(आलेख : बादल सरोज)

हर साल दिए जाने वाले नोबल पुरस्कार के नाम पर दिए जाने वाले सम्मानों की बहुत चर्चा होती है । कुछ इस तरह होती है कि जैसे जिन्हें नोबल नहीं मिला, वो जन्मे ही न हो!! मगर इससे ठीक पहले घोषित होने वाले आईजी नोबल उतना प्रचार नहीं पा पाते। नोबल सम्मानों की शुरुआत के नब्बे साल बाद इसकी हाइप का मजाक उड़ाते हुए कुछ पत्रकारों, वैज्ञानिकों ने आईजी नोबल – इग्नोबल अवार्ड्स – का सिलसिला शुरू किया था। हिंदी में इन्हें हेय, मजाकिया और अप्रतिष्ठित सम्मान कहा जा सकता है । 1991 से शुरू इन व्यंगात्मक सम्मानों से नोबल की नक़ल करते हुए ऐसी ‘उपलब्धियों’ को सम्मानित किया जाता है, जो पहले सुनने वालों को हंसाती है, उसके बाद सोचने के लिए मजबूर करती हैं। वे इतनी विचित्र होती है कि जिन्हें मिलता है, वे भी ‘उसको भूलूँ, कि उसको याद करूँ’ के संशय और पशोपेश में पड़ जाते हैं। जैसे इस साल 2025 का इंजीनियरिंग का आईजी नोबल दो भारतीय इंजीनियरों को मिला। मगर इस अंतर्राष्ट्रीय सम्मान और उसे पाने वालों का किसी राष्ट्रभक्त चैनल, किसी देशभक्त मीडिया ने जिकरा तक नहीं किया। इनकी जिस ‘खोज’ को सम्मानित किया गया है, वह बदबू मारते जूते किस प्रकार शू-रैक के प्रदर्शन को प्रभावित करते हैं, की अभियांत्रिकी बताती है!! इसी साल जीवविज्ञान का आईजी नोबल एक जापानी टीम की उस खोज के लिए दिया गया है, जिसमे उन्होने पाया कि गायों पर ज़ेबरा जैसी काली और सफेद धारियां बनाने से मक्खियों द्वारा उन्हें काटे जाने की संख्या आधी हो जाती है!! इससे पहले एक ऐसा ही इग्नोबल उस ‘5 सेकंड्स के नियम’ की ‘खोज’ के लिए दिया गया, जिसने बताया था कि फर्श पर गिरा भोजन यदि पांच सेकंड के भीतर उठा लिया जाए तो वह दूषित प्रदूषित नही होता!  35 वर्षों में दिए गए इन सम्मानों के दिलचस्प उदाहरण अनेक है, उन्हें गिनाना इस टिप्पणी का मक़सद नहीं है – मकसद यह दर्ज करना है कि इग्नोबल सम्मानों की शुरुआत करने वाले व्यंगकारों ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि एक समय आयेगा, जब मजाक उड़ाने वाले इनके अवार्ड्स कहीं ज्यादा गंभीर और उपयोगी लगने लगेंगे और नोबल सचमुच में इग्नोबल – नीच और अधम – सम्मान हो जाएगा।

वेनेजुअला की मारिया कोरिना माचाडो नाम की महिला को 2025 का शान्ति के लिए दिया गया नोबल इसी तरह का – नीच और अधम – चयन है। यह बदबूदार जूतों को शू-रैक में सजाने और गाय पर जेब्रा जैसी काली सफ़ेद लकीरें खीचने से भी आगे की इग्नोबल योग्यता को दिया सम्मान है। यही बात है कि जैसे ही इन मोहतरमा के नाम की घोषणा हुई, वैसे ही दुनिया, खासतौर से लैटिन अमरीका को जानने वाले लोगों को पहले हँसी आई, जो तुरंत ही क्षोभ से रोष में बदलती हुई घिन में तब्दील हो गयी। स्वाभाविक था, इससे अधिक बेतुकी, बेहूदा कोई और बात हो ही नहीं सकती थी। एक ऐसे व्यक्ति को जिसकी राजनीति, विचारधारा और क्रियाकलापों में हिंसा, बर्बरता, लोगों को दुःख पहुंचाने के सिवा कुछ भी न हो, जिसकी राजनीति में ‘शांति’ नाम का शब्द ही न हो, उसे शान्ति का अंतर्राष्ट्रीय सम्मान दिया जाना भारतीय रूपक में समझें, तो ठीक वैसा ही है, जैसे नत्थूराम गोडसे को गाँधी की जीवन रक्षा के लिए तमगा दिया जाए, जैसे मनु को महिलाओं और दलितों के उद्धार के लिए लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया जाए। हालाँकि इस तरफ, इन दिनों ऐसा होना भी कोई अचम्भे की बात नहीं रही है। मगर शान्ति का नोबल जिस दुनिया के अन्तःपुर में ढलता है, जिन मुर्दाघरों में सजता और संवरता है, लाशों के ढेर को सीढ़ियां बनाकर उतरता है, वह उनकी दुनिया है, जो खुद को दुनिया भर में लोकतंत्र और मानवाधिकारों की स्व-नियुक्त दरोगा मानती है। इस बार का चयन ऐसा है, जिसने शांति की उसकी इस नयी परिभाषा से इन साम्राज्यवादी देशों का पहले से ही नुचा-नुचाया, रहा-सहा मुखौटा भी उतार कर रख दिया है।

कौन है मारिया कोरिना माचाडो?

इसे साम्राज्यवाद-विरोधी और युद्ध-विरोधी अभियानों में लगे नारियों के एक समूह कोडपिंक से जुड़ी वेनेज़ुएलन-अमेरिकन एक्टिविस्ट मिशेल एलनर ने ठीक तरह से सूत्रबद्ध करते हुए एक-एक कर गिनाया है कि माचाडो असल में किसकी प्रतिनिधि हैं।

माचाडो दुनिया भर के देशों की चुनी हुई सरकारों को बदलकर अपने पिट्ठुओं को बिठाने की वॉशिंगटन की “रिजीम चेंज” मशीन का मुस्कुराता चेहरा है। प्रतिबंधों, निजीकरण और विदेशी हस्तक्षेप की सजी-संवरी ऐसी प्रवक्ता है, जिसे “लोकतंत्र” की लकदक गुड़िया के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। ऐसी गुड़िया, जिसकी राजनीति हिंसा में डूबी हुई है और इसे वह छुपाती भी नहीं है। वह खुले आम खुद अपने देश वेनेजुअला में विदेशी सेनायें बुलाती है, गज़ा के विनाश के बाद एक-दो दुष्ट देशों को छोड़ समूची विश्व मानवता द्वारा नरसंहारी बताये जा रहे बेन्यामिन नेतन्याहू से अपने ही देश वेनेजुअला पर बम बरसाने और वहां की निर्वाचित सरकार के शासन से “मुक्त” कराने की प्रार्थना करती है। दुष्ट शेतन्याहू के नाम से कुख्यात हुए नेतन्याहू को विश्व लोकतंत्र का रक्षक मानती है और गज़ा में जिन प्रतिबंधों के चलते हुए दवा, पानी, भोजन, ऊर्जा के अभाव में युद्ध से भी ज्यादा लोग मारे गए है, ऐसे इजरायली प्रतिबंधों का न केवल समर्थन करती है, बल्कि ठीक वैसे ही प्रतिबन्ध अपने ही देश वेनेजुअला की जनता पर भी लगाए जाने का न्यौता देती है।

साम्राज्यवादी हुकूमतों और उनके द्वारा नियंत्रित मीडिया की चहेती माचाडो ने अपना पूरा राजनीतिक जीवन विभाजन को बढ़ावा देने, वेनेज़ुएला की संप्रभुता को कमजोर करने और अपने ही देश के लोगों के सम्मानजनक जीवन के अधिकार को नकारने में बिताया है। उसने 2002 के उस तख्तापलट का नेतृत्व किया, जिसने एक लोकतांत्रिक रूप से चुने गए राष्ट्रपति को कुछ समय के लिए हटा दिया था। इसने उस कुख्यात आदेश पर हस्ताक्षर किए थे, जिसने रातों-रात संविधान और सभी सार्वजनिक संस्थानों को भंग कर दिया। इसने डोनाल्ड ट्रम्प की धमकियों और कथित नशे की तस्करी के नाम पर कैरबियन देशों की खाड़ी में अमरीकी नौसैना के बेड़े की तैनाती का समर्थन किया। ट्रम्प से वेनेजुअला में अमरीकी सेना भेजने की अपील की और उसका मातहत बनने की पेशकश की। यह जानते हुए भी कि इसकी सबसे बड़ी कीमत गरीबों, बीमारों और श्रमिक वर्ग को चुकानी पड़ेगी, उसने अमेरिका के उन प्रतिबंधों को आगे बढ़ाया, जिन्होंने अर्थव्यवस्था को ध्वस्त कर दिया था। उसने तथाकथित वाशिंगटन की कठपुतली “अंतरिम सरकार” बनाने में मदद की, जिसका “स्वयंभू राष्ट्रपति” विदेशों में वेनेज़ुएला की संपत्ति लूटता रहा, जबकि देश में बच्चे भूख से मर रहे थे। उसने उस यरूशलेम में वेनेज़ुएला का दूतावास फिर से खोलने की प्रतिज्ञा की, जिस येरुशेलम पर इजरायल के कब्जे को दुनिया का लगभग कोई देश नहीं मानता। इस सबके आलावा अब उसका एजेंडा है, दुनिया के पांचवे नम्बर के तेल भण्डार वाले वेनेजुअला का तेल, जल और बुनियादी ढांचे को निजी कंपनियों को सौंपना। यह वही नुस्खा है, जिसने दुनिया को कार्पोरेट्स की लूट का चारागाह और विश्व मानवता के जीवन को मकतल में बदल दिया है। शांति का नोबल जिसे दिया गया है, वह मोहतरमा 2014 के “ला सलिदा” आंदोलन की भी राजनीतिक योजनाकारों में से एक थी — यह वह आन्दोलन था, जिसने वेनेजुअला में हिंसक प्रदर्शनों और हमलों का आह्वान किया था। इन हिंसक हमलों में सड़कों को जलते कचरे और कंटीली तारों से रोका गया, मजदूरों की बसें जलाई गईं, जिन्हें ह्यूगो चावेज का समर्थक – चाविस्ता — समझा गया, उन्हें मारा-पीटा गया, अनेक को मार दिया गया। एम्बुलेंसों और डॉक्टरों तक पर हमले हुए। कुछ क्यूबाई मेडिकल ब्रिगेड्स को ज़िंदा जलाने की कोशिश की गई। सार्वजनिक भवनों, खाद्यान्न से भरे ट्रकों और स्कूलों को नष्ट कर दिया गया। मचाडो यहीं तक नहीं रुकतीं। वे ट्रंप के उन बर्बर “निर्णायक कदमों” की तारीफ़ भी करती है, जिसने प्रवासियों को जेल और शरणार्थी कैम्पस में भर दिया, परिवारों को अलग कर दिया ; आज भी वेनेजुएला की मांयें अपने गुमशुदा बच्चों को ढूंढ रही है, जिन्हें ट्रम्प की अमेरिकी प्रवासन नीतियाँ निगल गईं।

इस तरह माचाडो न तो शांति का प्रतीक है, न प्रगति का। वह फासीवाद, यहूदीवाद और नवउदारवाद के उस सांघातिक गठबंधन का हिस्सा है, जो सिर्फ दक्षिण अमरीका महाद्वीप को ही नहीं, समूची धरती को अपने चंगुल में लेना चाहता है। विचारधारा एक ही है, जिसका यह मानना है कि कारपोरेट पूँजी के छप्पर फाड़ मुनाफे की खातिर कुछ करोड़ लोग मर-मरा जाएँ, तो कोई फर्क नहीं पड़ता, देशों की संप्रभुता नाम की कोई चीज नहीं होती, यह आसानी से खरीदी-बेची जा सकती है। यह मानती है कि हिंसा और बर्बरता को एक मान्य शासन प्रणाली, एक व्यवस्था के रूप में स्थापित किया जा सकता है। इसी तरह शान्ति का नोबल भी शान्ति का प्रतीक नहीं है। ऐसे सम्मान अपने मनुष्यता विरोधी धत्कर्मों को प्रामाणिकता और स्वीकार्यता प्रदान करने के लिए दुनिया का वहशी पूँजीवाद हमेशा काम में लाने की कोशिश करता रहा है : गिद्धों को शान्ति कपोत, भेड़ियों को शाकाहारी खरगोश के रूप में दिखाने की चतुराई दिखाता रहा है।

दुनिया भर में अमरीकी वर्चस्व कायम कराने के लिए युद्धों की झड़ी लगाने वाले, वियतनाम युद्ध के सह-अपराधी हेनरी किसिंजर का 1973 में नोबल शांति पुरस्कार के लिए चयन करना इसी तरह की चतुराई थी, जिसे लोगों के गले उतारने के लिए वियतनाम के मुक्ति संग्राम के प्रतिनिधि ली डक थो के साथ संयुक्त रूप से देने की आड़ ली गयी। ली डक थो और वियतनाम की कम्युनिस्ट पार्टी इस झांसे में नहीं आये और उन्होंने आँखों में धूल झोंकने वाले इस दिखावे को ठुकरा दिया : मगर स्थापित यमदूत किसिंजर नोबल के इतिहास में शान्ति दूत के रूप में दर्ज हो गये। पश्चिम एशिया सहित दुनिया के अनेक इलाकों में युद्धों के सूत्रधार रहे अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भी 2009 में शान्ति का नोबल कबाड़ लाये। इससे पहले समाजवादी सोवियत रूस को विखंडित करने के ईनाम में पसीना सूखने से पहले ही, 1990 में ही, मिखाइल गोर्बाचोव की छाती पर शान्ति का नोबल टांका जा चुका था। आज की दुनिया शायद ही यकीन करे कि तीस साल पहले इजरायल के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री यित्जाक राबिन और शिमोन पेरेस भी शान्ति का नोबल ले चुके हैं, सो भी अपने ही शिकार फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन के नेता यासर अराफात के साथ। सनद रहे कि ये वही नोबल वाले हैं, जिन्होंने महात्मा गांधी की तरह कभी भी भूलकर भी नहीं देखा।
इतिहास की इसी कालिख को देखते हुए अमरीका के अब तक के सबसे दुष्ट और हिंसक राष्ट्रपतियों में से एक डोनाल्ड ट्रम्प नोबल की दावेदारी ठोंक रहे थे ; न जाने कितने-कितने युद्धों को खत्म कराने का श्रेय लेते-लेते गला बिठाए हुए थे। उनकी इस ख्वाहिश को पूरी करवाने में उनके माय डिअर फ्रेंड नरेन्द्र मोदी पूरे भक्तिभाव के साथ लगे हुए थे। जिस दिन शान्ति के नोबल की घोषणा होनी थी, उस दिन तक प्राणपण से जुटे हुए थे। मोदी सुबह से शाम तक इतने बालसुलभ उत्साह के साथ लगे रहे कि गज़ा में हमास और इजरायल के शस्त्रविराम के लिए चार-चार बार चहककर ट्वीट करके डोनाल्ड बाबू का हुक्का गरम और ताजा बनाए रहे। पता नहीं, उन्होंने इन ट्वीट के साथ नोबल कमेटी को टैग किया कि नहीं, मगर उनके शुभचिंतकों ने ट्रम्प बाबू तक तो इसकी खबर पहुंचा ही दी होगी। आखिर क्यों न करें : भले टैरिफ का आतंक हो, अब तक 50 बार किया जा चुका युद्ध विराम का दावा और उसके साथ नत्थी अपमान हो, भारत को अलग-थलग करने और उसके मुकाबले पाकिस्तान को मान-प्रतिष्ठित करने का सुनियोजित अभियान हो, अंततः ट्रम्प हों या मोदी, राजनीति का आधार तो एक ही है।
नोबल के शान्ति और साहित्य के पुरूस्कार मोटा-मोटी इसी तरह की राजनीति को आगे बढाने का हथियार होते हैं । हर बार जब यह पुरस्कार हिंसा के किसी वास्तुकार को दिया जाता है, जो खुद को कूटनीति के नाम पर छुपाता है। इस तरह यह सम्मान उन लोगों के चेहरे पर तमाचा होता है, जो वास्तव में शांति के लिए लड़ते हैं। इस बार लालायित ट्रम्प की जगह लपलपाती माचाडो को चुनकर नोबल की निर्णायक कमेटी अपने रास्ते से नहीं भटकी है : उसने रूप की जगह सार को तवज्जोह दी है ; अल्फ्रेड नोबल खुश ही हुए होंगे कि उनके ट्रस्टियों ने एक बार काम आने वाले हथगोले की जगह बारूद को चुना। हालांकि थोड़ा खुश तो ट्रम्प को भी होना चाहिए। आखिर में शैतान की खाला ने अपना नोबल शैतन्याहू के आका – डोनाल्ड ट्रम्प – को ही तो समर्पित किया है।

(लेखक ‘लोकजतन’ के सम्पादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94250-06716)

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