मुस्ताअली बोहराअधिवक्ता एवं लेखकभोपाल भारत रत्न, महान मर्मज्ञ, अर्थशास्त्री, संविधान शिल्पी, आधुनिक भारत की नींव रखने वाले, इतिहास के ज्ञाता, तत्वज्ञानी, मानव शास्त्र के ज्ञाता, कानूनविद, मानवाधिकार के संरक्षक, धर्म व दर्शन के विद्वान, पाली साहित्य के अध्ययनकर्ता, महान लेखक, समाज सुधारक, राजनीतिज्ञ, संपादक, बौद्ध साहित्य के अध्ययनकर्ता, मजदूरों के मसीहा, इतिहासविद, प्रोफेसर, शिक्षाविद, चिंतक, समाज सुधारक, पर्यावरणविद्, वक्ता, दार्शनिक, बहुभाषाविद्, संपादक, आजाद भारत के पहले कानून मंत्री बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी डाॅ. भीमराव आंबेडकर जिन्हें पूरी दुनिया प्यार और सम्मान के साथ बाबा साहब के नाम से पुकारती है। सन 1990 में उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी इंग्लैंड के 2011 के आंकड़ों के मुताबिक आंबेडकर जी को सबसे ज्यादा 64 विषयों पर मास्टरी थी। संविधान निर्माता, भारत रत्न डॉ. बीआर अम्बेडकर के बारे में देश के पहले राष्ट्रपति डाॅ. राजेंद्र प्रसाद ने 26 नवम्बर 1949 को संविधान सभा में कहा था कि स्वतंत्र भारत के संविधान शिल्पी डा. अम्बेडकर ने अपनी बुद्धि, प्रतिभा और योग्यता की हर कीमत चुका कर देश को एक नया संविधान भेंट किया। संसार में ऐसी मानसिक ऊंचाई और शाश्वत प्रतिभा के धनी कर्मठ महापुरुष कभी-कभी ही अवतरित होते हैं। डाॅ प्रसाद के ये शब्द महज बाबा साहब की तारीफ नहीं थी बल्कि ऐसा सच था जो हमेशा कायम रहेगा। उन्होंने सालों तक जातिगत भेदभाव और अपमान सहा। बाबा साहब ने करुणा, प्रेम, समता और अहिंसा से ओतप्रोत बौद्ध मत को अंगीकार किया। आंबेडकर तीन लोगों को अपना गुरु मानते थे गौतम बुद्ध, कबीर दास और महात्मा ज्योतिबा फुले। View this post on Instagram सामाजिक क्रांति लाने वाले बाबा साहब डा. भीमराव अम्बेडकर का जन्म समाज और देश को नई दिशा और दशा देने के लिए ही हुआ था। अमानवीय कुरीतियों जैसे छूआछूत, जातिगत भेदभाव, तिरस्कार और सामाजिक अन्याय आदि को स्वयं भोगा था, परन्तु कभी धैर्य नहीं खोया। उन्होंने वंचित वर्ग को समाज में उसकी प्रतिष्ठा दिलवाने के लिए अपने जीवन को समर्पित कर दिया। डाॅ आंबेडकर पूरी जिन्दगी दलित, शोषित, वंचित समाज को सशक्त, आत्मनिर्भर व सम्मानित जीवन देने के लिए संकल्पबद्ध रहे। उन्होंने 24 नवम्बर 1947 को दिल्ली में कहा था, ‘हम सब भारतीय परस्पर सगे भाई हैं। ऐसी भावना अपेक्षित है, इसे ही बंधुभाव कहा जाता है, उसी का अभाव है। जातियां आपसी द्वेष बढ़ाती हैं। अत इस अवरोध को दूर करना होगा क्योंकि यदि बंधुभाव ही नहीं रहेगा तो समता और स्वाधीनता सब अस्तित्वहीन हो जाएंगे।’ बाबा साहब का कहना था, ‘मैं चाहता हूं कि लोग सर्वप्रथम भारतीय हों व अंत तक भारतीय रहें, भारतीय के अलावा कुछ भी नहीं।’ बाबा साहब ने भाषाई आधार पर राज्यों के गठन का विरोध किया। हिंदी की राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापना को महत्व दिया। श्रम नीति सुधार, शहरीकरण का महत्व, समान नागरिक संहिता एवं हिन्दू कोड बिल, महिलाओं के प्रति उनकी संवेदनशीलता, आर्थिक योजनाएं, जल और विद्युत नीति में भूमिका सहित कई ऐसी नीतियां और योजनाएं थी जिनसे बाबा साहब की दूरंदेशी का अंदाजा हो जाता है। बाबा साहब की शख्सियत को इसी से जाना जा सकता है कि दुनिया भर के 100 से अधिक देशों में उनकी जयंती मनाई जाती है। गुगल ने डॉ अम्बेडकर की 125वीं जयंती पर अपने गूगल डूडल पर उनकी तस्वीर लगाकर उन्हें अभिवादन किया। तीन महाद्वीपों के देशों में यह डूडल था। सन 2016 में देश और दुनिया भर में भीमराव अंबेडकर की 125वी जयंती मनाई थी। इस वर्ष कुल 102 देशों में अम्बेडकर जयंती को मनाया गया था। इसी वर्ष पहली बार संयुक्त राष्ट्र ने भी भीमराव आंबेडकर की 125 वी जयंती मनाई जिसमें 156 देशों के प्रतिनिधीयों ने भाग लिया था। संयुक्त राष्ट्र नेे भीमराव आंबेडकर को विश्व का प्रणेता कहकर उनका मान बढ़ाया। संयुक्त राष्ट्र के 70 वर्ष के इतिहास में वहां पहली बार किसी भारतीय व्यक्ति का जन्मदिवस मनाया गया था। बाबा साहब के अलावा विश्व में केवल दो ऐसे व्यक्ति हैं जिनकी जयंती संयुक्त राष्ट्र ने मनाई हैं मार्टिन लूथर किंग और नेल्सन मंडेला। आंबेडकर, किंग और मंडेला ये तीनों लोग अपने अपने देश में मानवाधिकार संघर्ष के सबसे बड़े नेता के रूप में जाने जाते हैं। डॉ. भीमराव अम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को ब्रिटिश भारत के मध्य भारत प्रांत (अब मध्य प्रदेश) में स्थित महू नगर सैन्य छावनी में हुआ था। इनके बचपन का नाम भिवा था। वे रामजी मालोजी सकपाल और भीमाबाई मुरबादकर की 14 वीं और अंतिम संतान थे। डॉ. बाबा साहब अंबेडकर के पिता ब्रिटिश सेना में सूबेदार थे। बाबा साहेब का परिवार कबीर पंथ को मानने वाला मराठी मूूल का था और वो वर्तमान महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में आंबडवे गाँव के निवासी थे। डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर लगभग दो वर्ष के थे जब उनके पिता नौकरी से सेवानिवृत्त हो गए थे। जब वह केवल छह वर्ष के थे तब उसकी मां का निधन हो गया था। इन्हे इनकी बुआ मीराबाई ने सम्हाला और मीराबाई के कहने पर इनके पिता ने जीजाबाई से दूसरी शादी की। जातिगत भेदभाव से जूझने वाले डॉ. भीमराव अंबेडकर के लिए शुरुआती दौर की पढ़ाई आसान नहीं रही. स्कूल में एडमिशन के बाद इन्हें कक्षा में बैठने से कई बार रोका गया, वजह थी इनका निचली जाति से ताल्लुक रखनां यह भेदभाव स्कूल में सिर्फ पढ़ने-लिखने तक ही सीमित नहीं थां इन्हें सार्वजनिक मटने से पानी पीने के लिए भी रोका गयां इस भेदभाव के कारण समाज में इन्हें हर उस चीज के करीब जाने से रोकने की कोशिश की गई जो उन्हें पसंद थीं। ऐसी कई बातें उनके जेहन में घर कर गईं और यही से ऊंच-नीच का फर्क मिटाने के संघर्ष की नींव पड़ी। महार जाति (अछूत) में जन्म लेने के कारण इन्हे अपनी प्रारंभिक शिक्षा हासिल करने में काफी अपमान का सामना करना पड़ा। हाईस्कूल में इनका उपनाम सकपाल की बजाय आंबडवेकर लिखवाया गया जिसे बाद में उनके शिक्षक कृष्णा महादेव ने आंबेडकर कर दिया। तमाम संघर्ष के पड़ाव को पार करने के बाद वही बच्चा देश का पहला कानून मंत्री बना। बाबा साहब ने सवर्णो की जातिवादी मानसिकता को नहीं बदलने की काफी कोशिश की लेकिन जब वे ऐसा नहीं कर पाए तो अंत में 13 अक्टूबर 1935 को नासिक जिले में येवला में एक सम्मलेन के दौरान धर्म परिवर्तन की घोषणा कर दी। इसके बाद 21 वर्षों तक तमाम धर्मों का अध्ययन करने के बाद 14 अक्टूबर 1956 को अपने असंख्य अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपना लिया। डॉ. बी.आर. अंबेडकर के धर्म परिवर्तन का भारतीय समाज और राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ा। इसने दलितों के बीच बौद्ध धर्म में सामूहिक रूप से परिवर्तन का एक आंदोलन शुरू कर दिया, जिसे दलित बौद्ध आंदोलन के रूप में जाना जाता है। 15 अगस्त 1936 को उन्होंने दलित वर्गों के हितों की रक्षा करने के लिए स्वतंत्र लेबर पार्टी का गठन किया, जिसमें ज्यादातर श्रमिक वर्ग के लोग शामिल थे। सन 1938 में कांग्रेस ने अछूतों के नाम में बदलाव करने वाला एक विधेयक प्रस्तुत किया। डा अंबेडकर ने इसकी आलोचना की। उनका दृष्टिकोण था कि नाम बदलने से समस्या का समाधान नहीं हो सकता है। सन 1942 में वह भारत के गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद में श्रम सदस्य के रूप में नियुक्त हुए। सन 1946 में उन्हें बंगाल से संविधान सभा के लिए चुना गया। उसी समय उन्होंने अपनी पुस्तक प्रकाशित की, “शूद्र कौन थे”? आजादी के बाद 1947 में उन्हें देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के पहले मंत्रिमंडल में कानून एवं न्याय मंत्री के रूप में नियुक्त किया गया। लेकिन 1951 में उन्होंने कश्मीर मुद्दे, भारत की विदेश नीति और हिंदू कोड बिल के प्रति प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की नीति पर अपना मतभेद प्रकट करते हुए मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। सन 1952 में कोलंबिया विश्वविद्यालय ने भारत के संविधान का मसौदे तैयार करने में उनके योगदान को मान्यता प्रदान करने के लिए उन्हें एलएलडी की डिग्री प्रदान की। सन 1955 में उन्होंने भाषाई राज्यों पर विचार नामक अपनी पुस्तक प्रकाशित की। डॉ. बीआर अंबेडकर को उस्मानिया विश्वविद्यालय ने 12 जनवरी 1953 को डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया। डॉ बाबा साहेब अंबेडकर को सन 1954 में नेपाल के काठमांडू में जगतिक बौद्ध धर्म परिषद में बौद्ध भिक्षुओं द्वारा बोधिसत्व की उपाधि से सम्मानित किया गया। महत्वपूर्ण बात यह है कि डॉ. अंबेडकर को जीवित रहते हुए ही बोधिसत्व की उपाधि से नवाजा गया था। 14 अक्टूबर 1956 को उन्होंने नागपुर में एक ऐतिहासिक समारोह में बौद्ध धर्म अपना लिया। 6 दिसंबर 1956 को उनका महाप्रयाण हो गया। डॉ. भीमराव अंबेडकर की पुण्यतिथि को पूरे देश में ‘महापरिनिर्वाण दिवस’ के रूप में मनाई जाती है। बहरहाल, बाबा साहब ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में और स्वतंत्रता के बाद इसके सुधारों में भी अपना योगदान दिया। इसके अलावा बाबा साहेब ने भारतीय रिजर्व बैंक के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। केंद्रीय बैंक का गठन हिल्टन यंग कमीशन को बाबासाहेब द्वारा प्रस्तुत की गई अवधारणा के आधार पर किया गया था। डॉ. अंबेडकर विद्वान और कर्मशील व्यक्ति थे। उन्होंने आकर्षक वेतन के साथ उच्च पदों को लेने से इनकार कर दिया क्योंकि वह दलित वर्ग के अपने बंधुओं को कभी नहीं भूले। उन्होंने अपना जीवन समानता, भाईचारे और मानवता के लिए समर्पित किया, दलित वर्गों के उत्थान के लिए पुरजोर कोशिश की। बाबा साहब का जीवन संघर्ष, आपके उसूल, आदर्श और सशक्त भारत के निर्माण में दिए गए उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन हर दु:ख, हर कष्ट में सबसे पहले ही हनुमानजी ही आते हैं याद गाड़ी पर खड़े होकर ट्राफीक संभाल रहे एसीपी का वीडियो वाइरल….