(आलेख : राजेंद्र शर्मा)

तमिलनाडु में आखिरकार, जनतंत्र को पांवों तले रोंदने की कोशिश विफल हो गयी। सिने स्टार विजय के नेतृत्व में, पहली बार चुनाव में उतरी पार्टी, टीवीके की सरकार को 10 मई को, चेन्नै में राज्यपाल, राजेंद्र आर्लेकर के शपथ दिलाने पर, जनतंत्र की परवाह करने वाले लोगों ने अवश्य ही राहत की सांस ली होगी। जैसा कि सभी जानते हैं, 4 मई को हुई मतगणना का एक नतीजा निर्विवाद था — तमिलनाडु की जनता का फैसला विजय के नेतृत्व में सरकार बनाने के पक्ष में था। हालांकि, 234 सदस्यीय विधानसभा में टीवीके की 108 सीटें ही आयी थीं और इस तरह वह पूर्ण बहुमत से दस सीट पीछे रह गयी थी, फिर भी जनता का फैसला साफ तौर पर उसके ही पक्ष में था। उसकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी और पिछले दस साल से सरकार चला रही डीएमके की सीटें पिछले चुनाव के मुकाबले आधी से भी कम होकर, 59 पर आ गयी थीं, जबकि उसकी पिछली बार की प्रतिद्वंद्वी, एआईएडीएमके को 47 सीटों पर ही जीत हासिल हुई थी। अदल-बदल कर 59 साल से तमिलनाडु में शासन संभाल रही इन दोनों पार्टियों को मिलकर भी, टीवीके जितनी सीटें हासिल नहीं हुई थीं। बहरहाल, संघ-भाजपा की  राजनीति में प्रशिक्षित और मोदी सरकार द्वारा नियुक्त राज्यपाल, आर्लेकर को तमिलनाडु की जनता का यह फैसला मंजूर नहीं हुआ।

चुनाव के नतीजे आने के फौरन बाद, कांग्रेस के 5 विधायकों ने जब विजय के नेतृत्व में सरकार के लिए समर्थन की घोषणा कर दी, इस तरह 113 विधायकों के समर्थन के बल पर उन्होंने राज्यपाल से मुलाकात कर सरकार बनाने का अपना दावा पेश किया था। लेकिन, राज्यपाल ने इसके बावजूद उन्हें सरकार बनाने का न्यौता दिए बिना लौटा दिया कि न सिर्फ विजय बहुमत के आंकड़े के बहुत नजदीक पहुंच चुके थे, बल्कि किसी अन्य पार्टी ने सरकार बनाने का दावा पेश ही नहीं किया था। राज्यपाल की दलील थी कि विजय, विधानसभा में पूर्ण बहुमत यानी 118 विधायकों के समर्थन का साक्ष्य, विधायकों द्वारा हस्ताक्षरित पत्र के रूप में जब तक पेश नहीं करेंगे, उन्हें राजभवन से (जिसका नाम अब लोकभवन कर दिया गया है) सरकार बनाने का आमंत्रण नहीं मिलेगा।

राज्यपाल आर्लेकर के इस तरह की शर्त लगाने की वैधता पर छिड़ी बहस में अनेक संविधान तथा कानून के जानकारों ने और यहां तक आम तौर पर मोदी सरकार की राय के साथ चलने वाले वरिष्ठ विधिवेत्ता तथा पूर्व-एडवोकेट जनरल, मुकुल रोहतगी तक ने राज्यपाल के ऐसी शर्त लगाने को अनाधिकार चेष्टा कहा था और उसके कदमों को एक कृत्रिम संकट पैदा करने वाला बताया था। बेशक, टीवीके नेता, शुरूआत में कोई 118 विधायकों के समर्थन का दावा नहीं कर रहे थे। लेकिन, भारत के संसदीय इतिहास की जरा-सी जानकारी रखने वाला भी यह बता देगा कि सरकार बनाने के लिए राष्ट्रपति/ राज्यपाल से आमंत्रण हासिल करने के लिए, ऐसा पूर्ण बहुमत का समर्थन जरूरी भी नहीं है। वास्तव में पिछले पचास साल के संसदीय इतिहास में ही राज्यों के स्तर पर ही नहीं, केंद्र के स्तर पर भी, अल्पमत सरकारें बनने और पूरे कार्यकाल तक चलने के भी अनेक चर्चित उदाहरण हैं। इनमें 1991 में बनी नरसिंह राव सरकार और 1996 में बनी अटलबिहारी वाजपेयी सरकार के उदाहरण भी शामिल हैं, जबकि बाद वाली सरकार तो वास्तव में तेरह दिन ही चल पायी थी। आर्लेकर की शर्त के हिसाब से तो ये सरकारें बन ही नहीं सकती थीं।

वास्तव में भारत में न तो विभाजित जनादेश वाले चुनाव कोई अनहोनी रहे हैं और न ही अल्पमत सरकारें और ऐसी स्थितियों में राज्यपालों के फैसलों और उनके पीछे केंद्र की भूमिका पर विवाद भी उठते रहे हैं। इसी की पृष्ठभूमि में केंद्र-राज्य संबंधों पर विचार के क्रम में 1988 के सरकारिया आयोग ने तथा फिर 2002 के वेंकटचेलैया आयोग ने और 2010 के पंछी आयोग ने, एक राय से इस पर फैसला दिया था कि पूर्ण बहुमत प्राप्त पार्टी के दावे के अभाव में, सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने के लिए राष्ट्रपति/ राज्यपाल को प्राथमिकता का क्या क्रम अपनाना चाहिए? सबसे पहले मौका अकेले सबसे बड़े चुनाव-पूर्व गठबंधन को मिलना चाहिए। ऐसा दावेदार न होने की सूरत में, स्थिर सरकार बना सकने की दावेदार अकेली सबसे बड़ी पार्टी को मौका दिया जाना चाहिए। चुनाव के बाद बने गठबंधनों का नंबर, उक्त दोनों के बाद आता है क्योंकि मतदाताओं ने उसके आधार पर वोट नहीं दिया होता है। और इतना ही स्पष्ट यह भी हो चुका है कि इस तरह नियुक्त किसी भी सरकार के बहुमत का परीक्षण, संबंधित सदन में होना चाहिए, न कि राजभवन में किसी तरह की गिनती से या समर्थन को लेकर उसकी निजी संतुष्टि के जरिए।

लेकिन, मोदी राज के बारह वर्षों में राज्यपालों की भूमिका को जिस तरह केंद्र सरकार के हाथों में  राजनीतिक हथियार बनाया गया है, उसके हिस्से के तौर पर राज्यपालों के रूप में छांट-छांटकर ऐसे संघ-भाजपा नेताओं तथा पूर्व-नौकरशाहों की नियुक्तियां की गयी हैं, जो सहर्ष केंद्र की राजनीति का औजार बनने के लिए तैयार रहते हैं। मोदीशाही ने तो राज्यपालों को फिर से सक्रिय राजनीति में लाकर, चुनाव लड़ाने की अनोखी मिसालें कायम की हैं, जो सत्ताधारी पार्टी और राज्यपाल के पद के अंतर के ही मिटाये जाने के सबूत हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि यह न सिर्फ मोदी सरकार की ज्यादा से ज्यादा सत्ता अपने हाथों में केंद्रित करने की हवस को ही दिखाता है, बल्कि संघ-भाजपा के बुनियादी संघीय व्यवस्था विरोधी, एकात्मक व्यवस्था-परस्त सोच से भी मेल खाता है। इसलिए, हैरानी की बात नहीं है कि जहां विपक्ष-शासित राज्यों में मोदी राज के बैठाए राज्यपाल, अपनी संवैधानिक भूमिका को भूलकर, निर्वाचित सरकारों के काम-काज में अड़चनें डालने तथा वास्तव में विपक्षी सरकारों के खिलाफ राजनीतिक अभियान चलाने में ही लगे रहे हैं। वास्तव में पिछले कुछ वर्षों में राज्यपालों के इन विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर बैठे रहने से लेकर, खासतौर पर उच्च शिक्षा संस्थाओं में नियुक्तियों में रोड़े अटकाने के खिलाफ, विपक्षी राज्य सरकारों को बार-बार उच्च न्यायालयों की शरण में जाना पड़ा है और सर्वोच्च न्यायालय तक को हस्तक्षेप करना पड़ा है। ऐसे राज्यपालों के जरिए, उक्त स्थापित व्यवस्था का उल्लंघन कर, सुविधा के तर्क से भाजपा की सरकारें बनवाने की कोशिशें नहीं की गयी होतीं, तो ही हैरानी की बात होती।

गोवा, मणिपुर, कर्नाटक और महाराष्ट्र आदि कई राज्यों में, इसी तरह से भाजपा की सरकारें थोपने की कोशिशें की गयी थीं, हालांकि कर्नाटक तथा महाराष्ट्र के मामलों में तब ये कोशिशें ज्यादा कामयाब नहीं रही थीं और बाद में भाजपा को ‘ऑपरेशन कमल’ का भी सहारा लेना पड़ा था। गोवा में 2017 में राज्यपाल के पद पर बैठायी गयी भाजपा नेता मृदुला सिन्हा ने 40 सदस्यीय सदन में, 17 विधायकों वाली कांग्रेस के दावे को अनदेखा कर, 13 विधायकों वाली भाजपा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर लिया। जाहिर है कि बाद में भाजपा ने तोड़-फोड़ और खरीद-फरोख्त के जरिए, बहुमत का भी जुगाड़ कर लिया। उसी वर्ष मणिपुर में, 28 विधायकों वाली कांग्रेस के दावे के अनदेखा कर, राज्यपाल ने 21 विधायकों वाली भाजपा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर लिया और उसे जोड़-तोड़ से बहुमत गढ़ने का मौका दे दिया। लेकिन, इसके अगले वर्ष कर्नाटक में राज्यपाल, वजूभाई वाला ने 224 सदस्यीय कर्नाटक विधानसभा में, कांग्रेस और जनता दल (सेकुलर) के चुनाव-बाद गठबंधन के बल पर, 115 विधायकों का समर्थन होने का दावा करने बावजूद, 104 विधायकों वाली भाजपा को सरकार बनाने का न्यौता ही नहीं दिया, उसे विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन का समय भी दे दिया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप कर, इस अवधि को घटाकर दो दिन कर दिया ताकि खरीद-फरोख्त के लिए ज्यादा मौका न रहे और येदियुरप्पा को बहुमत हासिल न होने के कारण इस्तीफा देना पड़ा। इसी तरह, भगतसिंह कोशियारी ने 2020 में महाराष्ट्र में देवेंद्र फडनवीस को मुंह अंधेरे मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी, जबकि विपक्षी महाराष्ट्र विकास अघाड़ी का चुनावोत्तर गठबंधन के रूप में बहुमत का दावा उनके सामने था। यह दूसरी बात है कि बहुमत न जुगाड़ पाने की वजह से तब देवेंद्र फडनवीस को भी इस्तीफा देना पड़ा था।

जाहिर है कि तमिलनाडु के राज्यपाल, आर्लेकर त्रिशंकु विधानसभा के सामने, भाजपा के लिए सुविधा के तर्क का वही खेल खेल रहे थे। लेकिन, भाजपा की तो तमिलनाडु विधानसभा में एक सीट ही आयी है और अन्नाद्रमुक के साथ उसका गठजोड़ भी, सरकार बनाने की किसी दावेदारी से कोसों दूर था। तब टीवीके की सरकार का रास्ता रोकने की कोशिश में केंद्र सरकार का क्या खेल हो सकता था? यह खेल था, द्रमुक के सरकार में रहने के लिए लालायित एक हिस्से के समर्थन से, जिसे टीवीके के जड़ पकड़ने में अपने अस्तित्व के लिए ही खतरा दिखाई दे रहा था, अन्नाद्रमुक की सरकार बनवाने का खेल। पर्दे के पीछे यह खेल तब तक जारी रहा, जब तक सीपीआई (एम) तथा सीपीआई ने और उनके दबाव में वीसीके तथा आईयूएमएल ने, जो सभी द्रमुक के साथ चुनाव-पूर्व गठबंधन में थीं, अपने 8 विधायकों के साथ टीवीके सरकार के लिए समर्थन देने की घोषणा नहीं कर दी। इस तरह, उसके समर्थन का आंकड़ा 121 हो गया।

दूसरी ओर, टीवीके सरकार में शामिल होने के लिए कांग्रेस ने जिस तरह द्रमुक के नेतृत्व वाले गठबंधन से नाता तोड़ने की घोषणा की थी, उसके विपरीत, इन पार्टियों ने स्पष्ट कर दिया कि जनता के हित के प्रश्नों पर दबाव और आंदोलन के साधन के रूप में, द्रमुक के नेतृत्व वाला व्यापक गठबंधन जारी रहना चाहिए। इसने न सिर्फ आर्लेकर से 118 विधायकों की समर्थन की शर्त पूरी कर, रविवार को विजय के नेतृत्व में तमिलनाडु में नयी सरकार के गठन का रास्ता खोल दिया बल्कि भाजपा और केंद्र के दूरगामी खेल के लिए, द्रमुक को  राजनीतिक रूप से अलग-थलग करने की चालों पर भी पानी फेर दिया। फिर भी राज्यपाल आर्लेकर ने टांग अड़ाने की आखिरी कोशिश में, नयी सरकार के लिए ज्यादा से ज्यादा 72 घंटे के अंदर अपना बहुमत साबित करने की शर्त लगा दी। यह खेल को केंद्र के हाथ से निकलने से रोकने की आखिरी हताश कोशिश है, जो खरीद-फरोख्त का बाजार गर्म होने की उम्मीद के भरोसे है, हालांकि द्रमुक के नयी सरकार को छ: महीने का समय देने के ऐलान के बाद, इस खेल के ग्राहक शायद ही मिलेंगे।

दूसरी ओर, राजेंद्र आर्लेकर समेत संघ-भाजपा नियुक्त राज्यपालों के आचरण से, इस बहस ने एक बार फिर तेजी पकड़ ली है कि भारत की संवैधानिक व्यवस्था में, राज्यपाल के पद की क्या वाकई कोई जरूरत भी है?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)

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