नई दिल्ली। देश में लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या बढ़ाकर 1500 किए जाने की मांग को लेकर बहस तेज होती जा रही है। इसे भारतीय लोकतंत्र के पुनर्गठन और सशक्त प्रतिनिधित्व से जोड़कर देखा जा रहा है। वर्तमान व्यवस्था में एक लोकसभा सांसद औसतन 25 से 40 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, जिसे कई विशेषज्ञ लोकतांत्रिक संतुलन के विपरीत मान रहे हैं।जानकारों का कहना है कि 1971 के बाद देश की जनसंख्या ढाई गुना से अधिक बढ़ चुकी है, लेकिन लोकसभा सीटों की संख्या लगभग स्थिर बनी हुई है। इससे निर्वाचन क्षेत्र अत्यधिक विशाल हो गए हैं, जहां जनप्रतिनिधियों के लिए मतदाताओं से सीधा संवाद और स्थानीय समस्याओं की गहराई तक पहुंचना कठिन हो गया है।विशाल निर्वाचन क्षेत्रों के कारण चुनावी खर्च भी तेजी से बढ़ा है। वर्तमान में एक लोकसभा चुनाव लड़ने का खर्च 5 करोड़ से 50 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। इसके चलते राजनीति में आर्थिक रूप से सक्षम उम्मीदवारों का वर्चस्व बढ़ रहा है, जबकि प्रतिभाशाली लेकिन सीमित संसाधनों वाले लोग पीछे छूट रहे हैं।संवैधानिक रूप से, अनुच्छेद 82 के तहत प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन का प्रावधान है, लेकिन 1976 और 2002 के संशोधनों के कारण यह प्रक्रिया लंबे समय तक स्थगित रही। अब 2026 के बाद परिसीमन की प्रक्रिया फिर से शुरू होने की संभावना है, जिससे प्रतिनिधित्व के ढांचे में बदलाव की उम्मीद जताई जा रही है।अंतरराष्ट्रीय तुलना में भी भारत की स्थिति चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है। यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, जर्मनी, जापान और अमेरिका जैसे देशों में प्रति सांसद जनसंख्या भारत की तुलना में काफी कम है। इससे वहां जनप्रतिनिधियों की पहुंच और जवाबदेही अधिक प्रभावी मानी जाती है।महिला आरक्षण के तहत लोकसभा सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव भी चर्चा में है, लेकिन कई विशेषज्ञ इसे अपर्याप्त मानते हैं। उनका तर्क है कि इससे न तो निर्वाचन क्षेत्रों का आकार कम होगा और न ही चुनावी खर्च में उल्लेखनीय कमी आएगी।इस संदर्भ में लोकसभा सीटों को बढ़ाकर 1500 करने का प्रस्ताव सामने आया है। इसके समर्थकों का कहना है कि इससे निर्वाचन क्षेत्र छोटे और अधिक प्रबंधनीय होंगे, चुनावी खर्च में कमी आएगी और सामान्य पृष्ठभूमि के लोगों के लिए राजनीति में अवसर बढ़ेंगे। साथ ही संसद में विविधता और नए विचारों का बेहतर प्रतिनिधित्व संभव होगा।विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का माध्यम नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व का आधार है। ऐसे में बढ़ती जनसंख्या के अनुरूप लोकसभा सीटों का पुनर्गठन समय की आवश्यकता बन गया है।लेखक विनोद कुमार वासनिक, मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव, ने इसे भारतीय लोकतंत्र के “पुनर्जन्म और विकास” से जुड़ा मुद्दा बताया है। उनका कहना है कि यदि देश को वास्तव में जन-केंद्रित शासन व्यवस्था बनानी है, तो प्रतिनिधित्व को संख्या के बजाय न्याय के आधार पर पुनर्परिभाषित करना होगा। View this post on Instagram Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading... Related पोस्ट नेविगेशन लाहौर में लश्कर संस्थापक आमिर हमजा पर हमला, गंभीर घायल शाजापुर में फैमिली ब्लैकमेल गैंग का भंडाफोड़, 33 लाख की ठगी