मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने हाल ही में एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के दौरान राज्य सरकार से सवाल किया कि सरकार द्वारा नियंत्रित मंदिरों में पुजारी के रूप में केवल ब्राह्मणों की नियुक्ति क्यों की जाती है। यह याचिका आजाद कर्मचारी संगठन (अजाक्स) और अनुसूचित जाति-जनजाति अधिकारी और कर्मचारी संघ द्वारा दायर की गई थी, जिसमें मंदिरों में पुजारी नियुक्ति प्रक्रिया की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। कोर्ट ने राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। यह मामला संविधान के समान अवसर के अधिकार (अनुच्छेद 14, 15 और 16) से जुड़ा है, जो जाति के आधार पर भेदभाव को निषेध करता है। याचिका में तर्क दिया गया है कि मंदिरों में केवल ब्राह्मणों को पुजारी नियुक्त करना अन्य समुदायों के लिए अवसरों को सीमित करता है और यह परंपरा संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन हो सकती है। कुछ लोग इसे हिंदू धर्म में पारंपरिक रूप से ब्राह्मणों द्वारा पूजा-अर्चना की प्रथा से जोड़ते हैं, जबकि अन्य इसे योग्यता के बजाय जाति आधारित भेदभाव मानते हैं। View this post on Instagram दूसरी ओर, यह भी तर्क दिया जाता है कि मंदिरों में पूजा के लिए विशिष्ट धार्मिक और वैदिक ज्ञान की आवश्यकता होती है, जो परंपरागत रूप से ब्राह्मण समुदाय के पास रहा है। हालांकि, तमिलनाडु जैसे राज्यों में गैर-ब्राह्मण पुजारियों की नियुक्ति के उदाहरण मौजूद हैं, जहां सरकार ने सभी जातियों के लिए पुजारी प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किए हैं। मध्य प्रदेश में यह मामला अब चर्चा का विषय बन गया है, और कोर्ट का अंतिम निर्णय इस मुद्दे पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है। Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन सिंधिया का मोहन सरकार पर निशाना: मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार और 50 करोड़ के दान का मामला गरमाया, जांच की मांग कार्यशाला का सारांश: ऑनलाइन धोखाधड़ी और साइबर अपराध रोकथाम हेतु क्राइम ब्रांच इंदौर और बैंक नोडल अधिकारियों की संयुक्त पहल