(आलेख : बादल सरोज)

अंततः साल के आख़िरी दिनों में लखनऊ को एक और विराट पार्क – बाकी पार्कों से हर तरह से भिन्न पार्क  – मिल ही गया । स्वयं प्रधानमंत्री इसके दरो-दीवार के बारे में बताने के लिए लखनऊ पहुंचे और  संघ-जनसंघ-भाजपा के तीन शिखर पुरुषों पंडित श्यामाप्रसाद मुख़र्जी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय और पंडित अटल बिहारी वाजपेई  की 65-65 फीट ऊंची प्रतिमाओं वाले इस पार्क का उदघाटन किया। इस मौके पर अपने भाषण में अपनी आदत के अनुरुप मोदी ने चुनाव-चुनाव का खेल खेला और इन ‘शिखर पुरुषों’ से ज्यादा, सामयिक राजनीति के बीहड़ पर मुखर होकर बोला। कुल 230 करोड़ रुपए खर्च से, कोई 6300 वर्गमीटर में फैले इस पार्क – जिसे प्रेरणा पार्क का नाम दिया गया है – में एक लगभग 98000 वर्ग फीट क्षेत्र में फैला संग्रहालय भी है। इसे भाजपा के चुनाव चिन्ह कमल के आकार में डिजाइन किया गया है।

दावा किया गया है कि इसमें यहां उन्नत डिजिटल तकनीक से भारत की यात्रा और इन दूरदर्शी नेताओं के योगदान को प्रदर्शित किया गया है। बताया जाता है कि इस ‘दूरदर्शी’ नेताओं के ‘योगदान’ के काल खण्डों को जनसंघ काल, भाजपा काल में भी बांटा गया है । इसका उदघाटन करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने दावा किया कि “ये राष्ट्र प्रेरणा स्थल उस सोच का प्रतीक है, जिसने भारत को आत्मसम्मान, एकता और सेवा का मार्ग दिखाया है ।  डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीन दयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी की विशाल प्रतिमाएं जितनी ऊंची हैं, इनसे मिलनी वाली प्रेरणाएं उससे भी बुलंद हैं।“ इस परिसर को “भारतीय राजनीतिक चिंतन, राष्ट्र निर्माण और सार्वजनिक जीवन में उनके ऐतिहासिक योगदान का प्रतीक” बताया गया। हिंदी व्याकरण की भाषा में जब तुलना और तुलना किये जाने वाले में – उपमेय और उपमान में — कोई अंतर नहीं रह जाता, तो जो बनाता है उसे रूपक कहते हैं :  यह पार्क और परिसर उसी तरह का रूपक, विडम्बना का रूपक है।

कुनबे के साथ असल समस्या यह है कि उसके पास न बताने के लिए कोई विरासत है, न दिखाने के लिए देशहित में किया गया कोई योगदान है, न गिनाने के लिए कोई सचमुच का महान है। इस कमी को छुपाने के लिए कुनबा उठाईगिरी करता रहता है :  कभी सरदार पटेल और लालबहादुर शास्त्री को अपने पाले में लाने की, तो कभी अपनों के बीच से दो-चार का गुब्बारा फुलाने की असफल कोशिश की जाती रहती हैं। मगर कुंठा इतनी गहरी है कि जाती ही नहीं है। कुछ वक़्त पहले केद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा भाजपा कार्यकर्ताओं से प्रचार कर-कर के  मोदी ‘जी’ को नेहरू जैसा साबित करने का आव्हान किया जाना इसी कुंठा का इजहार था। एक तरह से इस सच की स्वीकारोक्ति थी कि कुनबा लाख जतन प्रयत्न कर ले, कांसा सोना नहीं हो सकता।

पूरे सौ साल के हुए संघ और सत्ता पर कोई दो दशक के परोक्ष-अपरोक्ष वर्चस्व, मीडिया पर लगभग सम्पूर्ण प्रभुत्व के बावजूद किसी महान को खड़ा न कर पाना इस बात का प्रमाण है कि महानता एक ऐसी स्थिति है, जिसे खरीदा या उत्पादित नहीं किया जा सकता। यह पार्क इस कुनबे की इस मामले में अति-दरिद्रता का स्मारक भी है।  अब यदि मोदी जी यह दावा करते हैं कि “ये तीनों विशाल प्रतिमाएं जितनी ऊंची हैं, इनसे मिलनी वाली प्रेरणाएं उससे भी बुलंद हैं”, तो क्यों न लगे हाथ इस बात की जांच कर ही ली जाए कि इन प्रतिमाओं में जिनके नक्श उभारे गए हैं, उनके ऐसे प्रणम्य और असाधारण योगदान क्या-क्या हैं, जिनसे प्रेरणा ली जा सकती है।

शुरुआत शुरू से – उन डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी से — ही करते हैं, जो इस कुनबे की राजनीतिक भुजा के पितृपुरुष भी हैं। गांधी हत्याकांड के बाद प्रतिबंधित, लांछित और बहिष्कृत होने के बाद जब आरएसएस ने अपनी राजनीतिक पार्टी – जनसंघ — बनाने का फैसला लिया, तब उन्होंने पूर्ववर्ती राजनीतिक अवतार हिन्दू महासभा के नेता डॉ. मुखर्जी को अपना पहला अध्यक्ष बनाया। इनके ‘योगदानों’ से ग्रन्थ के ग्रन्थ भरे पड़े हैं। सुभाष चन्द्र बोस, आजाद हिन्द फ़ौज, स्वतन्त्रता संग्राम के प्रति इनका द्वेष और द्रोह कितना महान था, इसका जिक्र पिछले अंक में किया जा चुका है। उसे दोहराने की बजाय जिज्ञासा के लिए उनके कुछ ही कामों की याद दिलाकर कुनबाधीशों से यह पूछना प्रासंगिक होगा कि इनमें से किसको वे ‘बुलंद प्रेरणादायी’ मानते हैं।

सावरकर साहब की अध्यक्षता वाली हिन्दू महासभा के नेता मुखर्जी इन कथित हिन्दू वीरों द्वारा मुस्लिम लीग के साथ मिलकर चलाई गयी – सिंध, उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत और बंगाल की – तीन सरकारों में से एक बंगाल की फजलुल हक की अगुआई वाली सरकार में मंत्री बने और मंत्री के रूप में सुभाष बोस की आजाद हिन्द फ़ौज से निबटने और 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन को कुचलने की योजनाएँ बना-बनाकर वायसरॉय को सौंपते रहे। ध्यान रहे ये जनाब वही फजलुल हक थे, जिन्होंने 1940 में मुस्लिम लीग के अधिवेशन में पाकिस्तान निर्माण का प्रस्ताव पेश किया था। बाद में 1946 में इन्हीं डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने बंगाल विभाजन का समर्थन किया।

जिस कश्मीर और धारा 370 के मुद्दे पर जेल में हुई, उनकी मृत्यु को कुनबा शहादत और कुर्बानी बताता है, उस पर भी उनकी भूमिका वैसी नहीं थी, जैसी बताई जाती है। कश्मीर के ताजे इतिहास के दो विशेषज्ञों ने इसे तथ्यों के साथ सप्रमाण उजागर किया है। ए.जी. नूरानी आक्सफोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस, द्वारा प्रकाशित अपनी महत्त्वपूर्ण  किताब ‘आर्टिकल 370 : ए कान्स्टिट्यूशनल हिस्ट्री ऑफ जम्मू एण्ड कश्मीर’ में पेज 480 पर दर्ज करते है कि डॉ. मुखर्जी ने शुरुआत में धारा 370 की अनिवार्यता को स्वीकारा था। उन्होंने इस बात से रजामंदी जताई थी कि कश्मीर को स्वायत्तता दी जानी चाहिए।

जनसंघ के पूर्व अध्यक्ष बलराज मधोक ने भी  लिखा है कि  “डॉ. मुखर्जी कश्मीर को स्वायत्तता देने के समर्थक थे, उन्होंने बाद में आरएसएस के दवाब में अपनी इस राय को बदला था।“ कश्मीर के अग्रणी पत्रकार बलराज पुरी ‘द ग्रेटर कश्मीर’ के अपने आलेख में डॉ. मुखर्जी के 9 जनवरी 1953 को  लिखे पत्र का हवाला देते है, जिसमें उन्होने लिखा था कि ‘‘हम इस बात पर तुरंत सहमत होंगे कि घाटी में शेख अब्दुल्ला की अगुआई में सरकार को विशेष तरीके से (मतलब धारा 370 के अंतर्गत), तब तक, जब तक वह चाहते हों, चलने दिया जाए, अलबत्ता जम्मू और लद्दाख का भारत के साथ तुरंत एकीकरण करना चाहिए।’’ अब यह तो कुनबा ही बता सकता है, इनमें से ऐसा कौन सा योगदान है, जिनसे वह खुद प्रेरणा लेता है?

रही बात उस पार्टी जनसंघ की, जिसके वे संस्थापक अध्यक्ष रहे, सो रिकॉर्ड गवाह है कि उसके साथ भी उनके रिश्ते कोई ख़ास नहीं बचे थे। उनके असामयिक निधन के  बाद जनसंघ के दूसरे अध्यक्ष बने पंडित मौलिचन्द्र शर्मा अपनी किताब में कहते हैं कि “पदाधिकारियों के चयन से लेकर फैसले लेने तक पार्टी में कोई लोकतंत्र नहीं है।  सारे हुकुमनामे और फतवे आरएसएस देता है। पार्टी नाम की कोई चीज ही नहीं है।“ उन्होंने यह भी कहा कि “श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी आरएसएस के इस दैनंदिन हस्तक्षेप से आजिज आ गए थे और अपने कश्मीर दौरे से लौटकर इस्तीफा देने का मन बना चुके थे।“ इतना सब कुछ होने के बाद भी यह कुनबे की दरिद्रता है कि वह उन्ही डॉ. मुखर्जी का मुकुट धारण करने के लिए विवश है।

प्रेरणा पार्क में दूसरी मूर्ति पंडित अटल बिहारी वाजपेयी की है। वक्तृत्व कला में निपुण, कहीं न पहुंचाने और अक्सर कुनबे के अपराधों को ढांकने के लिए शब्दाडम्बर का माया जाल रचने में पारंगत ये वाजपेयी ही प्रधानमंत्री थे, जब आजादी के बाद का सबसे भयानक गुजरात नरसंहार हुआ था। राजनीतिक समीक्षकों ने उन्हें ठीक ही ‘डेविल्स एडवोकेट’ का संबोधन दिया था। गुजरात नरसंहार के बाद दिया गया वाजपेयी का ‘राजधर्म निबाहने’ जुमला बार-बार याद दिलाया जाता है, मगर जिस भाषण में उन्होंने यह कथित आप्तवचन बोला  था, उसी में उन्होंने ‘हर मुसलमान आतंकी नहीं है, मगर हर आतंकी मुसलमान है’ का फतवा भी दिया था। यह अत्यंत आपत्तिजनक ही नहीं, पूरी तरह झूठा और निराधार भी था, क्योंकि भारत में तब तक : महात्मा गांधी हत्याकांड, इंदिरा गांधी और राजीव गाँधी की हत्याओं से लेकर बाबरी ध्वंस तक, जिन्हें आतंकी घटना कहा जा सकता है, उन घटनाओं में कोई मुस्लिम लिप्त नहीं पाया गया था।

डॉ. मुखर्जी की ही तरह स्वतन्त्रता संग्राम में अटल बिहारी वाजपेयी की भी भूमिका आजादी के आन्दोलनकारियों को सजा दिलवाने में अंग्रेजों का साथ देने की ही थी। भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान  27 अगस्त 1942 को बटेश्वर में हुई घटना को लेकर द्वितीय श्रेणी मजिस्ट्रेट एस हसन की अदालत में 1 सितम्बर 1942 दिया गया उनका इकबालिया बयान लीलाधर वाजपेयी सहित अन्य स्वतंत्रता सेनानियों की सजा का आधार बना था। इस बयान में उन्होंने कहा था कि “कुछ लोगों ने भाषण दिए और वन विभाग के कार्यालय को नुकसान पहुँचाया था। उन्होंने कहा कि वह केवल एक दर्शक के रूप में भीड़ का हिस्सा थे और उन्होंने किसी भी सरकारी इमारत को गिराने में मदद नहीं की।“ बाद में वरिष्ठ पत्रकार मानिनी चटर्जी द्वारा इस मामले में तैयार की गयी, फरवरी 1988 के फ्रंटलाइन में छपी एक खोजी रिपोर्ट में जब अटल बिहारी वाजपेई  से उनका पक्ष पूछा गया, तो उन्होंने बाकायदा लिखित में जवाब देकर यह माना था कि वह इकबालिया बयान और उस पर किये गए दस्तखत उन्हीं के थे। अब प्रेरणा पार्क में खडी उनकी 65 फीट की ऊंची मूर्ति किस तरह की बुलंद प्रेरणा देगी, यह सोचने की बात है।

तीसरी प्रेरणास्रोत मूर्ति पंडित दीनदयाल उपाध्याय की बताई गयी है। दीखने में सीधे सरल और निस्पृह दिखने वाले उपाध्याय जी को तबका जनसंघ और आज की भाजपा उस वैचारिक राजनीतिक दिशा का प्रणेता मानती है, जिसे ‘एकात्म मानववाद’ के नाम से जाना जाता है। इसमें कितना विचार, कितना आदर्शं और कितना मार्ग है यह आज तक स्पष्ट नहीं हुआ है । स्पष्टता तो खुद, बकौल भाजपा, आज तक संदेहों से घिरी उनकी दुर्घटना मृत्यु के बारे में भी नहीं है। उनकी ‘हत्या’ की जांच करने की मांग उठाने वाला जनसंघ और उसके बाद भाजपा कई-कई बार उत्तरप्रदेश और केंद्र की सरकारों में रह चुकी, मगर जांच उसने भी नहीं  कराई। अलबत्ता जनसंघ के पूर्व अध्यक्ष बलराज मधोक ने इसे लेकर बेहद गंभीर सवाल उठाये है।

भारतीय जनसंघ के संस्थापक मधोक ने अपनी आत्मकथा “ज़िंदगी का सफ़र” में दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु को एक दुर्घटना मानने से इंकार किया। उन्होंने आरोप लगाया कि यह एक साजिश के तहत की गई हत्या थी, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जनसंघ के कुछ शीर्ष नेता शामिल थे। उन्होंने साफ़-साफ़ तत्कालीन जनसंघ के अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी और नानाजी देशमुख का नाम भी लिया था। उनके अनुसार, ‘इन नेताओं का मकसद जनसंघ पर नियंत्रण हासिल करना था। उपाध्याय के अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने वाजपेयी और देशमुख को महत्वपूर्ण पदों से हटा दिया था, जिससे वे उपाध्याय को अपने में रास्ते का रोड़ा मानने लगे।‘  आत्मकथा में  उन्होंने यह भी लिखा कि उपाध्याय कुछ नेताओं के अनैतिक आचरण और पार्टी में “चरित्रहीन” लोगों को बढ़ावा न देने के पक्षधर थे, जिसके कारण वे कुछ स्वार्थी तत्वों के निशाने पर आ गए। मधोक ने यह भी दावा किया कि वाजपेयी और अन्य नेताओं ने उन पर (मधोक पर) दबाव डाला था कि वे जनता के बीच उपाध्याय की मौत को एक दुर्घटना के रूप में पेश करें।

इस तरह यह साफ़ हो जाता है कि प्रेरणा पार्क का उद्देश्य प्रेरणा-व्रेरणा देने का नहीं, इससे  आगे का है और  कुछ और ही है। यह क्या है, इसे समझने के लिए इसी दिसम्बर में कोलकता में किये संघ सुप्रीमो मोहन भागवत के ’भारत  हिन्दू राष्ट्र था, हिन्दू राष्ट्र है, हिन्दू राष्ट्र रहेगा’ के घोष की निरंतरता में पढ़ना और हिन्दू राष्ट्र की उनकी वास्तविक धारणा से जोड़ कर देखना होगा। ज्यादा विस्तार में जाने की बजाय कुनबे के दो सच्चे प्रेरणा स्रोतों की हिन्दू राष्ट्र की प्रस्थापना को ही बांच लेते हैं।

इनके आदि पुरुष और हिंदुत्व के जनक सावरकर के अनुसार, “मनुस्मृति वह शास्त्र है, जो हमारे हिन्दू राष्ट्र के लिए वेदों के बाद सबसे अधिक पूजनीय है और जो प्राचीन काल से ही हमारी संस्कृति-रीति-रिवाज, विचार और व्यवहार का आधार बना हुआ है। सदियों से इस पुस्तक ने हमारे राष्ट्र के आध्यात्मिक और दैवीय पथ को संहिताबद्ध किया है। आज भी करोड़ों हिन्दू अपने जीवन और व्यवहार में जिन नियमों का पालन करते हैं, वे मनुस्मृति पर आधारित हैं। आज मनुस्मृति हिंदू कानून है। यह मौलिक है।“

इनके  प.पू. गुरुजी गोलवलकर इसे और आगे बढाते हुए कहते हैं कि : “आज हम अज्ञानतावश वर्ण व्यवस्था को नीचे गिराने का प्रयास करते हैं। लेकिन यह इस प्रणाली के माध्यम से था कि स्वामित्व को नियंत्रित करने का एक बड़ा प्रयास किया जा सकता था … समाज में कुछ लोग बुद्धिजीवी होते हैं, कुछ उत्पादन और धन की कमाई में विशेषज्ञ होते हैं और कुछ में श्रम करने की क्षमता है। हमारे पूर्वजों ने समाज में इन चार व्यापक विभाजनों को देखा । वर्ण व्यवस्था का अर्थ और कुछ नहीं है, बल्कि इन विभाजनों का एक उचित समन्वय है और व्यक्ति को एक वंशानुगत के माध्यम से कार्यों का विकास, जिसके लिए वह सबसे उपयुक्त है, अपनी क्षमता के अनुसार समाज की सेवा करने में सक्षम बनाता है। यदि यह प्रणाली जारी रहती है, तो प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसके जन्म से ही आजीविका का एक साधन पहले से ही आरक्षित है।”(ऑर्गनाइज़र, 2 जनवरी, 1961, पृष्ठ 5 और 16 में प्रकाशित)

🔵 इस हिसाब से देखें तो लखनऊ के बाकी पार्कों में से यह एकदम अलग हैं : बाकियों में सुधारक हैं, जड़ता तोड़ने वाले हैं, समता है और इधर देखें, तो पंडित मुखर्जी हैं, पंडित वाजपेयी हैं, पंडित दीनदयाल उपाध्याय हैं :  तीनो के तीनों सावरकर और गोलवलकर के हिदू राष्ट्र के शिरोमणि ब्राह्मण हैं। इस तरह यह पार्क नहीं है, नई वर्ष में जारी किया संघ – भाजपा के हिन्दू राष्ट्र का ‘लोगो’ – शुभंकर है । ऐसा शुभंकर, जो देश और उसके लोगो के लिए पूरी तरह अशुभंकर है। 

और अंत में

कुछ बातें संकेतों में भी बयान हो जाती हैं। जैसे पार्क के उदघाटन के समय मोदी द्वारा दी गयी सूचना कि “जिस जमीन पर यह प्रेरणा स्थल बना है, उसकी 30 एकड़ से भी ज्यादा जमीन पर पहले कूड़े का पहाड़ बना हुआ था।” इसे भावार्थ में समझना होगा। अब तक हिन्दू राष्ट्र की धुन पर मुंडी हिला रही भक्त भेड़ों के लिए यह खबर काम की हो सकती है कि इस कथित राष्ट्र प्रेरणा स्थल में फेंका हुआ खाना खाने से 170 भेड़ें ठौर मर गयीं , 200 की हालत नाजुक बनी हुई है।

(लेखक लोकजतन के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94250-06716)

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