— डॉ. जेम्स पाल
(सामाजिक कार्यकर्ता)


इंदौर से जुड़ी हाल की तीन घटनाएँ हमें एक ही बात समझाती हैं—कानून और व्यवस्था की ताकत कम नहीं है, बल्कि उसे लागू करने की इच्छाशक्ति कमजोर पड़ जाती है।

पहला मामला, 13 साल पुरानी शिकायत का है, जिसमें हाई कोर्ट ने साफ कहा कि अगर अपराध का असर इंदौर में पड़ा है तो एफआईआर यहीं दर्ज होगी, भले ही घटना कहीं और हुई हो। यह निर्णय न केवल कानूनी रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि आम नागरिक के अधिकारों को मजबूत करता है।

दूसरा मामला, ऑनलाइन धोखाधड़ी का है, जहाँ एक व्यक्ति 7 साल तक अलग-अलग थानों और एजेंसियों के चक्कर काटता रहा। टीआई बदलते रहे, अधिकारी बदलते रहे, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। अंततः जब इच्छाशक्ति दिखाई गई, तब एफआईआर दर्ज हुई। सवाल यह है कि क्या यह काम पहले दिन नहीं हो सकता था?

तीसरा मामला, शहर में थाना सीमाओं (परिसीमन) को लेकर लगातार विवाद का है। अपराधी इसका फायदा उठा रहे हैं और पुलिस सीमाओं के नाम पर जिम्मेदारी से बचती नजर आती है। आम नागरिक को यह समझ ही नहीं आता कि उसकी शिकायत कौन सा थाना सुनेगा।

इन तीनों मामलों का सार एक ही है—
अधिकारी यदि चाहें, तो असंभव को भी संभव बना सकते हैं।
कानून में इतनी शक्ति है कि हर समस्या का समाधान निकाला जा सकता है, लेकिन जरूरत है सही नीयत और सक्रियता की।

अब प्रश्न उठता है—
कौन रोक रहा है वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को?
टीआई, एसीपी, डीसीपी जैसे पदों पर बैठे अधिकारी क्या इस समस्या को नहीं समझते? क्या परिसीमन का मुद्दा सुलझाना इतना कठिन है?

एक टीआई, एसीपी या डीसीपी के रूप में “जीरो एफआईआर” दर्ज कर कानूनी प्रक्रिया तुरंत शुरू की जा सकती है। भोपाल में राज्यपाल और पूरी सरकार मौजूद है—यदि इच्छा हो, तो इस मुद्दे का समाधान कुछ ही दिनों में किया जा सकता है।

हाई कोर्ट के न्यायाधीश ने एक बेहतरीन निर्णय देकर यह दिखा दिया कि कानून आज भी जिंदा है और न्याय संभव है।
तो फिर सवाल यही है—
क्या अधिकारियों को जनता के हित में काम करने से कोई रोक रहा है?

सच्चाई यह है कि—
कोई भी कानून किसी अधिकारी को अच्छे और वैध कार्य करने से नहीं रोकता।
यह पूरी तरह उस अधिकारी पर निर्भर करता है कि वह अपने पद की शक्तियों को कैसे समझता है और उनका उपयोग जनता के हित में करता है या नहीं।

साथ ही, यह भी उतना ही जरूरी है कि जो अधिकारी ईमानदारी से अच्छा काम कर रहे हैं, उन्हें वरिष्ठ अधिकारियों का पूरा सहयोग मिले—उन्हें हतोत्साहित या अनावश्यक दबाव में न डाला जाए, चाहे वह दबाव किसी भी प्रकार का क्यों न हो।

आज जरूरत है जिम्मेदारी लेने की, बहाने छोड़ने की और व्यवस्था को मजबूत करने की।
क्योंकि जब अधिकारी ठान लेते हैं, तो हर समस्या का समाधान संभव है।

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