प्रदीप चौधरी। अंकुल प्रताप सिंह, बघेल। जगन्नाथ रथ यात्रा हर साल ओडिशा के पुरी में आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को आयोजित होती है। इस वर्ष यह 27 जून 2025 से शुरू होकर 5 जुलाई 2025 तक चलेगी। यह उत्सव भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को समर्पित है। महत्वपूर्ण तिथियां और अनुष्ठान 26 जून 2025: भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के विग्रह को सजाया जाता है और रथ यात्रा की आज्ञा ली जाती है। 27 जून 2025: रथ यात्रा जगन्नाथ मंदिर से गुंडीचा मंदिर तक शुरू होती है। इस दिन छेरा पहांड़ा रस्म होती है, जिसमें ओडिशा के महाराज सोने की झाड़ू से रथ की सफाई करते हैं। 1 जुलाई 2025: हेरा पंचमी, जब माता लक्ष्मी गुंडीचा मंदिर में भगवान जगन्नाथ से मिलने आती हैं। 4 जुलाई 2025: बाहुड़ा यात्रा (वापसी यात्रा) होती है। 5 जुलाई 2025: भगवान जगन्नाथ की मुख्य मंदिर में वापसी और सुना बेशा उत्सव। धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व जगन्नाथ रथ यात्रा भक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। मान्यता है कि रथ खींचने और दर्शन करने से पापों से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह यात्रा सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है, जहां जात-पात का भेदभाव नहीं होता। विश्व भर से लाखों श्रद्धालु इस पवित्र उत्सव में शामिल होने पुरी पहुंचते हैं। रथ और उनकी विशेषताएं यात्रा में तीन रथ शामिल हैं: तालध्वज: बलभद्र का रथ दर्पदलन: सुभद्रा का रथ नंदीघोष: जगन्नाथ का रथ ये रथ नीम और अन्य विशेष लकड़ियों से बनाए जाते हैं, जिन्हें 200 से अधिक कारीगर 58 दिनों में तैयार करते हैं। यात्रा के बाद रथों को तोड़ दिया जाता है। तैयारियां और व्यवस्थाएं ओडिशा सरकार और मंदिर प्रशासन ने यात्रा की तैयारियां शुरू कर दी हैं। मुख्य सचिव ने हाल ही में व्यवस्थाओं का जायजा लिया। यात्रा से एक दिन पहले गुंडीचा मंदिर को शुद्ध जल से धोया जाता है, जिसे गुंडीचा मार्जन कहा जाता है। पौराणिक कथा और परंपराएं मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ की बहन सुभद्रा ने नगर दर्शन की इच्छा जताई थी, जिसके बाद यह यात्रा शुरू हुई। भगवान अपने भाई-बहन के साथ गुंडीचा मंदिर (मौसी का घर) जाते हैं और 7 दिनों तक वहां विश्राम करते हैं। यात्रा से पहले, ज्येष्ठ पूर्णिमा के बाद भगवान जगन्नाथ 15 दिनों तक एकांतवास में रहते हैं, जहां उन्हें फलों का रस, औषधि और सादा भोजन दिया जाता है। सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव View this post on Instagram जगन्नाथ रथ यात्रा धार्मिक उत्साह के साथ-साथ सांस्कृतिक एकता को बढ़ावा देती है। यह उत्सव भक्तों को एकजुट करता है और विश्व भर में भारतीय संस्कृति का प्रतीक बन चुका है। जगन्नाथ रथ यात्रा: रथ निर्माण प्रक्रिया जगन्नाथ रथ यात्रा के लिए तीन रथों—नंदीघोष (भगवान जगन्नाथ), तालध्वज (बलभद्र), और दर्पदलन (सुभद्रा)—का निर्माण हर साल नया किया जाता है। यह प्रक्रिया धार्मिक परंपराओं और शास्त्रीय नियमों के अनुसार होती है। नीचे रथ निर्माण की प्रक्रिया का विस्तृत विवरण दिया गया है: 1. शुभ तिथि पर शुरुआत रथ निर्माण का कार्य अक्षय तृतीया (वैशाख माह) से शुरू होता है। इस दिन पुरी के जगन्नाथ मंदिर के पास रथ निर्माण स्थल पर विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। रथ टिम्बर यार्ड में लकड़ियों का चयन और भंडारण पहले से किया जाता है। 2. लकड़ी का चयन रथ निर्माण के लिए मुख्य रूप से नीम (नीम) और फासी (एक विशेष प्रकार की लकड़ी) का उपयोग होता है, जो मजबूत और पवित्र मानी जाती हैं। लकड़ियां ओडिशा के जंगलों, विशेष रूप से दासपल्ला और नयागढ़ क्षेत्रों से लाई जाती हैं। ये लकड़ियां विशिष्ट आकार और गुणवत्ता वाली होती हैं। लकड़ी काटने से पहले वन देवता और भगवान जगन्नाथ की पूजा की जाती है। केवल स्वस्थ और दोषरहित पेड़ों का चयन किया जाता है। 3. कारीगरों की भूमिका रथ निर्माण में विश्वकर्मा समुदाय के लगभग 200 कारीगर शामिल होते हैं, जिनमें महर्षि (प्रधान कारीगर), भोई (लकड़ी काटने वाले), और अन्य सहायक शामिल हैं। ये कारीगर पीढ़ियों से इस कार्य में निपुण हैं और परंपरागत तकनीकों का उपयोग करते हैं। निर्माण कार्य में कोई आधुनिक उपकरण नहीं, बल्कि पारंपरिक औजार जैसे हथौड़ा, छेनी, और आरी का उपयोग होता है। 4. रथों की संरचना प्रत्येक रथ की संरचना अद्वितीय होती है और उनके आकार, रंग और सजावट में अंतर होता है: नंदीघोष (जगन्नाथ का रथ): ऊंचाई: 45 फीट पहिए: 16 रंग: लाल और पीला कुल लकड़ी: लगभग 832 टुकड़े सजावट: पीले और लाल रंग के कपड़े, गरुड़ की मूर्ति तालध्वज (बलभद्र का रथ): ऊंचाई: 44 फीट पहिए: 14 रंग: लाल और हरा कुल लकड़ी: लगभग 763 टुकड़े सजावट: हल और मूसल के प्रतीक दर्पदलन (सुभद्रा का रथ): ऊंचाई: 43 फीट पहिए: 12 रंग: लाल और काला कुल लकड़ी: लगभग 593 टुकड़े सजावट: कमल के फूलों की माला 5. निर्माण अवधि रथ निर्माण में लगभग 58 दिन लगते हैं। यह कार्य अक्षय तृतीया से शुरू होकर रथ यात्रा से कुछ दिन पहले पूरा होता है। प्रत्येक रथ के लिए अलग-अलग हिस्सों (जैसे पहिए, छत, और आधार) को अलग-अलन बनाया जाता है और फिर जोड़ा जाता है। रथों को रंग-बिरंगे कपड़ों, चित्रों, और प्रतीकों से सजाया जाता है। 6. धार्मिक अनुष्ठान निर्माण के दौरान कई धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। प्रत्येक रथ के हिस्से को जोड़ने से पहले पूजा की जाती है। रथों के पहियों को चक्र पूजा के बाद स्थापित किया जाता है। निर्माण पूरा होने पर रथ प्राण प्रतिष्ठा की जाती है, जिसमें रथों में प्राण डाले जाते हैं। 7. विशेष विशेषताएं रथों में कोई कील या धातु का उपयोग नहीं होता। लकड़ी के जोड़ और रस्सियों से रथ बनाए जाते हैं। प्रत्येक रथ में एक सारथी (रथ चालक) और घोड़े (लकड़ी के) लगाए जाते हैं, जो यात्रा के प्रतीक हैं। रथों को खींचने के लिए मोटी रस्सियां उपयोग की जाती हैं, जिन्हें भक्तों द्वारा खींचा जाता है। 8. यात्रा के बाद रथ रथ यात्रा समाप्त होने के बाद रथों को तोड़ दिया जाता है। उनकी लकड़ी का उपयोग मंदिर के रसोईघर में ईंधन के रूप में या अन्य धार्मिक कार्यों में किया जाता है। यह परंपरा रथों की पवित्रता और नएपन को बनाए रखने के लिए है। 9. आधुनिक व्यवस्थाएं ओडिशा सरकार और मंदिर प्रशासन निर्माण स्थल पर सुरक्षा, पानी, और बिजली की व्यवस्था करते हैं। कारीगरों के लिए भोजन और आवास की सुविधा भी प्रदान की जाती है। रथ निर्माण की प्रक्रिया को देखने के लिए श्रद्धालु और पर्यटक भी आते हैं, जिसके लिए विशेष व्यवस्था की जाती है। निष्कर्ष जगन्नाथ रथ यात्रा के रथों का निर्माण एक पवित्र और परंपरागत प्रक्रिया है, जो कला, शिल्प, और भक्ति का अनूठा संगम है। यह न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि ओडिशा की सांस्कृतिक विरासत को भी दर्शाता है। हर साल नए रथों का निर्माण भगवान जगन्नाथ के प्रति भक्तों की श्रद्धा और नवीकरण की भावना को दर्शाता है। Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन बैकुण्ठपुर पुलिस की कार्यवाही में गांजा की तस्करी करने वाले 2 आरोपियों को किया गया गिरफ्तार दुआरी में दो मोटरसाइकिलों 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