(आलेख : प्रबीर पुरकायस्थ, अनुवाद : संजय पराते) वेनेजुएला में अमेरिकी युद्ध के बाद, जिसमें अमेरिका ने निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस डी मादुरो को गिरफ्तार कर लिया और एक आज्ञाकारी डेल्सी रोड्रिगेज को सत्ता सौंप दी, अब अमेरिका ने नई कठपुतली सरकार के साथ एक तेल समझौता किया है। अमेरिका ने बिना कोई निवेश किए अपनी बनाई एक नई तेल कंपनी — नॉर्थ अमेरिकन ब्लू एनर्जी पार्टनर्स (नाबेप) — में 35% हिस्सेदारी पक्की कर ली है। इस सौदेबाजी में अमेरिका का चुना हुआ साझेदार एलेजांद्रो बेटनकोर्ट है, जो वेनेजुएला के तेल की इस लूट में बहुलांश शेयर रखेगा। वेनेजुएला की कठपुतली सरकार ने नाबेप को 17 तेल क्षेत्रों के संचालन के लिए सौ साल की छूट दी है, जो देश के सुरक्षित तेल भंडार का लगभग एक चौथाई है, जो दुनिया के किसी भी देश से सबसे ज़्यादा है : दुनिया के कुल सुरक्षित तेल भंडारों का 17.2%। अमेरिकी दिग्गज शेवरॉन के बाद एलेजांद्रो बेटनकोर्ट और उनकी कंपनी अब वेनेजुएला की दूसरी सबसे बड़ी निजी तेल उत्पादक कंपनी बन गई है। इस समझौते से नाबेप को वेनेजुएला के तेल क्षेत्र में केंद्रीय स्थान मिलता है, जिसके पास दुनिया का सबसे बड़ा वास्तविक कच्चा तेल भंडार है। यह कंपनी पहले से ही वेनेजुएला की दूसरी सबसे बड़ी निजी तेल उत्पादक है। ट्रंप ने इस एकपक्षीय समझौते को ‘विश्व इतिहास का सबसे बड़ा तेल सौदा’ बताया है, जिसमें अमेरिका ने एक भी पैसा निवेश किए बिना कंपनी का एक तिहाई से अधिक हिस्सा हासिल कर लिया है। इस समझौते के तहत अमेरिका को प्राथमिकता के आधार पर कंपनी के तेल उत्पादन का 20%, बाजार मूल्य के बजाय लागत मूल्य पर, खरीदने का अधिकार और शेष 80% को खरीदने से मना करने का पहला अधिकार भी मिलता है। अमेरिका को न केवल बोर्ड की सभी नियुक्तियों पर वीटो का अधिकार है, बल्कि यह शर्त भी रखी गई है कि कंपनी के बोर्ड के अधिकांश सदस्य अमेरिकी नागरिक होने चाहिए। यह शायद उत्तर-औपनिवेशिक युग में देखी जा रही सबसे स्पष्ट नव-औपनिवेशिक सौदेबाजी है। इस इतिहास में, हमें इस तथ्य को अपनी दृष्टि से ओझल नहीं करना चाहिए कि अमेरिका और उसके सहयोगियों द्वारा शावेज़ सरकार के दौरान बर्बर प्रतिबंध लगाने से पहले वेनेज़ुएला एक महत्वपूर्ण तेल उत्पादक देश था। शावेज़ ने वेनेज़ुएला की तेल कंपनियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था, और उसके जवाब में अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगियों ने उसके सभी तेल निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसके परिणामस्वरूप, वेनेज़ुएला का तेल निर्यात, जो दुनिया के कुल निर्यात के लगभग 12 प्रतिशत था, घटकर 1 प्रतिशत से भी कम रह गया। सोवियत संघ के पतन और इस अवधि के दौरान समाजवादी ताकतों के कमजोर होने से लैटिन अमेरिका को भारी नुकसान हुआ, जहां अमेरिका ने मोनरो सिद्धांत के संशोधित रूप के जरिए अपने नव-औपनिवेशिक वर्चस्व को फिर से स्थापित करने का प्रयास किया है। ट्रंप ने वर्ष 2025 के अपने राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति दस्तावेज़ में स्पष्ट रूप से इसका समर्थन किया है और इसे अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के अपने दर्शन के रूप में उद्धृत करना जारी रखा है, जिसे विश्लेषक ‘डोनरो’ सिद्धांत की संज्ञा देते हैं। लैटिन अमेरिका के लिए सौभाग्यवश, ब्राज़ील और ब्राज़ील के लोग वेनेज़ुएला जैसी स्थिति में पहुँचने से बाल-बाल बचे हैं। राष्ट्रपति लूला की जीत और बोल्सोनारो की हार ने ब्राज़ील को दूसरा वेनेज़ुएला बनने और उसके विशाल तेल भंडारों पर कब्ज़ा होने से बचा लिया है। हालांकि अमेरिका ने वेनेजुएला में तेल का एक महत्वपूर्ण अतिरिक्त स्रोत सुरक्षित कर लिया है, लेकिन वेनेजुएला के कच्चे तेल के साथ एक समस्या है। वेनेजुएला के तेल की कहानी का दूसरा पहलू यह है कि उसके अति-भारी कच्चे तेल को कैसे परिष्कृत किया जाए। यद्यपि कच्चे तेल को कारों और बसों के लिए पेट्रोल और डीज़ल जैसे उपयोगी ईंधन में बदला जा सकता है, लेकिन इसके शोधन की लागत कच्चे तेल के प्रकार के अनुसार काफी बदल जाती है। आज केवल कुछ ही शोधन संयंत्र वेनेज़ुएला के अति-भारी कच्चे तेल को परिष्कृत कर सकते हैं। वेनेजुएला के कच्चे तेल की समस्या को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि कच्चा तेल होता क्या है और इससे क्या प्राप्त किया जा सकता है। जब हम कुएं की खुदाई के बाद तेल निकालते हैं, यानी तेल की खोज करते हैं, तो इसका अर्थ यह है कि हमने तरल हाइड्रोकार्बन की एक विशाल श्रृंखला में से एक विशिष्ट तेल का पता लगाया है। यह हल्के कच्चे तेल से लेकर भारी, गाढ़े कच्चे तेल तक होता है, जो लगभग अर्द्ध-ठोस रूप ले लेता है। हल्के कच्चे तेल को भारी कच्चे तेल की तुलना में परिष्कृत करना आसान होता है। एक और जटिलता कच्चे तेल में सल्फर की मात्रा है : यदि यह कम है, तो इसे ‘स्वीट’ (मीठा) कहा जाता है; यदि यह अधिक है, तो इसे ‘सावर’ (खट्टा) कहा जाता है। स्पष्ट रूप से, खट्टे कच्चे तेल की तुलना में मीठे कच्चे तेल को प्राथमिकता दी जाती है, क्योंकि इन्हें परिष्कृत करना आसान होता है। दोनों ही पैमानों पर, वेनेज़ुएला का कच्चा तेल एकदम विपरीत है : यदि यह अत्यधिक भारी नहीं, तो भी भारी है, विशेषकर ओरिनोको बेसिन का तेल, जो वेनेज़ुएला के अधिकांश कच्चे तेल का स्रोत है, और इसमें सल्फर की मात्रा भी अधिक है। अधिकांश तेल शोधक संयंत्र ऐसे कच्चे तेल को परिष्कृत नहीं कर पाते हैं और यह काम उन संयंत्रों के लिए छोड़ देते हैं, जिसमें विभिन्न प्रकार के कच्चे तेल को परिष्कृत करने के लिए पूंजी निवेश किया जाता है। भारी और खट्टे कच्चे तेल को परिष्कृत करने के लिए, तेल शोधक संयंत्रों के पास अतिरिक्त उपकरण और ऐसे उपकरणों की लंबी श्रृंखला होनी चाहिए, ताकि कच्चे तेल को क्रमिक रूप से प्रसंस्कृत किया जा सके। इस तरह के भारी और खट्टे कच्चे तेल को परिष्कृत करने का लाभ यह है कि इसकी जटिलता के कारण ये भारी छूट पर और काफी कम कीमत पर मिल जाते हैं। इसके अतिरिक्त, इससे प्राप्त होने वाले पदार्थों को भी बाजार में बेचा जा सकता है। इसका नकारात्मक पहलू यह है कि इससे संयंत्र की पूंजी लागत काफी बढ़ जाती है। इससे पहले, वेनेजुएला का कच्चा तेल अमेरिकी गल्फ कोस्ट (खाड़ी तट) के संयंत्रों में परिष्कृत किया जाता था। शावेज के शासनकाल में और उसके बाद वेनेजुएला पर लगे प्रतिबंधों के कारण, इन संयंत्रों ने अन्य स्रोतों की ओर रुख कर लिया। मीठा और आसानी से परिष्कृत होने वाले हल्के शेल ऑयल की खोज कारण, ज़्यादातर अमेरिकी तेल शोधन संयंत्रों के पास अब वेनेज़ुएला के कच्चे तेल को परिष्कृत करने की क्षमता नहीं बची है, कम से कम उन कीमतों पर तो बिल्कुल नहीं, जिससे ठीक-ठाक मुनाफा हो सके। यहीं पर, इस कहानी में रिलायंस का प्रवेश होता है। रिलायंस के जामनगर तेल शोधन संयंत्र की नेल्सन जटिलता रेटिंग 21 है। इसका अर्थ यह है कि यह संयंत्र कच्चे तेल के कई प्रकारों को परिष्कृत कर सकती है। यह दुनिया के उन संयंत्रों में से एक है, जिनकी जटिलता रेटिंग सबसे अधिक है, और यह दुनिया का सबसे बड़ा तेल शोधन संयंत्र भी है। परंतु जामनगर की यात्रा के पीछे अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का यही एकमात्र कारण नहीं है। रिलायंस ने अमेरिका के टेक्सास स्थित ब्राउन्सविले में प्रतिदिन 168,000 बैरल क्षमता वाले एक तेल शोधन संयंत्र में निवेश करने का भी वादा किया है, जो पिछले 50 वर्षों में अमेरिका में बनने वाला पहला तेल शोधन संयंत्र होगा। यह हमें तेल और उसके भू-सामरिक महत्व के व्यापक मुद्दों की ओर ले जाता है। अमेरिका-ईरान युद्ध और उसके बाद सऊदी अरब के साथ अंसारल्लाह-हूती युद्ध ने पश्चिमी एशिया के तेल पर अमेरिकी नियंत्रण को काफी कमजोर कर दिया है। हाँ, अमेरिका खुद तेल और गैस का एक बड़ा उत्पादक है। लेकिन यह काफ़ी नहीं है। चूंकि हाइड्रोकार्बन — तेल और गैस — वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए केंद्रीय महत्व के हैं, इसलिए वह वैश्विक राजनीति को नियंत्रित करने के लिए वैश्विक तेल प्रवाह का भी इस्तेमाल करना चाहता है। ईरान पर इज़राइली-अमेरिकी हमले और वेनेज़ुएला में तख्तापलट का महत्व यहीं है। अमेरिका वैश्विक राजनीतिक अर्थव्यवस्था को आकार देने के लिए वैश्विक तेल प्रवाह को नियंत्रित करना चाहता है। पश्चिमी एशिया में, प्रतिरोध के केंद्र के रूप में ईरान को नष्ट करने का उसका प्रयास न केवल विफल रहा है, बल्कि इस क्षेत्र में उसकी स्थिति भी काफी कमजोर हो गई है। वेनेजुएला में, उसने फिलहाल एक बड़ी जीत हासिल की है और वहां एक आज्ञाकारी डेल्सी रोड्रिगेज के कार्यभार संभालने के साथ उसके तेल पर नियंत्रण कर लिया है। भारत में वेनेजुएला के तेल को परिष्कृत करने की व्यवस्था से दो उद्देश्य पूरे होंगे : पहला, अमेरिका द्वारा बिक्री प्रक्रिया को नियंत्रित करते हुए वेनेजुएला के तेल को बाजार में लाना ; और दूसरा, भारतीय अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े खिलाड़ी को अमेरिका से जोड़ना। इस संदर्भ में, अमेरिकी विदेश मंत्री रुबियो का जामनगर यात्रा के लिए मुंबई में उतरना, और भारत में अमेरिकी राजदूत का यह कहना कि अमेरिका को उम्मीद है कि विदेश मंत्री जयशंकर उनसे वहीं मिलेंगे, भारत के लिए कूटनीतिक रूप से अच्छा नहीं है। यह अमेरिकी श्रम सचिव कीथ सोंडरलिंग के उस कदम के बाद आया है, जिसमें उन्होंने इंफोसिस, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज़, विप्रो, एचसीएल और अन्य बड़ी भारतीय आईटी कंपनियों समेत आठ कंपनियों को अपने भारतीय स्टाफ़ के लिए ग्रीन कार्ड मांगने से रोक दिया था। ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति का मूल आधार उन देशों को धमकाना है, जिन्हें वह कमजोर समझता है। सभी धमकाने वालों की तरह, उसके सामने झुकने से धौंस और बढ़ती है। एक दबंग के रूप में अमेरिका सिर्फ ताकत की भाषा समझता है। अमेरिका को अंबानी से सीधे बात करने की इजाजत देकर, भारत अपनी भू-सामरिक बढ़त को कमजोर कर रहा है। चूंकि भारतीय तेल शोधन संयंत्र कई तरह के कच्चे तेल को परिष्कृत कर सकती हैं, इसलिए किसी भी तेल कंपनी को शामिल करने से पहले बातचीत भारत सरकार के साथ होनी चाहिए। अगर रुबियो वेनेज़ुएला की उस तेल कंपनी की तरफ़ से बातचीत कर रहे हैं, जिसके पास कच्चा तेल है, तो लक्षित कंपनियों से संपर्क करने से पहले विदेश मंत्री के साथ बातचीत होनी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय राजनीति भू-रणनीतिक लाभ और आपसी लेन-देन का खेल है। ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका उन ‘अच्छे पुराने दिनों’ में लौटना चाहता है, जब मुट्ठी भर औपनिवेशिक और आबाद-औपनिवेशिक शक्तियों का दुनिया भर में राज हुआ करता था : वह उनके लिए सब कुछ लेने और कुछ न देने का दौर था। भारत को यह दृढ़तापूर्वक जताना होगा कि वे दिन अब लद चुके हैं। रूस से कच्चा तेल खरीदने के लिए भारत जैसे देशों पर अमेरिका प्रतिबंध नहीं लगा सकता। ऐसा इसलिए नहीं है कि अमेरिका खुद भी रूसी तेल खरीद रहा है, बल्कि इसलिए कि भारत को यह तय करने का संप्रभु अधिकार है कि वह किसके साथ व्यापार करे और कैसे करे। और धमकाने वालों के सामने झुकने से सिर्फ और सिर्फ, ज्यादा धमकियां ही मिलती हैं। (लेखक डिजिटल न्यूज पोर्टल न्यूज़क्लिक के संस्थापक और मुख्य संपादक हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650) Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन सात साल से फरार एनडीपीएस एक्ट का आरोपी मुंबई से गिरफ्तार, नारकोटिक्स विंग इंदौर की कार्रवाई Left-Congress Seat-Sharing Talks Continue in Tripura; 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