1. संविधान की सार्वभौमिक मताधिकार की अवधारणा पर हमला

वोट देने का अधिकार एक बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार है, जो समानता और सम्मान के अधिकार का अभिन्न अंग है।  भारत का संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत हर वयस्क नागरिक को इस अधिकार की गारंटी देता है। चुनाव आयोग द्वारा कराया गया एसआईआर नागरिकों को इसी अधिकार से वंचित करता है।

पश्चिम बंगाल में इस माह के अंत में दो चरणों में चुनाव होने जा रहे है। लेकिन एसआईआर के जरिए लगभग 90 लाख लोगों को मताधिकार से वंचित कर दिया गया हैं। इनमें से ऋचा घोष और सुप्रबुद्ध सेन जैसे कुछ नाम तो इस देश के अत्यंत प्रतिष्ठित लोग हैं। ऋचा घोष भारतीय महिला क्रिकेट टीम की सदस्य हैं और वे 2023 वर्ल्ड कप जीतने वाली टीम का हिस्सा थीं। वे सिलीगुड़ी नगर निगम की 19 नंबर वार्ड की निवासी हैं। उनका नाम “विचाराधीन मतदाताओं” की लिस्ट में हैं। इसी प्रकार, 88 वर्षीय सुप्रबुद्ध सेन चित्रकार नंदलाल बोस, जिन्होंने भारत के संविधान की मूल प्रति को सजाने का काम किया था, के पोते हैं। उनका और उनकी पत्नी दीपा सेन का भी नाम कट गया है। इसी प्रकार, नोबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन का नाम भी मतदाता सूची से कटते कटते बचा है, लेकिन सामान्य मतदाता की श्रेणी से हटकर अब वे एनआरआई भारतीय बन गए हैं और अब उन्हें अपना वोट डालने के लिए हर हालत में भारत आना पड़ेगा, क्योंकि एनआरआई को डाक मतपत्र की सुविधा नहीं मिलती।

लेकिन मतदाता सूची से बहिष्कृत होने वाले अधिकांश लोग अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय से जुड़े हैं और विशेष रूप से सामाजिक-आर्थिक रूप से हाशिए पर पड़े लोगों, दलित और आदिवासी समुदाय के लोगों के नाम हैं। इनमें मतुआ समुदाय के लोग भी बड़े पैमाने पर शामिल हैं, जो कई विधानसभा क्षेत्रों के नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं और जिनके लिए भाजपा ने सीएए के जरिए नागरिकता देने का वादा किया है। यह हास्यास्पद है कि बांग्लादेशी मतुआ समुदाय के लोगों को नागरिकता देना तो दूर, इस एसआईआर के जरिए मतुआ समुदाय के भारतीय नागरिकों का ही मताधिकार छीन लिया गया है। 

चुनाव आयोग के अनुसार, जिन लोगों का मताधिकार छीना गया है, उन्हें अब अपनी भारतीय नागरिकता साबित करना है, जबकि किसी व्यक्ति की नागरिकता का सवाल गृह मंत्रालय को हल करना है। विपक्षी दलों का कहना है और जिसे उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में भी अपना तर्क बनाया है कि चुनाव आयोजनों अधिकारों का अतिक्रमण कर रहा है। जो भी हो, इतने बड़े पैमाने पर, लोगों को मताधिकार से वंचित करना, संविधान की सार्वभौमिक मताधिकार की अवधारणा पर ही एक गंभीर हमला है। इसलिए वोट देने के संवैधानिक अधिकार की गारंटी भारत के चुनाव आयोग को हर कीमत पर देनी चाहिए।

मीडिया रिपोर्टों से पता चलता है कि पश्चिम बंगाल में 90 लाख से अधिक मतदाता के नाम, जो राज्य के मतदाताओं का लगभग 12 प्रतिशत है, मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए हैं। मतदाताओं की एक महत्वपूर्ण संख्या को “निर्णय के अधीन” की श्रेणी में रखा गया था, जिस पर आज तक कोई सार्थक सुनवाई नहीं हुई है। इस प्रकार, मतदाता सूचियों के नियमित प्रशासनिक अद्यतन के विपरीत, एसआईआर बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित करने की एक व्यवस्थित कवायद का प्रतिनिधित्व करता है, जो “तार्किक विसंगति” जैसे मनमाने मानदंडों और पारदर्शी, क्षेत्र-आधारित सत्यापन के बजाय एल्गोरिदम-संचालित बहिष्करण पर बढ़ती निर्भरता द्वारा पहचाना जाता है। उल्लेखनीय है कि तार्किक विसंगति की यह नई श्रेणी बंगाल एसआईआर के लिए ही लागू की गई है, किसी अन्य राज्य के लिए नहीं। पहले की कवायदों के विपरीत, मतदाता को अब एक “संदिग्ध” के रूप में माना जाता है और अपनी नागरिकता साबित करने का बोझ उस पर ही डाल दिया गया है।

सर्वोच्च न्यायालय में द्वारा गठित न्यायिक तंत्र भी लगातार प्रभावी रूप से काम करने में असफल रही है, जिससे ऐसे बहिष्कृत मतदाता अपनी समस्या निवारण के किसी भी सार्थक उपाय से वंचित है। चुनाव आयोग ‘चालाक आयोग’ बन गया है और उसने गैर-विश्लेषण योग्य प्रारूपों में मतदाता सूचियां जारी की हैं, जिससे किसी भी प्रकार की सार्वजनिक जांच को रोका जा सके।

इतने बड़े पैमाने पर लोगों को मतदाता सूचियों से बाहर करना स्वीकार नहीं किया जा सकता। ऐसी हालत में, जब इस प्रक्रिया की वैधता पर ही न्यायालय विचार कर रहा हो, फिलहाल समाधान यही है कि इन 90 लाख लोगों को वोट देने का अधिकार दिया जाएं,जब तक कि प्रत्येक व्यक्ति के मामले का कोई स्थायी समाधान न निकल जाएं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इन लोगों को मताधिकार फिलहाल इस विधानसभा चुनाव में मताधिकार सेवांचित करके “जो चल रहा है, जैसा चल रहा है, चलने दो” वाली मानसिकता का परिचय दिया है। ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट ने भाजपा को अपने लिए नागरिकों  और मतदाताओं का चयन करने की छूट दे दी है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देश के लोकतंत्र पर बढ़ रहे खतरों और हमलों को और तीखा बनाएगा।
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2. एनसीआर में मजदूर आंदोलन : किसके पक्ष में खड़ी है भाजपा सरकार?

नोएडा-दिल्ली-एनसीआर ये तीनों सटे हुए क्षेत्र हैं, जहां हजारों फैक्टरियां और कंपनियां हैं और इनमें लाखों मजदूर काम करते हैं। न्यूनतम मजदूरी देने की मांग को लेकर हरियाणा से उठी मांग में ये तीनों क्षेत्र भी पिछले चार दिनों में शामिल हो गए हैं। इस जायज मांग पर आंदोलनकारियों पर पुलिस की नाजायज सख्ती के कारण हिंसा भड़क उठी है और आगजनी की वारदातें हुई है। इस मजदूर आंदोलन ने पिछले एक दशक से ज्यादा से जारी भाजपा राज का असली चेहरा सामने ला दिया है।

और मजदूरों की मांगें क्या है? वे न्यूनतम मजदूरी की मांग कर रहे हैं, वे अतिरिक्त काम के उचित भुगतान की मांग कर रहे हैं, वे समय पर वेतन देने की मांग कर रहे हैं और वे छुट्टी के प्रावधानों को लागू करने की मांग कर रहे हैं। इन मांगों में नाजायज क्या हैं? ये सब प्रावधान तो हमारे श्रम कानूनों में और हाल फिलहाल पारित श्रम संहिताओं में पहले से ही मौजूद हैं। फिर मजदूरों को इन अधिकारों और सुविधाओं को पाने के लिए सड़कों पर उतरना क्यों पड़ा है?

वर्ग विभाजित समाज की असली कहानी यही है कि विधानमंडल कितने भी अच्छे कानून बना लें, यदि उसे लागू करवाने वाली मशीनरी, शासन और प्रशासन, लूटेरों  के साथ खड़ा है, तो गरीबों को न्याय की उम्मीद भी नहीं करना चाहिए। बाबा साहेब ने यही तो कहा था कि हमने दुनिया का सर्वोत्तम संविधान बनाया है, लेकिन इसे लागू करने की शासन में इच्छाशक्ति नहीं होगी, तो यह संविधान बदतर साबित होगा। पिछले एक दशक में मोदी का शासन शोषित मजदूरों के पक्ष में नहीं, लूटेरे कॉरपोरेटों के साथ ही खड़ा रहा है।

आज मजदूरों की असली हालत क्या है? मजदूर न्यूनतम वेतन बढ़ाने की मांग कर रहे हैं, क्योंकि जिस रफ्तार से महंगाई बढ़ रही है, उससे वे जानवरों की तरह जिंदा रहने की हालत में भी नहीं रह गए हैं। लेकिन इस सरकार ने जो न्यूनतम मजदूरी घोषित भी की है, कारखानों के मालिक इस मजदूरी से भी उन्हें वंचित रखे हुए हैं और इस बात को छिपाने के लिए वे मजदूरों को कानूनी रूप से अनिवार्य वेतन स्लिप भी नहीं दे रहे हैं।

सरकार ने श्रम कानून में बदलाव कर मालिकों को मजदूरों से 12 घंटे काम करा सकने की छूट दे दी है। इसके लिए अतिरिक्त भुगतान का प्रावधान है। लेकिन आज की हकीकत यह है कि 8 घंटों के लिए घोषित मजदूरी पर ही 12 घंटों तक काम लिया जा रहा है। श्रम संहिता में काम के अधिकतम घंटों के साथ न्यूनतम छुट्टियों का भी प्रावधान है, लेकिन काम के घंटे तो बढ़ा दिए गए हैं और छुट्टियों से उन्हें वंचित कर दिया गया है।

मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी कितनी है? हमारे देश में अलग-अलग राज्यों में मजदूरों की अलग-अलग श्रेणियों के हिसाब से यह मजदूरी 12 से 15 हजार रूपये मासिक निर्धारित है। वास्तविक मजदूरी उन्हें इससे भी कम मिलती है। इस मजदूरी में उन्हें अपने कम से कम 5 सदस्यों के परिवार को पालना पड़ता है। परिवार को पालने का मतलब है : मकान के किराए का इंतजाम, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, परिवार के सदस्यों के स्वास्थ्य की देखभाल, उनके पोषण-आहार और पेट भरने का इंतजाम, परिवहन व्यय और वे सभी आवश्यक खर्च, जो एक इंसान के जिंदा रहने के लिए जरूरी है।

सरकारी आयोगों का भी मानना है कि आज एक मजदूर के परिवार को जिंदा रखने के लिए उन्हें न्यूनतम 30 हजार रूपये मजदूरी मिलना चाहिए।

सवाल यही है कि जब अनुपातहीन ढंग से पूंजीपतियों के मुनाफे बढ़ रहे हैं, तो मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी क्यों नहीं बढ़नी चाहिए? मजदूर यदि न्यूनतम मजदूरी और अपने अधिकारों की मांग करते हैं, तो आंदोलन में पाकिस्तान का हाथ कहां से आ जाता है या वह नक्सल प्रेरित आंदोलन कैसे बन जाता है? मोदी सरकार को साफ करना चाहिए कि कानूनों का उल्लंघन करने वाले कारखाना मालिकों के खिलाफ कार्यवाही करने के बजाए वह मजदूरों के आंदोलन को कुचलने पर आमादा क्यों है?

(टिप्पणीकार अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)

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