1. माफी मांगने का नहीं, मंगवाने का रोग : विष्णु नागर इन्हें तो अपने हर विरोधी से माफी चाहिए, मगर आज बीसवां दिन है, इनसे जंतर-मंतर पर धरने और प्रदर्शन में शामिल उन छात्रों से, उन युवाओं से माफी नहीं मांगी जा रही, जिनकी आंख, कान, मुंह, पीठ, कमर, टांग सब तोड़ने में इनकी पुलिस ने कोई कसर नहीं रखी थी। न प्रधानमंत्री उसके बाद सदन में आए, न गृहमंत्री! संसद भवन में ये रोज आते हैं। बताया जाता है कि ये सुबह दस से शाम सात बजे तक अपने कमरे में बैठे-बैठे कभी मक्खी, कभी मच्छर मारते रहते हैं। विपक्ष रोज कहता है, शाह जी को सदन में लाओ। राज्यसभा के सभापति भी इशारे में कह चुके कि अमित शाह को सदन में आना चाहिए, मगर दस कदम दूर लोकसभा या राज्यसभा में जाने की इनमें हिम्मत नहीं। स्वास्थ्य इनका सौ टंच ठीक है, हाथ-पांव भी दुरुस्त हैं। दिमाग उतना ही और वैसा ही है, जैसा कि 2014 में था। उसमें कोई सुधार, संशोधन, परिवर्तन, परिवर्धन नहीं हुआ है। कमर लगता है बारह साल में जरूरत से ज्यादा अकड़ गई है या शरीर का भार इतना बढ़ गया है कि शब्दों के जरिए भी इनसे संसद के सामने झुका नहीं जा रहा है। क्षमा नहीं मांगी जा रही। नाक कटी जा रही है। इन्हें देश के वर्तमान और भविष्य से माफी मांगने में इतनी ज्यादा तकलीफ़ हो रही है, मगर इन्हें और इनके लग्गू-भग्गुओं को हर दिन, सोते-जागते, उठते-बैठते, खाते-पीते, हगते-मूतते हरेक से माफी चाहिए। अपने निजी सेवक से लेकर विपक्ष के नेता तक से माफी चाहिए। माफी मांगो, इनका नया राष्ट्रगान है। इनका नियम-धर्म-व्रत-उपवास है, मगर खुद ये कभी माफी नहीं मांगेंगे। संघ की आचरण संहिता में शायद ऐसा ही लिखा है। बताओ, इन्होंने पिछली बार कब माफी मांगी थी? 30 जनवरी,1948 के दिन इनके परम पूज्य नाथूराम गोडसे ने गांधी जी के सीने में तीन गोलियां उतार दी थीं और इनके मातृ संगठन ने इस खुशी में मिठाई बांटी थी। इसके लिए आज तक इन्होंने कभी माफी मांगी है? नेहरू जी से तो इन्हें आज भी बात-बात पर माफी चाहिए।भारत का बंटवारा क्यों स्वीकार किया, कश्मीर में 370 धारा लागू क्यों की, पाकिस्तान के साथ सिंधु जल समझौता क्यों किया और न जाने किस-किस के लिए, बल्कि हर बात के लिए इन्हें माफी चाहिए। यहां तक कि वे 1947 में वे महात्मा गांधी के समर्थन और सरदार पटेल की सहमति से प्रधानमंत्री क्यों बन गए, इसके लिए भी उन्हें माफ़ी चाहिए। मरे हुओं को पकड़ कर वापस लाना अगर संभव होता, तो ये गांधी जी और नेहरू जी को पकड़कर ले आते और 2014 में ही उन्हें फांसी पर चढ़ा देते। जिनसे नाक पर बैठी मक्खी तक भगाई नहीं जाती, उन्हें इसके लिए भी नेहरू जी से माफी चाहिए! इनकी यह बहुत बड़ी मेहरबानी है कि इन्होंने चंद्रशेखर आजाद और भगतसिंह से उनकी मृत्यु के बाद उनसे माफी नहीं मंगवाई। सरदार पटेल से भी ये रियासतों के एकीकरण और आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने के लिए माफी मंगवाते, मगर मुश्किल यह थी कि इनकी नज़र में वे नेहरू जी के परम शत्रु थे। शत्रु का शत्रु, दोस्त होता है, इस सिद्धांत पर चलते हुए इन्होंने उन्हें अपना दोस्त मान लिया। फिर वे गुजराती थे और ऊपर से वहां की सबसे संपन्न और प्रभावशाली जाति के थे!ऐसा नहीं होता, तो ये आज उन्हें भी सूली पर टांग कर ताली बजाते! इन्हें माफी मंगवाने का लाइलाज रोग है। ये माफी मंगवाने की सुबह-शाम माला जपने-जपते कहीं पागल न हो जाएं, इसका हमेशा खतरा रहता है, हालांकि बहुत से ज्ञानी कहते हैं कि ये उस परम अवस्था को काफी पहले प्राप्त कर चुके हैं! फेसबुक, व्हाट्स एप और इंस्टाग्राम जैसी दस बड़ी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म चलानेवाली कंपनी मेटा के मालिक मार्क जुकरबर्ग से तो ये सुबह-शाम माफी मंगवा सकते हैं, क्योंकि उसका लाखों डॉलर का रोज का धंधा है, मगर ये कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टियों, समाजवादी पार्टी, राजद आदि से आज तक किसी बात के लिए माफी नहीं मंगवा पाए। ये अरुंधति राय, मेधा पाटकर, वृंदा करात, तीस्ता सीतलवाड़, उमर खालिद से माफी नहीं मंगवा पाए और ये नेहा बोरा से भी माफी नहीं मंगवा पाएंगे! ये पत्थर पर सिर पटककर फोड़ लेंगे, तो भी इनसे माफी नहीं मंगवा पाएंगे। यह बात इन्हें आज तक पागल किए हुए है कि इनकी सरकार आज 22 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में है, सारी संवैधानिक संस्थाएं इनकी जेब में हैं, पर इन जैसे हजार-दस हजार लोगों से ये माफी नहीं मंगवा पा रहे।झुका नहीं पा रहे उन्हें!बारह साल हो गए, इनमें से एक को भी ये माफीवीर बना नहीं पाए। और अब तो ये जंतर-मंतर पर धरना देने और प्रदर्शन करनेवाले युवाओं को भी झुका नहीं पा रहे हैं, जबकि उन्होंने इन्हें झुकाकर दिखा दिया है, इतना ज्यादा झुका दिया है कि शर्म से इनका चेहरा लाल रहने लगा है। संसद में दिखाने लायक नहीं रहा है! 15 साल की लड़की के मां-बाप को डराकर इन्होंने जरूर माफी मांगने का विडियो बनवा लिया है, मगर इतनी बड़ी सत्ता के लिए एक छोटी बच्ची से माफी मंगवा लेना भी कोई सफलता है? बेहतर है, ये इसके लिए शर्म से चुल्लू भर पानी में डूब जाते। बरसात के दिन हैं, दो चुल्लू पानी का भी इस्तेमाल कर सकते थे! वैसे तीन चुल्लू पानी भी खर्च करने में भी फिलहाल हर्ज नहीं! अच्छा चलो चार चुल्लू भी चलेगा, पर यह सही समय है, शर्म से डूब मरने का! ये चाहें तो ये ज्योतिषी जी से इसका मुहूर्त निकलवा लें! (कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।) 2. यारब जेन-ज़ी न समझे हैं, न समझेंगे मोदी जी की बात! : राजेंद्र शर्मा देखा, देखा, भक्तों की आशंका सही निकली। जेन-ज़ी पर मोदी जी की माफ़ी वेस्ट हो गयी यानी एकदम बेकार गयी। जरा सी कृतज्ञता की छोड़ो, बंदों के मुंह से दिखावे के लिए एक थैंक यू तक नहीं निकला। माफ़ी देने का कोई असर ही नहीं हुआ। मुर्गी जान से गयी और मियां जी को मजा ही नहीं आया। वर्ना चर्चा तो होनी चाहिए थी, आईआईटी दिल्ली में मोदी जी के दीक्षांत समारोह में पधारने की। आईआईटी के श्रेष्ठतम प्रदर्शन करने वाले छात्रों को मोदी जी के अपने कर-कमलों से पदक प्रदान करने की। आईआईटी के छात्रों के बहाने मोदी के जेन-ज़ी को इसका भरोसा दिलाने की कि संघ के स्वयंसेवक हुए तो क्या हुआ, वह भी छात्रों को प्रश्नाकुलता का उपदेश दे सकते हैं। पर चर्चा काहे की हो रही है? चर्चा हो रही इसकी कि मोदी जी के आने के लिए सुरक्षा इंतजामों के नाम पर, कई दिन पहले से छात्रों को कितना परेशान किया गया। मोदी जी के आने वाले दिन, कार्यक्रम हॉल में घुसने के लिए छात्रों को कैसी-कैसी चेकिंग से गुजरना पड़ा और लैपटाप, फोन, पानी की बोतल और क्या-क्या बाहर छोड़कर आना पड़ा। चर्चा हो रही है इसकी कि अपने बच्चों को डिग्री लेते देखने के लिए पहुंचे माता-पिता को कैसे घंटों बाहर ही इंतजार करना पड़ा, जब तक मोदी जी का कार्यक्रम समाप्त नहीं हो गया। और कई को तो डिग्री दिए जाने का कार्यक्रम, मोदी जी के फारिग होने के बाद पर खिसकाए जाने से, अपने बच्चे को डिग्री लेते देखना नसीब ही नहीं हुआ। बताइए! माफ़ी की कद्र करने वाला होता तो जेन-ज़ी, मोदी जी के दर्शन देने के लिए समय निकालने पर धन्य हो रहा होता या इसकी शिकायतें करता फिरता कि उसे ही नहीं, उसके माता-पिता को भी मोदी जी के आने की वजह से हैरान-परेशान होना पड़ा। जेन ज़ी के माता-पिता तो जेन ज़ी भी नहीं होंगे – मिलेनियल होंगे या और बहुत हुआ तो बूमर। अपनी झूठी-सच्ची शिकायतों में जो उन अंकिलों को भी घसीटने कोशिश करे, जिनमें बहुत सारे तो पक्के वाले भक्त रहे होंगे, वह जेन-ज़ी मोदी जी की माफ़ी पाने के लायक तो नहीं ही हो सकता है। भागवत जी को पता नहीं कैसे इस जेन ज़ी में, पहले वाली पीढ़ियों से ज्यादा ईमानदारी और देशभक्ति नज़र आ गयी। देश तो फिर भी अमूर्त है, मूर्त तो मोदी जी वाली पीएम की गद्दी ही है – जिसके मन में मोदीभक्ति नहीं जागी, उसके मन में देशभक्ति कैसे जागेगी? और बात सिर्फ सुरक्षा इंतजामों की वजह से हैरान होने की ही हो रही होती, तब भी समझा जा सकता था। शिकायत करने वाले भी ज्यादा से ज्यादा यही तो कह रहे होते कि इससे तो अच्छा था कि मोदी जी सशरीर दर्शन देते ही नहीं। मोदी जी के लिए वह कौन-सा मुश्किल था? मोदी जी प्रौद्योगिकी से डरते नहीं हैं, वह तो प्रौद्योगिकी पर मरते हैं। 2020 में कोरोना के टैम में मोदी जी ने इसी आईआईटी के, इसी कार्यक्रम में, अशरीर यानी वर्चुअल रूप में हिस्सा लिया भी तो था। वह तो जेन-ज़ी पर प्यार आ गया, वर्ना एक बार फिर वर्चुअली पहुंच सकते थे। पर बात हो रही है, छात्रों के सामने प्रधानमंत्री के संबोधन की। बात इसकी हो रही है कि मोदी जी ने आईआईटी छात्रों को प्रश्नाकुलता का उपदेश तो खूब दिया, पर उसमें भी अपने प्रिय छोटे भाई, बागेश्वर बाबा का पुछल्ला क्यों जोड़ दिया? आगे विज्ञान किधर जाएगा, यह मोदी जी को नहीं पता है, मोदी जी का यह स्वीकार करना तो ठीक है। लेकिन, बागेश्वर बाबा को पता होगा, का इशारा क्यों? क्या आईआईटी के छात्रों की शिक्षा में इसी ‘‘वैज्ञानिकता’’ की कमी थी, जिसकी पूर्ति के लिए मोदी जी का दीक्षांत भाषण जरूरी था! जिस जेन-ज़ी को मोदी जी के भाषण से ही प्रॉब्लम हो, उस पर मोदी जी को अपनी माफ़ी बर्बाद क्यों करनी थी? और बात सिर्फ मोदी जी के उपदेश तक ही रहती, तब भी गनीमत थी। उपदेश आजकल वैसे भी सुनना ही कौन चाहता है? वर्ना क्या मोदी जी आधी रात को जाग-जाग कर रील बना रहे होते? और क्या भागवत जी पब्लिक को दिखाकर प्रश्नोत्तरी खेल रहे होते और वह भी जेन-ज़ी के एक प्रतिनिधि के साथ! जेन ज़ी को उपदेश नहीं सुनना है, तो वह भी सही। पर यहां तो चर्चा इसकी हो रही है कि प्रधानमंत्री से जिन्हें पदक पाना था, उन्हें इसकी ट्रेनिंग क्यों दी जा रही थी कि मोदी जी के सामने कितना झुक कर खड़े होना है? सिर्फ इतना नहीं कि झुक कर खड़े होना था। यह भी बताया जा रहा था कि कितनी डिग्री झुक कर खड़े होना है — नब्बे डिग्री से थोड़ा कम ही सही, पर नब्बे डिग्री के कितने करीब? और यह सबसे मेधावी छात्रों के लिए था। यह तो मेधा को सत्ता के आगे झुकाना हुआ! पहली बात तो यह है कि इस मामले में सत्ता को बीच में लाना ही गलत है। पदक अमूर्त प्रधानमंत्री को नहीं, मूर्त मोदी जी को देने थे। पदक पाने वालों को झुककर मोदी जी के सामने खड़ा होना था। और चूंकि मोदी जी मूर्त हैं, उनकी एक उम्र भी है। जेन ज़ी के साथ संवाद के चक्कर में मोदी जी के रील-रील खेलने पर और मोदी जी के योगा के वीडियो पर मत जाइए, मोदी जी बाकायदा बुजुर्ग हैं। छियत्तर साल से ज्यादा के बुजुर्ग। और बुजुर्गों के सामने झुकना, यह तो हमारी संस्कृति है। और कुछ भी हो जाए, मोदी जी संस्कृति और धर्म के मामले में समझौता नहीं करने वाले हैं। वह तो शिक्षा में संस्कृति और धर्म को धंसाने के लिए, पूरी की पूरी नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति ही लाए हैं। बेशक, इसे शिक्षा में धंधा घुसाने के लिए भी लाए हैं, पर उतना ही संस्कृति और धर्म धंसाने के लिए भी लाए हैं। जेन-ज़ी वालों को तो शुक्रगुजार होना चाहिए कि उनसे मंच पर चरण स्पर्श नहीं कराया गया, वर्ना परंपरा और संस्कृति तो उसकी भी है। और जो ज्यादा तेवर दिखाए, दक्षिणा में उसका अंगूठा काट लेने की भी। हमें तो लगता है कि ये रील-वील बनाने से काम चलने वाला नहीं है। दिल्ली आईआईटी की तरह, जेन-ज़ी को सशरीर दर्शन देने से भी नहीं और दर्शन के समय वैदिक मंत्रों का पाठ कराने से भी नहीं। अब मोदी जी को अपने मंदिर के बिहार वाले प्रस्ताव को फास्ट ट्रैक करना पड़ेगा। अब तो जब मोदी जी खुद भगवान बनेंगे, तभी ये जेन-ज़ी और जेन-वाई के तूफान थमेंगे। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।) Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन माफ़ी का स्वांग : प्रतिशोध का एलान सैकड़ों मजदूरों ने कलेक्ट्रेट पर किया प्रदर्शन, कहा : आम जनता पस्त, लेकिन मोदी मस्त, उन्हें जाना ही होगा