(आलेख : बृंदा करात, अनुवाद : संजय पराते)

सुप्रीम कोर्ट का उमर खालिद और शरजील इमाम को ज़मानत देने से इंकार कर दिया है, जबकि उसी मामले में पांच अन्य आरोपियों की ज़मानत याचिकाएं मंज़ूर कर ली है। यह सिर्फ़ दो लोगों को प्रभावित करने वाला न्यायिक आदेश नहीं है। यह भारत में संवैधानिक लोकतंत्र के लिए एक बहुत ही संकट पैदा करने वाला मामला है। जबकि सत्ताधारी पार्टी, उसकी ज़हरीकी ट्रोल सेना और व्यापक मीडिया की बंधक पारिस्थितिकी इस अन्यायपूर्ण और दूरगामी आदेश का जश्न मना रही है, वामपंथी पार्टियों को छोड़कर मुख्यधारा के ज़्यादातर विपक्ष की राजनीतिक चुप्पी — साफ़ दिखती है और इस पर सवाल उठाया  जाना चाहिए।

यह आदेश एक ऐसे पैटर्न को मज़बूत करता है, जिसमें असाधारण कानूनों, खासकर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) को, “राष्ट्रीय सुरक्षा” की रक्षा के घोषित लक्ष्य के लिए इस्तेमाल करने के बजाय, असंतुष्टों को लंबे समय तक जेल में रखने के साधन के तौर पर सामान्य बना दिया गया है। न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और एन वी अंजारिया की पीठ ने अभियोजन पक्ष के प्रथम दृष्टया संलिप्तता के दावे को स्वीकार किया है और कहा है कि खालिद और इमाम अन्य आरोपियों से “गुणात्मक रूप से अलग स्थिति” में है।

विडंबना यह है कि एकमात्र साफ़ अंतर यह है कि हिंसा के दौरान उनमें से कोई भी दिल्ली में मौजूद नहीं था। इमाम पहले से ही न्यायिक हिरासत में था, उसे जनवरी में — दिल्ली हिंसा से लगभग एक महीने पहले — भड़काऊ भाषण देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। खालिद कहीं और था। इन तथ्यों को, जिनसे किसी भी कथित साज़िश में उनकी गैर-भागीदारी का मामला मज़बूत होना चाहिए था, उल्टा कर दिया गया, और हिंसा वाली जगह पर उनकी गैर-मौजूदगी को गलत तरीके से साज़िश रचने के सबूत के तौर पर पेश किया गया।

अपने आदेश में, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पहले के दिए गए उन फैसलों के तर्क को पलट दिया है, जिनमें यूएपीए के तहत जमानत देने के मामले में ज़्यादा संतुलित नज़रिया अपनाया गया था। यह आदेश कानून के पहले से ही सख्त स्वभाव में नए और खतरनाक आयाम जोड़ता है। इस व्याख्या के तहत, किसी को भी हिंसा के किसी भी काम में शामिल होने या सीधे हिंसा भड़काने की ज़रूरत नहीं है। सड़क जाम करने, सार्वजनिक जगहों पर बाधा डालने, या “आर्थिक स्थिरता” को प्रभावित करने वाले  कामों को भी अब आतंकवाद माना जा सकता है।

इस तरह की बड़े दायरे की व्याख्या के तहत, हड़ताल पर जाने वाले मज़दूरों, अपनी ज़मीन में खनन का विरोध करने के लिए सड़कों को जाम करने वाले आदिवासियों, या अपने घरों को गैर-कानूनी तरीके से तोड़े जाने का विरोध करने वाले झुग्गी-झोपड़ीवासियों को यूएपीए  के तहत गिरफ्तार किया जा सकता है और आतंकवादी घोषित किया जा सकता है। ऐसे में, संविधान के “सुनहरे त्रिकोण” — अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), और अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) — का क्या बचेगा? यह व्याख्या एक तानाशाह सरकार के लिए असहमति को देशद्रोह के बराबर मानने और डर और जेल के ज़रिए अपनी नीतियों के किसी भी विरोध को व्यवस्थित रूप से खत्म करने का रास्ता खोलती है।

इस अन्याय की जड़ में एक और कड़वी सच्चाई छिपी है: शुरुआती सबूत और घटनाओं का असली क्रम बिल्कुल अलग दिशा की ओर इशारा करते हैं। हिंसा की वजह संशोधित नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) का बड़े पैमाने पर विरोध था। यह विरोध मोटे तौर पर, शांतिपूर्ण और धर्मनिरपेक्ष था, और जाति, समुदाय तथा क्षेत्रीय सीमाओं को पार करते हुए अपने फैलाव में अभूतपूर्व था। फरवरी 2020 के पहले हफ़्ते में हुए दिल्ली विधानसभा चुनावों में भाजपा के अभियान का एक मुख्य मुद्दा इस विरोध को कलंकित करना था।

गृह मंत्री के उन भड़काऊ शब्दों को कौन भूल सकता है, जो उन्होंने मतदाताओं से कहा था — “बटन इतनी ज़ोर से दबाओ कि उसका झटका शाहीन बाग तक महसूस हो।” भाजपा चुनाव हार गई। इस हार ने सत्ताधारी पार्टी के नज़रिए से, सीएए-विरोधी आंदोलन को तोड़ने, उसे कलंकित करने और उसे सांप्रदायिक बताने की ज़रूरत को और मज़बूत कर दिया। उस दौरान खालिद, इमाम और दूसरे कार्यकर्ताओं के भाषणों और दूसरी तरफ अनुराग ठाकुर, प्रवेश वर्मा और कपिल मिश्रा जैसे भाजपा नेताओं के भाषणों की तुलना करने पर साफ पता चलता है कि किसके शब्दों ने नफ़रत और हिंसा भड़काई।

इस लेखिका ने इन भाजपा नेताओं के खिलाफ पुलिस में शिकायतें दर्ज कराईं थीं और वीडियो सबूत के साथ कोर्ट में याचिकाएं दायर की थीं। एक भी एफआईआर दर्ज नहीं हुई। न्यायमूर्ति एस मुरलीधर ने एक दूसरी याचिका पर सुनवाई करते हुए और खुले कोर्ट में वीडियो देखने के बाद, नफरत भरे भाषणों के मामलों में एफआईआर दर्ज न करने के लिए दिल्ली पुलिस की आलोचना की थी। इसके तुरंत बाद उनका स्थानांतरण कर दिया गया।

यह हिंसा 23 फरवरी को मिश्रा के भड़काऊ भाषण के बाद शुरू हुई। फिर भी, बचाव के लिए कोई खास कार्रवाई नहीं की गई। इसके उलट, पुलिस के कुछ हिस्सों के दंगाईयों के साथ मिलीभगत के वीडियो सबूत सामने आए। 25 फरवरी को दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग ने लेफ्टिनेंट गवर्नर को एक नाराजगी भरा पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने तुरंत कर्फ्यू लगाने की अपील की थी। उसी दिन, तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक ने गृह मंत्रालय को सुरक्षा बलों की भारी कमी के बारे में बताया था, जो राष्ट्रीय राजधानी में कानून-व्यवस्था के लिए ज़िम्मेदार था।

पुलिस बल की कम तैनाती के लिए कौन ज़िम्मेदार था? सेना को समय पर तैनात क्यों नहीं किया गया? कर्फ्यू देर से क्यों लगाया गया, और सिर्फ़ कुछ ही इलाकों तक सीमित क्यों रखा गया? सरकारी आंकड़ों के अनुसार, मारे गए 53 लोगों में से 41 मुस्लिम थे, और जिनके घर, दुकानें और पूजा स्थल नष्ट हुए, उनमें से भी ज़्यादातर मुस्लिम ही थे। यह सांप्रदायिक हिंसा की पिछली घटनाओं से परेशान करने वाली समानता दिखाती है, जहाँ देरी से या चुनिंदा सरकारी कार्रवाई ने भीड़ को बिना किसी डर के काम करने का मौका दिया।

फिर भी, हमसे यह विश्वास करने को कहा जाता है कि इस हिंसा को 18 लोगों के एक समूह ने योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया, जिनमें से ज़्यादातर युवा छात्र थे। एक और पहलू है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता : सीएए का संवैधानिक आधार पर विरोध करने वाले मुस्लिम कार्यकर्ताओं को कलंकित करना। यूएपीए  के तहत आरोपित 18 लोगों में से 16 मुस्लिम हैं, जिनमें तीन महिलाएं भी शामिल हैं। उस समय दायर किए गए लगभग 751 मामलों में से, एक के बाद एक मामले में, निचली अदालतों ने दिल्ली पुलिस को उसकी खराब जांच और संदिग्ध गवाहों के लिए फटकार लगाई है।

विपक्षी पार्टियों — खासकर कांग्रेस — के लिए इन मुद्दों पर साफ़ और लगातार बोलना बहुत ज़रूरी है। एक नियमित शासन प्रणाली में चुप्पी अन्याय में बदल जाती है, खासकर जब उसमें सांप्रदायिक रंग मिला हुआ हो। जब अन्यायपूर्ण अदालती आदेशों को, चुनौती देने में हिचकिचाहट होती है,  खासकर यूएपीए जैसे बिना कानूनी आधार वाले कानूनों के ज़रिए किए जा रहे राजनीतिक उत्पीड़न का विरोध करने में हिचकिचाहट होती है, चाहे वह दिल्ली हिंसा के मामलों में हो, भीमा कोरेगांव मुकदमों में हो या न्यूज़क्लिक मामले में, तो सत्ताधारी सरकार को अपने दमन के लिए कोई असली राजनीतिक कीमत नहीं चुकानी पड़ती। ऐसे राजनीतिक माहौल में, स्टेन स्वामी की हिरासत में मौत — जो उनकी गंभीर स्वास्थ्य स्थितियों के बावजूद ज़मानत और बुनियादी सुविधाओं को देने से इंकार करने की क्रूरता के कारण हुई — भी सामान्य बात बन जाती है।

उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे मामलों में धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक विपक्षी पार्टियों का साफ़ रुख न अपनाना, लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए चल रही लड़ाई को कमज़ोर करता है।

(सौजन्य: इंडियन एक्सप्रेस। लेखक माकपा पोलिट ब्यूरो की पूर्व-सदस्य तथा पूर्व सांसद हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)

NEWS NATIONAL WORLD समाचार राष्ट्रीय दुनिया's avatar

By NEWS NATIONAL WORLD समाचार राष्ट्रीय दुनिया

NEWS NATIONAL WORLD (NNW NEWS) / NNW TV NEWS NATIONAL WORLD (NNW NEWS) is a trusted digital media group and online Hindi news portal providing the latest breaking news and updates from India and around the world. Our coverage includes Politics, Crime, Public Issues, Sports, Entertainment, Bollywood, Business, Lifestyle, Art & Culture, Tourism, Social Affairs, and more. Our mission is to deliver accurate, reliable, and impactful journalism while keeping our audience informed about important developments at local, national, and international levels. "NEWS NATIONAL WORLD – Trusted Digital Media for Accurate News & Meaningful Stories." -- Management & Editorial Team -- Managing Director (MD) Ankul Pratap Singh Baghel Mobile: +91 85168 70370 // Editor Gaurav Jain (Indore) Mobile: +91 98276 74717 // Associate Editor Aamir Khan Mobile: +91 90099 11100 // Divisional Bureau Chief (Indore) Pradeep Chaudhary Mobile: +91 94250 52518 // Rewa Editor Kushmendra Singh Mobile: +91 94247 01399 // Join NEWS NATIONAL WORLD Share local news, public issues, social activities, events, sports updates, and important information from your area with us. For News Coverage, Advertising & Business Inquiries: Mobile: +91 85168 70370 Email: allindiamedia12340@gmail.com Follow and join the NEWS NATIONAL WORLD (PVT. LTD.) WhatsApp Channel for fast, reliable, and authentic news updates. NNW TV | NNW NEWS

प्रातिक्रिया दे

You missed

Translate »

Discover more from NNWORLD

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading