अहमदाबाद/कलोल (17 मार्च 2026): 2002 के गुजरात दंगों ने नसीब मोहम्मद शेख का पूरा परिवार छीन लिया। एक तरफ़ उनके ससुराल से 11 सदस्य और दूसरी तरफ़ मायके से 14 सदस्य—कुल 25-26 लोग हिंसा की भेंट चढ़ गए। घर जला दिया गया, सपने राख हो गए, लेकिन नसीब शेख ने बदले की आग में जलने के बजाय इंसानियत की राह चुनी। आज वे उन सैकड़ों विधवाओं और पीड़ित महिलाओं की मिसाल हैं, जिन्हें उन्होंने न सिर्फ़ सहारा दिया, बल्कि आत्मनिर्भर बनाकर ताकत प्रदान की। 2002 के दंगों के बाद कलोल क्षेत्र में राहत शिविरों में रहने वाली नसीब बहन ने संगठन ‘सेवा’ से जुड़कर काम शुरू किया। उन्होंने गांव-गांव जाकर प्रभावित महिलाओं और बच्चों की मदद की। स्थानीय स्तर पर एक मुस्लिम मौलवी द्वारा राहत शिविर में महिलाओं के अधिकारों का हनन होने पर उन्होंने महिलाओं की एक छोटी सेना खड़ी की और विरोध जताकर उनके हक दिलाए। बाद में उन्होंने शांति समिति बनाकर सांप्रदायिक सद्भावना को बढ़ावा दिया। दलितों और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों के लिए भी उन्होंने आवाज़ उठाई। नसीब शेख की यह यात्रा दर्द से उम्मीद तक की है। दंगों के बाद बने राहत कॉलोनियों में रहते हुए भी उन्होंने कभी नफरत नहीं फैलाई। बल्कि, उन्होंने सिखाया कि दर्द में भी इंसानियत बरकरार रखी जा सकती है। उनकी इस कोशिशों के लिए उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित किया गया है—एक ऐसा सम्मान जो उनकी शांति और महिला सशक्तिकरण की लड़ाई को वैश्विक मंच पर ला रहा है। नसीब शेख कहती हैं, “जब सब कुछ खो जाता है, तब इंसान के पास सिर्फ़ दो रास्ते होते हैं—नफरत या प्यार। मैंने प्यार चुना।” उनकी कहानी हर उस इंसान के लिए प्रेरणा है जो दुख में भी उम्मीद की किरण देखना चाहता है। क्या आप भी दर्द के बीच इंसानियत चुनने की हिम्मत रखते हैं? यह कहानी याद दिलाती है कि हिंसा कितनी भी भयानक हो, इंसानियत की जीत अंततः तय है। नसीब शेख जैसी महिलाएं इसी जीत की जीती-जागती मिसाल हैं। View this post on Instagram View this post on Instagram Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन हिमाचल में कुदरत का खूबसूरत मंजर पर्यटकों के लिए बड़ी मुसीबत बन गया! ईरान-इज़राइल युद्ध के बीच बांग्लादेश को राहत: भारत देगा 45,000 टन डीजल