इंदौर। संजय एम तराणेकर।

अभी “गदर-2” का खुमार उतरा भी नहीं था की जन्माष्टमी का दिन और शाहरुख की “जवान” आ गई। अधिकांश सोशल मीडिया और साइटस पर तारीफों के पुल ही नहीं बिल्डिंग्स व टॉवर खड़े किए जाने लगे। मानो किसी दुनियां से सचमुच भगवान ने अवतार ले लिया हों। सनी देओल की फिल्म का रिकॉर्ड को भी ब्रेक कर दिया, ऐसी तमाम तरह की लाइनें चल रही थी। राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन बल्कि साउथ के रजनीकांत के ज़माने का क्रेज़ देख चुके दर्शकों के लिए ये कुछ नया नहीं। अब बात करते हैं फिल्म की।

कहानी: व‍िक्रम राठौड़ सेना की स्‍पेशल टास्‍क फॉर्स का जवान है. उसके साथ 6 लड़कियां भी हैं जो उसकी इस क्राइम में मदद करती हैं. वो मुंबई की एक मेट्रो ट्रेन को हाइजैक करता है और सरकार से अपनी मांगे मंगवाता है. आज़ाद व‍िक्रम का बेटा है. विक्रम के सामने हैं देश के सबसे बड़े आर्म्‍स डीलरों में से एक काली गायकवाड़, जो सेना के जवानों को बंदूकें देता है. काली एक बड़ा बिजनेसमैन है और व‍िक्रम से उसकी पुरानी दुश्‍मनी है.

ओवरआल: व‍िक्रम और आजाद इन दोनों ही किरदारों में शाहरुख खान इंप्रेस करते हैं। एक्शन उनके चिर परिचित अंदाज़ में हैं जो फैंस पसंद करते हैं। कई बार ऐसा लगता है कि वे जो चीज़ें अपने असल जीवन में नहीं कर पाते वो उन्होंने इस फिल्म में की है. जैसे देश के सामाजिक-राजनीतिक मसलों पर खुलकर अपनी बात रखना. “बेटे को हाथ लगाने…” वानखेड़े की ओर इशारा। वैसे ही जैसे एक ज़माने में अमिताभ बच्चन ने वी पी सिंह को टारगेट कर फिल्म “हम” में किया था। विजय सेतुपति टिपिकल हैं. जो पहले राउंड में हीरो को हरा देता है. दूसरे राउंड में हीरो, विलन से बदला लेने आता है. फिल्म की हीरोइन नयनतारा इकलौती हैं, जिन्हें फिल्म फुटेज देती है. दीपिका पादुकोण वाहवाही लूटने में भले कामयाब रही। मगर सान्या मल्होत्रा से लेकर प्रियमणि अपनी फिल्मों व सीरीज़ में लीडिंग रोल्स करती हैं. यहां उन्हें एक फुल लेंग्थ डायलॉग तक बोलने को अवसर नहीं मिलता. निर्देशक अरुण कुमार उर्फ़ एटली अब तक “थेरी, बिगिल, नानबन और उस्ताद भगतसिंह” जैसी फिल्में बना चुके हैं। उन्होंने साउथ और बॉलीवुड का मसाला भेल सहित कलाकारों का भी इस्तेमाल तड़का लगाने में किया है जिसमें वे सफ़ल रहें।

खूबियां: फिल्म के आखिर में एक सीन है, जहां आज़ाद और विक्रम विलेन से लड़ रहे हैं. काली उनके ऊपर शॉटगन से गोली दाग रहा है. फिल्म का बैकग्राउंड म्यूज़िक असरदार है. खासकर ‘जवान थीम’. सेतुपति का एक सीन है, जब वो अपने गुर्गों से कहते हैं कि इन दोनों को खत्म करो. वरना ये लोग गाना गाने लगेंगे और उन्हें सुनना पड़ेगा. ये फिल्म इंटरटेन कर सिर्फ पैसे कमाने के मक़सद से बनाई गई है.

कमियां: फिल्म में कई सामाजिक मसलों को छूआ है. मगर वो जेन्यूइन नहीं लगते. ऐसा लगता हैं यहा दर्शकों को ब्लैकमेल किया गया है. इस फिल्म की सबसे ज़्यादा खलने वाली चीज़ भी यही हैं. क्या वाकई इन सामाजिक मसलों का कोई सरोकार रियालिटी से हैं? इसमें आपको 6 महिला किरदार नज़र आते हैं. सबकी कहानी फिल्म के लिए डिफरेंट सब-प्लॉट्स रेडी करती है. पूरी कहानी में सिर्फ उनका इतना ही रोल है। विजय सेतुपति के काली के रोल को थोड़ा और उभारा जाता, तो फिल्म और रोचक होती. फिल्म में दो सुपरस्टार्स के निराशाजनक कैमियो हैं. थिएटर से निकलने के बाद कोई भी गाना याद नहीं रहता.

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