आलेख। प्रदीप चौधरी।। उस सुबह दिल्ली के पालम एयरपोर्ट पर एक युवा पायलट समय की पाबंदी के साथ उतरा। यूनिफॉर्म सिलवटों से रहित, टोपी हाथ में, आँखों में वही सादगी जो किसी विमान को उड़ाने वाले की होती है—न कि सत्ता संभालने वाले की। राजीव गांधी उस समय आसमान की ऊँचाइयों में जीते थे, जहाँ निर्णय मशीनों के साथ मिलकर लिए जाते हैं, न कि नारों और भाषणों से। उन्हें नहीं मालूम था कि इतिहास जल्द ही उन्हें एक अलग उड़ान पर ले जाएगा।1970 का दशक भारत के लिए राजनीति का शोर-शराबे वाला दौर था। इंदिरा गांधी की सत्ता, आपातकाल के बाद का उथल-पुथल भरा माहौल। लेकिन राजीव उससे दूर थे। कैम्ब्रिज की इंजीनियरिंग पढ़ाई, फिर एयर इंडिया में पायलट की नौकरी—उनका जीवन अनुशासन, तकनीक और सटीक समयबद्धता का मिश्रण था। वे मशीनों से डरते नहीं थे; वे उन्हें समझते थे। यही समझ बाद में भारत के भविष्य की नींव बनी—बिना किसी बड़े नारे या घोषणा के।1980 में संजय गांधी की अचानक मृत्यु ने सब बदल दिया। घर में गहरा शोक, देश में राजनीतिक हलचल। इंदिरा गांधी को एहसास था कि अब परिवार की जिम्मेदारी राजीव पर आएगी। राजीव राजनीति में नहीं आना चाहते थे, लेकिन राजनीति कभी “चाहना” नहीं पूछती। 1981 में वे अमेठी से संसद पहुँचे। नए सांसद, कम बोलने वाले, ज्यादा सुनने वाले। कई लोगों ने सोचा—यह आदमी राजनीति नहीं जानता। लेकिन कोई नहीं समझ सका कि वे देश को भविष्य के चश्मे से देख रहे थे।31 अक्टूबर 1984—एक काला दिन। इंदिरा गांधी की हत्या। दिल्ली में अफरा-तफरी, सड़कों पर हिंसा। उसी शाम 40 वर्षीय राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। न लंबा राजनीतिक अनुभव, न सत्ता की भूख—बस एक टूटे हुए बेटे की आँखें और एक सदमे में डूबे देश की जिम्मेदारी। उनका पहला सार्वजनिक वक्तव्य इतिहास में अमर हो गया: “जब एक बड़ा पेड़ गिरता है, तो धरती हिलती है।”यह वाक्य भावुक था, लेकिन भावुकता के पीछे एक ठंडा, तर्कसंगत दिमाग काम कर रहा था।प्रधानमंत्री बनते ही राजीव ने सरकारी तंत्र की हकीकत देखी—कागजों के ढेर, महीनों की देरी, भ्रष्टाचार और सुस्ती। रेलवे आरक्षण के लिए दिन भर लाइनें, बैंक में पासबुक के लिए घंटों इंतजार, टेलीफोन कनेक्शन के लिए सालों की वेटिंग लिस्ट। उन्होंने एक शब्द चुना—कंप्यूटर।1985 तक यह शब्द संसद की बहसों में गूंजने लगा। लेकिन भारत में कंप्यूटर तब विदेशी साजिश जैसा लगता था। ट्रेड यूनियनों ने चेतावनी दी—”मशीन आएगी, मजदूर जाएगा।” सरकारी कर्मचारी बोले—”हम बेरोजगार हो जाएंगे।” विपक्ष ने संसद में आरोप लगाया—”यह पश्चिमी नकल है।”एक तीखी बहस में विपक्ष ने तंज कसा: “प्रधानमंत्री जी, गरीब देश में कंप्यूटर का क्या काम?”राजीव का जवाब सीधा और क्रांतिकारी था: “गरीब इसलिए हैं, क्योंकि हमने तकनीक से डरना सीख लिया है।यह वाक्य समाचार पत्रों की सुर्खियों में कम आया, लेकिन इतिहास में दर्ज हो गया।1986 में रेलवे में कंप्यूटरीकृत आरक्षण प्रणाली शुरू हुई। विरोध चरम पर पहुँचा—हड़तालें, नारे “कंप्यूटर हटाओ”, कुछ जगह मशीनें तोड़ी गईं। कर्मचारियों का कहना था—”हम ट्रेन चलाएंगे, मशीन नहीं।” राजीव नहीं झुके। उन्होंने कहा: “रेलवे भारत की रीढ़ है, और रीढ़ को मजबूत करने के लिए तकनीक चाहिए।”बैंकिंग क्षेत्र में भी कंप्यूटर लाने की पहल हुई। विपक्ष फिर बोला—”नौकरियां खा जाएगा।” राजीव ने आरबीआई और बैंकों के अधिकारियों से कहा: “कंप्यूटर क्लर्क को बेरोजगार नहीं करेगा, उसे कुशल बनाएगा।”1987 में दूरसंचार क्रांति की शुरुआत। फोन कनेक्शन के लिए रिश्वत और सालों की प्रतीक्षा का दौर था। राजीव ने C-DOT को मजबूत किया, स्वदेशी तकनीक पर जोर दिया। लक्ष्य था—फोन आम आदमी तक पहुंचे। पीसीओ क्रांति शुरू हुई, गांव-गांव तक संचार का जाल बिछा।संसद में विपक्ष ने तंज कसा: “आप देश को मशीन बना रहे हैं।”राजीव ने शांत स्वर में जवाब दिया: “मैं देश को भविष्य के लिए तैयार कर रहा हूं।”उन्होंने आईटी शिक्षा पर निवेश बढ़ाया, इंजीनियरिंग कॉलेजों को प्रोत्साहन दिया। सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क्स (STP) की नींव 1980 के अंत में रखी गई, जो बाद में 1991 में STPI के रूप में स्थापित हुई। उस समय किसी को अंदाजा नहीं था कि ये कदम भारत को दुनिया का आईटी हब बना देंगे।विरोध हर तरफ था—मजदूर संगठन, यहां तक कि कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता भी असहज थे। कुछ बोले—”बहुत तेज जा रहे हैं।” राजीव का जवाब था: “अगर हम आज तेज नहीं गए, तो कल पीछे रह जाएंगे।”1988-89 तक कंप्यूटर सरकारी दफ्तरों में नजर आने लगे। लोग समझने लगे—नौकरियां नहीं गईं, काम आसान हुआ। रेलवे आरक्षण की लाइनें छोटी हुईं, बैंकिंग तेज हुई, टेलीफोन पहुंचा। विरोध की आवाजें धीमी पड़ गईं।लेकिन राजनीति ने उन्हें ज्यादा समय नहीं दिया। 1989 में सरकार चली गई। राजीव विपक्ष में बैठे, लेकिन उनका विश्वास अडिग रहा।21 मई 1991—श्रीपेरंबुदूर में एक चुनावी सभा के दौरान धमाका। राजीव गांधी शहीद हो गए।जिस व्यक्ति को कंप्यूटर लाने के लिए कोसा गया, वही आज आधुनिक भारत का शिल्पकार कहलाता है। जिस प्रधानमंत्री को “कंप्यूटर ब्वॉय” कहकर तंज कसा गया, उसी की दूरदृष्टि ने भारत को आईटी और टेलीकॉम क्रांति की ओर ले जाकर आज के डिजिटल इंडिया की नींव रखी।आज जब हम मोबाइल में UPI से पेमेंट करते हैं, सॉफ्टवेयर एक्सपोर्ट से अरबों कमाते हैं, दुनिया भर में भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स काम करते हैं—तो याद रखें, यह सब अचानक नहीं हुआ। यह उस दौर में शुरू हुआ जब कंप्यूटर डरावना लगता था।और एक प्रधानमंत्री ने कहा था—”डर से देश नहीं बनते।”यह कहानी न किसी नारे की है, न कल्पना की। यह उस ऐतिहासिक सच की कहानी है, जिसे उस समय समझा नहीं गया, लेकिन आज पूरा भारत इसे जी रहा है। View this post on Instagram Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन इंदौर: अवैध एमडी 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