(टिप्पणी : अरुण माहेश्वरी)

19 जून के ‘टेलिग्राफ’ के अनुसार अमित शाह ने कहा है कि लोग अंग्रेज़ी बोलने से जल्द ही शर्म करेंगे ; अर्थात् हमारे अनुसार, लोग अपने ज्ञान और प्रश्न उठाने की क्षमता पर शर्म करेंगे!

हम उनके इस कथन को एक तानाशाह के ‘आज्ञापालक समाज’ के गठन का सपना कहेंगे। ‘आज्ञापालक समाज’ एक सैडिस्ट समाज होता है, जहां नैतिकता से मनुष्यता विरेचित कर ली जाती है। लोग रोबोटिक बना दिये जाते हैं।

रोबोट्स के लिए मंत्रों का नहीं, मंत्रोच्चारों का, आदेशनुमा संकेतों का महत्व होता है। रोबोटिक मनुष्य ही बलात्कारी भी होता है, क्योंकि उसके लिए शरीर महत्वपूर्ण होता है, उसके पीछे का मनुष्यत्व गायब हो जाता है।

दुनिया में भारत की किसी भाषा को ‘ज्ञान की भाषा’ क्यों नहीं माना जाता, क्या अमित शाह ने कभी इस पर सोचा है?

ज्ञान की भाषा वह है, जो आदमी को आत्ममुग्ध नहीं, संशयग्रस्त बनाती है ; जो अध्यापन की अमूर्तता से जीवन की ठोस परिस्थितियों में उतरती है ; जिसमें अध्यापन आरोपण नहीं, संवाद होता है।

वे कभी नहीं जानेंगे कि “ज्ञान की भाषा” स्वयं को स्थिर नहीं मानती ; जीवन की गति से खुद को संशोधित करती है ; सत्ता के बजाय अनुभव से अपनी वैधता प्राप्त करती है। यह उनकी समझ के बाहर हैं कि भाषा का संकट असल में हमारी संस्कृति के विघटन का संकट है ; जिस समाज में मानव के चित्त की गति को भाषा के जरिये स्वयं के बाहर रखने और बार-बार पुनः अर्जित करने की प्रक्रिया थम जाती है, उसमें भाषा न ज्ञान की भाषा बनती है, न मुक्ति की।

यह कोई संयोग नहीं है कि भारत की एक भी भाषा को आज वैश्विक या राष्ट्रीय ‘ज्ञान-भाषा’ का दर्जा नहीं मिला है — न विज्ञान, न दर्शन, न समाजशास्त्र, न तकनीक, न ही न्याय के विमर्श में। आज तो कोई भी विश्वविद्यालय भारतीय भाषाओं में उच्च शोध को गंभीरता से नहीं लेता। टेक्नोलॉजी, कानून, चिकित्सा, अंतरराष्ट्रीय नीति — सभी की भाषा अंग्रेज़ी है। नैतिक रूप से भी पढ़े-लिखे अभिभावक बच्चों को भारतीय भाषाओं, खास कर हिंदी मीडियम से दूर रखना चाहते हैं।

इसका मुख्य कारण औपनिवेशिक विरासत या अंग्रेज़ी का प्रभुत्व मात्र नहीं है, बल्कि स्वतंत्र भारत के अंदर ही भाषा को सचेत रूप में प्रश्नाकुलता और आत्म-विकास से कभी जुड़ने नहीं दिया गया।

क्यों पश्चिम में जर्मन, फ्रेंच, जापानी, रूसी जैसी भाषाएँ अपने समाज में ज्ञान की भाषाएँ बनीं? इसलिये कि वहाँ की सत्ता, बुद्धिजीवी वर्ग और शिक्षानीति ने उन भाषाओं में ज्ञान के आधुनिक विमर्श का निर्माण किया। हेगेल, कांट, हाइडेगर आदि ने जर्मन को दर्शन की भाषा बना दिया। जॉक लकान, देरीदा फूको आदि ने फ्रेंच को। चीन में मैंडरिन में विज्ञान, राजनीति, तकनीक — सबका समावेश किया गया। ग्लोबल होने की चाह में आत्मविसर्जन नहीं किया गया।

लकान के शब्दों में कहें, तो यह उस संस्कृति (प्रतीकात्मक व्यवस्था) का अभाव है, जिसमें कोई समाज खुद को विकासशील और विचारशील समाज के रूप में समझता है।

हमारे यहाँ भाषा धार्मिक परंपरा या भावुक राष्ट्रवाद की वाहक बनी, किसी ज्ञान परंपरा की भूमिका नहीं निभा सकी। इसीलिए हिंदी या तमिल को ज्ञान की भाषा नहीं, भावुक पहचान की भाषा के रूप में देखा जाता है।

क्या अमित शाह चाहेंगे कि भाषा में संशय, प्रश्न और विवाद के लिए जगह बनें। जब तक भाषा सिर्फ भक्ति या गौरव का माध्यम रहेगी, वह ज्ञान की वाहक नहीं बन सकती।

भारत की आज की सचाई है कि प्रेस की स्वतंत्रता की रैंकिंग 159 तक गिर चुकी है ; भूख के सूचकांक में देश 107वें पायदान तक फिसल गया है ; जहाँ सवाल पूछना राजद्रोह बन चुका है ; और सत्ता को जाहिल सांप्रदायिक नारों और आंकड़ों से खिलवाड़ करके खुद अपनी अशिक्षा पर गर्व है। यह सब स्वतंत्रता और प्रश्नाकुलता और विवेक के सख्त विरोधी हैं ।

सच यह है कि यहां ‘भाषा’ का सवाल भाषा विज्ञान का नहीं, प्रमुख रूप से जनतंत्र की आत्मा का सवाल भी है।

(टिप्पणीकार सुप्रसिद्ध साहित्यिक आलोचक, राजनैतिक टिप्पणीकार, स्तंभ लेखक और स्वतंत्र पत्रकार है। संपर्क : 98310-97219)

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