-मुस्ताअली बोहरा
अधिवक्ता एवं लेखक
भोपाल, मप्र

  मुगलकाल में हिंदू और मुस्लिम त्यौहार बिना किसी भेदभाव के मनाए जाते थे। दीपावली, शिवरात्रि, दशहरा और रामनवमी को मुगलों ने राजकीय मान्यता दी थी। मुगल शासक बाबर दीपावली को धूमधाम से मनाया करता था। बाबर जरूरतमंदों को नये कपड़े और मिठाइयां भेंट करते थे। बाबर के उत्तराधिकारी हुमायूं ने भी यह परम्परा जारी रखी। इस अवसर पर हुमायूं, महल में महालक्ष्मी के साथ अन्य हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा भी करवाते और गरीबों को सोने के सिक्के उपहार में देते थे। पूजा के दौरान आतिशबाजी की जाती और 101 तोपें चलाई जातीं। शहंशाह अकबर इस्लाम के साथ-साथ सभी धर्मों का समान सम्मान करते थे। अकबर ने कई त्योहारों पर शासकीय अवकाश की देने की परंपरा शुरू की थी। हर एक त्योहार में खास तरह के आयोजन होते, जिनके लिए शासकीय खजाने से दिल खोलकर अनुदान मिलता। अकबर के नौ रत्नों में से एक अबुल फजल ने अपनी मशहूर किताब ‘आईना-ए-अकबरी’ में शहंशाह अकबर के दीपावली पर्व मनाये जाने का जिक्र किया है। दीवाली मनाने की शुरुआत दशहरे से ही शुरू हो जाती। दशहरा पर्व पर शाही घोड़ों और हाथियों के साथ जुलूस निकाला जाता। बादशाह अकबर दिवाली पर पूरे राज्य में मुंडेरों पर दीये प्रज्वलित करवाते। महल की सबसे लंबी मीनार पर बीस गज लंबे बांस पर कंदील लटकाये जाते थे। महल में पूजा का दरबार सजाया जाता था। 16वीं सदी में भारत पर मुगल बादशाह अकबर का शासन था। अकबर ने दिवाली धूमधाम से मनाने की शुरुआत की थी। अकबर ने रामायण का फारसी में अनुवाद भी कराया था, जिसका पाठ दिवाली के दिन किया जाता था और इसके बाद श्री राम की अयोध्या वापसी का नाट्य मंचन होता था। इतना ही नहीं, अकबर अपने मित्र राजाओं और दरबारियों के यहां दीवाली पर मिठाइयां और भेंट भी भिजवाता था। अकबर के शासन काल में आतिशबाजी का जिक्र मिलता है। अकबर ने दिवाली की बधाई के रूप में मिठाई देने की परंपरा भी शुरू की। विभिन्न राज्यों के रसोइयों द्वारा मुगल दरबार में व्यंजन बनाए जाते थे। घेवर, पेठा, खीर, पेड़ा, जलेबी, फिरनी और शाही टुकड़ा और ऐसे ही कई पकवान मेहमानों को परोसे जाते थे। मुगल काल के दौरान दिवाली पर आतिशबाजी की निगरानी मीर आतिश द्वारा की जाती थी और लौ सुरंजक्रांत पत्थर से जलाई जाती थी। इतिहासकार आरवी स्मिथ के अनुसार मुगल सम्राट अकबर ने आगरा में शाही दिवाली समारोह की परंपरा शुरू की थी, जिसे उनके उत्तराधिकारियों ने भी जारी रखा।
——— शाहजहां का आकाश दीया और 56 भोग
मुगल बादशाह शाहजहां का शासन 17वीं शताब्दी में था। शाहजहां के शासनकाल तक भव्य आतिशबाजी शुरू हो चुकी थी। आतिशबाजी देखने के लिए महिलाओं के लिए अलग व्यवस्था और आम जनता के देखने के लिए भी खास व्यवस्था की जाती थी। शाहजहाँ अपनी रानियों और राजकुमारों को महरौली भेजते थे ताकि वे कुतुब मीनार से आतिशबाजी देख सकें। दिवाली पर होने वाला भोज भी सात्विक होता था। शाहजहाँ पूरे भारत से रसोइयों को आमंत्रित करते थे और फारस से सामग्री बुलवाते थे ताकि रसोइये छप्पन थाल (56 राज्यों की मिठाइयों से युक्त) के लिए सबसे स्वादिष्ट मिठाइयां तैयार कर सकें, जो दिवाली की परंपरा बन गई।  आगरा, मथुरा, भोपाल और लखनऊ से सबसे बेहतरीन हलवाई लाए जाते थे। व्यंजनों को तैयार करने के लिए आसपास के गांवों से देसी घी की व्यवस्था की जाती थी। साथ ही युद्ध में शहीद हुए वीरों की याद में सूरजक्रांत नाम के एक पत्थर पर सूर्य किरण लगाकर उसे रौशन किया जाता था। महल को दीयों, झूमरों, चिरागदानों (दीपक स्टैंड), और फानूस (पेडस्टल झूमर) से सजाया जाता था। जब शाहजहाँ ने राजधानी को दिल्ली स्थानांतरित किया, तो उन्होंने आकाश दिया (आकाश दीपक) की शुरुआत की। दरअसल 40 गज ऊंचे खंभे पर रखा गया एक विशाल दीपक “आकाश दीया” किले में स्थापित किया जाता था और दिवाली पर जलाया जाता था। लगभग चार टन कपास के बीज के तेल या सरसों के तेल से दीपक को भरा जाता था और बर्तन में तेल तथा कपास (बत्ती) डालने के लिए बड़ी सीढ़ी का इस्तेमाल किया जाता था। इतिहासकारों के अनुसार शाही सेवक सूरजकांत नामक एक गोल चमकदार पत्थर को सूर्य की किरणों के सामने रखते थे। पत्थर के पास रुई का एक टुकड़ा रखा जाता था जो बाद में गर्मी से आग पकड़ लेता था। इस दिव्य अग्नि को एजिंगिर (अग्नि-पात्र) नामक एक बर्तन में संरक्षित किया जाता था और फिर इसका उपयोग आकाश दिया (आकाश दीपक) को जलाने के लिए किया जाता। शाहजहाँ ने आकाश दीया परंपरा की शुरुआत धार्मिक सद्भाव के प्रतीक के रूप में की थी। दिवाली के दौरान आतिशबाजी की परंपरा का श्रेय भी शाहजहाँ को दिया जाता है। हर दिवाली पर यमुना के तट पर भव्य आतिशबाजी की जाती थी। भारतीय लेखक, नाटककार, निबंधकार और इतिहासकार अब्दुल हलीम शरर ने अपनी एक किताब में लिखा है कि हिंदू पौराणिक कथाओं में देवताओं का निवास आकाश में भी माना जाता है इसलिए, आकाश दीया देवताओं के सम्मान में जलाए गए दीपक हैं। उन्होंने नवरोज परंपराओं के कुछ हिस्सों को दिवाली में शामिल किया ताकि इसे और अधिक जीवंत बनाया जा सके। अब्दुल रहीम खान-खाना (1598 ईस्वी) द्वारा रामायण के फारसी अनुवाद में चित्रण, जिसे अब फ्रीर रामायण कहा जाता है, का पाठ किया जाता था। मुगलों ने नवरोजK और ईद के अलावा होली और दिवाली जैसे त्योहार धूमधाम से मनाए। वास्तव में, नौरोज भी फारस का एक पूर्व-इस्लामी त्योहार है, जिसे 651 ई. में अरब विजय के साथ ससैनियन साम्राज्य के पतन के बाद नए इस्लामी शासकों द्वारा बरकरार रखा गया था।  
मुगल शासक मोहम्मद शाह अपने शासन के दौरान यानी सन 1719 से 1748 तक दिवाली का जश्न धूमधाम से मनाते थे। संगीत और साहित्य में गहरी रुचि रखने वाला ये शासक ‘रंगीला’ के नाम से मशहूर था। दिवाली के मौके पर वो अपनी तस्वीर बनवाता था। उसके शासनकाल में लाल किले की भव्य तरीके से सजावट की जाती थी। वह कई तरह के पकवान बनवाकर आम जनता में बंटवाते थे। औरंगजेब ने भी दिवाली पर मिठाइयां भेजने की परंपरा का पालन किया। मुगल शासन के दौरान उर्दू कवियों जैसे नज़ीर अकबराबादी, इंशा, फैज, हातिम, अमानत लखनवी और अन्य को दिवाली समारोह पर लिखने के लिए विशेष रूप से नियुक्त किया गया था।

अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर लाल किले में लक्ष्मी पूजा का आयोजन करवाते थे। पूजा सामग्री चांदनी चौक के कटरा नील से मंगवाई जाती थी। वे लाल किले में दिवाली की थीम या प्रसंगों पर नाटकों का आयोजन करते थे। लाल किले को आम जनता के लिए खोल दिया जाता था। दिल्ली की जामा मस्जिद के पास आतिशबाजी भी की जाती थी। खील, खांड, बताशे, खीर और मेवे की मिठाइयां विशेष रूप से तैयार की जाती थीं। इसे किले में आम लोगों को बांटा जाता था। इतिहासकार विलियम डेलरिम्पल की किताब, द लास्ट मुगल-फॉल ऑफ डेल्ही 1857 में कहा गया है, बहादुर शाह जफर को सात प्रकार के अनाज, सोना, मूंगा आदि से तौला जाता था और फिर ये सभी चीजें गरीबों को बांट दी जाती थीं। इसके अलावा उन्होंने हिंदू अधिकारियों को विशेष अवसरों पर उपहार भेजने की परंपरा शुरू की।  
मुगल शासन के दौरान दीवाली शाही उत्सव के रूप में मनाई जाती थी। दिल्ली में किले के आसपास के सभी व्यापारी अपनी हवेलियों को मिट्टी के दीयों से सजाते थे। चांदनी चौक के हिंदू परिवार नहर पर दीये रखते थे। सिख समुदाय गुरुद्वारा सीसगंज से तेल का योगदान करता था, वहीं मुसलमान कपास (बत्ती) का प्रबंध करते थे। चांदनी चौक से लेकर फतेहपुरी मस्जिद तक का पूरा इलाका दीयों से रौशन हो जाता था। महल को रोशन करने के लिए सोने और चांदी के पात्रों में कपूर की मोमबत्तियों (कुफुरी-शमा) को जलाया जाता था।
अवध के नवाबों ने कई हिंदू त्योहारों को मनाने की मुगल परंपरा को जारी रखा। नवाब आसफ उददौला अपने दरबार में वसंत उत्सव पर समारोह का आयोजन करते थे। सआदत अली खान भी होली के उत्सव की व्यवस्था पर बहुत पैसा खर्च करते थे। इतिहासकार बताते हैं कि लखनऊ में रामलीला की परंपरा दशहरा के दिनों की शुरुआत 1810 ईसवी में नवाब सआदत अली खान के संरक्षण में हुई थी। रामलीला की व्यवस्था को लगभग सभी नवाबों ने संरक्षण दिया। वे इस आयोजन के लिए आर्थिक सहायता भी देते थे।
  मुगलकाल में गोवर्धन पूजा बड़े श्रद्धा के साथ संपन्न होती थी। गायों को अच्छी तरह नहला-धुलाकर, सजा-संवार कर उनकी पूजा की जाती। शहंशाह अकबर खुद इन समारोहों में शामिल होते थे। दीपावली के पहले दशहरा भी मनाया जाता था। औरंगजेब समेत सभी मुगल शासकों ने दशहरा पर्व पर भोज देने की परंपरा कायम रखी। इस मौके पर औरंगजेब अपने हिंदू अभिजात्य साथियों में सम्मान स्वरूप वस्त्र वितरित करते। मुगल शहंशाह ही नहीं, बंगाल तथा अवध के नवाब भी दिवाली शाही अंदाज में मनाते थे। महलों के चारों ओर तोरण द्वार बनाकर, खास तरीके से दीप प्रज्वलित किये जाते थे। नवाब खुद अपनी प्रजा के बीच में जाकर दीपावली की मुबारकबाद दिया करते थे। मैसूर में तो दशहरा हमेशा से ही धूमधाम से मनाया जाता रहा है। हैदर अली और टीपू सुल्तान दोनों ही विजयादशमी के दिन होने वाले समारोह में शामिल होते थे। कहा तो ये भी जा सकता है कि दिवाली को भव्यता देने में मुगल बादशाहों का अहम योगदान रहा। इतिहासकारों की मानें मुगल सम्राट अकबर द्वारा आगरा से शुरू की गई शाही दिवाली की परंपरा को उनके उत्तराधिकारियों ने 1857 तक जारी रखा था। सन 1857 के विद्रोह के बाद, जब ब्रिटिश शासन ने मुगल साम्राज्य पर कब्जा कर लिया तो ये परंपराएँ समाप्त हो गईं।  

…………………………. मंदिर ही नहीं दरगाहें भी होती हैं रौशन  
  दीपावली पर सिर्फ मंदिर ही नहीं सजाए जाते बल्कि दरगाहों पर भी रौशनी की जाती है। मुंबई में हाजी अली दरगाह, दिल्ली में हजरत निजामुद्दीन दरगाह पर दीपक जलाए जाते हैं। पुणे के शनिवार वाड़ा के पास बाबा हजरत मकबूल हुसैन मदनी की दरगाह को हर दिवाली पर दीयों से सजाया जाता है। इस दरगाह का निर्माण 13 वीं शताब्दी में किया गया था। पिछले दो दशकों से ज्यादा वक्त से हर दीपावली पर दरगाह में सजावट होती आ रही है। राजस्थान के झुंझुनू में कमरुद्दीन शाह की दरगाह की भी ऐसी ही कहानी है। सूफी संत कमरुद्दीन शाह और हिंदू संत चंचलनाथजी के बीच दोस्ती थी। 250 साल पुरानी कहानी का सम्मान करने के लिए हिंदू और मुस्लिम इस दरगाह पर एक साथ दिवाली मनाते हैं। दरगाह और चंचलनाथजी के आश्रम को जोड़ने वाली गुफा को दीयों से रौशन किया जाता है।  
………………………… पुराणों में है दीपवृक्ष खड़े करने का विधान  
असुर राजा बलि दिवाली के दिन पाताल गये थे, इस उपलक्ष्य में भी दीपावली मनाने की परंपरा है। दीपावली पर स्कन्द पुराण, पद्म पुराण, भविष्य पुराण में दीपमाला प्रज्ज्वलित करने के साथ साथ दीपवृक्ष खड़े करने का विधान है। आतिशबाजी दीपवृक्ष का ही एक रूप है। अनार, रॉकेट आदि से वृक्ष की तरह प्रकाश प्रज्ज्वलन होता है। कार्तिक की अमावस्या को पृथ्वी पर दैत्य व राक्षस आ जाते हैं, उन्हें दूर रखने और उनके भय को खत्म करने के लिए ही प्रकाश करने का विधान शास्त्र में है। शाम को लक्ष्मी पूजा के बाद दीप जलाया जाता है और आतिशबाजी की जाती है। उल्का (आतिशबाजी) तारा गणों के प्रकाश का प्रतीक है। आधी रात को जब लोग सो जाएं तब जोर से शब्द होना चाहिये (पटाखा) जिससे अलक्ष्मी भाग जाये। भविष्य पुराण में विस्फोटक को बाण कहा गया है। तेज शब्दों से राक्षस डरते हैं और दूर रहते हैं इसलिए पटाखे जलाने की परंपरा है। दूसरी तरफ, ऋग्वेद में तो दुर्भाग्य लाने वाली निरृति को देवी माना गया है और दिकपाल (दिशाओं के 9 स्वामियों में से एक) का दर्जा दिया गया है। उससे प्रार्थना की जाती है कि हे देवी, अब जाओ, पलट कर मत आना, यह कहीं नहीं कहा गया कि उसे पटाखों की आवाज से डरा धमका कर भगाया जाए।

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