राजेश उषा शर्मा, इंदौर।

पिछले कुछ वर्षों से ये देखने में आ रहा है कि राखी और होली पर भद्रा के साए के बारे में बातें होने लगी है, शास्त्रों का हवाला देकर भ्रम, असमंजस, डर, खौफ और भय का वातावरण निर्मित होने लगा है,,,, इसमें मीडिया और सोशल मीडिया की अहम भूमिका जिम्मेदार है,,, यू ट्यूब पर भी ढेरों उलूल – जुलुल, आधारहीन टोने – टोटको, उपायों की भरमार है और स्वयंभू ज्योतिषियों का जमवाड़ा लग गया है और जन – जन को डर, खौफ और भ्रम में उलझा दिया है,,,, सदियों से होली जल रही है, रखी का पर्व भी मन रहा है,,,निश्चित ही हजारों बार भद्रा के साए में भी मना होगा, तब ये न तो ये सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक तथा प्रिंट मीडिया इन योगों को, कालों को न तो जानते थे और अनभिज्ञ थे,,,, इतने सालों में न तो समाज या परिवार में कोई शामत आई या कोई अनर्थ या अशुभ हुआ,,, हमारे पूर्वजों ने, माता – पिता ने ,मेने और आप लोगों ने भद्रा में ये कितनी ही बार ये पर्व माना लिए होंगे और हमारे पूर्वज, माता पिता, आप और में हम सभी इष्ट, प्रभुकृपा से सुरक्षित, सुखी और सपन्न भी हैं,,,

मेरी सोच, शोध, चिंतन और विचार औरों से भिन्न हैं , जुदा और अलग ही है,,, मेने भी कई शास्त्रों का अध्यन किया, गहन मंथन भी किया है, महागुरु का सानिध्य प्राप्त है,,, भद्रा जो कि इस लोक के प्रधान न्यायाधीश शनिदेव की बहन है जिनका तीनों लोकों में वास है और ये शनि की तरह ही भयावह है, विकराल स्वरूपा है और क्रूर भी है,,, ये मान्यताएं हैं और शास्त्रों में इनका उल्लेख भी है,,, शनि के नाम से भी कतिपय मेरी बिरादरी के कई लोग और झोला छाप ज्योतिष डराते है, चमकाते हैं खौफ पैदा करते और अपनी मोटी दुकानदारी चलाते हैं,,,, जबकि सत्य तो ये है कि शनि न्याय के देव है,,, दुष्कर्मी, अधर्मी, पापी, कुकर्मी , अन्याय करने वालों के लिए शनि काल है, क्रूर है और उनके दंड से किसी भी लोक में कोई भी नही बच सकता है न ही कोई बचा सकता है,,, कर्मों के अनुसार शनि लाभ – हानि, शुभ – अशुभ और दंड – इनाम देते है,,, जब शनि किसी को भी बेवजह परेशान नही करते, तकलीफ ही देते तो उनकी बहन भी बेवजह क्यों करेगी,,,,?? इस प्रेम, वात्सल्य, खूबसूरत, सौम्य और पावन पर्व पर ग्रहण क्यों लगाएगी ,,,?? निसंदेह नवीन और शुभ कार्य जैसे क्रय, ग्रह प्रवेश, मांगलिक कार्य, मुंडन, अनुष्ठान निषेध है और इनकी मनाई है,,, निश्चित इस काल में इन कर्मों और कार्यों की सख्त पाबंदी और करने पर दुष्परिणाम , विपरीत परिणाम और तबाही निश्चित है,,, अब कुछ विद्वान रावण का हवाला देते हैं कि रावण ने भी भद्रा काल में राखी बंधवाई थी तो वो अगली राखी नही देख पाया,,, अरे भाई वो पापी था, अहंकारी था तो अंत सुनिश्चित ही था,, वो राखी ही नहीं बल्कि कोई भी पर्व नही मना पाया,,,

साल में सिर्फ ही एक बार ही पावन पर्व आता है जब बहन – बेटी महीनो से इस पर्व की राह देखती है, सपने संजोती है, कल्पना करती है और योजना बनाती है, दूर देश – विदेश से सज – धज कर अपने पीयर आती है, अपने भाई, भतीजों के लिए मनपसंद और आर्कषक राखी , उपहार लाती है,,, यदि किसी कारणवश नही जा पाती तो पोस्ट से ही भेज देती है,,, भाई और परिवारजन भी अपनी बहन – बेटी के लिए भी इस स्नेहिल पर्व के लिए उतने ही उतावले और उत्साहित होते हैं,,,, इतने सुंदर, सौम्य, पावन और स्नेहिल पर्व पर ये भद्रा का ग्रहण और काल क्यों,,,,?? ये डर, भ्रम, उहापोह की स्तिथि क्यों,,,??? सिर्फ राखी ही तो बंधवा रहे हैं भाई कोई अन्य मांगलिक या शुभ कार्य या व्यापार – व्यवसाय और सौदा या क्या तो नहीं कर रहें है न,,,,?? इसलिए राखी पर ये प्रोटोकाल क्यों,,,??
इसलिए बेखौफ, निडर और बिना किसी भ्रम के राखी का पर्व, हर्ष, उल्लास और आनंद के साथ अपने पितृदेव, इष्ट, कुलदेव/देवी का परम स्मरण करते हुए बिंदास मनाएं,,, महत्व तो पूर्णिमा का ही होता है,, 31अगस्त को भी मना सकते हैं और वैसे जमाष्टमी तक राखी मनाई जाती है,,,

प्रायः ये भी देखा गया है कि बहन – बेटी की बिदाई के बाद पिता और भाई पर संकट आ जाता है, काम – धंधा रुक जाता है, चारो तरह से संकट आ जाता है,,, ससुराल वाले संपन्न, धनवान हो जाते और पीयर वाले निर्धन और परेशान,,, कुछ उपाय इस महापर्व पर करने से निश्चित पिता और भाई की बिगड़ी भी बनेगी, संकट भी दूर होंगे, काम- धंधा भी चल निकलेगा,,,


🟣अमोघ , अनसुने और अचूक उपाय
🔺कई बहन – बेटी ससुराल किसी भी वजह से परेशान और दुःखी होती है , उन्हें जली – कटी बातें न करें, व्यंग न कसें बल्कि उन्हें अधिक से अधिक प्यार, लाड, दुलार दें, उनके मनपसंद व्यंजन, भोजन खिलाएं, उपहार दें ताकि वो वो इन सुखद और यादगार पलों को सहेजकर रखें और दिल से दुयाएं देकर बिदा हों।
🔺इस बार भी पूर्णिमा का शुभयोग बुधवार और दिनांक 3 याने ब्रहस्पति का अंक, गजकेसरी योग, बुध जो कि व्यापार – व्यवसाय के कारक है, ब्रहस्पति सुखी, सुखद जीवन और धन के कारक हैं, बहन – बेटी का संबंध बुध ग्रह से है इसलिए इनके हाथ से तुलसी, आंवला, अनार और शमी के पौधे लगवाएं, खेत की, बगीचे की, धर्मस्थान, तीर्थस्थान की मिट्टी बहन बेटी के शुभ हाथों से इसमें मिलवाएं या बाद में इसमें डालें, ५ का एक सिक्का भी दबाएं, यकीनन जैसे – जैसे इनके पत्ते बढ़ते जाएंगे पीयर वालों का कल्याण होता जाएगा।
🔺राखी बांधने के पूर्व चौमुखी दीपक हल्दी के स्वस्तिक बनाकर उसमें केसर के रेशे डालकर जलाएं और प्रभु से विनती करें कि इस परिवार में चारों तरफ से खुशहाली आए, केसर से नाम यश और वैभव बढ़ेगा, बाद में बहन- बेटी पीली सरसों से अपने भाई या पिता के सिर से विपरीत दिशा से याने एंटीक्लोक्वाइज 7 बार वारकर उसे अन्य दीपक में कपूर के साथ जलाएं।
🔺राखी बांधने के पश्चात बहन – बेटी अपने पिता या भाई को एक पीले रेशमी वस्त्र में हल्दी की तीन गांठ गंगा जल, और शहद लगाकर, बचे हुए अक्षत और 5 के सिक्के के साथ तीन गठान लगारकर तीन वरदान के साथ भाई को महावरदान स्वरूप दें।
🔺पर्व को मात्र रस्म मानकर ही न मनाएं, तमाम कड़वाहट, गिले – शिकवे – शिकायत तथा गलतफहमी भूलकर और त्यागकर बहन – बेटी को मनोभाव से खुशियां प्रदान करें और ससम्मान बिदा करें वही खुशियां कई गुना होकर कुदरत आपको प्रदान करेगी इसमें तनिक मात्र भी संदेह नहीं है,,,,

और अंत में ये मेरी बात गांठ बांध लें कि जिन घरों में बहन बेटी का सम्मान नही होता है, उन्हें प्यार- दुलार नही मिलता है, तिरस्कार होता या मात्र दिखावे का ही प्यार होता है या उनका हक मार दिया जाता है या व्यंग्य कसे जाते है,,, उस परिवार में सुकून, अमन, चैन कभी नही होगा, बरकत नही होगी, रुकावटें जारी रहेंगी, अचानक विपदा आएंगी और अनर्थ होकर रहेगा,,, क्योंकि बहन – बेटी कभी भी बददुआ तो नही देंगी लेकिन उनकी आत्मा, उनकी रूह तो दुखी होंगी और फिर ये कुदरत, ये नियति अपना कर्म बुखूबी निभाते हैं इसमें तनिक मात्र भी संशय और संदेह नहीं,,,।।
ये मेरे अपने तर्क, विचार, शोध और चिंतन है.

( लेखक पत्रकार, व्यंग्यकार, विश्लेषक तथा अंतराष्ट्रीय ज्योतिष, औरा विशेषज्ञ, लाइफ कोच, वास्तुविद ,मोटिवेशन, मैनेजमेंट, हैप्पीनेस तथा फैमिली गुरु भी है।)

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