नई दिल्ली/सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जज जस्टिस संजय करोल ने अपने विदाई समारोह के अवसर पर न्यायपालिका, कानून और मानवीय संवेदनाओं को लेकर विचार साझा किए। अपने चार दशक लंबे कानूनी सफर और 19 साल के न्यायिक कार्यकाल को याद करते हुए उन्होंने कहा कि जज इंसान होते हैं, भगवान नहीं; इसलिए उनसे हर फैसला शत-प्रतिशत सही होने की उम्मीद नहीं की जा सकती। न्याय के लिए फैसले में विनम्रता और संवेदना जरूरीजस्टिस संजय करोल ने कहा कि अदालत में न्याय करने के लिए एक जज के भीतर विनम्रता होना बेहद आवश्यक है। उन्होंने कहा, “जजों को हर मुकदमे में केवल फाइल पर दर्ज याचिकाकर्ता को नहीं, बल्कि उसके पीछे खड़े हाड़-मांस के इंसान को भी देखना चाहिए। याचिका से मामले के कानूनी तथ्य तो मिल सकते हैं, लेकिन वह यह नहीं बता सकती कि उस व्यक्ति ने जीवन में क्या खोया है और वह किस उम्मीद के साथ कोर्ट आया है।” संविधान केवल कानून लागू करने की मांग नहीं करतासंवैधानिक मूल्यों पर प्रकाश डालते हुए जस्टिस करोल ने स्पष्ट किया कि संविधान जजों से केवल यह उम्मीद नहीं करता कि वे कानून को सही तरीके से लागू करें। इसके बजाय, संविधान की असली मांग यह है कि कानून को ‘न्यायपूर्ण तरीके’ से लागू किया जाए। कोर्टरूम में खामोशी और कर्तव्यों की अहमियतअपने संबोधन में उन्होंने कहा कि न्यायपालिका के लिए ‘धर्म’ का अर्थ किसी धार्मिक अनुष्ठान से नहीं, बल्कि एक जज के अपने पवित्र कर्तव्य से है। कोर्ट में आने वाला व्यक्ति चाहे कितना भी छोटा या बेबस क्यों न हो, उसकी आवाज को गरिमा के साथ सुना जाना ही न्याय का असली उद्देश्य है। उन्होंने युवा वकीलों को भी सलाह दी कि वकालत कोई व्यापार नहीं बल्कि समाज सेवा है, और इंसान को अपने रोजमर्रा के आचरण में न्यायसंगत होना चाहिए। Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन जीआरपी उज्जैन की तत्परता से 15 वर्षीय बालिका सुरक्षित दस्तयाब, ‘मुस्कान’ अभियान में मिली सफलता एक दशक बाद भारत करेगा चीनी का आयात, बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए सरकार का बड़ा फैसला