(टिप्पणी : अरुण माहेश्वरी)

पटना में कृष्ण कल्पित की हरकत केवल एक सामाजिक अपराध नहीं, बल्कि एक विकृत आत्म-संरचना का उदाहरण भी है। वह जो अपने भाषिक तेवर में विद्रोही और मुक्त दिखाई देता है, वही कैसे भीतर ही भीतर असंख्य कुंठाओं और खास तौर पर स्त्रीत्व के बारे में अजीबोगरीब प्रतीकात्मक उहापोह (अस्थिरता) से भी भरा होता है, कृष्ण कल्पित उसका एक ख़ास उदाहरण है।

जब हम किसी में स्त्रीत्व के बारे में “प्रतीकात्मक अस्थिरता” की बात कहते हैं, तो उसका अर्थ यह है कि ऐसे व्यक्ति के लिए स्त्री कोई स्वतंत्र सामाजिक या भाषिक सत्ता नहीं, बल्कि महज उसकी फैंटेसी की जगह है, जिस पर वह अपनी अधूरी कामनाओं को आरोपित करता है।

दरअसल आदमी एक प्रतीकात्मकता व्यवस्था से अर्थ ग्रहण करता है। यह व्यवस्था भाषा, नियम, कानून, समाज, निषेध, और नाम-का-पिता की व्यवस्था है। इसका चरित्र पितृसत्तात्मक है। उसमें ‘स्त्री’ की स्थिति एक तरह की अनुपस्थिति या असंभवता के रूप में आती है।

लकान का प्रसिद्ध कथन हैं : “The Woman does not exist.” यह स्त्री के अस्तित्व से इंकार नहीं है। इसका तात्पर्य यह है कि ‘स्त्री’ एक पूर्ण और स्थिर संकेतक के रूप में प्रतीकात्मक व्यवस्था में कभी दर्ज नहीं होती। उसका अस्तित्व हमेशा एक फिसलते हुए संकेतक की तरह होता है — कभी माँ के रूप में, कभी कामना की वस्तु के रूप में, कभी निषेध की भूमि के रूप में। स्त्रीत्व का कोई स्थायी, निश्चित अर्थ नहीं बनता, इसीलिए वह प्रतीकात्मक व्यवस्था में अस्थिर है। या तो एक आदर्श होती है (देवी, माँ, प्रेरणा), या एक कुलटा, अपवित्र (कामुकता, भय, अपराध की चीज)। यह दरअसल स्त्री को एक स्वायत्त मानव नहीं, बल्कि एक प्रतीकात्मक वस्तु मानने की मानसिकता है — जिसे या तो ऊँचे कंगूरे पर रखा जाए या ज़मीन पर पटक दिया जाए, लेकिन उसके साथ संवाद नहीं किया जाए।

लकान इसे फालोगोसेन्ट्रिक संरचना कहते हैं — एक ऐसी भाषा-संरचना, जिसमें अर्थ, अधिकार और इच्छा सभी पुरुष की स्थिति से निकलते हैं। इन दोनों ध्रुवों के बीच ‘स्त्री’ का अपना स्वायत्त स्वरूप गायब हो जाता है।

यही कारण है कि जब कोई स्त्री अपनी स्वतंत्रता का अहसास कराती है, तब वह आदमी की उस फैंटेसी की संरचना को तोड़ती है। स्त्री की अपनी चेतना — उसकी अस्मिता, सीमाएँ, प्रतिरोध — उनके लिए केवल एक ‘बाधा’ बनती है, जिसे वे नकारते हैं।

लेकिन जैसे ही वास्तविक स्त्री — जैसे वह कवयित्री — ना कहती है, सीमाएँ तय करती है, प्रतिरोध करती है, वह आदमी के अंदर की प्रतीकात्मक अस्थिरता को चुनौती देती है। और यही वह क्षण होता है, जब कल्पित जैसों की असहनीय यौनिक और भाषिक हताशा आक्रामक रूप ले लेती है। कवयित्री के घर में जबरन घुस जाना दरअसल कल्पित के अंदर की विध्वस्त संस्कृति, उसके प्रतीकात्मक विधान के ध्वंस का कुत्सित प्रकटीकरण है।

सच यह है कि जो व्यक्ति शब्दों से अपनी आत्म-छवि का निर्माण करता है, यदि वह स्वयं को उस छवि के जाल में पहचानने लगे, तो वही छवि उसे सिंथोम की तरह बाँध लेती है। ऐसा बंधन रचनात्मक भी हो सकता है, यदि सामाजिक विधान को मान कर चला जाए ; परंतु जब इस सामाजिक विधान को ही ठुकरा दिया जाता है, तो वह सिंथोम अपराध की शक्ल ले सकता है।

कृष्ण कल्पित की करतूत कोई क्षणिक उन्माद या अकेलेपन की उपज नहीं है, बल्कि एक लंबे समय से भीतर पल रही लालसात्मक विकृति और भाषिक आत्ममुग्धता का सामाजिक अपराध में बदलना है।

इस प्रकरण में प्रताड़ित कवयित्री ने अपनी पहचान उजागर नहीं की। उसने पुलिस में शिकायत नहीं की। पर क्या इस चुप्पी को हम उसकी कमज़ोरी कहेंगे! जब पीड़िता अपनी पहचान को उजागर नहीं करना चाहती, तो यह न केवल उसका संवैधानिक अधिकार है, बल्कि एक प्रतीकात्मक उत्तरजीविता की रणनीति भी है। स्त्री की चुप्पी कई बार उसकी भाषा होती है। वास्तव में वह यह जता रही होती है कि ‘मैं इस संरचना में अपनी देह नहीं, अपनी भाषा को सुरक्षित रखना चाहती हूँ।’

फ़ेसबुक पर कल्पित प्रकरण पर कुछ महानुभाव अजीब प्रकार की अदालती जिरह वाली मुद्रा में उतर पड़े हैं। वे अपनी बात कहने के बजाय कवयित्री से सवाल कर रहे हैं कि “अगर इतनी गंभीर बात थी, तो रिपोर्ट क्यों नहीं की?” वे सवाल पर सवाल उछालते हैं कि “कहाँ थी, क्यों गई, रात में क्यों गई, किस मंशा से गई?”

इन सब सवालों से यही साफ़ होता है कि स्त्री को ये सब उसकी ‘इच्छा की स्वायत्त सत्ता’ के रूप में स्वीकारने के लिए तैयार नहीं है ।

कुछ महानुभाव कल्पित के प्रति सहानुभूति में कह रहे हैं कि उनका ‘मीडिया ट्रायल’ हो रहा है! वे यह नहीं देख पा रहे हैं कि यह कथित ‘मीडिया ट्रायल’ वास्तव में एक प्रतीकात्मक न्याय है, जो उस मौन की जगह से हो रहा है जहाँ कानून की भाषा काम नहीं करती, पर जहां स्त्री की पीड़ा और आक्रांता के अपराध की छाप मौजूद रहती है।

कल्पित का कृत्य महज़ नशे में की गई ‘चूक’ नहीं, बल्कि उनकी उस मानसिक संरचना का प्रतिशोध है जिसमें स्त्री उनके लिए अब कोई प्रेरणा नहीं, बल्कि प्रतिरोध बन चुकी थी।

सवाल उठता है कि क्या हम स्त्री को केवल तब तक ही साहित्यिक मान्यता देंगे, जब तक वह हास्यास्पद “प्रेरणा” बनी रहे? क्या हम उसकी चुप्पी को समझने के बजाय उसे “नाटकीय मौन” कहकर खारिज कर देंगे?

यह पूरा प्रसंग — केवल एक कवि का पतन नहीं, बल्कि एक समूचे काव्य-प्रेमी समाज की आत्मपरीक्षा है।

(टिप्पणीकार सुप्रसिद्ध साहित्यिक-राजनैतिक आलोचक, स्तंभ लेखक और स्वतंत्र पत्रकार हैं। संपर्क : 98310-97219)

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