नेतृत्व में हिन्दुओं और मुसलमानों का संयुक्त आंदोलन था, जिसने अंग्रेजों को भारत से बेदखल कर दिया था। जफर को भारत के पूर्वी क्षेत्रों से मुख्य रूप से भर्ती किए गए हिंदू उच्च-जाति के सिपाहियों (पुरबिया कहा जाता है) द्वारा विद्रोह के नेता के रूप में चुना गया था। अंग्रेजों ने कई महत्वपूर्ण मुस्लिम दरगाहों को अपमानजनक तरीके से अपवित्र कर दिया था। जामा मस्जिद को ध्वस्त करने की बात हो रही थी, अकबराबादी मस्जिद को नष्ट कर दिया गया था, फतेहपुरी मस्जिद को ब्रिटिश समर्थक लाला चुन्ना मल को बेच दिया गया था और जीनत-उल-मस्जिद को बेकरी के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा था। मौलवी अब्दुल लतीफ, बदरुद्दीन तैयबजी और उनके भाई कमरुद्दीन तैयबजी ने सेनानियों के साथ ब्रितानिया हुकूमत के खिलाफ आवाज बुलंद की। पबना और खुलना के मुस्लिम किसानों ने जुलाई 1905 में रैली निकाली। उसी वर्ष, 23 सितंबर को कलकत्ता के हिंदू-मुस्लिम छात्रों ने एक साथ मार्च किया। अब्दुर रसूल ने गोरों के खिलाफ रैली की अगुवाई की। हुगली में बंदे मातरम और अल्लाह-हो-अकबर के नारे साथ-साथ लगाए गए। मुस्लिम स्वदेशी उद्यमों जैसे गजनवी की यूनाइटेड बंगाल कंपनी, बंगाल होजरी और बंगाल स्टीम नेविगेशन कंपनी ने आंदोलन के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। सन 1906 की महान ईस्ट इंडिया रेलवे हड़ताल के दौरान अबुल हुसैन और लियाकत अली प्रमुख आंदोलनकारी थे। हड़ताल के दौरान मुस्लिम लोकोमोटिव ड्राइवरों ने कुरान की कसम खाई और दिसंबर 1907 में बहिष्कार में शामिल हो गए थे। इसी तरह पूर्ण स्वतंत्रता (पूर्ण स्वराज) का प्रस्ताव पहली बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सन 1921 के अहमदाबाद अधिवेशन में मौलाना हसरत मोहनियाल ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के स्वामी कुमारानंद के साथ पेश किया था। इसी तरह जून 1922 में लखनऊ में आयोजित खिलाफत समिति और जमीयत-उल-उलेमा के एक संयुक्त सत्र ने एक क्रांतिकारी प्रस्ताव पारित किया था। यहां ये बताना लाजमी होगा कि जय हिंद के देशभक्ति के नारे को जैन-उल-अबिदीन इलियास आबिद हसन ने लोकप्रिय बनाया था, जो नेताजी सुभाष चंद्र बोस के करीबी सहयोगी और भारतीय राष्ट्रीय सेना के एक अधिकारी थे। जमीयत उलेमा ए हिंद, मजलिस ए अहरार ए इस्लाम, ऑल इंडिया मोमिन कॉन्फ्रेंस, ऑल इंडिया शिया कांफ्रेस, राष्ट्रीय मुस्लिम पार्टी, खुदाई खिदमतगार, अंजुमन ए वतन जैसे संगठनों ने सेनानियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर भारत को आजाद कराने में अपनी भूमिका निभाई। ————— वो 1857 का विद्रोह और हिन्दु-मुसलमान-सिखों की कुर्बानियां ………………..सन 1857 की लड़ाई हिंदुओं और मुसलमानों ने मिलकर लड़ी थी और उस जंग में हजारों मुस्लिम मारे गए थे। कानपुर से फर्रुखाबाद के बीच सड़क के किनारे जितने पेड़ थे उन पर मौलानाओं को फांसी पर लटका दिया गया था। इसी तरह दिल्ली के चांदनी चैक से लेकर खैबर तक जितने पेड़ थे उन पर भी उलेमाओं को फांसी पर लटकाया गया था। करीब चैदह हजार उलेमाओं को सजा-ए-मौत दी गई थी। जामा मस्जिद से लाल किले के बीच मैदान में उलेमाओं को जिंदा जलाया गया। लाहौर की शाही मस्जिद में हर दिन आधा सैकड़ा से ज्यादा मौलवियों को फांसी पर लटका कर उनकी लाशें रावी नदी में फेंक दी जाती थीं। फांसी पर चढ़ने वाले और काला पानी की सजा पाने वालों में करीब पचास प्रतिशत मुसलमान थे। इतना ही नहीं, ये मुसलमान हैदर अली और टीपू सुल्तान के समय से ही अंग्रेजों के खिलाफ लड़ रहे थे। कई मुसलमानों को सरेआम कोड़े तक मारे गए। काकोरी ट्रेन डकैती के प्रमुख षड्यंत्रकारी अशफाक उल्ला खान जैसे लोगों ने साहस का परिचय दिया। खान अब्दुल गफ्फार खान, जिन्हें सीमांत गांधी के नाम से जाना जाता है, अहिंसा और राष्ट्रवाद के प्रबल समर्थक थे। मौलाना अबुल कलाम आजाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सबसे युवा अध्यक्षों में से एक और हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक थे। आजाद ने विभाजन का भी विरोध किया था। बेगम हजरत महल जैसी मुस्लिम महिलाओं ने भी महत्वपूर्ण बलिदान दिया, जिन्होंने 1857 के विद्रोह के दौरान ब्रिटिश शासन का सक्रिय रूप से विरोध किया। सिख समुदाय की बात हो तो बाबा सोहन सिंह भकना और लाला हरदयाल जैसे नेताओं का नाम जहन में आता है। क्रांतिकारी भगत सिंह ने 23 वर्ष की आयु में अपना बलिदान देकर आदर्श स्थापित कर दिया। सिख समुदाय ने जनरल मोहन सिंह के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय सेना जैसे सशस्त्र संघर्षों में भी भाग लिया। साथ ही भारत छोड़ो जैसे आंदोलनों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। सरदारनी बलबीर कौर जैसी महिलाओं ने विरोध प्रदर्शनों में भाग लिया और शहादत को गले लगा लिया। अजीत सिंह द्वारा शुरू किए गए पगड़ी संभाल जटा जैसे आंदोलनों ने ब्रिटिश दमन के विरुद्ध जन प्रतिरोध को प्रेरित किया। आजादी की लड़ाई में कम्यूनिस्टों ने भी अपना योगदान दिया। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के एमएन राय, एसए डांगे सहित कई नेताओं को हिरासत में लिया गया। कम्युनिस्टों ने श्रमिक आंदोलनों और हड़तालों को संगठित करने में भूमिका निभाई। इसके अलावा ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस ने श्रमिक अधिकारों के लिए आवाज उठाते हुए मजदूरों को संगठित करने में योगदान दिया। आर्थिक रूप से सम्पन्न लोगों ने भी स्वतंत्रता संग्राम में योगदान दिया, आंदोलनों को वित्तीय सहायता दी। उद्योगपति उमर सुभानी जैसे पूंजीपतियों ने धनराशि उपलब्ध कराई। पूंजीपतियों ने अपने संसाधनों का उपयोग स्वदेशी उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए किया।ब्रिटिश शासन के तहत समय समय पर किसान विद्रोह भी हुए। उत्तर प्रदेश में किसान सभा आंदोलन और मालाबार में मप्पिला विद्रोह जैसे आंदोलन हुए। सरदार वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में बारदोली सत्याग्रह हुआ। इसके अलावा अंग्रेजों की नीतियों, उच्च करों के खिलाफ भी किसान आंदोलन हुए। नील विद्रोह (1859-60) और दक्कन दंगों (1875) जैसे विद्रोहों ने जबरन खेती और अत्यधिक राजस्व मांगों के खिलाफ किसानों को संगठित किया। किसान सभा और तेभागा आंदोलन जैसे आंदोलनों ने किसानों को एकजुट किया। किसानों के साथ ही आमजन के शामिल होने से ब्रितानिया हुकूमत की चूले हिल गईं। आजादी के आंदोलन में मजदूर वर्ग की भी अहम भूमिका रही। स्वदेशी आंदोलन के दौरान मजदूरों ने ब्रिटिश स्वामित्व वाली फैक्टरियों के खिलाफ हड़ताल की। एआईटीयूसी के गठन से श्रमिकों को अपनी आवाज बुलंद करने के लिए एक राष्ट्रीय मंच मिला। ———- कवि-लेखकों ने जगाई आजादी की अलख ——— जंगे आजादी में साहित्यकारों की भी अहम भूमिका रही। कवि, लेखकों, शायरों ने अपनी ओजपूर्ण कविताओं, शायरी, कहानी, लेख आदि के जरिए लोगों को आजादी के आंदोलन से जोड़ने का काम किया। मुंशी प्रेमचंद, भारतेंदु हरिश्चंद्र, रवीन्द्रनाथ टैगोर, रामधारी सिंह दिनकर, मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय, शिवमंगल सिंह सुमन, जयशंकर प्रसाद, अल्लामा इकबाल, महावीर प्रसाद द्विवेदी, श्रीधर पाठक, हरिशंकर परसाई, महादेवी वर्मा, गोपालदास नीरज, मुक्तिबोध, बाबा नागार्जुन, जनकवि शील, रामप्रसाद बिस्मिल, राधाकृष्ण दास, बद्री नारायण चौधरी, प्रताप नारायण मिश्रा, श्याम नारायण पांडेय, पंडित अंबिका दत्त व्यास, बाबू राम किशन वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, सरोजिनी नायडू, ठाकुर जगमोहन सिंह, जगदीश चन्द्र बसुु, रामनरेश त्रिपाठी, श्यामलाल गुप्त, राधाचरण गोस्वामी, माधव प्रसाद शुक्ल, नाथूराम शर्मा शंकर, गयाप्रसाद शुक्ल स्नेही, रांगेय राघव, सियाराम शरण गुप्त, अज्ञेय, श्रीकृष्ण सरल, बालकृष्ण शर्मा नवीन, माइकेल मधुसूदन, चिपलुन ठाकुर, भारत भारती, महिला उपन्यासकार रशीद उन निसा जैसे साहित्यकारों ने अपने लेखन से समाज को नई दिशा दी। View this post on Instagram Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन चुघ ब्रदर्स ने किया जमकर फर्जीवाड़ा… फिर वे बंगालियों के लिए आए!