(आलेख : राजेंद्र शर्मा)

आखिरकार, हिमांत बिश्वशर्मा ने और अकेेले विश्व शर्मा ने ही नहीं, उनके नेतृत्व में भाजपा की असम इकाई ने भी, भारतीय संविधान को खुली चुनौती दे ही दी। भाजपा के आधिकारिक हैंडल से प्रसारित एक वीडियो संदेश में, बिश्वशर्मा हाथों में तरह-तरह की बंदूकें/ पिस्तौलें लिए, अमरीकी फिल्मों के कॉउबाय की मुद्राओं में प्रकट ही नहीं हुए, वह अपने हथियारों से गोलियां दागते हुए दिखाई भी दिए। याद रहे कि बंदूकों के साथ अपने गीतों को फिल्माने के लिए ही पंजाब में तथा अन्यत्र कई गायकों को हिंसा को बढ़ावा देने की धाराओं में कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ा है। इस ”गन कल्चर” को एक गंभीर खतरे की तरह चित्रित किया जाता रहा है। लेकिन, भाजपायी मुख्यमंत्री हिंसा के जरिए अपनी ”मर्दानगी” के प्रदर्शन तक ही नहीं रुके। इससे आगे बिश्वशर्मा ने, फासीवादी नरसंहार का मॉडल पेश करने के रास्ते पर लंबी छलांग लगायी है। बिश्वशर्मा ने सीधे जिंदा लोगों पर निशाना लगाया। और निशाने का चुनाव उनकी ”मर्दानगी” के वास्तविक चरित्र का पूरी तरह से खुलासा कर देने वाला था। निशाने पर जो दो लोग नजर आते हैं, वेशभूषा से साफ तौर पर मुसलमान हैं — एक अपेक्षाकृत युवा और एक अधेड़। शर्मा निशाना साधकर गोली दागते नजर आते हैं। और भाजपायी वीडियो खुशी से एलान करता है — पाइंट ब्लैंक! किसी टिप्पणीकार ने ध्यान दिलाया कि पाइंट ब्लैंक के फायर से संघ परिवार का नाता पुराना है। जनवरी 1948 में जब गोडसे की पिस्तौल से निकली तीन गोलियों ने महात्मा गांधी की जान ली थी, वह फायर भी पाइंट ब्लैंक का बताया गया था।

स्वाभाविक रूप से, अल्पसंख्यकों के खिलाफ नरसंहार के इस तरह के खुले आह्वान पर, मुख्यधारा के मीडिया पर संघ-भाजपा के पूर्ण नियंत्रण के बावजूद, काफी हो-हल्ला मचा। अन्य चीजों के अलावा इस पर भी तीखी टिप्पणियां आयीं कि शर्मा के नेतृत्व में असम भाजपा द्वारा उक्त वीडियो विज्ञापन ठीक उस समय जारी किया गया था, जब उन्हीं की पार्टी के प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी 65 फीसद से अधिक मुस्लिम आबादी वाले और घोषित रूप से इस्लामी राज्य, मलेशिया की मेहमान नवाजी का आनंद ले रहे थे, जिसमें रामकथा की कठपुतली प्रस्तुति समेत, हिंदू परंपराओं के अनेक तत्वों से लेकर, तमिल भाषा व संस्कृति के अनेक तत्वों के साथ मलेशियाई जनता के जिंदा रिश्तों के प्रदर्शन भी शामिल थे। परदेश में मोदी मुस्लिम नेताओं को गले लगा रहे थे और भारत में उनकी डबल इंजन सरकार का असम का डिब्बा, मुसलमान की पहचान कर, पाइंट ब्लैंक से फायर कर रहा था!

निंदा के इन स्वरों को अपने अनुमान से ज्यादा तेज होता देखकर, असम भाजपा ने अपने हैंडल से उक्त विज्ञापन वीडियो को डिलीट कर दिया। लेकिन, यह तभी किया गया, जब पहले यह सुनिश्चित कर लिया गया कि लाखों संघ-भाजपा समर्थक, इस वीडियो को देख चुके थे और आगे शेयर करने की शृंखलाएं शुरू कर चुके थे। यह किसी से छुपा हुआ नहीं है कि संघ-भाजपा ने खंडन-मंडन के इस तरह के धतकर्म में खूब महारत हासिल कर रखी है। किसी उकसावेपूर्ण सांप्रदायिक और इसलिए संविधान पर चोट करने वाले ”संदेश” को हवा में उछाल कर, इसकी थाह लेना कि संविधान की रक्षा करने वाली ताकतों में इस पर कैसी तथा कितनी प्रतिक्रिया होती है और फिर यह सुनिश्चित करने के बाद कि उक्त ”संदेश” उसकी कतारों तक फैल जाए, रस्मी तौर पर उस संदेश को ”वापस” ले लेना या उसका खंडन कर देना, उनका जाना-पहचाना खेल है। और इस खेल के बाद हर बार, सांप्रदायिक संदेश की नग्नता की सीमा को आगे बढ़ाया जा रहा होता है।

इस खेल में बिश्वशर्मा के नेतृत्व में असम भाजपा, सत्ताधारी पार्टी की अन्य राज्य इकाईयों से भी सवायी दुस्साहसी ही होगी, किसी से कम नहीं। हैरानी की बात नहीं है कि भाजपा की असम इकाई के लिए अपने संदेशों में अल्पसंख्यकों के ”नरसंहार” के इशारे करना भी कोई नयी बात नहीं है। अभी कुछ ही महीने पहले, दो अलग-अलग संदर्भों में और दूसरी बार तो संभवत: बिहार के विधानसभाई चुनाव में भाजपा-जदयू गठजोड़ की जीत के बाद, भागलपुर के अस्सी के दशक के भयावह दंगों में एक हड्डियों को जमा देने वाली घटना में, लोगाईं गांव में दर्जनों मुसलमानों की हत्या के बाद, खेतों में लाशें गाड़कर, उन पर गोभी बो देने के प्रसंग की, संस्तुतिपरक तरीके से याद दिलायी गयी थी। उस नातिपरोक्ष इशारे से, पाइंट ब्लैंक तक की यात्रा, पूरी तरह से अप्रत्याशित तो नहीं ही थी।

हैरानी की बात नहीं है कि इस मामले पर सारे शोर-शराबे के बावजूद, संघ-भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने, जिसमें खुद प्रधानमंत्री मोदी तक शामिल हैं, नरसंहार के उक्त जघन्य संदेश से किसी भी तरह से दूरी बनाना तक जरूरी नहीं समझा है। वास्तव में उन्हें तो इसका नोटिस तक लेने की तकलीफ करना भी गवारा नहीं हुआ है। पूरे संघ-भाजपा प्रतिष्ठान की और जाहिर है कि उसके द्वारा नियंत्रित मुख्यधारा के मीडिया की भी मुद्रा, ”मूंदेहु आंख कहूं कछु नाहीं” की ही बनी रही है। उनके लिए तिनके की ओट के तौर पर इतना भर काफी है कि आपत्तिजनक बताया जा रहा वीडियो संदेश तो सार्वजनिक पटल पर है ही नहीं — उसे तो पहले ही हटाया जा चुका है! जिसे हटाया जा चुका है, उस पर विवाद कैसा?

संघ-भाजपा के शीर्ष नेतृत्व, खासतौर पर मोदी-शाह जोड़ी की, ऐसे सभी मामलों में चुप्पी वैसे तो एक आम कायदा ही है, फिर भी आने वाले विधानसभाई चुनावों के संदर्भ में यह चुप्पी उनके लिए और भी जरूरी है। यह थोड़े भी राजनीतिक रूप से सजग, तटस्थ प्रेक्षकों से छुपा नहीं हैं कि आम तौर पर आने वाले राज्य विधानसभाई चुनावों में, और खासतौर पर असम और प. बंगाल में विधानसभा के चुनावों में, संघ परिवार को अपनी अति-उपयोग से बुरी तरह घिस चुकी, हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक तुरुप का ही सहारा है।

वास्तव में खुल्लमखुल्ला सांप्रदायिक तुरुप का केंद्रीय आधार के रूप में सहारा लेने की शुरूआत तो, 2024 के आम चुनाव के दूसरे-तीसरे चरण से ही शुरू हो गयी थी, जब खुद प्रधानमंत्री मोदी ने इसका ”खतरा” दिखाना शुरू कर दिया था कि अगर सत्ता उनके विरोधियों के हाथ में आ गयी, तो वे हिंदुओं से छीनकर उनकी भैंस, जमीन, मंगलसूत्र, आरक्षण और न जाने क्या-क्या, मुलसमानों को दे देंगे, जिनका तुष्टीकरण ही उनका मुख्य काम है!
उसके बाद से पहले झारखंड में, उसके बाद बिहार में, विधानसभा चुनाव के हरेक चक्र में मोदी के प्रत्यक्ष नेतृत्व में, हिंदुओं के लिए ”छीन लेंगे, मुसलमानों को बांट देंगे” के खतरे के इस राग का स्वर तेज से तेज ही किया गया है। हैरानी की बात नहीं है कि विधानसभा चुनाव के इस चक्र में, जो उस समय आ रहा है, जब मोदी के नेतृत्व में डबल इंजनिया राज के पास, अपनी चौतरफा विफलताओं के सामने, जनता को बहलाने के लिए और कुछ भी नहीं बचा है, ”खतरे” के इस जाप को और भी तेज किया जाने वाला है।

इसके पर्याप्त संकेत मोदी और शाह ने अब तक तथाकथित ”घुसपैठियों के खतरे” के अपने बखानों और उन्हें ”चुन-चुनकर निकालने” के ऐलानों से दे भी दिए हैं। प. बंगाल में उत्पीड़नकारी, मनमाने तथा पक्षपाती, मतदाता सूची गहन पुनरीक्षण या सर की खुली हिमायत और असम में बिश्वशर्मा की करतूतों के उनके खुले अनुमोदन में, इसकी तैयारियां साफ नजर भी आती हैं। यहां से बिश्वशर्मा का पाइंट ब्लैंक ज्यादा दूर भी नहीं है। लगता है कि बिश्वशर्मा, पाइंट ब्लैंक से निशाना लगाएंगे, जिसके सामने शाह और मोदी के ”घुसपैठियों के खतरे” के संदेश, उदार न सही, तार्किक तो बनाकर पेश ही किए जा सकते हैं!

फिर भी हैरानी की बात है कि इस पर शायद ही किसी को हैरानी होगी कि बहुसंख्यक सांप्रदायिकता के इस खेल को रोकने के लिए, बिखरे हुए जनमत के सिवा, संविधान की रक्षा के लिए जिम्मेदार किसी भी संस्था में शायद ही कोई हरकत नजर आती है। संविधान की शपथ लेकर, सभी लोगों के हितों की रक्षा करने का वचन देने वाला, एक राज्य का मुख्यमंत्री खुले आम आबादी के एक हिस्से के नरसंहार के आह्वान कर रहा है और सर्वोच्च न्यायालय समेत, समूची न्याय प्रणाली इसे अनदेखा कर के अपने ‘न्याय करने’ की रस्मअदायगी करने में लगी हुई है। वह चुनाव आयोग, जिस पर यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है कि चुनाव समेत, भारतीय  राजनीति धर्मनिरपेक्ष, जनतंत्र के दायरे में संचालित हो, कब का अपनी इस जिम्मेदारी का परित्याग कर चुका है और अवैध मतदाताओं की खोज में लगा हुआ है, ताकि उन्हें चुन-चुनकर निकाला जा सके। उसने न्याय व्यवस्था के काफी हद तक भुलाए जा चुके आदर्श सूत्र को सिर के बल ही खड़ा कर दिया है — चाहे सौ वैध मतदाता कट जाएं, पर एक अवैध मतदाता न रहने पाए! मोदीशाही के बहुमत के आधीन विपक्ष को म्यूट कर के चलती संसद, मोदी सरकार और उसकी गोद में बैठे मुख्यधारा के मीडिया से तो खैर कोई उम्मीद भी कर ही कैसे सकता है?

बहुसंख्यक सांप्रदायिकता की ताकतें, धर्मनिरपेक्ष, जनतंत्रात्मक संविधान को तेजी से पीछे धकेल रही हैं। न्यायपालिका समेत इसकी रक्षा के लिए जिम्मेदार सभी संस्थाएं, पीछे खिसकते हुए इसके लिए जगह खाली कर रही हैं। संविधान की छाती पर पाइंट ब्लैंक फायर खोल दिया गया है।

*(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)*

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