(आलेख : कामेश्वर पांडे)

दिल्ली में 33 लाख से अधिक मतदाताओं को चुनाव आयोग ने नोटिस जारी किए हैं। कारण—‘नो मैपिंग’ और ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’। यानी पुराने मतदाता रिकॉर्ड से नाम का मेल नहीं बैठ रहा या मतदाता द्वारा दिए गए विवरण में आयोग को कोई ‘तार्किक विसंगति’ दिखाई दे रही है। 33.13 लाख में लगभग 13.80 लाख ‘नो मैपिंग’ और 19.33 लाख ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ की श्रेणी में हैं।

यह कोई छोटी-मोटी प्रशासनिक कार्रवाई नहीं है। इन नोटिसों की सूची में पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, दिल्ली की वर्तमान मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, निर्वाचन आयुक्त एस.एस. संधू जैसे बड़े नाम भी शामिल हैं।

यानी जिस व्यवस्था को देश के करोड़ों नागरिकों के मताधिकार की रखवाली करनी है, वह यह पता लगाने में असमर्थ है कि देश के विदेश मंत्री और मुख्यमंत्री जैसे लोगों का पुरानी मतदाता सूची से संबंध कहाँ है! तो फिर उस गरीब आदमी का क्या होगा जिसके पास पुराने कागज नहीं हैं? उस प्रवासी मजदूर का क्या होगा जो रोजी-रोटी के लिए शहर बदलता रहा? उस किरायेदार का क्या होगा, जिसका पता दस साल में तीन बार बदला? उस बूढ़े का क्या होगा जिसके पास अपने पिता या दादा की मतदाता सूची की प्रति नहीं है? और उस नागरिक का क्या होगा, जिसे यह भी पता नहीं कि चुनाव आयोग ने उसके नाम के आगे ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ लिख दिया है?

यही वह जगह है जहाँ मामला खतरनाक हो जाता है, क्योंकि गलती व्यवस्था करती है और सबूत नागरिक से माँगती है।

और बात केवल 33 लाख नोटिसों की नहीं है। दिल्ली की मसौदा मतदाता सूची में लगभग 47.56 लाख नाम नहीं आए। इनमें ‘अनुपस्थित, शिफ्ट, मृत या डुप्लीकेट’ जैसी श्रेणियाँ इस्तेमाल की गई हैं। दूसरी ओर मसौदा सूची में शामिल 33.13 लाख मतदाताओं को नोटिस के लिए चिन्हित किया गया। इससे पहले भी बड़ी संख्या में नाम मतदाता सूची से हटाए गए थे।

अब जरा कल्पना कीजिए — दिल्ली विधानसभा का चुनाव हो चुका है। अगर मतदाता सूची इतनी ही अविश्वसनीय, अधूरी और गड़बड़ थी कि लाखों नाम गलत थे, लाखों नाम गायब थे और लाखों दूसरे नामों पर अब सवाल उठ रहे हैं, तो उसी मतदाता सूची से कराया गया विधानसभा चुनाव कितनी विश्वसनीयता का दावा कर सकता है?

यह कोई मामूली तकनीकी प्रश्न नहीं है। मतदाता सूची ही चुनाव की पहली मतपेटी है। जिसका नाम उसमें है, वह वोट दे सकता है। जिसका नाम नहीं है, उसका लोकतंत्र में कोई वोट नहीं है। इसलिए मतदाता सूची से किसी का नाम हटाना केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं है। यह उसके नागरिक अस्तित्व को मिटा देना है।

लेकिन सबसे विचित्र बात अभी बाकी है। कुछ लोग कह रहे हैं— इसमें चिंता की क्या बात है? देखिए, भाजपा के बड़े नेताओं को भी नोटिस मिला है। विदेश मंत्री को मिला, मुख्यमंत्री को मिला, पूर्व उपप्रधानमंत्री को मिला। इससे तो सिद्ध होता है कि आयोग निष्पक्ष है।

नहीं। असली सवाल इससे कहीं गहरा है। सवाल यह नहीं है कि नोटिस भाजपा वाले को भी मिला या विपक्ष वाले को भी। सवाल यह है कि इतने बड़े-बड़े और सार्वजनिक जीवन में सर्वाधिक पहचाने जाने वाले नामों को भी इस प्रक्रिया में लपेटने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या यह केवल प्रशासनिक संयोग है? या फिर इससे एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत राजनीतिक तस्वीर बनाई जा रही है — “देखिए, हम किसी को नहीं छोड़ रहे। हमारे लोग भी घेरे में हैं, विपक्षी भी।” इस तरह लाखों सामान्य नागरिकों पर चल रही कार्रवाई को निष्पक्षता का प्रमाणपत्र मिल जाता है।

लेकिन इसका दूसरा अर्थ और ज्यादा भयावह हो सकता है। सत्ता में बैठे लोगों का मनोबल यदि इतना बढ़ गया हो कि वे संवैधानिक पदों पर रह चुके लोगों तक को अपनी प्रशासनिक मशीनरी के सामने खड़ा कर सकें, तो सामान्य नागरिक को क्या संदेश जाता है? यही कि व्यवस्था के सामने कोई बड़ा नहीं है। और यह लोकतंत्र में नागरिक की निर्भयता का नहीं, नागरिक के भीतर भय पैदा करने का संदेश बन सकता है।

बिहार में यह भयावहता एक और रूप में सामने आई थी। योगेंद्र यादव दो ऐसे जीवित मतदाताओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुँचे थे, जिन्हें चुनावी प्रक्रिया में मृत घोषित कर दिया गया था। वे दोनों अदालत में सामने खड़े थे। जीवित। और सरकारी रिकॉर्ड में मृत! यानी, जिस व्यवस्था को नागरिक की पहचान बचानी थी, उसने उसकी पहचान ही मिटा दी।

और जब यही प्रक्रिया लाखों लोगों पर लागू हो, तो इसे केवल कंप्यूटर की गलती कहकर आगे बढ़ जाना लोकतंत्र के साथ मजाक है।

पश्चिम बंगाल में मामला और बड़ा है। लगभग 27 लाख मतदाताओं को सूची से बाहर कर दिया गया। फिर अपील का रास्ता खोला गया। लाखों अपीलें आईं। लगभग 38 लाख अपीलों में सितंबर तक केवल करीब 1.02 लाख का निपटारा हो सका था। लगभग 97 प्रतिशत मामले लंबित! यह कैसी अपील व्यवस्था है? अगर इसी गति से काम चलता रहा, तो चुनाव आते रहेंगे और मतदाताओं के मामले अदालतों और ट्रिब्यूनलों में पड़े रहेंगे। और तब तक जिन लोगों का वोट छिन गया, वे क्या करेंगे? अगले चुनाव का इंतजार? लेकिन जिस चुनाव में उनका वोट नहीं पड़ा, वह चुनाव तो वापस नहीं आएगा। सुप्रीम कोर्ट में पश्चिम बंगाल के इसी मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची की टिप्पणी का आशय यह था कि यदि कोई इस बार मतदान नहीं कर पाया, तो अगली बार कर सकता है।

लेकिन लोकतंत्र में यह कैसी व्यवस्था है, जिसमें नागरिक के मताधिकार को “इस बार नहीं, तो अगली बार” कहकर टाला जा सकता है? वोट कोई बस नहीं है कि छूट गई, तो अगली पकड़ लेंगे। जिस चुनाव में नागरिक का वोट नहीं पड़ा, उस चुनाव में वह नागरिक सत्ता के निर्माण से बाहर कर दिया गया।

और फिर चुनावी प्रक्रिया की दूसरी विसंगतियाँ। एक ही मतदाता के एक से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों में नाम होने के आरोप। एक ही मकान के पते पर असामान्य संख्या में मतदाताओं के नाम। मृत व्यक्तियों के नाम मतदाता सूची में बने रहने के मामले। हरियाणा में एक ब्राजीलियाई मॉडल की तस्वीर अलग-अलग नामों के साथ अनेक मतदाता प्रविष्टियों में मिलने का मामला। उम्मीदवारों के नामांकन को लेकर उठे सवाल। और श्याम रंगीला जैसे व्यक्ति का प्रधानमंत्री के विरुद्ध वाराणसी से चुनाव लड़ने का प्रयास नामांकन प्रक्रिया में ही समाप्त हो जाना।

क्या ये सब लोकतंत्र की सामान्य धड़कनें हैं? नहीं। जब ऐसी घटनाएँ एक-दूसरे के साथ दिखाई देने लगें, तो नागरिक को सवाल पूछने का पूरा अधिकार है। और सवाल पूछने वाला नागरिक किसी राजनीतिक दल का एजेंट नहीं होता। वह लोकतंत्र का असली मालिक होता है।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि आज चुनाव आयोग कह रहा है— “नोटिस मिला है, नाम अभी नहीं कटा है।” लेकिन नागरिक पूछ रहा है — नाम काटने की नौबत ही क्यों आई? पुराना रिकॉर्ड तुम रखो और मुझे ढूँढ़ने का काम क्यों? तुम्हारे पास मेरा आधार है, पता है, मतदाता पहचान-पत्र है, पिछले चुनावों का रिकॉर्ड है — फिर भी मुझे साबित क्यों करना है कि मैं, मैं हूँ?

यह कैसी व्यवस्था है, जिसमें नागरिक अपनी पहचान का प्रमाण देता है और व्यवस्था अपनी गलती का नहीं। संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान होना चाहिए। लेकिन संवैधानिक संस्था और उस संस्था पर बैठे व्यक्ति एक ही चीज नहीं हैं। संस्था संविधान से बड़ी नहीं हो सकती। और संस्था पर बैठे व्यक्ति संविधान से ऊपर नहीं हो सकते। इसलिए यदि किसी निर्वाचन अधिकारी के निर्णय पर सवाल उठता है, तो केवल इसलिए उसे सम्मान की ढाल नहीं दी जा सकती कि वह चुनाव आयोग में बैठा है। यदि किसी न्यायिक निर्णय पर सवाल उठता है, तो केवल इसलिए सवाल पूछना बंद नहीं किया जा सकता कि निर्णय देने वाला न्यायाधीश है।

संविधान का सम्मान करने का अर्थ संवैधानिक पद पर बैठे हर व्यक्ति के प्रति अंध-श्रद्धा रखना नहीं है। लोकतंत्र में संस्थाओं की सबसे बड़ी सुरक्षा यही है कि उनके काम पर कठोर सवाल पूछे जाएँ।

आज जरूरत इस बात की नहीं है कि हम इन संस्थाओं के प्रति ‘सदय’ हों। सदय तो मतदाता के प्रति होना चाहिए। उस बूढ़े मतदाता के प्रति, जिसे मृत बता दिया गया। उस गरीब के प्रति, जिसके पास पुराने कागज नहीं हैं। उस प्रवासी के प्रति, जिसका पता बदल गया है। उस नागरिक के प्रति, जिसका नाम सूची से गायब हो गया है। और उस नागरिक के प्रति, जिसे कहा जा रहा है — “इस बार नहीं, तो अगली बार वोट दे देना।”

नहीं। लोकतंत्र में मतदाता अगली बार के भरोसे नहीं जीता। हर चुनाव में उसका अधिकार उसी चुनाव के दिन जीवित रहता है।

इसलिए आज सवाल सिर्फ यह नहीं है कि दिल्ली में 33 लाख लोगों को नोटिस क्यों मिला। सवाल यह है कि मतदाता कटघरे में क्यों है? जिसे चुनाव कराना है, वह सवाल पूछ रहा है। जिसे वोट देना है, वह जवाब दे रहा है। जिसके पास रिकॉर्ड है, वह नागरिक से रिकॉर्ड माँग रहा है। और जिसकी मशीन ने गलती की है, उसी मशीन के सामने नागरिक अपनी बेगुनाही साबित कर रहा है।

यह लोकतंत्र की स्वाभाविक स्थिति नहीं है। यह लोकतंत्र का उलटा खड़ा कर दिया जाना है। ईमानदार मतदाता कटघरे में है। इसलिए सवाल पूछने की जरूरत अब मतदाता से नहीं, बेईमान चुनाव आयोग से है।

(लेखक जनवादी लेखक संघ, छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष हैं।)

NEWS NATIONAL WORLD समाचार राष्ट्रीय दुनिया's avatar

By NEWS NATIONAL WORLD समाचार राष्ट्रीय दुनिया

NEWS NATIONAL WORLD (NNW NEWS) / NNW TV NEWS NATIONAL WORLD (NNW NEWS) is a trusted digital media group and online Hindi news portal providing the latest breaking news and updates from India and around the world. Our coverage includes Politics, Crime, Public Issues, Sports, Entertainment, Bollywood, Business, Lifestyle, Art & Culture, Tourism, Social Affairs, and more. Our mission is to deliver accurate, reliable, and impactful journalism while keeping our audience informed about important developments at local, national, and international levels. "NEWS NATIONAL WORLD – Trusted Digital Media for Accurate News & Meaningful Stories." -- Management & Editorial Team -- Managing Director (MD) Ankul Pratap Singh Baghel Mobile: +91 85168 70370 // Editor Gaurav Jain (Indore) Mobile: +91 98276 74717 // Associate Editor Aamir Khan Mobile: +91 90099 11100 // Divisional Bureau Chief (Indore) Pradeep Chaudhary Mobile: +91 94250 52518 // Rewa Editor Kushmendra Singh Mobile: +91 94247 01399 // Join NEWS NATIONAL WORLD Share local news, public issues, social activities, events, sports updates, and important information from your area with us. For News Coverage, Advertising & Business Inquiries: Mobile: +91 85168 70370 Email: allindiamedia12340@gmail.com Follow and join the NEWS NATIONAL WORLD (PVT. LTD.) WhatsApp Channel for fast, reliable, and authentic news updates. NNW TV | NNW NEWS

Leave a Reply

You missed

Discover more from NNWORLD

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading

Discover more from NNWORLD

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading