(आलेख : बादल सरोज)

यह समय बहुत ही असामान्य और अभूतपूर्व समय है। राजेश जोशी एक छोटी सी कविता ‘शांति की अपील’ में कहते हैं कि “जब तक मैं एक अपील लिखता हूँ/ आग लग चुकी होती है सारे शहर में/ हिज्जे ठीक करता हूँ जब तक अपील के/ कर्फ़्यू का ऐलान करती घूमने लगती है गाड़ी/ अपील छपने जाती है जब तक प्रेस में/ दुकानें जल चुकी होती हैं/ मारे जा चुके होते हैं लोग/ छपकर जब तक आती है अपील/ अपील की ज़रूरत ख़त्म हो चुकी होती है!” ठीक उसी तरह की भयावह स्थिति से इस समय दुनिया गुजर रही है। जब तक एक नृशंस वारदात को दर्ज करने के लिए विवरण जुटाते हैं, तब तक दूसरी पाशविकता की खबर आ जाती है। जब तक उसके तथ्य जांचते हैं, तब तक बर्बरता का एक और काण्ड घट चुका होता है। सप्ताह-दस दिन की छोटी सी अवधि में जो अघट घटा है, उसके जितने भी आयाम हैं, वे सभी गंभीर और दूर तक असर डालने वाले हैं। इनमें से किसी की भी अनदेखी वर्तमान और भविष्य दोनों के लिए महंगी साबित हो सकती है। मगर ऐसा करने के लिए विस्तार में जाना होगा, इसलिए फिलहाल यहाँ इनमें से सिर्फ एक, भारत के हिसाब से कुछ ज्यादा ही अजीब आयाम, दुनिया के सबसे दुष्ट देश इजरायल और उसके अतर्राष्ट्रीय न्यायालय द्वारा घोषित मानवता के विरुद्ध युद्ध के अपराधी बेंजामिन नेतन्याहू के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उफनती, उलफुलाती आसक्ति, भक्ति की सीमाओं को लांघती अभ्यर्थना और रसातल में पहुंचाई जाती भारत की विदेश नीति और  कूटनीतिक प्रतिष्ठा से जुड़े आयाम पर ही केन्द्रित रहते हैं।



नरेन्द्र मोदी भारत के पहले प्रधानमंत्री हैं, जो इजरायल गए – मगर 26-27 फरवरी की उनकी इजरायल की दूसरी यात्रा भारत जैसे संप्रभुता के हामी और विश्वशांति के हिमायती देश की अब तक की अंतर्राष्ट्रीय पहचान को जोरदार नुकसान पहुंचाने वाली थी। अपनी इजराइल यात्रा के दौरान भारतीय गाँवों के कायाकल्प के लिए ‘विलेज ऑफ एक्सीलेंस’ कार्यक्रम के तहत  इजराइल की कथित आधुनिक कृषि तकनीक को सीधे भारत के जमीनी स्तर यानी गाँवों तक पहुँचाने का वचन भर रहे थे। साझेदारी रक्षा और व्यापार से आगे ले जाकर पेगासस जैसे जासूसी यंत्रों से हर तरह की सूचना चुराने वाले दुष्ट देश की मदद से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एआई और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसे क्षेत्रों में भी गाँवों को ‘आधुनिक’ बनाने का करार कर रहे थे। जब वे हजारों बेगुनाह बच्चों सहित आम नागरिकों के हत्यारे नेतन्याहू के साथ गलबहियां कर रहे थे। वहां की संसद में बोलते हुए इस अवैध राष्ट्र की तारीफ़ में कसीदे पढ़ रहे थे, ठीक उस समय इजरायल भारत के परम्परागत और भरोसेमंद दोस्त देश ईरान पर ऐसे हमले की उलटी गिनती गिन रहा था, जैसा हमला द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद के कालखण्ड सहित ताजा इतिहास में कभी नहीं हुआ। इजरायली संसद में मोदी उस दुष्ट राष्ट्र का गुणगान कर रहे थे, जिसे एक ट्रम्प के अमरीका को छोड़ धरती का हर देश, किसी न किसी अनुपात में, धिक्कारता है। जिसके खिलाफ 2015 से 24 के बीच संयुक्त राष्ट्र संघ में 173 से अधिक प्रस्ताव पारित किये जा चुके हैं। उसके साथ खड़े होकर उसकी संसद में मोदी ने जो बोला और जो नहीं बोला, वह दोनों ही सिर्फ भारत नहीं, दुनिया भर के अब तक के लगभग सर्वमान्य नजरिये से पूरी तरह उलटा था। उन्होंने 7 अक्टूबर 23 को हुए हमास के उस हमले की भर्त्सना के लिए तो शब्द जुटा लिए, जिसके बारे में खुद तत्कालीन यूएनओ महासचिव कह चुके थे कि ‘इसे शून्य में, यानि उन हालात से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए, जिनमें यह हुआ है।‘ मगर फिलिस्तीन के गज़ा में इजरायल द्वारा किये जा रहे वीभत्स नरसंहार पर उनके मुंह से बोल नहीं फूटे। गज़ा के स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार हमला शुरू होने से लेकर  फरवरी 2026 तक छोटे से गज़ा में 71,000 से अधिक फिलिस्तीनी मारे जा चुके हैं। इनका एक बड़ा हिस्सा — लगभग 70% — महिलाओं और बच्चों का है। करीब 10,000 से अधिक लोग अभी भी लापता हैं या नष्ट हुई इमारतों के मलबे के नीचे दबे हैं। सीधे हमलों के अलावा कम से कम 440 लोग भुखमरी और कुपोषण के कारण अपनी जान गंवा चुके हैं।

यह उस फिलिस्तीन में हो रहा है, जिसके साथ भारत हमेशा से रहा है। जिसके बारे में खुद नरेंद्र मोदी के कुनबे के अटल बिहारी वाजपेयी, भारत के विदेश मंत्री के नाते भारत की स्थिति स्पष्ट कर चुके है। जनता पार्टी की जीत के बाद 1977 में अटल बिहारी वाजपेयी ने दिल्ली के रामलीला मैदान में दिए अपने भाषण में कहा था कि : “एक गलतफहमी पैदा की जा रही है कि जनता पार्टी की सरकार बन गई है। वो अरबों का साथ नहीं देगी, इजरायल का साथ देगी। … मध्य-पूर्व के बारे में ये स्थिति साफ है कि अरबों की जिस जमीन पर इजरायल कब्जा करके बैठा है, वो जमीन उसको खाली करनी होगी। आक्रमणकारी आक्रमण के फलों का उपभोग करे, ये हमें अपने संबंध में स्वीकार नहीं है। जो नियम हम पर लागू है, वो औरो पर भी लागू होगा। अरबों की जमीन खाली होनी चाहिए। जो फिलिस्तीनी हैं, उनके अधिकारों की प्रस्थापना होनी चाहिए। …  मध्य-पूर्व का एक ऐसा हल निकालना होगा, और जिसमें आक्रमण का परिमार्जन हो और स्थायी शांति का आधार बने। गलतफहमी की गुंजाइश नहीं है।“ वाजपेयी जिनके अधिकारों की प्रस्थापना की बात कर रहे थे, मोदी उन्हीं फिलिस्तीनियों के नरसंहारी के मेहमान बने कत्लेआम पर चुप्पी साधे बैठे रहे। यह अनायास नहीं है।

यही शर्मनाक खामोशी ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्ला खामनेई की घोर आपाराधिक तरीके से की गयी हत्या को लेकर भी दिखी। खामनेई  वही व्यक्ति हैं, जिनसे  मुलाकात करने मोदी तेहरान गए थे और वहां जाकर कहा था कि ‘भारत और ईरान के रिश्ते उतने ही पुराने हैं, जितना पुराना दुनिया का इतिहास है।‘ ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में उस समय छपी खबरों के अनुसार मई 2016 में अपनी ईरान यात्रा के दौरान मोदी ने वहां के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला सैयद अली खामनेई से मुलाकात की और उन्हें कुरान की 700 वर्ष पुरानी एक दुर्लभ पांडुलिपि की प्रतिकृति भेंट की। कुफिक लिपि में लिखी गई कुरान की इस प्रति को पैगंबर के दामाद और चौथे इस्लामी खलीफा हजरत अली से संबंधित माना जाता है। इसी यात्रा के दौरान मोदी ने ईरान के तत्कालीन राष्ट्रपति हसन रूहानी को मिर्जा गालिब की फारसी कविताओं का संग्रह और रामायण का फारसी अनुवाद भेंट किया था। इतना भर नहीं, जब मई 2024 में ईरान के तत्कालीन राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मारे गए, तो भारत सरकार ने उनके सम्मान में 21 मई 2024 को एक दिन के राजकीय शोक की घोषणा की थी। उसी मोदी सरकार ने उसी ईरान के सर्वोच्च नेता के इस तरह मार दिए जाने के बाद शाब्दिक शोक भी व्यक्त नहीं किया, बल्कि इससे उलट हमलावर देश इजरायल के नेतन्याहू और उसके सहयोगी देशों के राष्ट्र प्रमुखों को फ़ोन करके खुद मोदी उनके साथ संवेदनाएं और एकजुटता जता रहे हैं। इतनी निर्लज्ज कूटनीति भारत की कभी नहीं रही।

आखिर यह रिश्ता क्या कहलाता है? पूरा विश्व जिसकी निंदा, भर्त्सना और तिरस्कार कर रहा है, उसके प्रति उमड़ते इस हेज की वजह क्या है। भारत के हित तो पक्के से नहीं हैं, क्योंकि  इस्लामिक देशों के संगठन – ओ आई सी – में जब-जब कश्मीर के सवाल पर पाकिस्तान ने मुस्लिम कार्ड चलने की कोशिश की, तब-तब ईरान वह प्रमुख देश था, जिसने उसे रोका और भारत का साथ दिया। 1994 में जब पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में कश्मीर पर भारत के खिलाफ प्रस्ताव लाने की कोशिश की थी, तब भी ईरान ने अंतिम समय में भारत का साथ दिया और प्रस्ताव को रोकने में मदद की। भारत की तेल आपूर्ति का सबसे भरोसेमंद और किफायती स्रोत भी रहा। स्वयं मोदी ने मई 2024 में भारत और ईरान ने चाबहार पोर्ट के शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल के संचालन के लिए 10 साल के अनुबंध को अपनी एक एतिहासिक उपलब्धि बताया था। जबकि इजरायल हमंशा उस अमरीका के साथ रहा, जिसने आज तक भारत के खिलाफ साजिशें रचने के सिवा कुछ नहीं किया। फिर ऐसा क्या है, जिसके चलते भारत आज वहाँ खड़ा है, जहां वह कभी नहीं रहा? अमरीकी दवाब,  ट्रम्प को  ख़ुश करने और खुश बनाए रखने, एप्सटीन की फाइलों में दर्ज रहस्यों के अलावा, उनके साथ भेड़िये का मुंह भेड़िये द्वारा सूंघने का मामला है। स्वाभाविक अपनापा वह ‘मुस्लिम विरोध’ और हिंसक प्रवृत्ति है,  जिसमें मोदी और उनका कुनबा खुद को नेतन्याहू जैसों के नजदीक मानता है।

यह रिश्ता न तो आज का है, ना इकतरफा है, ना ही दबा-छुपा है। इजरायली विदेश मंत्रालय के सार्वजनिक किये गए दस्तावेजों और ऐतिहासिक टेलीग्रामों में इसकी कथायें भरी पड़ी हैं। तब भेजी गोपनीय डाक में  इजरायली राजनयिक जनसंघ की मुस्लिम विरोधी राजनीति के आधार पर उसको इजरायल का एक स्वाभाविक और मजबूत समर्थक मानते-बताते रहे। वाशिंगटन में तत्कालीन इजरायली राजदूत डेविड तुर्गमैन ने 25 मार्च 1977 को तेलअबीब को भेजे एक टेलीग्राम में लिखा था कि “दक्षिणपंथी जनसंघ अपने मुस्लिम विरोधी स्वभाव के कारण इजरायल का समर्थक है”। 1980 में, भारत में इजरायली उच्चायुक्त हाइम डिवोन ने एक टेलीग्राम में लिखा कि नई भारतीय जनता पार्टी वास्तव में “भेष बदलकर जनसंघ ही है” और इसके सदस्य इजरायल के प्रति समर्थक का रुख रखते हैं। इतना ही नहीं, 1960 के दशक से ही  इजरायली राजनयिकों ने जनसंघ के नेताओं के साथ गहरे संबंध बनाए हुए थे। राजदूतों ने अपनी रिपोर्ट्स में दर्ज किया था कि जब जनसंघ के हाथों में दिल्ली की स्थानीय सरकार आई, तो वे इजरायल के साथ सहयोग करने के लिए पूरी तरह तैयार थे। मतलब यह कि जब समूचा देश, उसकी संसद मध्य-पूर्व से फिलिस्तीन तक के सवाल पर एक राय थी, तब भी इस कुनबे ने इजरायल के साथ रिश्ते बनाए हुए थे। मुस्लिम विरोध वह प्रमुख वजह तब भी थी, आज भी है। इस मलिग्नैंट ग्रंथि के चलते यहूदीवाद के दुष्ट इरादे के साथ उन्हें भाईचारा महसूस होता है। इस तरह संघ और भाजपा ने ‘विदेश नीति अंततः संबंधित देश की आतंरिक नीतियों का ही प्रतिबिम्ब होती है’ की शास्त्रीय धारणा का उदाहरण पेश कर दिया है। अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के आधार  को  भी उस नफरती जहर से विषाक्त कर दिया है, जिसे वह देश के भीतर फैलाने में लगे है। 

इजरायली संसद में दिए भाषण में ‘फादरलैंड-मदरलैंड’ की उपमा और रूपक इसी बात को हद से कुछ ज्यादा ही आगे बढाने की हरकत थी। यह सिर्फ भाषण लिखने वाले की लेखनी और वर्तनी की फूहड़ कूड़मगजी भर नहीं है, यह आरएसएस की पितृभू–पुण्यभू के बेतुके आधार पर धर्म आधारित राष्ट्र के विचार का विस्तार है। क्या सिर्फ इसलिए कि वह जिस धर्म में विश्वास करता है, उसके आदि पैगम्बर ने येरुशेलम की मोरिय्याह पहाड़ी पर ज्ञान पाया था, यहूदी धर्म मानने वाले भारतीय नागरिकों की  की फादरलैंड इजरायल हो जायेगी? यह बात तो स्वयं यहूदी धर्म तक नहीं करता। उसकी शिक्षाओं में न राष्ट्र की बात है, न सेना की, न पितृ भूमि की। इजरायल के बाद मध्य-पूर्व में सबसे बड़ी यहूदी आबादी उस ईरान में रहती है, जिस पर हमला बोला गया है, इन ईरानी यहूदियों ने इजरायल को कभी अपनी पितृभूमि नहीं माना। धर्म के उदगम स्थल को पितृ भूमि मानने की धारणा अपने आप में ही अत्यंत खतरनाक धारणा है। कोई एक सदी से युद्ध के झंझावातों में फंसा येरुशेलम का करीब पौन किमी.  का छोटा-सा टुकडा यहूदी धर्मं के अलावा बाकी दोनों अब्राहमी धर्मों – ईसाइयत और इस्लाम – के पैगम्बरों से भी उतना ही जुड़ा हुआ है। यह तर्क चल निकला, तो फिर आर्यों को भी मध्य एशिया के अपने ददिहाल और ननिहाल दोनों की याद आने लगेगी  : थोड़ा-सा और पीछे गए, तो दुनिया भर को दक्षिण अफ्रीका के जोहानसबर्ग में मानवता के पालने – क्रैडल ऑफ़ ह्यूमनकाइंड – में सोयी दुनिया भर की नानी अम्मा के पास जाना पड़ेगा।  आखिर नफरती साम्प्रदायिकता इसी तरह की अंधी गलियों में ले जाकर ही तो खड़ा कर देना चाहती है।

ध्यान रहे, जो कुनबा आज यहूदीवादी नेतन्याहू जैसों की पाद-परिक्रमा करने में लगा है, वही कुनबा 1930-40 के दशक में नाज़ी जर्मनी में इन्ही यहूदियों के कत्लेआम को अपना आदर्श बता संघचालक एम.एस. गोलवलकर  1939 की अपनी किताब ‘हम और हमारी राष्ट्रीयता – ‘वी, ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड’ लिख रहे थे कि “राष्ट्र और उसकी संस्कृति की शुद्धता बनाए रखने के लिए, जर्मनी ने यहूदियों (सेमिटिक नस्लों) को देश से बाहर निकालकर दुनिया को चौंका दिया। यहाँ राष्ट्रीय गौरव अपने उच्चतम स्तर पर प्रकट हुआ है।“ उन्होंने आगे कहा था कि यह हिंदुस्तान के लिए सीखने और लाभ उठाने के लिए एक अच्छा सबक है। संघ इतने पर ही नहीं रुका, उसने अपने प्रमुख नेता डॉ. मुंजे को मुसोलिनी और हिटलर के पास भेजा भी था । इनके आराध्य विनायक दामोदर सावरकर ने भी नाजीवाद और हिटलर की नीतियों के प्रति प्रशंसा व्यक्त की थी, विशेष रूप से उस समय जब जर्मनी यहूदियों को बाहर निकाल रहा था। सावरकर ने 1930 के दशक के अंत में नाजीवाद को जर्मनी के लिए “रक्षक” बताया था। आज वही संघ यहूदियों के नाम की जा रही लगभग उसी प्रकार की बर्बरता का गुणगाहक बना हुआ है। साफ़ बात है, जब हिंसक बर्बरता ही साध्य हो, तो आराध्य अदलने-बदलने में काहे की शर्म और कैसा संकोच?

इतिहास में कुछ ऐसे सप्ताह होते हैं, जिनमें दशकों का बदलाव हो जाता है। ट्रम्प और नेतन्याहू की जुंडली इन सप्ताहों को अपने खौफनाक इरादों को पूरा करने वाला बनाए, इससे पहले दुनिया की मानवता के साथ लोकतंत्र के शासन, मनुष्यता के मान, सभी देशों की सम्प्रभुता के सम्मान और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के विधान में विश्वास करने वाले भारत के अवाम को एक स्वर में बोलना होगा।

*(लेखक ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94250- 06716)*

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