सुप्रीम कोर्ट में ऑनलाइन और ऑफलाइन सट्टेबाजी ऐप्स पर सुनवाई: कानून से रोक संभव नहीं सुप्रीम कोर्ट ने ऑनलाइन और ऑफलाइन सट्टेबाजी ऐप्स को नियंत्रित करने की मांग वाली एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। याचिकाकर्ता के.ए. पॉल ने दावा किया कि ये ऐप्स जुए के समान हैं और इनकी लत के कारण लाखों युवाओं की जिंदगी बर्बाद हो रही है, जिससे कई बच्चों ने आत्महत्या तक की। उन्होंने आरोप लगाया कि अभिनेता, क्रिकेटर और इन्फ्लुएंसर इन ऐप्स का प्रचार कर युवाओं को आकर्षित कर रहे हैं। View this post on Instagram जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा, “सैद्धांतिक रूप से हम आपके साथ हैं कि इसे रोका जाना चाहिए, लेकिन शायद आप इस गलतफहमी में हैं कि इसे कानून के जरिए रोका जा सकता है। जैसे हम कानून के बावजूद हत्या को पूरी तरह नहीं रोक सकते, वैसे ही सट्टेबाजी या जुआ खेलने से भी लोगों को पूरी तरह नहीं रोक सकते।” कोर्ट ने केंद्र से जवाब मांगा, लेकिन फिलहाल कोई अंतरिम आदेश जारी नहीं किया। रेप विक्टिम से शादी करने पर सुप्रीम कोर्ट ने माफ की दोषी की सजा सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में पॉक्सो (POCSO) मामले में दोषी व्यक्ति की सजा को माफ कर दिया, क्योंकि उसने पीड़िता से शादी कर ली और दोनों का एक बच्चा भी है। कोर्ट ने कहा कि हालांकि कानून के अनुसार यह अपराध है, लेकिन पीड़िता को इसे अपराध के रूप में महसूस नहीं हुआ। जांच रिपोर्ट के आधार पर कोर्ट ने पाया कि पीड़िता को सबसे अधिक तकलीफ बार-बार पुलिस और कोर्ट के चक्कर काटने और आरोपी को सजा से बचाने की कोशिशों से हुई। जस्टिस अभय एस. ओका और पंकज मिठाल की बेंच ने कहा, “समाज ने उसे जज किया, कानूनी व्यवस्था ने उसे विफल किया, और उसके अपने परिवार ने भी उसे छोड़ दिया।” कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले में अब दोषी को पॉक्सो एक्ट के तहत कोई सजा नहीं दी जाएगी, क्योंकि पीड़िता और दोषी अब वैवाहिक जीवन जी रहे हैं और उनकी सहमति से रिश्ता बना हुआ है। हालांकि, यह ध्यान देना जरूरी है कि भारत में बलात्कार एक गैर-समझौता योग्य अपराध (non-compoundable offense) है, और सुप्रीम कोर्ट ने पहले शिम्भु बनाम हरियाणा राज्य (2013) मामले में कहा था कि बलात्कार के अपराध को कम करने के लिए शादी के प्रस्ताव का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। फिर भी, इस मामले में कोर्ट ने विशेष परिस्थितियों को देखते हुए सजा माफ की, क्योंकि पीड़िता और दोषी अब एक परिवार के रूप में रह रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट की इलाहाबाद हाईकोर्ट को फटकार: 4 साल से जेल में बंद व्यक्ति की जमानत याचिका 27 बार टालना अस्वीकार्य सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा एक धोखाधड़ी मामले में आरोपी लक्ष्य तंवर की जमानत याचिका को 27 बार टालने पर कड़ी नाराजगी जताई। मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने कहा, “जब किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल हो और वह चार साल से जेल में हो, तो कोर्ट को याचिका लटकाकर नहीं रखनी चाहिए।” कोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए लक्ष्य तंवर को जमानत दे दी और हाईकोर्ट में लंबित मामले को समाप्त कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में ऐसी देरी को अस्वीकार्य बताया, खासकर जब याचिकाकर्ता 3 साल, 8 महीने और 24 दिन से हिरासत में था। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि कुल 365 गवाहों में से केवल 3 की गवाही हुई थी, जिससे मुकदमे में और देरी की संभावना थी। सीबीआई ने जमानत का विरोध करते हुए तंवर पर 33 अन्य मामलों में शामिल होने का आरोप लगाया, लेकिन याचिकाकर्ता के वकील ने स्पष्ट किया कि इनमें से 27 मामले हिरासत के बाद दर्ज हुए और उनमें जमानत मिल चुकी थी। Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन कार्यशाला का सारांश: ऑनलाइन धोखाधड़ी और साइबर अपराध रोकथाम हेतु क्राइम ब्रांच इंदौर और बैंक नोडल अधिकारियों की संयुक्त पहल खून पर भारी सिंदूर-व्यापार!