(आलेख : बादल सरोज)

बीते कुछ दिनों से कुनबे ने तेजी के साथ, कभी बासी नहीं होने दी कढ़ी में फिर से उबाल लाने की खुराफात शुरू की हुई है। तरीका वही पुराना है, अधूरी जानकारी में तड़का लगाकर अफवाहें फैलाना, सूचना के अभाव से उपजे अज्ञान में व्हाट्सअप का गोबर खाद डालना।  जाति श्रेष्ठता के वायरस – विषाणु – को संक्रामक बनाकर, पहले से दुर्बल समाज को बीमार बनाना। इरादा भी वही है : सामाजिक न्याय के किसी आधे अधूरे कदम की भी मुखालफत करके उसे हिंदू समाज के लिए खतरा बताना और वर्चस्वकारी और अमानवीय जातिगत उत्पीड़न को शास्त्रसम्मत महान परम्परा बताते हुए उसकी रोकथाम के लिए किये जाने वाले मामूली और कमजोर कदमों को भी जातिवाद फैलाने वाला कहकर कोहराम मचाना।

अलबत्ता मुद्दा इस बार नया है। इस बार यूजीसी के नए नियमों को बहाना बनाकर उन्माद पैदा किया जा रहा है। डेढ़ सयाने पोंगे इसे कथित सवर्ण समुदाय के लिए जीवन मृत्यु का संकट बता रहे हैं और संयोग से जाति विशेष में जन्मे कुछ भोले भाले घोंघे, बिना इस हंगामे के पीछे छुपी शातिर बदनीयत को समझे उनके दाने को चुग कर भरम जाल में फंस रहे हैं।

इन पंक्तियों के लिखे जाने तक कई रणबांकुरे अपना लंघोट लहरा अखाड़े में कूद चुके हैं। नफरती भाषण के कई मुकदमों में एफ़आईआर शुदा, गाँधी से एपीजे अब्दुल कलाम तक के खिलाफ अपशब्द बोलने और मुसलमानों के नरसंहार तक का आह्वान करने वाले, खुद लंदन-मास्को में नौकरी करके लौटे, भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने का दम भरने वाले, कथित अखिल भारतीय संत परिषद् के अध्यक्ष और संघी कुनबे के प्रिय दीपक त्यागी उर्फ़ यति नरसिंहानंद ने यूजीसी के नए नियमों को मौत का परवाना – डेथ वारंट – बताया है।

कुकवि कुमार विश्वास ने इसे सवर्णों का रोआं-रोआं उखाड़ने वाला बताते हुए अपने सोशल मीडिया प्लेटफार्म के सारे गधे घोड़े खोल दिए हैं। यूपी की बरेली के एक दोयम दर्जे के अफसर अलंकार अग्निहोत्री ने खुद को हाथ में लिए पोस्टर से कलंकृत करते हुए इन नियमों को रोलेट एक्ट बताया है और अपने पद से इस्तीफे का एलान करके आग में घी देने का अग्निहोत्र कर्म पूरा कर दिया है। भाजपा के तीसरे और चौथे दर्जे के नेताओं ने अपनी त्यागपत्र की पुंगियों से अग्निकुंड में आहुति देने का धर्म निबाहा ।

इस प्रायोजित व्यथा की कथा को समझने के लिए बात की शुरुआत शुरू से ही करना ठीक होगा। और वह इस तरह कि यह जाना जाए कि ये नियम क्या हैं? क्या ऐसे नियम पहली बार बने हैं? क्या इन्हें सरकार ने खुश होकर खुद अपनी मर्जी से बनाया है? और इसी के साथ यह भी कि आखिर इन नियमों को लाने की आवश्यकता क्यों पड़ी?

*क्या हैं यूजीसी के नए नियम?*

13 जनवरी को देश की ऊपर के स्तर की शिक्षा को नियमित करने वाले विश्वविद्यालय अनुदान आयोग – यूजीसी – ने नियमावली के नियम 3 (सी) में थोड़े बहुत सुधार और बदलाव की अधिसूचना जारी की और इन्हें 15 जनवरी से लागू कर दिया गया। इन्हें *उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता के संवर्धन संबंधी नियम – प्रमोशन ऑफ़ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्युशंस रेगुलेशन 2026* कहा गया। ध्यान रहे, इस तरह के नियम पहली बार नहीं बने हैं। चौदह साल पहले 2012 में भी इससे मिलते-जुलते प्रावधान किये गए थे। उनकी आपराधिक विफलता के चलते उनमे सुधार और इस तरह के बदलाव की जरूरत पेश आई, ताकि अब उन्हें प्रभावी बनाया जा सके।

यह जरूरत भी सरकार के दिमाग में नहीं आई। इन्हें आईआईटी, आईआईएम, विश्वविद्यालयों और इंजीनियरिंग से लेकर बड़े-बड़े मेडिकल कॉलेजों में लगातार बढ़ते जातिगत उत्पीड़न की वारदातों और दलित, आदिवासी तथा वंचित समुदायों से जुड़े छात्र-छात्राओं की आत्महत्याओं की घटनाओं में वृद्धि के चलते सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्देशों के पालन में लाया गया। सही होगा यह कहना कि लाना पड़ा।

इन नियमों के अनुसार अब :
*(अ)*  हर उच्च शिक्षा संस्थान को अपने यहाँ समान अवसर सुनिश्चित करने वाले – इक्वल अपोर्चुनिटी सेंटर्स – बनाने होंगे।
*(आ)* संस्थान के प्रमुख की अध्यक्षता में एक समानता समिति –इक्विटी कमेटी – गठित करनी होगी,  जिसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े समुदाय ओबीसी, महिला और दिव्यांग सदस्य होंगे। 
*(इ)* यह समिति साल में दो बार अपनी बैठक करेगी और हर छह माह में अपनी रिपोर्ट सार्वजनिक करेगी। इस रिपोर्टमें जाति आधारित ड्रॉपआउट – बीच में पढाई छोड़ देने – की दर, कुल प्राप्त शिकायतों और उन पर की गयी कार्यवाही का ब्यौरा  दिया जाएगा।
*(ई)* एक 24 घंटे काम करने वाली हैल्पलाइन शुरू की जायेगी।
*(उ)* हर छात्रावास और विभाग में इक्विटी स्क्वाड गठित किये जायेंगे, इक्विटी एम्बेसडर नियुक्त किये जायेंगे। इनका काम त्वरित हस्तक्षेप और जागरूकता पैदा करने का होगा।
*(ऊ)* कोई भी शिकायत मिलने पर 24 घंटे के अन्दर इस कमेटी की बैठक बुलानी होगी। उस शिकायत पर निर्धारित समय में कार्यवाही करनी होगी।
*(ए)* कार्यवाही की पर्याप्तता-अपर्याप्तता को लेकर अपील के लिए एक निष्पक्ष लोकपाल – ओम्बुड्समैन – होगा।
(ऐ)* इन नियमों में भेदभाव को भी परिभाषित किया गया है। जाति, धर्म, लिंग, विकलांगता और जन्मस्थान के आधार पर किये जाने वाले बर्ताव को भेदभाव बताया गया है।

*क्यों लाने पड़े ये नियम?*

जैसा कि कहा जा चुका है ये नियम ‘सबका साथ सबका विकास’ की मुंहजबानी बकवास करते हुए ‘कॉर्पोरेट का साथ मनु का राज’ लाने वाली सरकार अपनी मर्जी से नहीं लाई है। इसकी रक्तरंजित पृष्ठभूमि है। 

दस साल पहले 17 जनवरी 2016 को हैदराबाद की सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी में पीएचडी कर रहे युवा रोहित वेमुला की स्कालरशिप जातिगत घृणा के आधार पर बंद कर दी गयी। इससे आहत और दुखी होकर रोहित ने आत्महत्या कर ली। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था। अपने सुसाइड नोट में लिखे उसके शब्दों कि “मेरा जन्म ही एक जानलेवा अनहोनी है” ने सभ्य समाज को दहला दिया था। पूरे देश में इसके खिलाफ आक्रोश पैदा हुआ।

मगर जो बर्बर थे, वे बर्बर ही रहे। इसी नृशंस मानसिकता का उदाहरण था — इस मामले में तब की शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी द्वारा संसद में किया गया विष वमन। उन्होंने रोहित वेमुला की माँ और पिता को भी नहीं बख्शा। स्मृति ईरानी की  आपराधिक टिप्पणियाँ, उन टिप्पणियों के समय बत्तीसी दिखाती भाजपा नेतृत्व की त्रयी और चौकड़ी के चेहरे देश को आज भी याद हैं। रोहित वेमुला केस सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा। इधर तारीखें बढ़ती रहीं, उधर वारदातें बढ़ती रहीं।

22 मई 2019 को मुम्बई के एक मेडिकल कॉलेज की रेजिडेंट डॉक्टर पायल तड़वी ने जातिसूचक अपमान से आजिज आकर आत्महत्या कर ली। रोहित दलित थे, तो पायल आदिवासी थीं। 12 फरवरी 2023 को आईआईटी बॉम्बे के दलित छात्र दर्शन सोलंकी ने सातवीं मंजिल से कूदकर जान दे दी। आईआईटी दिल्ली में बीटेक की पढ़ाई कर रहे दो छात्रों आयुष आशना ने जुलाई 2023 में और अनिल कुमार ने उसी साल 1 सितम्बर को आत्महत्या कर ली। ध्यान रहे राजधानी दिल्ली में हुए इन दोनों ही हादसों में पुलिस ने दो साल बाद एफ़आईआर दर्ज की – वह भी तब, जब सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाते हुए रिपोर्ट दर्ज करने का आदेश दिया। इन स्थितियों में नए नियमों की आवश्यकता महसूस हुई। मगर किसे? सरकार को? नहीं।

*कैसे बनाए गए ये नियम?*

इन देश भर में धिक्कारी गयी घटनाओं के बाद सुप्रीम कोर्ट में रोहित वेमुला और पायल तड़वी मामलों में दायर मुकदमों ने गति पकड़ी। सुप्रीम कोर्ट ने जांचा कि जातिगत आधार पर किये जाने वाले उत्पीड़न से संबंधित  वर्ष 2012 में लागू किये गए नियमों की स्थिति क्या है। कोर्ट को तथ्य चाहिए थे, सो उसने यूजीसी को आदेश दिया कि वह इस तरह के मामलों से जुड़े आँकड़े इकट्ठा कर अदालत के सामने प्रस्तुत करे। आदेश की तामील में दिए अपने जवाब में यूजीसी ने माना कि अधिकाँश संस्थानों में 2012 के नियम लागू ही नहीं किये जा रहे हैं। इसके साथ जोआंकड़े प्रस्तुत किये गए, वे और भी चौंकाने वाले थे।

शपथपत्र के साथ सौंपी जानकारी में, यूजीसी ने माना कि पिछले पांच वर्षों में उच्च शिक्षा संस्थानों, यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में जातिगत भेदभाव की शिकायतों में 118.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। अनुसलझे यानि  लम्बित मामलों में तो यह वृद्धि 500– पांच सौ –  प्रतिशत की है।

इसी के बारे में हुए एक सर्वेक्षण से कुछ और तथ्य सामने आये। जानकारी निकली कि *देश के सर्वोच्च कहे जाने वाले शिक्षा संस्थानों – आईआईटी – में अनुसूचित जाति और जनजाति के 70 प्रतिशत छात्रों को जातिगत आधार पर, कभी न कभी, किसी न किसी रूप में उत्पीड़न झेलना पड़ा है।* इसमें भी और परेशान करने वाला तथ्य यह आया कि *द्रोणाचार्य यहाँ भी डटे हैं :  एससी, एसटी समुदाय के हर चौथे छात्र/छात्रा को स्वयं अपने शिक्षक के द्वारा भी जातिगत भेदभाव का शिकार बनना पड़ा है।* 

इस भयावह स्थिति से झुंझलाकर जनवरी 2025 में सर्वोच्च अदालत ने तुरंत ऐसी ढांचागत प्रक्रिया तय करने का आदेश दिया, जिससे इस स्थिति में बदलाव लाया जा सके। नतीजे में ये नियम बने। इनका मसौदा 27 फरवरी 2025 को यूजीसी ने सार्वजनिक किया और सभी से सुझाव मांगे। यूजीसी संसद के क़ानून के तहत बनी संस्था है इसलिए और ऐसी परम्परा है। इसलिए भी, इन मसौदा नियमों को शिक्षा, महिला, युवा और खेल संबंधी संसदीय स्थायी समिति को भेजा गया। इसने समीक्षा की और कुछ सुझावों के साथ इन्हें अंतिम रूप दिया। *इस स्थायी समिति में बाकी दलों के अलावा सीपीएम के सांसद बिकास रंजन भट्टाचार्य भी शामिल थे : अध्यक्ष दिग्विजय सिंह थे।* अंततः यूजीसी ने 13 जनवरी 2026 को अधिसूचना जारी करके 15 जनवरी से इन नियमों को लागू कर दिया।

*साफ़ छुपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं!!*

भारतकी कोई 85 प्रतिशत आबादी के छात्र-छात्राओं के लिए इतनी दारुण स्थिति में मलहम –सिर्फ मलहम — लगाने के लिए, पूरे एक वर्ष तक चली प्रक्रिया के बाद बने नियमों पर कुनबा ऐसा ढोंगी विलाप क्यों कर रहा है? ऐसा क्यों बता रहा है, जैसे एकदम, अचानक, रातों-रात कुछ ऐसा अघट घट गया कि यदि उसे रोका नहीं गया, तो धर्म भ्रष्ट, समाज नष्ट और पृथ्वी का अपनी धुरी पर घूमना अस्त-व्यस्त हो जाएगा। बिल्ली के थैले से बाहर आ जाने वाले अंग्रेजी मुहावरे की तर्ज पर कहें, तो यह भेड़ की ओढ़ी हुई खाल उतारकर भेड़िये का बाहर आना है।

यह मनु की प्रेतसिद्धि में लगे वर्णाश्रम के साधकों का आर्तनाद है। यह भारत के समाज को डेढ़-दो हजार साल के पहले की अवस्था में धकेलने पर आमादा अंधकार के पुजारियों का हाहाकार है। वे ऊँच-नीच की यातनादायी अवधारणा पर टिकी जाति श्रेष्ठता के मनोविकार की अर्थी की कोई गाँठ ढीली नहीं होने देना चाहते। अब चूंकि साफ़-साफ़ ऐसा कह नहीं सकते, इसलिए सारे सवर्णों की एकता के लिए झूठी अफवाहें फैला रहे हैं। मंडल कांड का द्वितीय अध्याय शुरू करना चाह रहे हैं। अभी हवा का रुझान देखना है, अभी पांच राज्यों में चुनाव चुनाव खेलना है, इसलिए पिछलग्गुओं से हुआं-हुआं करवाई जा रही है। माहौल बनते ही, चुनाव निबटते ही,  नेकरिया पलटन की भरम मंडली खुद कूदेगी।

*यही है हिन्दू राष्ट्र का असली चेहरा*

*जिसे पहले हिन्दू धर्म बताया गया, चार-पांच बरस से उसे सनातन कहा जाने लगा, अब वह अपने सारे समानार्थी शब्दों के झीने वस्त्र उतारकर सीधे उस मूल धातु शब्द पर आ रहा है, जिसे इतिहास में हमेशा ब्राह्मण धर्म के नाम से जाना गया।* वर्णाश्रम पर आधारित, स्वभाव से ही अवैज्ञानिक. अलोकतांत्रिक, अमानवीय  ब्राह्मण धर्म, जिसे उसके सही नाम से पुकारने में उसके आराधकों को लज्जा आती है। वह शासन प्रणाली, जिसने सदियों तक इस देश के विकास को रोके रखा। सभी ब्राहण उपनाम धारियों का नहीं, सिर्फ उनका जिन्हें संघ के गोलवलकर और इन दिनों संग के रामभद्राचार्य ब्राह्मण मानते हैं।

यह वह वर्चस्वकारी, समाज विरोधी धारणा है, जिसने हर नए, हर सुधार, हर बदलाव का विरोध किया। *चर्च ने गैलिलियो से, भले 359 साल बाद सही, माफ़ी तो मांगी। लेकिन यह वह अधर्म है, जिसने आज तक शम्बूक, एकलव्य, सावित्री फुले, यहाँ तक कि सीता और द्रौपदी, गार्गी और मैत्रेयी से भी ‘सॉरी’ नहीं बोला।*

इसे छुपाया भी नहीं जा रहा। जिस अफसर अलंकार अग्निहोत्री को यह कुनबा सर पर धारे घूम रहा है, यूजीसी के नए नियम उसके इस्तीफे की पहली नहीं, दूसरी वजह हैं। खुद उसने पहली वजह शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के अपमान के उदाहरण के साथ योगी राज में ब्राह्मणों का अपमान बतायी है। सरकारों का रुख और रवैया भी इसी की ताईद करता है। गणतंत्र दिवस के दिन यह अधिकारी सार्वजनिक रूप से संविधान की मूल भावना और स्थापनाओं की धज्जियां उड़ाता है : सरकार उसकी मान-मनौवल करने के लिए कलेक्टर सहित चार-पांच बड़े अधिकारियों को उसके घर भेजती है। सार्वजनिक रूप से  दिया गया उसका इस्तीफा भी मंजूर नहीं किया जाता। वहीँ इसी दिन महाराष्ट्र के नाशिक में एक मंत्री द्वारा गणतंत्र दिवस के अपने भाषण में डॉ. आंबेडकर का नाम तक न लिए जाने पर विरोध दर्ज कराने वाली फारेस्ट गार्ड माधवी जाधव को पुलिस द्वारा तत्काल हिरासत में ले लिया जाता है।

*खेल की असलियत और जन की भूमिका*     
                        
जिन्हें सरकारी नौकरियाँ खत्म करते समय, पब्लिक सेक्टर बंद करते समय, रोजगार की सारी संभावनाओं का गला घोंटते समय, ट्रम्प की घुड़की और कारपोरेट की भभकी में देश की खेती-किसानी को चौपट करते समय, तीन कृषि क़ानून और चार श्रम संहिताएँ बनाकर देश की मेहनतकश जनता को गुलाम बनाने का अपराध करते समय सवर्ण युवाओं की चिंता नहीं हुई, वे संविधान-सम्मत नियमों को बनाए जाते समय सवर्ण छात्रों को डेथ वारंट का झुनझुना दिखाकर खुद अपनी ही बर्बादी की यात्रा में ढोल मंजीरे बजाने के लिए बुला रहे हैं।

उच्च शिक्षा का कारपोरेटीकरण और बाजारूकरण करने वाले, शिक्षा संस्थाओं की स्वायत्तता और राज्यों के अधिकारों को कमजोर करने वाले, कथित भारतीय ज्ञान प्रणाली के नाम पर शिक्षा का हिंदुत्वीकरण करने वाली कथित नई शिक्षा नीति और उसे आगे बढ़ाने वाले प्रस्तावित, विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025 पर जिनका बोल तक नहीं फूटा, वे यूजीसी के नए नियमों को लेकर बदहवास हुए जा रहे है? क्यों ?

इसलिए कि ‘महान प्राचीन हिन्दू समाज’ की बहाली के नाम पर बनाए जाने वाले कथित हिन्दू राष्ट्र का एजेंडा अब अपने असली ठीये पर पहुँचने की हड़बड़ी में है। उसे बहुत जल्दी है।

अब यह भारत को तय करना है कि उसे कहाँ जाना है। मुक्तिबोध के शब्दों में कहें, तो तय करना होगा कि पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है? वरना दिनकर जी कह ही गए हैं कि तटस्थ रहना भी अपराध में शुमार होता है।

*(लेखक ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94250-06716)*

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