(आलेख : कृष्ण प्रताप सिंह)

2014 में ‘महानायकत्व’ के अजीबोगरीब दर्प से भरे नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनाव जीतकर प्रधानमंत्री बने और उन्होंने ताबड़तोड़ विदेश यात्राएं शुरू कीं, तो उनके ‘आह्लादित’ भक्त जोर-शोर से दावे करने लगे थे कि अब पूरी दुनिया में उनका डंका बजने लगा है। इतना ही नहीं, वे देश का मान इतना बढ़ा दे रहे हैं कि उसका विश्वगुरुत्व पूरी तरह असंदिग्ध हो गया है।

लेकिन अब उनकी सत्ता के बारहवें साल में हम यह देखने को विवश हैं कि दुनिया भर में बज रहा वह डंका नीदरलैंड में वहां के प्रधानमंत्री रॉब येटेन द्वारा उनसे बातचीत से पहले एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में भारत में प्रेस/पत्रकारों/अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, अल्पसंख्यकों के अधिकारों और सामाजिक समावेशिता के क्षरण व ‘गंभीर दबाव’ में होने को लेकर जताई गई चिंता से, क्या पता, सकते में आकर या तिलमिलाकर, फट गया, नक्कारखाने में तूती की आवाज या कि अपने विलोम में बदल गया है।

इस सिलसिले में समझने की सबसे जरूरी बात यह है कि येटेन की इस चिंता का कोई मतलब नहीं रह जाता, अगर वह सचमुच (जैसा कि मोदी सरकार और भक्त कभी प्रत्यक्ष, तो कभी अप्रत्यक्ष दावे कर रहे हैं) भारत के बारे में उनकी ‘नासमझी’ के कारण या अपने राजनीतिक स्वार्थों के दबाव में जताई गई होती, क्योंकि तब अपनी आज़ादी व अधिकारों का समुचित उपभोग कर रहे भारत के सच्चे मीडियाकर्मी, पत्रकार और अल्पसंख्यक अपने सच्चे देशप्रेम के तकाजे से येटेन को अपनी ओर से खुशी-खुशी जवाब देकर गलत ठहरा रहे होते।

निस्संदेह, वह हमारे लोकतंत्र के लिए बहुत गौरव का क्षण होता। लेकिन हम जानते हैं कि चूंकि ये सभी समुदाय मोदी सरकार के हाथों पीड़ित हैं, इसलिए ऐसा नहीं कर रहे। तिस पर कौन जाने, उनको संतोष का अनुभव हो रहा हो कि येटेन ने उनकी तकलीफें समझीं और उन्हें शब्द दिए।

ऐसे में स्वाभाविक ही, येटेन को जवाब देने की सारी जिम्मेदारी मोदी सरकार, उनके अफसरों और भक्तों को उठानी पड़ रही है और किसी तार्किकता के अभाव में उनके द्वारा जो ‘जवाब’ दिए जा रहे हैं, उनमें जवाब कम और खीझों व झुंझलाहटों का प्रदर्शन ज्यादा दिख रहा है।

*सिर्फ ‘चौधरी’ से ज्ञान!*

इसकी एक नजीर एक भक्त का वह ‘जवाब’ भी है, जिसमें उसने ‘गरजते’ हुए कहा है कि महज 1.6 करोड़ की आबादी वाले (आशय उसे पिद्दी-सा बताना होगा) देश नीदरलैंड की मजाल कि उसका प्रधानमंत्री दुनिया के सबसे ज्यादा आबादी वाले देश भारत को ज्ञान दे! वह भी इस मुद्दे पर कि अल्पसंख्यकों से कैसा व्यवहार किया जाना चाहिए?

इस भक्त के अनुसार : येटेन के देश की जितनी कुल आबादी नहीं है, उससे दस-बारह गुना ज्यादा खांटी भारतीय मुसलमानों की है। बंटवारे के वक्त भारत में अल्पसंख्यकों की जो आबादी ग्यारह प्रतिशत थी, वह अब बढ़कर बीस प्रतिशत से ज्यादा हो गई है। लेकिन येटेन भारत की विशाल और शानदार संस्कृति को समझ ही नहीं पा रहे।

क्या अर्थ है इसका? क्या यही नहीं कि निर्गुट आंदोलन के संस्थापक रहे भारत पर थोप दिए गए ‘विश्वगुरुत्व’ ने उसके निजाम को मूर्खों के ऐसे स्वर्ग में ला खड़ा किया है, जहां उसे लगता है कि नीदरलैंड जैसे पिद्दी से देश से उसने जरा-सा भी ज्ञान ले लिया (पढ़िए: आईना देखा), तो उसकी बहुत हेठी हो जाएगी।

इसके चलते कई भक्त आगे बढ़कर यह कहने की हद तक चले जा रहे हैं कि हजारों-हजार साल की सभ्यता वाले भारत को यूरोप से समावेशी विचार सीखने की भी आवश्यकता नहीं है।

तो क्या इसका मतलब यह समझा जाए कि अब भारत को दुनिया के गिने-चुने ‘चौधरियों’ से ही ‘ज्ञान’ लेना अभीष्ट है, जिनमें से एक अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ज्ञानदान का तो वह मोहताज ही होकर रह गया है? अगर हां, तो यह प्रश्न भी बनता ही है कि क्या यह मोहताजी उसके लोकतांत्रिक गौरव के अनुकूल है?

फिलहाल, भक्त इसका कोई सीधा जवाब नहीं दे रहे। उल्टे पूछ रहे हैं कि येटेन ने अपनी चिंता भारत व नीदरलैंड, दोनों देशों की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस करके क्यों नहीं व्यक्त की, क्यों उसे जताने के लिए पहले ही अकेले प्रेस से बात कर ली और क्यों मोदी की यात्रा के बाद संयुक्त प्रेस स्टेटमेंट भर जारी किया?

जैसे कि संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस होती, तो रात का दिन हो जाता और येटेन द्वारा उसमें यह चिंता व्यक्त की जाती, तो मोदी का प्रेस कॉन्फ्रेंसों में सवालों के तुर्की-ब-तुर्की जवाब देने का दुग्धधवल रिकार्ड काम आ जाता और येटेन की चिंता सिरे से खारिज हो जाती!

यह चमत्कार होना होता, तो उस नार्वे में भी हो जाता, जहां की पत्रकार हेले ल्यूंग ने नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास स्टोरे और मोदी की मुलाक़ात के बाद मोदी से पूछा कि वे नार्वे के दुनिया के सबसे स्वतंत्र मीडिया के पूछे सवालों के जवाब क्यों नहीं देते (ज्ञातव्य है कि वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में नार्वे पहले स्थान पर है और भारत 157वें स्थान पर), तो उनको कोई जवाब देना गवारा नहीं हुआ।

इसके बावजूद कि पत्रकार ने उनका लिफ्ट तक पीछा किया और बाद में भारतीय विदेश मंत्रालय की प्रेस कॉन्फ्रेंस में भारत में मानवाधिकारों के उल्लंघन और मोदी के कठिन व असुविधाजनक सवालों के जवाब नहीं देने से जुड़े प्रश्न पूछे। साथ ही, यह भी कि ऐसे में कोई देश भारत पर भरोसा क्यों कर करें?

*इस बखान का हासिल?*

लेकिन मंत्रालय ने भी उसको माकूल जवाब नहीं ही दिया और बदले में भारत की उपलब्धियों और महानताओं का बखान शुरू कर दिया। यह कहते हुए कि भारत 1.4 अरब लोगों का दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है, जिसकी 5000 साल से अधिक पुरानी नाना प्रकार की विविधताओं से भरी सभ्यता है। हर धर्म के लोग, अतीत में जब भी दुनिया के किसी हिस्से में उनका उत्पीड़न हुआ, भारत आए और फले-फूले….हम दुनिया की कुल आबादी का छठा हिस्सा हैं, लेकिन दुनिया की समस्याओं का छठा हिस्सा नहीं। हर अल्पसंख्यक हमारे यहां फलता-फूलता है।

इतना ही नहीं, मंत्रालय ने प्रेस की स्वतंत्रता के सवाल को गोल-गोल घुमाया और उससे जुड़ी चिंता को सर्वथा नकार कर कह दिया कि भारत कुछ ज्यादा ही ‘शोरगुल वाला लोकतंत्र’ है, जिसमें हर किसी को अभिव्यक्ति व प्रेस की स्वतंत्रता प्राप्त है।

काश, मोदी और उनकी सरकार दोनों समझते कि दुनिया न भारत की विविधताओं से भरी सभ्यता और उसकी प्राचीनता से अनजान है और न इससे कि वे तभी उसका इतना गुणगान करते या उसकी शरण में जाते हैं, जब पाते हैं कि उनकी उस सभ्यता की विरोधी कारस्तानियों से मलिन या धूमिल हुई उनकी छवि किसी और तरह से उजली नहीं होने वाली।

पिछले बारह सालों में उन्होंने इस सभ्यता से दुश्मनी निभाते हुए देश के हालात को अनजाने में यहां तक थोड़े पहुंचाया है, जान बूझकर पहुंचाया है — इरादतन। वे यह दुश्मनी नहीं निभाते, तो न वह चिंता पैदा होती, येटेन ने जिसे अभिव्यक्त किया, न वे असुविधाजनक सवाल, जिन्हें पूछे जाने पर मोदी को प्रायः मौन साध लेना पड़ता है और जिनके चलते उनकी सवालों से भागने वाले ‘विश्वगुरु’ की छवि बनती जा रही है।

सोचकर हैरानी होती है कि अपनी सांप्रदायिक राजनीति पर गर्व करते हुए अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हेट स्पीच, मॉब लिंचिंग, धर्मांतरण व गौ-हत्या विरोधी कानूनों के दुरुपयोग व अनेक भेदभाव भरे आह्वानों के प्रति इतने ‘सहिष्णु’ बने रहकर वे यह उम्मीद भी कैसे कर पाते हैं कि दुनिया को इसकी कतई खबर नहीं होगी और वह माने रहेगी कि उनके राज में देश के अल्पसंख्यक पूरी तरह सुरक्षित और आश्वस्त हैं?

अगर बकरीद आते ही देश के सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले प्रदेश की सरकार धमकी के अंदाज में कहने लगेगी कि सड़कों पर नमाज पढ़ी गई, तो खैर नहीं, तो दुनिया को यह संदेश तो जाने से रहा कि भारत अभी भी समावेशी समाज बना हुआ है। और यह संदेश नहीं जाएगा तो कौन कह सकता है कि मोदी को अपनी यात्राओं में ऐसी स्थितियां बारंबार झेलनी नहीं पड़ेंगी।

उनको दुनिया भर में भारत का डंका बजाते-बजाते अचानक यह रोना भी रोने लग जाना पड़ेगा कि प्रेस व धार्मिक स्वतंत्रता के सूचकांक व रपटें तैयार करने वाली कई संस्थाओं व आयोगों का रवैया भारत-विरोधी और दुराग्रही है। फिर तो यह बताने की जरूरत भी पड़ेगी कि आपके लगातार डंका बजाने के बावजूद ऐसा क्यों है?

*और अंत में*

अंत में एक और बात। येटेन के सिलसिले में संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस की बात करने वाले भक्तों को कम से कम इतना तो याद रखना चाहिए था कि उन्होंने यह भी कहा है कि वे समय-समय पर भारत के साथ अपनी यह चिंता साझा करते रहे हैं, क्योंकि यह भारत में प्रेस की स्वतंत्रता भर की ही बात नहीं है, अल्पसंख्यकों के अधिकारों की भी है, जो गंभीर दबाव में हैं।

यह दबाव मुख्य रूप से मुस्लिम समुदाय पर है, लेकिन कई अन्य छोटे समुदायों पर भी इसका असर है। चिंता इस बात को लेकर भी है कि भारत किस हद तक ऐसा समावेशी समाज बना रह पाता है, जिसमें हर किसी को समान अधिकार मिलते हैं।

ऐसा है, तो मोदी की सरकार व उसके भक्तों द्वारा यह क्यों नहीं बताया जाता कि येटेन को समय-समय पर क्या जवाब दिए गए और ऐसे उपाय क्यों नहीं किए गए कि भारत के बारे में उनकी कथित नासमझी समझदारी में बदल जाए? अगर किसी कारण ऐसे उपाय नहीं हो पाए या उनको करना संभव ही नहीं था, तो सवाल है कि उनकी इस नासमझी के रहते मोदी अतिथि बनकर उनके देश गए ही क्यों? क्या अपनी और देश की भद पिटवाने? अगर हां, तो उसका हासिल तो यही हो सकता था, जो हुआ है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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