-मुस्ताअली बोहराअधिवक्ता एवं लेखकभोपाल, मप्र साल 2025 की विजयादशमी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 100 साल का हो रहा है। इन 100 सालों में कभी आरएसएस अपनी गतिविधियों तो कभी भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की बात तो कभी भारतीय तिरंगे के रूख को लेकर तो कभी नाथूराम गोडसे से ताल्लुकात को लेकर चर्चित रहा। सन 1925 में कोई डेढ़ दर्जन अनुयायियों के साथ केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में संघ की स्थापना की थी। माना जाता है कि विनायक दामोदर सावरकर के विचारों से प्रेरित होकर इसकी नींव रखी गई थी तब से लेकर अब तक ये संगठन लगातार विस्तृत होते रहा। इतने सालों में आरएसएस की घुसपैठ शासन-प्रशासन सहित हर क्षेत्र में है। ये भी सच है कि सीएम से लेकर पीएम तक और बीजेपी अध्यक्ष से लेकर राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति तक की ताजपोशी में भी संघ की पसंद का ख्याल रखा जाता है। संघ से जुड़े लोगों का कहना है कि संघ स्वयंसेवकों के बीच भाईचारे की भावना को बढ़ावा देता है। दूसरी तरफ, संघ की आलोचना में कहा जाता है कि ये भारत के अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों और ईसाइयों के प्रति कट्टरता और अलगाववाद को बढ़ावा देता है। सन 1955 की एक सरकारी खुफिया रिपोर्ट में हेडगेवार के हवाले से कहा गया था कि भारत की भावी सरकार पर हिंदुओं का प्रभुत्व होगा और यह तय करना उनका काम है कि गैर-हिंदू तत्वों को कौन से राजनीतिक अधिकार और विशेषाधिकार दिए जाएं। संघ की मुखालफत करने वाले कहते हैं कि आरएसएस अल्पसंख्यकों को हाशिए पर धकेलना चाहता है। कुल मिलाकर, संघ पर चाहे जितनी तोहमतें लगीं हो या चाहे जितने विवाद हुए हो लेकिन उसका प्रभुत्व लगातार बढ़ा ही है।—— संविधान को लेकर क्या थी संघ की सोच ——— संविधान, राष्ट्रध्वज और जाति व्यवस्था पर संघ की विचारधारा को लेकर अक्सर तोहमतें लगती रहती हैं। बंच ऑफ थॉट्स नाम की मशहूर किताब में संघ के दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर लिखते हैं कि हमारा संविधान भी पश्चिमी देशों के विभिन्न संविधानों के विभिन्न अनुच्छेदों का एक बोझिल और विषम संयोजन मात्र है। इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे हमारा अपना कहा जा सके। क्या इसके मार्गदर्शक सिद्धांतों में एक भी ऐसा संदर्भ है कि हमारा राष्ट्रीय मिशन क्या है और जीवन में हमारा मुख्य उद्देश्य क्या है? नहीं! 1960 के दशक के मध्य में गोलवलकर ने एक साक्षात्कार में भी मनुस्मृति की प्रशंसा की थी और संविधान में दोष निकाले थे। गोलवलकर की किताब वी ऑर आवर नेशनहुड डिफाइंड के सन 1946 में आए चौथे संस्करण में लिखा है कि हिंदुस्तान के सभी गैर-हिंदुओं को हिंदू संस्कृति और भाषा अपनानी होगी। हिंदू धर्म का आदर करना होगा और हिंदू जाति अथवा संस्कृति के गौरव गान के अलावा कोई विचार अपने मन में नहीं रखना होगा। मालूम हो कि 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा ने संविधान को अपनाया। यह तय किया गया कि 26 जनवरी 1950 से पूरे देश में इसे लागू किया जाएगा और फिर इस दिन को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाएगा। इसका जश्न न केवल भारत बल्कि दुनियाभर में मनाया गया। वहीं आरएसएस ने इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर शोक व्यक्त किया। संविधान सभा की ओर से संविधान पारित किए जाने के 3 दिन बाद 30 नवंबर 1949 को संघ के अंग्रेजी मुखपत्र ‘ऑर्गनाइजर’ ने लिखा हमारे संविधान में प्राचीन भारत में अद्वितीय संवैधानिक विकास का कोई उल्लेख नहीं है। मनु के कानून स्पार्टा के लाइकर्गस या फारस के सोलन से बहुत पहले लिखे गए थे। आज भी मनुस्मृति में वर्णित उनके कानून दुनिया भर में प्रशंसा का विषय हैं और सहज आज्ञाकारिता और अनुरूपता को बढ़ावा देते हैं लेकिन हमारे संवैधानिक पंडितों के लिए इसका कोई मतलब नहीं है। स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर 14 अगस्त 1947 को ऑर्गनाइजर में लिखा गया था कि हमें अब खुद को राष्ट्रवाद की झूठी धारणाओं से प्रभावित नहीं होने देना चाहिए। मानसिक भ्रम तथा वर्तमान और भविष्य की बहुत-सी परेशानियां इस सरल तथ्य की तत्काल मान्यता से दूर हो सकती हैं कि हिन्दुस्तान में केवल हिंदू ही राष्ट्र का निर्माण करते हैं और राष्ट्रीय संरचना को उस सुरक्षित और ठोस नींव पर बनाया जाना चाहिए। राष्ट्र को स्वयं बनाया जाना चाहिए हिंदुओं की, हिंदू परंपराओं, संस्कृति, विचारों और आकांक्षाओं पर। विनायक दामोदर सावरकर का भी मानना था कि मनुस्मृति वह शास्त्र है जो हमारे हिंदू राष्ट्र के लिए वेदों के बाद सबसे अधिक पूजनीय है और जो प्राचीन काल से हमारी संस्कृति, रीति-रिवाजों, विचारों और व्यवहार का आधार बन गया है। राजनीतिक टिप्पणीकार और एडव्होकेट एजी नूरानी ने अपनी किताब द आरएसएस ए मेनेस टू इंडिया में लिखा हैं कि इसने (संघ ने) 1 जनवरी 1993 को अपना श्वेत पत्र प्रकाशित किया, जिसमें संविधान को हिंदू विरोधी बताया गया। ये श्वेतपत्र 6 दिसंबर 1992 को हुए बाबरी मस्जिद विध्वंस के कुछ ही दिन बाद छपा था। एजी नूरानी ने अपनी किताब में लिखा है कि श्वेत पत्र की प्रस्तावना में स्वामी हीरानंद ने लिखा, वर्तमान संविधान देश की संस्कृति, चरित्र, परिस्थितियों आदि के विपरीत है। यह विदेशोन्मुखी है और वर्तमान संविधान को निरस्त करने के बाद ही हमें अपनी आर्थिक नीति, न्यायिक और प्रशासनिक ढांचे और अन्य राष्ट्रीय संस्थाओं के बारे में नए सिरे से सोचना होगा। तत्कालीन सरसंघचालक रज्जू भैया उर्फ राजेंद्र सिंह ने इंडियन एक्सप्रेस (14 जनवरी 1993) में लिखा कि वर्तमान संघर्ष को आंशिक रूप से हमारे सिस्टम की अपर्याप्तता के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, जो मूल भारत, इसकी परंपरा, मूल्यों और लोकाचार की जरूरतों का जवाब देने में असमर्थ है। उन्होंने लिखा कि संविधान में बदलाव की जरूरत है। भविष्य में इस देश के लोकाचार और प्रतिभा के अनुकूल एक संविधान को अपनाया जाना चाहिए। इसका जिक्र नूरानी ने अपनी किताब में भी किया है। 24 जनवरी 1993 को आंध्र प्रदेश के अनंतपुर में तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ने भी संविधान पर नए सिरे से विचार करने की मांग दोहराई थी।संविधान बदलने की मंशा के पीछे एक तर्क ये भी दिया जाता है कि अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते एनडीए सरकार बनी तो उन्होंने संविधान की समीक्षा के लिए एक समिति गठित की थी। लेकिन इसके विरोध को देखते हुए उन्हें समिति बनाने की वजह को बदलना पड़ा और कहना पड़ा कि यह समिति संविधान की पूरी समीक्षा न करके, ये देखेगी कि अब तक संविधान ने कैसे काम किया है। राजनीतिक समीक्षको का मानना था कि समिति बनाई ही इसलिए गई थी क्योंकि संघ और बीजेपी का ये मानना था कि मौजूदा संविधान की जगह एक नया संविधान होना चाहिए। बदलते वक्त के साथ संविधान को लेकर संघ का रूख भी बदला है। दिल्ली के विज्ञान भवन में सन 2018 में सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा था कि संविधान के अनुशासन का पालन करना सबका कर्त्तव्य है। संघ इसको पहले से ही मानता है…हम स्वतंत्र भारत के सब प्रतीकों का और संविधान की भावना का पूर्ण सम्मान करके चलते हैं। दिसंबर 2024 में जब संसद संविधान को अपनाने के 75 साल पूरे होने का जश्न मना रही थी उस वक्त कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने संविधान और मनुस्मृति के मसले पर सावरकर के लेखों का जिक्र करते हुए बीजेपी पर निशाना साधा। संविधान और मनुस्मृति की प्रति लेकर राहुल गांधी ने कहा कि सावरकर ने अपने लेखन में साफ तौर पर कहा है कि हमारे संविधान में कुछ भी भारतीय नहीं है और संविधान को मनुस्मृति से बदल दिया जाना चाहिए। कांग्रेस समेत कई विपक्षी राजनीतिक दल मनुस्मृति और संविधान के मुद्दे पर लगातार संघ पर निशाना साधते रहे हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान पढ़ा चुके, आरएसएस और हिन्दू राष्ट्रवाद के विषयों पर किताबें लिख चुके प्रोफेसर शम्सुल इस्लाम का कहना है कि 26 नवम्बर 1949 को भारत की संविधान सभा ने भारत का संविधान पास किया। चार दिन बाद संघ से जुड़े लोगों ने एडिटोरियल लिखा जिसमें कहा कि इस संविधान में कुछ भी भारतीय नहीं है। संघ ने ये सवाल भी उठाया था कि क्या मनुस्मृति में ऐसा कुछ नहीं मिला जिसे इस्तेमाल किया जा सके। सावरकर भी ये बात कहते थे कि मनुस्मृति वह धर्मग्रंथ है जो हमारे हिंदू राष्ट्र के लिए वेदों के बाद सबसे अधिक पूजनीय है और मनुस्मृति हिन्दू कानून है। —- हिन्दू कोड बिल का विरोध ————-डॉ. बी.आर. अम्बेडकर मूल हिन्दू कोड बिल के निर्माता थे, उन्होंने इसे संविधान सभा में प्रस्तुत किया था। हालाँकि, उनके प्रारंभिक प्रयासों को आरएसएस सहित कट्टरपंथी हिंदुओं के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा और विधेयक को 1948 में एक प्रवर समिति को भेज दिया गया। आरएसएस ने मूलतः मूल हिन्दू कोड बिल का विरोध किया था, जिसका उद्देश्य विवाह और संपत्ति जैसे क्षेत्रों में पुरुषों और महिलाओं के बीच समानता स्थापित करके हिन्दू पर्सनल लॉ को संहिताबद्ध और आधुनिक बनाना था। आरएसएस ने अन्य कट्टरपंथी हिंदू समूहों के साथ मिलकर उन सुधारों का विरोध किया, जो शुरू में डॉ. अंबेडकर द्वारा प्रस्तावित किए गए थे। बाबा साहब द्वारा प्रस्तावित इस कानून को 1950 के दशक में जवाहरलाल नेहरू सरकार द्वारा संशोधित रूप में लागू किया गया जिसके परिणामस्वरूप हिंदू विवाह अधिनियम और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम जैसे कानून बने। हिंदू कोड बिल हिंदू व्यक्तिगत कानूनों में सुधार और संहिताकरण के लिए बनाए गए कानूनों की एक श्रृंखला थी, जिसका उद्देश्य महिलाओं के खिलाफ भेदभाव को समाप्त करना और हिंदुओं के लिए एक समान कानूनी प्रणाली बनाना था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अन्य समूहों के साथ मिलकर इन सुधारों का कड़ा विरोध किया तथा इन्हें पारंपरिक हिंदू प्रथाओं और मूल्यों पर हमला माना। नेहरू प्रशासन ने 1950 के दशक में हिंदू विवाह अधिनियम (1955), हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (1956) और हिंदू अल्पसंख्यक एवं संरक्षकता अधिनियम (1956) सहित कई विधेयकों के संशोधित संस्करण सफलतापूर्वक पारित किये, जिन्होंने हिंदू कानून को संहिताबद्ध किया लेकिन ये अंबेडकर के प्रारंभिक प्रस्तावों की तुलना में कम व्यापक थे। कहा जाता है कि हिंदू कोड बिल हिंदू समाज को आधुनिक बनाने और लैंगिक समानता स्थापित करने की दिशा में एक प्रगतिशील कदम था, लेकिन इसे आरएसएस जैसे हिंदू राष्ट्रवादी समूहों से तीव्र प्रतिरोध का सामना करना पड़ा, जो पारंपरिक धार्मिक कानूनों को बनाए रखना चाहते थे। विरोध करने वालों ने दिल्ली में डॉ. बीआर अंबेडकर के आवास पर धावा बोल दिया। हिंदू कोड बिल विरोधी समिति ने पूरे देश में बैठकें की। 11 दिसंबर 1949 को संघ ने दिल्ली के रामलीला मैदान में सार्वजनिक बैठक आयोजित की। अगले दिन संघ कार्यकर्ताओं के एक समूह ने विधानसभा भवन पर मार्च किया और ‘हिंदू कोड बिल मुर्दाबाद’ के नारे लगाए। प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री और डॉ अंबेडकर के पुतले जलाए और फिर शेख अब्दुल्ला की कार में तोड़फोड़ की। भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा था कि हिंदू कोड बिल हिंदू संस्कृति की शानदार संरचना को चकनाचूर कर देगा। हिन्दू कोड बिल के विरोध में गोलवलकर ने अपनी किताब में लिखा कि महिलाओं को बराबरी का अधिकार मिलने से पुरुषों के लिए भारी मनोवैज्ञानिक संकट खड़ा हो जाएगा जो मानसिक रोग व अवसाद का कारण बनेगा। ………………… हटा दो पंथनिरपेक्ष और समाजवादी शब्द ………………….संघ ने संविधान की प्रस्तावना में जोड़े गए पंथनिरपेक्ष और समाजवादी शब्द को हटाने के लिए भी मोर्चा खोल रखा है। ये शब्द संविधान की प्रस्तावना में बदलाव कर जोड़े गए थे। एक कार्यक्रम में सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने आपातकाल के दौरान तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार द्वारा संशोधन कर संविधान की प्रस्तावना में जोड़े गए दो शब्द पंथनिरपेक्ष और समाजवादी पर विचार का आग्रह करते हुए इसे हटाने पर जोर दिया था। इसके बाद नई राजनीतिक बहस भी शुरू हो गई। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा था कि संविधान को नष्ट करना संघ का एकमात्र लक्ष्य है। उसके चेहरे से नकाब उतर गया है। उसने संविधान को कभी स्वीकार नहीं किया है। View this post on Instagram Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन पेट्रोल पंप कर्मचारी को कार ने मारी टक्कर, CCTV फुटेज आया सामने, पुलिस ने मामला दर्ज किया कांग्रेस का इंदौर में प्रदर्शन: सरकार पर योजनाओं के लाभ न देने का आरोप