अपने होकर भी जो अपने हो न पाए,चुभते होंगे कांटे रात भर ना सो पाए।कभी गिरेबा में भी झाँक लिया करों,रिश्तों के समुन्दर में नहा लिया करों!हुई गलतियाँ माफ़ी माँग लिया करों। अपने होकर भी जो अपने हो न पाए,चुभते होंगे कांटे रात भर ना सो पाए।अपनों को कैसे भूल जाया करते हो,बेगानों को ही गले लगाया करते हो!ऊपरी दिखावे से बहलाया करते हो। अपने होकर भी जो अपने हो न पाए,चुभते होंगे कांटे रात भर ना सो पाए।अब कब तक परिपक्वता ना आएगी,सेवानिवृत्ति भी तो गले में पड़ जाएगी!अब भी थाम लो रिश्तों को लहराएगी। संजय एम. तराणेकर(कवि, लेखक व समीक्षक)इन्दौर-452011 (मध्यप्रदेश)मो. 98260-25986 Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन बीटेक के छात्र ने फांसी लगाकर की आत्महत्या. तराई क्षेत्र के परसिया खरीदी केंद्र सहित कई खरीदी केंद्रों में हफ्ते भर से ज्यादा समय से बारदाने नही होने से खरीदी हुई बंद