(आलेख : बादल सरोज) बीते सप्ताह दिल्ली की सडकों पर मोदी की सत्ता और शाह की पुलिस और उसकी पतलून से बंधे स्वघोषित हिंदूवादी दस्तों ने जो नंगा नाच किया है, आजाद भारत के इतिहास में इतनी वहशी निर्लज्जता की कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती। देश के वरिष्ठ राजनीतिक नेताओं को खींचा-घसीटा गया, सांसदों के गले घोंटे गए। जहां सामान्य तरीके से भी गिरफ्तार किया जा सकता था, वहां भी लातों, घूसों और लाठियों से पीटा गया। पत्रकारों तक को नहीं बख्शा गया ; चौथे खंभे को भी लथेड़-लथेड़ कर खदेड़ा भी गया, पुलिस वाहनों में ठूंसा भी गया। सुप्रीम कोर्ट के वकीलों को भी भेड़-बकरियों की तरह घेरघार कर स्टेडियम को ही खुली जेल बनाकर उसमे बेड़ दिया गया। बर्बरता की तस्वीरों और विजुअल्स से मीडिया भरा पड़ा है ; यह इतने बड़े पैमाने पर और इतनी ज्यादा थी कि आमतौर से सरकार विरोधी आंदोलन की अनदेखी करने वाले कॉर्पोरेट मीडिया के एक हिस्से को भी शर्मा-शर्मी में इसे जगह देनी पड़ी। दबे स्वरों में, मिमियाते हुए ही सही, किन्तु इसकी आलोचना करनी पड़ी। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक भी दिल्ली – खासतौर से लूटन की दिल्ली – लोकतंत्र के लुटेरे और वोटर लिस्ट के सेंधमार ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करने वाले हिन्दुस्तानियों के लिए यातनागृह बनी हुई है। कॉर्पोरेट की गोद में बैठी हिन्दुत्ववादी नव-फासीवादी सरकार के तंत्र ने अंग्रेजों के जमाने से चले आ रहे विरोध जताने के लिए तय जंतर मंतर सहित सभी स्थान लोक के लिए प्रतिबंधित कर दिया है और इस तरह संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य की राजधानी को पुलिस स्टेट में बदल दिया गया है। इस सरासर अनावश्यक और पूरी तरह अवैधानिक दमन की सबसे भयानक दुष्टई स्त्रियों, विशेषकर नवयुवतियों, जिन्हें इन दिनों जेन-जी कहा जाता है, के साथ किया गया जलील और घिनौना बर्ताब है। यह इतना आपत्तिजनक है कि इसे शब्दों में बयान करना भी संभव नहीं है। सार में कहा जाए तो यह कि आंदोलनकारी युवतियों – जिनमें अनेक किशोरी भी थीं – की देह पर लाठियों से तानाशाही के नक्श उभारे गए हैं। यह किसी अदने सिपाही ने नहीं किया, आईपीएस जैसे ओहदे वाले अफसरों सहित स्टार-सुशोभित वर्दीधारी पुलिसियों ने किया। इन हवसी और कामकुंठित बदतमीजों की कुंठा की शिकार पत्रकार लड़कियां भी बनी। आपराधिक हरकतों की ये वारदातें अनेक हैं, इनकी लाइव रिकॉर्डिंग्स मौजूद हैं, इंटरनेट पर वायरल हुई पड़ी हैं, मगर अभी तक एक भी दोषी के खिलाफ दिखावे की कार्यवाही भी नहीं की गयी। मगर इस बार जघन्यता इतने पर नहीं रुकी, उसकी बाकायदा आउटसोर्सिंग की गयी और जो बाकायदा घोषित गुंडे और हिस्ट्रीशीटर हैं, उनके गिरोह के गिरोह बुला-बुलाकर काम पर लगाये गए। पुलिस फ़ोर्स तक को उनके मातहत कर दिया गया। वर्दी की आड़ में, वर्दी के साथ चलने वाले इन बेवर्दी गुंडों द्वारा आंदोलनकारियों, खासकर लड़कियों के साथ की गयी बेदर्दी के बाकायदा वीडियोज सामने आये हैं। इस पर उपजे क्षोभ और आक्रोश को देखते हुए इनमें से चार को तो गिरफ्तार करना ही पड़ा। हालांकि अब ये एक के बाद एक करके जमानतों पर छूटने लगे हैं और इनके सहोदर गुजरात मॉडल अपनाते हुए, इन्हें मालाएं पहनाकर, जैकारें लगाकर इनका स्वागत करने भी पहुँच रहे हैं। किसी भी सभ्य समाज और क़ानून के राज में यकीन करने वाले देश के लिए यह शर्म और लज्जा की बात है : मगर जिन्हें आनी चाहिए, उन्हें नहीं आ रही। आएगी भी कैसे, जब जो हो रहा है, वह खुद वे ही करवा रहे हैं। इस बार जिस पैमाने और जितनी नीचता – अफ़सोस कि इसके अलावा कोई और उपयुक्त शब्द नहीं सूझ रहा — के साथ यह सारा काण्ड हुआ है, हो रहा है, उसने पारम्परिक रूप से सत्ता पार्टी भाजपा के समर्थक और उसके रिमोटधारी आरएसएस को सांस्कृतिक संगठन मानने के मुगालते वाले मध्यम तथा उच्च मध्यम वर्ग के एक बड़े हिस्से को भी चौंका दिया है। बाकियों को भले न रही हो, मगर इन्हें उम्मीद रही थी कि जुलाई में युवतियों के नारों से लगे कल्चरल शॉक से रात 12 बजे उठकर रील बनाने वाले मोदी अक्टूबर में पुलिस और उसके साथ गिरोहबंद गुंडों द्वारा लड़कियों के यौन उत्पीड़न के कांड पर जरूर फिर से शॉक में चले गए होंगे। रात बारह बजे न सही, दिन में तो अवश्य बोलेंगे। मगर अभी तक उन्होंने ने न मुंह खोला हैं, न एक शब्द बोला है। प्रधानमंत्री के रूप में उनकी चुप्पी लज्जा की बात है, जो उन्हें नहीं आती। लोगों को लगा था कि मोदी न सही, सोते-जागते भारतीय संस्कृति की दुहाई देने वाले मोहन भागवत हस्तिनापुर के चीर हरण कांड को इतने विराट पैमाने पर इन्द्रप्रस्थ में दोहराए जाने पर तो जरूरई बोलेंगे। मगर अब तक उनकी तरफ से भी कोई टीका, कोई टिप्पणी, कोई हतप्रभ भाव या खेद प्रकाश प्रकाशित हुआ नहीं दिखा है। इससे उलट जरूर दिखा : और वह यह कि जब अपनी बात कहने के जुर्म में युवतर भारत और मीडियाकर्मियों के शरीर पर लाठियों से मोदी राज के शिलालेख उकेरे जा रहे थे, जंतर मंतर की बाड़ाबंदी की जा रही थी, तब उसी नई दिल्ली में नरेंद्र मोदी ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में गाल बजा रहे थे, भारत के ‘मदर ऑफ डेमोक्रेसी’ होने का जाप कर रहे थे और दावा ठोंक रहे थे कि भारत एक ऐसा देश है, जहां विभिन्न मुद्दों पर खुलकर बहस होती है और लोग अलग-अलग दृष्टिकोणों पर खुलकर चर्चा करते हैं। यह कारनामा मोदी ही दिखा सकते हैं। भागवत साहब से उम्मीद की वजह भी थी, क्योंकि उन्होंने मोदी की तरह फेंड्स बोलकर रील बाजी भर नहीं की थी : जेन-जी की भूरि भूरि प्रशंसा भी की थी। उसी जेन-जी की, जिस जेन-जी के जीते-जागते शरीरों को दिल्ली पुलिस फुटबॉल और पंचिंग बैग बनाए हुए है : जिस जेन जी के लिए वर्दी और बे-वर्दी शोहदे और गुंडे तैनात किये हुए हैं। इस जेन-जी को यही भागवत पहले लंदन में और उसके बाद मुंबई के नीता अंबानी ऑडिटोरियम में “अपनी पीढ़ी से भी – मतलब खुद से भी – ज्यादा ईमानदार और देशभक्त” बता रहे थे। कह रहे थे कि “जेन जेड आज सवाल पूछता है और उसका तार्किक जवाब चाहता है। उसका आंदोलन राष्ट्रविरोधी नहीं है, बल्कि वह लोकतंत्र का एक सशक्त माध्यम है।“ इतना ही नहीं, वे हिदायत भी दे रहे थे कि “मैं यह नहीं कहूंगा कि जेन-जेड को प्रदर्शन नहीं करना चाहिए, हमें उनकी बात सुननी चाहिए थी। उनसे बातचीत में कमी थी, इसीलिए दिल्ली के जंतर-मंतर पर ऐसा आंदोलन हुआ।“ जुलाई में उठाई मांगों को सही बताते हुए वे ऑन रिकॉर्ड बोले थे कि “उनकी शिकायत सही है। भारत की शिक्षा व्यवस्था में बहुत कुछ करने की जरूरत है, और ऐसा नहीं हो रहा है ; इसलिए यह मुद्दा उठाया जा रहा है। तो, सच में बातचीत होनी चाहिए।” लंदन में आयोजित ‘सेलिब्रेशन ऑफ वननेस’ कार्यक्रम में उन्होंने कहा था कि ‘मुझे आने वाली पीढ़ियों पर ज़्यादा भरोसा है। उनमें दुनिया को एक बेहतर जगह बनाने की चाहत है और वे इस मकसद के लिए हर तरह के अपने छोटे-मोटे मतभेदों को छोड़ने के लिए तैयार हैं। वे ज़्यादा ईमानदार हैं।’ इतना सब बोलने वाले भागवत इतनी बेरहमी से की गयी बेहुरमती पर सुन्न और सुट्ट कैसे हो गए। जैसे अक्टूबर के पहले पखवाड़े में हुए दिल्ली दमन का रूप और आयाम अचानक और स्वतःस्फूर्त नहीं है, वैसे ही ऊपर लिखा इतना सब बोलने वाले संघ प्रमुख की इस कांड पर चुप्पी अनायास नहीं है। पुलिस की गुंडई और गुंडोंकी पुलिसई सब कुछ स्क्रिप्टेड है, पूर्वनियोजित और तैयारी के साथ किया गया है और इसके पीछे सिर्फ मोदी-शाह की सरकार नहीं है, इसके पीछे भागवत जी का संघ – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ – है। संगठन कार्यशैली, गणवेश और लक्ष्यबद्ध की कार्यनीति सीखने सौ साल पहले इटली और जर्मनी गए डॉ मुंजे बहुत खुश होंगे कि उनके शिष्य अब मुसोलिनी की ब्लैक शर्ट और हिटलर की ब्राउन शर्ट्स जैसे हमलावर गिरोहों का इस्तेमाल करना सीख गए हैं। पहले मुंह पर नकाब पहनकर जेएनयू में जाकर मारपीट करने से आगे बढ़कर अब उनके चेलों की सरकार में अमित शाह द्वारा छांटकर लाये गए दिल्ली के पुलिस कमिश्नर के संरक्षण में आधिकारिक पुलिस के अनाधिकारिक हिस्सा बनकर फासिज्म के लक्ष्य को आगे बढ़ा रहे हैं। पिछली बार भी इस तरह के लफंगे आंदोलनकारियों से मारपीट करते नजर आये थे, मगर जिस तैयारी के साथ, वे इस बार आये हैं, वैसे नहीं आये थे। इस बार उन्हें तय करके, एलान करके, बुलाया गया है भाजपा के अध्यक्ष नितिन नबीन ने। जुलाई में हुए जंतर मंतर के बाद तेलंगाना में हुई एक सभा में इसकी घोषणा करते हुए तकरीबन टपोरी अंदाज में “कॉकरोच जनता पार्टी, ‘वायरस और कॉकरोच गैंग’ करार देते हुए एलान किया था कि “बीजेपी कार्यकर्ता और देश की जनता ऐसे अराजक समूहों को करारा जवाब देगी और सरकार भी इनसे सख्ती से निपटेगी।“ 10 अक्टूबर को यही हुआ। चार लोफर जो पकड़ने पड़े, वे चारों हिन्दू रक्षा दल के साथ पुलिस की अभिरक्षा में लड़कियों के साथ निर्दयता के साथ मारपीट कर रहे थे। मगर वे सिर्फ चार नहीं थे। लाठियों से भरे वाहनों के साथ पुलिस की वर्दी से भरे वाहन भी युवाओं ने देखे और पहचाने हैं। मतलब इस बार बड़ी संख्या में गुंडे सादा वर्दी में ही नहीं, पुलिस की वर्दी में भी थे। गुंडे ही नहीं, गुंडीयां भी थीं, बिना नेमप्लेट के पहचान छुपाती हुई। यह हिन्दुत्ववादी गिरोह का योजनाबद्द मोबिलाइजेशन था। यह फासीवादी दस्तों का ड्रेस रिहर्सल था। स्त्रियों के साथ यौन हिंसा कुछ सिरफिरे छिछोरों का काम नहीं है। यह कुनबे की कार्य नीति का हिस्सा है। लडकियां इस तरह निशाना इसलिए बनाई गयीं, ताकि वे सहम जाएँ, लजा जाएँ, डर जाएँ। यह सब घटते देख उनके परिवार वाले घबरा जाएँ और उन्हें बाहर निकलने से रोक दें। स्त्री इस देश में जुल्म और बदला लेने के मामले मे हमेशा पहला निशाना रही है ; सिर्फ गालियों में ही नहीं – दैहिक रूप से भी। उसके साहस के साथ खड़े होने की वजह से गुंडों द्वारा उसका यौन उत्पीडन किये जाने पर बजाय अपराधियों के पीडिता और पूरे खानदान की इज्जत खराब होने, मिट्टी में मिल जाने का बेहूदा फलसफा सोच समझ कर गढ़ा गया है । इतिहास में वह दोनों तरफ से निशाने पर रही है। इधर से भी उधर से भी। यह उस स्त्री विरोधी सोच का हिस्सा है, जो हिंदुत्व की रग-रग में है। मनु से लेकर सारी स्मृतियाँ, सारे पुराण और ग्रंथ इसके साक्षी हैं ; यह जघन्यता इतनी सर्व-स्त्रीव्यापी है कि इसकी सजा से सीता तक को नहीं बख्शा गया। यह पूरी आधी आबादी की देह पर लिखा संदेश है कि घर में कैद रहो, बाहर निकलोगी, तो रौंद दी जाओगी, कुचल दी जाओगी । जंतर मंतर-02 की युवतियां देश के सलाम की हक़दार हैं कि वे इस घिनौने मर्दवाद के झांसे में नहीं आयीं और उन्होंने भेड़ियों की आँख में आँख मिलाकर उसे तब तक देखा, जब तक पूरी दुनिया के सामने उसका भेड़ियात्व उजागर नहीं हो गया। इसके साथ इस कांड में यह धतूरा गिलोय और चिरायते पर चढ़े होने की बात भी है ; दुनिया में यह कुनबा एकमात्र ऐसा राजनीतिक गिरोह है, जो स्त्री की देह को नोंचने और भभोड़ने को अपना राजनीतिक औजार मानता है। यह मौजूदा शासक कुनबे की वैचारिक परवरिश का हिस्सा है। संघ और भाजपा, मोदी और शाह जिन्हें वीर और आराध्य मानते हैं, वे विनायक दामोदर सावरकर भारत की वह अकेली शख्सियत हैं, जो बलात्कार को एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करने का आह्वान करते हैं। बलात्कार का राजनीतिक इस्तेमाल न करने के लिए वे शिवाजी तक को नहीं बख्शते। अपनी पुस्तक “‘सिक्स ग्लोरियस इपॉक्स ऑफ इंडियन हिस्ट्री’ – भारतीय इतिहास के छह स्वर्णिम अध्याय- में वे शिवाजी द्वारा पराजित मुस्लिम शासकों की महिलाओं को सम्मान के साथ वापस भेजने की नीति की आलोचना करते हुए उसे “महिलाओं के प्रति आत्मघाती हिंदू उदारता” बताते हैं। वे छत्रपति शिवाजी की इस प्रवृत्ति को राष्ट्रघातक और कुपात्र प्रवृत्ति कहते हैं। इस किताब में एक पूरा अध्याय वे महिलाओं के प्रति इस तरह के बर्ताब को वे राजनीतिक हथियार बताने के लिए खर्च करते हैं। इस मामले में सावरकर अकेले नहीं है, आरएसएस जिन्हें अपना परम पूज्यनीय गुरु मानता है, उन गोलवलकर के शब्दों में “एक निरपराध स्त्री का वध पापपूर्ण है, परन्तु यह सिद्धांत राक्षसी के लिए लागू नहीं होता। “ — राक्षसी कौन? राक्षसी वह जो शास्त्र और मनु की परंपरा को न माने। जंतर मंतर पर विरोध प्रदर्शन करने या वहां जाने या वहां से लौटने वाली युवतियां और उनके समर्थन में पहुंची स्त्रियाँ कुनबे की वैचारिकी के हिसाब से राक्षसी थीं, लिहाजा जो उनके साथ किया गया, वह मनुसम्मत और शास्त्र सम्मत दोनों था। इस पृष्ठभूमि से जोड़कर देखें, तो यह कोई संयोग नहीं है कि मोदी और शाह की पार्टी भाजपा वह पार्टी है, जिसके सांसदों और विधायकों में बलात्कारियों और यौन अपराधियों की तादाद सबसे अधिक है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की अगस्त 2024 की रिपोर्ट के अनुसार भारतीय जनता पार्टी के सबसे अधिक मौजूदा सांसद और विधायक महिलाओं के खिलाफ बलात्कार और यौन उत्पीड़न जैसे अपराध के मामलों का सामना कर रहे हैं। इनकी संख्या 54 है। इस रिपोर्ट के अनुसार, भाजपा के 5 सांसद, विधायक ऐसे हैं, जिन पर सीधे तौर पर बलात्कार की धारा 376 के आरोप हैं। ठीक यही वजह है कि इतना सब कुछ घटने और दुनिया भर में भद्द पिटने, यहाँ तक कि संयुक्त राष्ट्र संघ के मानवाधिकार आयोग तक के द्वारा दिल्ली में हुए दमन का संज्ञान लेने, उस पर चिंता जताने और इसे रोके जाने की मांग किये जाने के बाद भी न मोदी कुछ बोले हैं, लेकिन न भागवत ने कुछ कहा। मगर देश बोला है। देश की जेन-जी बोली है। उसके साथ देश की जनता खड़ी हुई है : इंडिया ब्लाक की पार्टियां जुटी हैं। नव-फासीवाद के खिलाफ लड़ाई आगे बढ़ी है और दीवार पर गाढ़ी स्याही से लिखी इबारत साफ़-साफ़ कह रही है कि जुल्म की मीयाद के दिन थोड़े हैं। (लेखक लोकलहर के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94250-06716) Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन कम्युनिस्ट-इस्लामिक साज़िशों का हौवा संघी गिरोह के संगठनों को विदेशी फंडिग!