(आलेख : अखिलेश यादव)

भारत के स्वतंत्रता संग्राम के विशाल और उथल-पुथल भरे इतिहास में ‘शहीद-ए-आज़म’ भगत सिंह को अक्सर उनकी उग्र क्रांतिकारी कार्रवाइयों के दृष्टिकोण से याद किया जाता है। हालांकि, उन्हें केवल एक सशस्त्र क्रांतिकारी के रूप में देखना उनकी विरासत के मूल को सीमित कर देना है। दरअसल, भगत सिंह एक ‘विद्वान-क्रांतिकारी’ के रूप में उभरते हैं, एक ऐसा दुर्लभ व्यक्तित्व, जिसमें वैचारिक गहराई और क्रांतिकारी प्रतिबद्धता का अद्वितीय संगम दिखाई देता है।

उनका मानना था कि बौद्धिक जागरूकता ही किसी सफल क्रांति की सच्ची और स्थायी नींव होती है। वे इस दृढ़ विश्वास के साथ काम करते थे कि किसी राष्ट्र का भविष्य केवल युद्ध के मैदान में तय नहीं होता, बल्कि वह कक्षाओं में और उन शैक्षणिक स्थानों में विकसित होने वाली राजनीतिक चेतना में भी आकार लेता है।

1920 के दशक में, जब भारत एक निर्णायक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा था, भगत सिंह ने छात्र राजनीति को न तो शौक, न ही गौण गतिविधि, और न ही पढ़ाई से ध्यान भटकाने वाला माध्यम माना। इसके बजाय, उन्होंने इसे भारतीय समाज के व्यापक पुनर्निर्माण के लिए एक आवश्यक आधार के रूप में देखा।

यह मौलिक दृष्टिकोण उनके महत्वपूर्ण निबंध ‘विद्यार्थी और राजनीति’ में सबसे स्पष्ट रूप से सामने आता है, जो जुलाई 1928 में ‘किरती’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। उस समय ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार और रूढ़िवादी भारतीय शिक्षाविदों का एक वर्ग यह जोर देकर कह रहा था कि छात्रों को राजनीति से पूरी तरह दूर रहना चाहिए और अपना ध्यान केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित रखना चाहिए।

भगत सिंह इस दृष्टिकोण से सख्त असहमत थे. उन्होंने तर्क दिया कि शिक्षा का वास्तविक लक्ष्य ‘लिपिक’ या आज्ञाकारी सरकारी कर्मचारी पैदा करना नहीं हो सकता, जिन्हें औपनिवेशिक मशीनरी को चालू रखने के लिए डिज़ाइन किया गया हो। इसके विपरीत, वे शिक्षा को ऐसे सजग और संवेदनशील नागरिक गढ़ने का माध्यम मानते थे, जो अपनी मातृभूमि के दर्द को समझें और उसे जन्म देने वाली व्यवस्थाओं को उखाड़ फेंकने का आवश्यक साहस रखे।

लाहौर : आंदोलन का बौद्धिक केंद्र

भगत सिंह की राजनीति को पूरी तरह समझने के लिए उस विशिष्ट परिवेश को देखना ज़रूरी है, जिसने उनके विचारों को आकार दिया। 20वीं सदी की शुरुआत में लाहौर ब्रिटिश राज की मात्र एक प्रशासनिक इकाई नहीं था, बल्कि भारत की उभरती बौद्धिक और क्रांतिकारी चेतना का केंद्र बन चुका था।

1921 में असहयोग आंदोलन की समाप्ति के बाद ऐसे शैक्षणिक संस्थानों की आवश्यकता महसूस हुई, जो औपनिवेशिक सत्ता के प्रभाव से मुक्त हों। इसी जरूरत के जवाब में लाला लाजपत राय ने लाहौर में ‘नेशनल कॉलेज’ की स्थापना की। यह संस्थान उस दौर के सरकारी स्कूलों के मुकाबले एक स्वदेशी और विद्रोही विकल्प के रूप में खड़ा किया गया था।

नेशनल कॉलेज की दीवारों के भीतर ही भगत सिंह ने सुखदेव, भगवती चरण वोहरा और एहसान इलाही जैसे अपने करीबी साथियों के साथ मिलकर संगठित छात्र शक्ति की क्रांतिकारी संभावनाओं को समझना शुरू किया।

नेशनल कॉलेज का पाठ्यक्रम ब्रिटिश-नियंत्रित संस्थानों (जैसे- गवर्नमेंट कॉलेज) से मूलतः अलग था। यहां भारतीय इतिहास, वैश्विक क्रांतिकारी आंदोलनों और अर्थशास्त्र पर विशेष जोर दिया जाता था। इस तरह की शिक्षा ने भगत सिंह के वैचारिक विकास और उनके आगे के कार्यों के लिए एक मजबूत बौद्धिक आधार तैयार किया। इसी प्रक्रिया में उन्होंने महसूस किया कि छात्रों के पास एक विशिष्ट और अनछुई ऊर्जा होती है, और सबसे महत्वपूर्ण यह कि उनके पास देशभर में जागरूकता की निरंतर लहर पैदा करने के लिए आवश्यक समय और सामर्थ्य भी मौजूद है।

इस ऊर्जा को संगठित दिशा देने के लिए भगत सिंह ने 1926 में ‘नौजवान भारत सभा’ की स्थापना की। यद्यपि यह संगठन केवल छात्रों तक सीमित नहीं था, लेकिन इसकी रीढ़ युवा ही थे। सभा का प्रमुख उद्देश्य युवाओं को धर्मनिरपेक्षता और वैज्ञानिक सोच पर आधारित विश्वदृष्टि की ओर प्रेरित करना था। भगत सिंह का मानना था कि सांप्रदायिकता और अंधविश्वास वे बेड़ियां हैं, जो भारतीय युवाओं को उनकी पूरी क्षमता तक पहुंचने से रोकती हैं। इसलिए उन्होंने छात्रों से आह्वान किया कि वे धर्म को निजी मामला मानें और एक एकीकृत राष्ट्रीय शक्ति के रूप में संगठित हों।

एक स्वतंत्र आयोजक के रूप में छात्र

आंदोलन में भगत सिंह का योगदान केवल लेखन या भाषणों तक सीमित नहीं था ; वे एक कुशल और दूरदर्शी आयोजक भी थे। वे समझते थे कि किसी छात्र आंदोलन के प्रभावी होने के लिए उसमें संगठित संरचना के साथ-साथ स्वतंत्रता भी आवश्यक है।

इसी सोच के तहत उन्होंने ऑल पंजाब स्टूडेंट्स यूनियन (एपीएसयू) के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। छात्र संगठनों को लेकर उनका दृष्टिकोण स्पष्ट था। वे नहीं चाहते थे कि ये संगठन किसी स्थापित राजनीतिक दल की “पूंछ” बनकर रह जाएँ। इसके बजाय, उनका मानना था कि छात्र संघ अपने बौद्धिक और राजनीतिक दिशा-निर्धारण में स्वतंत्र और सक्षम होने चाहिए।

पंजाब का छात्र आंदोलन धीरे-धीरे पूरे भारत में एक अग्रणी उदाहरण बन गया. इसने छिटपुट विरोध प्रदर्शनों से आगे बढ़कर संगठित और अनुशासित छात्र यूनियनों का रूप ले लिया। 1927 में स्थापित लाहौर स्टूडेंट्स यूनियन इस परिवर्तन का शुरुआती और महत्वपूर्ण उदाहरण थी। इसका दायरा केवल शैक्षणिक मुद्दों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ‘स्वतंत्रता, संस्कृति और शांति’ जैसे व्यापक आदर्शों को केंद्र में रखा गया।

1936 तक यही क्षेत्रीय ऊर्जा ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (एआईएसएफ) के गठन के साथ एक राष्ट्रीय आंदोलन में बदल गई। नेशनल कॉलेज के छात्र और भगत सिंह के समकालीन प्रबोध चंद्र, जो आगे चलकर एआईएसएफ के नेता बने, ने अपनी 1938 की पुस्तक ‘स्टूडेंट मूवमेंट इन इंडिया’ में इस दौर का विस्तृत वर्णन किया है। उनके लेखन से स्पष्ट होता है कि विश्वविद्यालयों को अलग-थलग ‘हाथीदांत की मीनार’ नहीं, बल्कि राजनीतिक संघर्ष के सक्रिय मंच के रूप में देखा जाने लगा था, जहां छात्रों से सामाजिक परिवर्तन के प्रमुख वाहक बनने की अपेक्षा की जाती थी।

साइमन कमीशन और ‘बम का दर्शन’

लाहौर के छात्र आंदोलन की वास्तविक शक्ति की परीक्षा 1928 में साइमन कमीशन के आगमन के साथ हुई। 30 अक्टूबर को लाला लाजपत राय के नेतृत्व में हजारों छात्र एक विशाल विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए। इसके बाद हुए बर्बर पुलिस लाठीचार्ज, जिसकी चोटों के कारण बाद में लालाजी की मृत्यु हो गई, ने युवाओं को गहराई से झकझोर दिया।

भगत सिंह के लिए, जो उस समय तक भूमिगत क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय एक पूर्व छात्र बन चुके थे, यह घटना केवल दमन नहीं, बल्कि गहरे राष्ट्रीय अपमान का प्रतीक थी। जेए स्कॉट और जॉन सॉन्डर्स जैसे ब्रिटिश अधिकारियों की क्रूरता ने युवाओं को इस कठोर सच से रूबरू कराया कि औपनिवेशिक दमन के सामने अहिंसक विरोध की अपनी सीमाएं हैं। इस अनुभव के बाद आंदोलन का रुझान क्रांतिकारी समाजवाद की ओर तेज़ी से बढ़ा।

यह बदलाव भगत सिंह के प्रसिद्ध कथन ‘बहरों को सुनाने के लिए ऊंची आवाज़ की आवश्यकता होती है’ में स्पष्ट रूप से झलकता है, जो सेंट्रल असेंबली बमकांड और उसके बाद चले ऐतिहासिक मुकदमे के संदर्भ में दिया गया था। इसी दौर का उल्लेख करते हुए प्रबोध चंद्र लिखते हैं कि लाहौर के छात्रावासों में ‘बम का दर्शन’ (कल्ट ऑफ द बॉम्ब) ने प्रभावी रूप से अहिंसा के दर्शन का स्थान ले लिया था।

भगत सिंह की तस्वीरें लगभग हर छात्र के कमरे में दिखाई देती थीं, जो एक उभरते हुए ‘वर्ग-चेतन’ छात्र आंदोलन का संकेत था, ऐसा आंदोलन, जिसने देश की गुलामी के दौरान निष्क्रिय बने रहने से इनकार कर दिया था। यहां तक कि सॉन्डर्स की हत्या के बाद जब भगत सिंह और उनके साथी भूमिगत हो गए, तब लाहौर के छात्रावासों और ‘सेफ हाउस’ ने ही उन्हें शरण और सुरक्षा प्रदान की।

गोलियों पर किताबों की सर्वोच्चता

सशस्त्र कार्रवाइयों में सक्रिय भूमिका निभाने के बावजूद भगत सिंह का मूल आग्रह यह था कि पिस्तौल की तुलना में किताब कहीं अधिक शक्तिशाली होती है। अपने निबंध ‘विद्यार्थी और राजनीति’ में उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी थी कि जो लोग छात्रों को राजनीति से दूर रहने की सलाह देते हैं, वे दरअसल ऐसी पीढ़ी तैयार करना चाहते हैं, जो सत्ता से कभी सवाल न करे। उन्होंने यह भी आगाह किया कि युवावस्था में राजनीतिक समझ का अभाव व्यक्ति को आगे चलकर एक भ्रष्ट व्यवस्था का मूकदर्शक बना देता है।

भगत सिंह ने छात्रों को सलाह दी कि वे केवल भावनात्मक नारों के बहाव में न बहें। इसके बजाय, उन्होंने उन्हें मार्क्सवाद, समाजवाद और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का गंभीर अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया। उनके लिए ‘तर्कवाद’ को ‘भावुकता’ से ऊपर रखना जरूरी था, ताकि युवाओं को महज़ बयानबाज़ी से गुमराह न किया जा सके।

इस बौद्धिक प्रतिबद्धता का प्रमाण यह है कि जेल में रहते हुए भी उन्होंने सैकड़ों किताबें पढ़ीं। उनका स्पष्ट संदेश था कि ‘आलोचना और स्वतंत्र सोच’ किसी भी प्रकार की तानाशाही को चुनौती देने के सबसे बुनियादी और प्रभावी हथियार हैं।

भविष्य के लिए एक विरासत

आज जब भी छात्र संघ चुनाव या कैंपस सक्रियता की बात होती है, भगत सिंह की याद स्वाभाविक रूप से उभरती है। वे शैक्षणिक उत्कृष्टता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन के एक सशक्त आदर्श बने हुए हैं। उन्होंने कभी भी छात्रों को पढ़ाई छोड़ने के लिए नहीं कहा, बल्कि उन्हें दुनिया के प्रति सजग और उत्तरदायी रहते हुए अध्ययन करने की प्रेरणा दी। उनकी विरासत का वास्तविक सम्मान इसी में है कि शिक्षा को केवल निजी कैरियर का साधन न मानकर समाज के सबसे वंचित वर्गों के उत्थान का माध्यम बनाया जाए।

प्रबोध चंद्र ने अपने लेखन के अंत में एक गंभीर विकल्प सामने रखा था कि जो छात्र अपनी मातृभूमि की मुक्ति में योगदान नहीं देता, उसे आने वाली पीढ़ियों द्वारा ‘गद्दार’ करार दिया जाएगा।

आज के छात्र भी कुछ ऐसे ही निर्णायक मोड़ पर खड़े हैं। संस्थागत स्वायत्तता का संघर्ष दरअसल भारतीय लोकतंत्र के भविष्य का संघर्ष है। भगत सिंह किसी प्रतीक मात्र (एक झंडे) के लिए नहीं, बल्कि हर भारतीय के स्वतंत्र रूप से सोचने, कार्य करने और जीने के अधिकार के लिए शहीद हुए। वे आज भी उन सभी के लिए मार्गदर्शक बने हुए हैं, जो अपने समय के सवालों से मुंह मोड़ने के बजाय उनका सामना करना चाहते हैं। अंततः, ‘इंकलाब जिंदाबाद’ केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक न्यायपूर्ण और समानतामूलक भविष्य का स्वप्न है, जो हर जागरूक छात्र के भीतर धड़कता है।

(साभार : द वायर। लेखक जेएनयू के सेंटर फॉर हिस्टॉरिकल स्टडीज के शोधार्थी हैं और एनएसयूआई से जुड़े हैं।)

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