(आलेख : बादल सरोज)

भारत के संसदीय लोकतंत्र के अब तक के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है, जब राष्ट्रपति के अभिभाषण के लिए प्रस्तुत किये गए धन्यवाद प्रस्ताव पर हुई बहस का जवाब देने प्रधानमंत्री नहीं आये। यह सिर्फ रस्म या परम्परा भर का सवाल नहीं है। भारत ने जिस संसदीय पद्वत्ति को चुना है, उसमे राष्ट्रपति का अभिभाषण एक महत्वपूर्ण वक्तव्य होता है। यह उस पद पर बैठे व्यक्ति का निजी संबोधन नहीं होता : असल में तो राष्ट्रपति के ज्यादातर कथन या कदम उनके होते ही नहीं है। राष्ट्रपति,  जो सरकार के संवैधानिक प्रमुख होते/होती हैं, वे नई चुनी संसद में और हर वर्ष की शुरुआत में दिए जाने वाले भाषण में सरकार का लिखा पढ़ते हैं। उसकी नीतिगत प्राथमिकताओं, समकालीन चुनौतियों के सार और उनसे निजात पाने के उपायों सहित आने वाले वर्ष की योजनाओं का खाका पेश करते/करती है। संसद का सत्ता पक्ष और विपक्ष इस पर बहस करके उसे देश की आम राय बनाता है या बनाने का प्रयास करता है।

इस बार के अभिभाषण पर पहला अनूठा काम तो यह हुआ कि नेता प्रतिपक्ष – जो लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल का नेता होता है – को बोलने ही नहीं दिया गया। नेता सत्तापक्ष लोकसभा में बोलने से ही कतरा गया। बहस पर प्रधानमंत्री का जवाब असहमतियों का संज्ञान, आशंकाओं का समाधान और संकल्पों का पुनराख्यान होता है। भले उसे निचला सदन कहा जाता हो, किन्तु लोकसभा ही इसका मुख्य स्थान होती है। यह जानते हुए भी प्रधानमन्त्री मोदी लोकसभा में जवाब देने नहीं आये। लोकसभा अध्यक्ष ‘जी’ ने बिना उनके बोले ही ध्वनिमत से धन्यवाद प्रस्ताव पारित घोषित कर दिया।

सिर्फ इतना भर अनोखा नहीं हुआ। प्रधानमंत्री के लोकसभा में न आने की जो वजह अध्यक्ष ओम बिड़ला ने बताई वह और भी गजब थी। उन्होंने सदन को सूचित किया कि प्रधानमंत्री की सुरक्षा और अप्रिय घटना की आशंका के चलते  उन्होंने खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सदन में न आने की सलाह दी थी। उन्होंने दावा किया कि उनके पास ‘पुख्ता जानकारी’ थी कि विपक्षी सांसद प्रधानमंत्री के आसन तक पहुँचकर कोई अप्रत्याशित या अनुचित कृत्य कर सकते थे। उन पर शारीरिक हमला करके संसद की मर्यादा तार-तार करने की ‘योजना’ थी । हालांकि उन्होंने आज तक नहीं बताया कि यह पुख्ता जानकारी क्या थी। यह जरूर कहा कि महिला सांसदों से प्रधानमत्री पर हमला करवाये जाने की ‘योजना’ थी। जब मीडिया ने देश के सबसे अधिक सुरक्षित घेरे में रहने वाले प्रधानमत्री मोदी के खुद अपनी ही उतनी ही सुरक्षित संसद में असुरक्षित और कथित हमले की आशंका से घिरे रहने की बात पर आश्चर्य जताते हुए सवाल किये, तो सत्तारूढ़ गठबंधन एनडीए के एक नेता दीपक रेड्डी  ने कहा और बाद में आई टी सैल सहित पूरे कुनबे ने दोहराया कि संसद में हथियार नहीं लाये जा सकते, तो क्या हुआ, विपक्ष की महिला सांसद मोदी जी को अपने ‘दांतों से तो काट ही सकती थी’!!

इस पूरे त्रासद प्रहसन को देखते हुए अनायास ही दुष्यंत कुमार की पंक्तियाँ “हालाते जिस्म, सूरते जां और भी खराब / चारों तरफ खराब, यहाँ और भी खराब / नजरों में आ रहे हैं नज़ारे बहुत बुरे / होंठों पे आ रही है जुबां और भी खराब।“ याद आ गयीं। अब लिखा-पढ़ी में तो खराब जुबान इस्तेमाल नहीं की जा सकती, इसलिए नहीं कर रहे हैं – मगर मोदी जी ने यह सभ्रांतता नहीं बरती – जिस जवाब को देने से बचने के लिए वे लोकसभा से खिसक गए थे, उसे देने के लिए वे सज-धज कर राज्यसभा में पहुंच गए और ऐसा बमके कि बकौल ओम बिडला लोकसभा की भले बचा ली गयी हो, राज्य सभा की गरिमा पूरी तरह से तार-तार कर के रख दी ।

राज्यसभा का उनका भाषण भाषा और आत्मश्लाघा – जिनमें पहले के उल्लंघन और दूसरे के आलिंगन दोनों में वे पहले से ही सारी सीमाएं लांघ-उलांघ चुके हैं – की नकारात्मकता की नयी सीमा रेखा ही तय कर दी। अभी तक जो बातें वे अपने निशिकांत दुबों, गिरिराज सिंहों और अनुराग ठाकुरों जैसे सांसदों को “छू” बोलकर बुलवाया करते थे, लगभग वे ही सब – ज्यादातर आधारहीन बातें – स्वयं प्रधानमन्त्री ने अपने उग्र लहजे में बोलीं। बोलते-बोलते वे अपने से पहले के सभी प्रधानमंत्रियों को खारिज करते हुए बोले कि ‘पहले वालों के पास ना कोई सोच थी, ना उनके पास कोई विजन था और ना ही कोई इच्छाशक्ति थी।’ इस तरह उन्होंने अपनी आदत के अनुरूप ही खुदी को इतना बुलंद कर लिया कि खुद ही खुदा हो गए। इस खुदाई में उन्हें अपने लिए कब्र खुदने के नारे भी सुनाई दे गए। दो-ढाई किलो रोज की गालियाँ भी खाने को मिलती नजर आ गयीं। इसके जो कारण उन्होंने गिनाये, जो उदाहरण उन्होंने चुने, वे सब के सब विभाजनकारी, ध्रुवीकरण वाले थे। सौ साल के हुए संघ के एजेंडे वाले थे।

इसमें भी वे थोड़े से और आगे बढ़े और एक दलबदलू सांसद पर की गयी छींटाकशी को भी इसके साथ जोड़कर इसे सिखों का अपमान, यहाँ तक कि गुरुओं तक का अपमान बता दिया। ध्यान रहे यह बात वे सज्जन कह रहे थे, जिनके पूरे कुनबे का आजादी के महासंग्राम के साथ गद्दारी का भरा-पूरा कलुषित इतिहास है। इसके बावजूद भी जो दिन रात खुद को छोड़ बाकी सबको गद्दार कहते-कहते कोहराम मचाये रहते हैं, वे एक पालाबदल सांसद पर की गयी टिप्पणी को सिख धर्म और उसके गुरुओं का अपमान बताकर खेल खेल रहे थे। लगता है, उन्होंने अमरीकी पत्रिका टाइम मैगज़ीन द्वारा 2019 में दिए ‘डिवाइडर इन चीफ’ के तमगे को संसद के मंच पर भी प्रमाणित करने की ठान ली थी।

अपने 5 फरवरी 2026 को राज्य सभा में दिए 97 मिनट – एक घंटा 37 मिनट — के इस भाषण में नाम-उपनाम चुराने, घुसपैठ, सार्वजनिक उद्योगों में किये गए कथित रिफॉर्म्स, गंदे पानी से बच्चों की मौतों की भयावह खबरों के बीच बच्चों की जान बचाने के खोखले दावों के पुलिंदों आदि-इत्यादि सहित आरएसएस की शाखाओं में फैलाई जाने वाली अफवाहों, बोले जाने वाले असत्यों और अर्धसत्यों को देश की संसद की कार्यवाही का ही हिस्सा बना दिया, ताकि आने वाले वर्षों में इनकी प्रामाणिकता के स्रोत के रूप में राज्यसभा की कार्यवाही से दृष्टांत दिए जा सकें।

अपने इस भाषण में प्रधानमंत्री ने लोकसभा और राज्यसभा के फर्क को स्पष्ट करते हुए एक जगह कहा था कि ‘यह उच्च सदन है, यहाँ भाषणों का स्तर ऊंचा होता है।’ मगर अपने इसी भाषण की भाषा, लहजे और तरीके से उन्होंने बता दिया कि वे इस फर्क की कितनी परवाह करते हैं। जितने दावे उन्होंने किये, उनकी वास्तविकता वे स्वयं जानते थे, इसलिए एक भी दावे की पुष्टि में कोई तथ्य या आंकड़ा देने की जोखिम उन्होंने नहीं उठाई। विश्व का भारत के प्रति बढ़ता आकर्षण, उसका वैश्विक मंचों पर ग्लोबल साउथ की बुलंद आवाज बन जाना, विश्व के साथ स्पर्धा के लिए पूरी तरह तैयार होना, विश्व में जो चुनौतियां सामने आ रही हैं, उनका समाधान देने के लिए न सिर्फ आशा की एक किरण बन जाना, बल्कि समाधान देना भी, ‘मेजर इकोनॉमी में भारत का ग्रोथ बहुत हाई होना’ और अर्थव्यवस्था का मजबूत होना वगैरा के दावों की जन्नत की हकीकत उन्हें पता थी, लेकिन मन के बहलाने को ये ख्याल अच्छा बताने का मुगालता खुद भी पाल रहे थे और भक्तों को भी पलवा रहे थे।

ऐसा ही होता है, जब देश के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण विषयों पर कहने-सुनने से मुंह चुराना हो, तो बे सिर-पैर की बातें बनाने की पतली गली ही सूझती हैं। शायद वे भूल रहे हैं कि अब दुनिया डिजिटल हो चुकी है। अब कोई कोना, किनारा ऐसा नहीं बचा है, जहां छुपा जा सके।  सेवानिवृत्त थल सेनाध्यक्ष नरवाणे की वह किताब, जिसे उनकी सरकार अब तक अप्रकाशित बता रही थी, छपकर आ चुकी थी और मोदी और उनकी सरकार की निर्णय अनिश्चितता की पोल खोल चुकी थी। इस पर देश को  जवाब देने से बचना था। मोदी जी के माय डिअर फ्रेंड डोनाल्ड ट्रम्प के डिअरेस्ट फ्रेंड और इतिहास के सबसे घिनौने दलाल जेफरी एपस्टीन की जुगुप्सा जगाने वाली फाइलों का प्रेत दुनिया के सर पर नंगा नाच कर रहा है और इतने गंदे आदमी के साथ नजदीकी रिश्ता रखने वालों में मोदी और उनकी सरकार, दरबारी पूँजीवाद के हुकुम और दरबार — सभी के नाम सरे बाजार आम हो रहे थे।

भारत के अलावा एपस्टीन नरक में नामजद पाए जाने वालों के दुनिया भर में इस्तीफे हो रहे थे : उस पर चर्चा से बचना था । द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बनी विश्व व्यवस्था में स्वयं मोदी की हांकी डींग में “एक नए ग्लोबल ऑर्डर की तरफ, नए वर्ल्ड ऑर्डर की तरफ आगे बढ़ रही है। और पूरी दुनिया का झुकाव भारत की तरफ है”  की बजाय भारत झुकता, शरणागत होता दिख रहा है, इसे छुपाना था : इसलिए गाल बजाना ही बजाना था । पूरा भाषण इसी तरह की गालबजाऊ लफ्फाजियों से भरा हुआ था।

ढीठपन की पराकाष्ठा यह थी कि 27 देशों वाली यूरोपीयन यूनियन के साथ हुए व्यापार समझौते को सारे समझौतों की अम्मा – मदर ऑफ़ ऑल  डील्स – बताते हुए मोदी अमरीका के साथ हुए आत्मसमर्पण की पाँ पाँ ट्रेड डील – फादर ऑफ़ ऑल सरेंडर्स –  वाले शर्मनाक करार को ऐसा व्यापार समझौता बता रहे थे, जिसकी खुद उनके मुताबिक़ ‘अक्खा वर्ल्ड खुलकर तारीफ़ कर रहा है’। हालांकि इसे करार कहने की बजाय ट्रम्प डिक्टेट कहना ज्यादा सही होगा।

वही डिक्टेट, जिसकी समर्पंणकारी शर्तों के बारे में पूछने पर वाणिज्य मंत्री कहते हैं कि विदेश मंत्री से पूछिए : विदेश मंत्री कहते हैं कि वाणिज्य मंत्री से पूछिए। मोदी ने भी यही कुलधर्म निबाहा और बजाय इस समर्पण करने वाले, ट्रम्प द्वारा थोपे गए अपमानजनक समझौते की खूबियाँ बताने के उनने भी पीयूष गोयल के सर पर ही ठीकरा फोड़ दिया। कह दिया कि वे पहले बता ही चुके हैं। इस समझौते की किस अक्खा वर्ल्ड में तारीफ़ हो रही है, यह तो दिवास्वप्न टूटने के बाद ही मोदी बताएँगे या मुमकिन है कि न भी बताएं। मगर ट्रम्प ने इसके जरिये पूरी दुनिया में भारत की जो कमजोर, असहाय और ट्रम्प के आज्ञाकारी अधीनस्थ की छवि बनाई है, वह सचमुच में लानत की बात है । 

सरेंडर के समानार्थी हो चुके नरेंदर की अगुआई वाली यह डील देश की कृषि, उद्योग, वाणिज्य, अर्थव्यवस्था के लिए कितनी घातक है, इस बारे में बहुत कुछ लिखा और कहा जा चुका है। यहाँ उसे दोहराने की बजाय  ट्रम्प द्वारा  “मैं मोदी का राजनीतिक कैरियर बर्बाद कर सकता हूँ, मगर नहीं करूंगा, क्योंकि मोदी मुझे प्यार करता है” जैसी फूहड़ और मातहतों के लिए उनके आकाओं द्वारा बरती जाने वाली भाषा बार-बार बोलकर दुनिया भर में भारत का जो मजाक उड़ाया है, वह स्तब्ध कर देने वाला है। उससे भी ज्यादा चौंकाने और चिंतित कर देने वाली है इस ब्लैकमैलिंग पर मोदी सरकार की चुप्पी – जिसकी गूँज-अनुगूंज का असर आने वाले वर्षों में मातहती के और नुकीला होने, दुनिया के बदतरीन साम्राज्यवादी देश के धृतराष्ट्र आलिंगन में और बुरी तरह जकड़ने के रूप में सामने आयेगा। इस कथित डील ने भारत की संप्रभुता को ही खतरे में डाल दिया है। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश से अपने हितों के अनुरूप फैसले लेने की स्वतन्त्रता ही नहीं छीनी, उसके व्यापार-कारोबार पर खुल्लमखुल्ला पहरेदारी भी बैठा दी है ।

जिसे शानदार डील बताने का झुनझुना बजाते हुए संघी बटुक भक्त आकाश पाताल एक किये हुए हैं, इसमें बाकायदा आदेश जारी करके ट्रम्प ने भारत के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर निगरानी करने के लिए अपने तीन वरिष्ठ मंत्रियों की तैनाती की है। ट्रंप द्वारा जारी कार्यकारी आदेश के अनुसार, भारत द्वारा रूसी तेल के आयात पर नजर रखने – मोनिटरिंग — के लिए मुख्य रूप से तीन अमरीकी मंत्रियों – अमरीका में मंत्रियों को सेक्रेट्री कहा जाता है — को जिम्मेदारी सौंपी गई है।

भारत के वाणिज्य मंत्री  पीयूष गोयल के समकक्ष अमरीकी वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक इस निगरानी दल का नेतृत्व करेंगे। विदेश मंत्री एस जयशंकर के समकक्ष अमरीका के विदेश सचिव मार्को रुबियो और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के समकक्ष अमरीकी ट्रेज़री सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट इसके सदस्य होंगे। जाहिर है, ट्रम्प ने किसी छोटे-मोटे को नहीं, अपने सर्वोच्च मंत्रियों को इस काम पर लगाया है। इस लज्जित कर देने वाली निगरानी का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारत “प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष” रूप से रूस से तेल का आयात फिर से शुरू न करे। यदि ये अधिकारी पाते हैं कि भारत ने रूसी तेल खरीदना फिर से शुरू कर दिया है, तो वे ट्रंप को भारत पर फिर से 25% दंडात्मक टैरिफ लगाने की सिफारिश करेंगे। इसी के साथ  वाणिज्य सचिव को इस काम के लिए अन्य वरिष्ठ अधिकारियों और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के साथ समन्वय करने का अधिकार भी दिया गया है।

यह एक स्वतंत्र और संप्रभु देश को शर्मसार कर देने वाली एक ऐसी शर्त है, जिसे 8-10 हजार सैनिकों वाला भूटान या छोटी-सी सैन्य शक्ति वाला नेपाल भी मंजूर नहीं करता। उनकी बात तो दूर रही, बिना सेना वाला कोई टापू देश भी कभी स्वीकार नहीं करता। मोदी सरकार को जवाब देना चाहिए कि इतना अपमानजनक और देशहित विरुद्ध समर्पण उसने किस मजबूरी में किया? ऐसा करने का अधिकार उसे किसने दिया?

इन्हीं सब अपराधों को छुपाना है, इसलिए राज्यसभा में तेवरों के स्वांग दिखाए जा रहे हैं, हिन्दू सम्मेलनों के भंडारे गाँव-गाँव किये जा रहे हैं और इस या उस बहाने तनाव और उन्माद खड़े किये जा रहे हैं। ऐसे में जनता तक सही जानकारी पहुँचाना ही बचाव है, जनता का एकजुट संघर्ष ही एकमात्र हथियार है।

*(लेखक ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94250-06716)*

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