(आलेख : राजेंद्र शर्मा)

हैरानी की बात नहीं है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने अपनी करनियों और अकरनियों से इस देश की राजनीतिक व्यवस्था में उत्तर और दक्षिण के पुराने विभाजन को फिर से भड़का दिया है। जैसा कि हमने इससे पहले एक लेख में जिक्र किया था, इस विभाजन को बढ़ाने का काम मौजूदा केंद्र सरकार की भाषा नीति और शिक्षा रीति-नीति ने किया है। केंद्र सरकार के, शिक्षा के लिए तमिलनाडु राज्य के फंड उल्लेखनीय पैमाने पर रोकने ने इस टकराव को तेज किया और केंद्र सरकार के इसके ऐलान ने इस टकराव को विस्फोटक बिंंदु पर पहुंचा दिया कि 2020 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति और विशेष रूप से त्रिभाषा फार्मूले को जब तक तमिलनाडु लागू नहीं करता है, उसको रुका हुआ फंड नहीं दिया जाएगा। तमिलनाडु सरकार ने, जो त्रिभाषा फार्मूले को तमिलनाडु समेत गैर-हिंदी भाषी इलाके पर हिंदी थोपने की कोशिश के रूप में देखती है, न सिर्फ फंड रोकने के डंडे के बल पर केंद्र की शिक्षा नीति तथा भाषा नीति थोपने की इन कोशिशों को ठुकरा दिया, बल्कि अवज्ञापूर्ण रुख अपनाते हुए, केंद्र की इस मनमानी का हर कीमत पर विरोध करने का भी ऐलान कर दिया।

इसी दौरान, मोदी सरकार के इरादों को लेकर गंभीर आशंकाओं से भड़के एक और मुद्दे ने, उत्तर-दक्षिण के विवाद को और उग्र बना दिया है। यह मुद्दा है, आने वाले समय में होने वाली जनगणना के बाद, होने वाले परिसीमन या जन-प्रतिनिधित्व की इकाई के रूप में लोकसभाई क्षेत्रों के पुनर्सीमांकन का। जन प्रतिनिधित्व की व्यवस्था में संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक समायोजन की व्यवस्था करते हुए, देश के संविधान में इसका प्रावधान किया गया था कि हरेक दस साला जनगणना के बाद, उसके आधार पर संसदीय क्षेत्रों का पुनर्सीमांकन किया जाए, ताकि इस दौरान आए जनसांख्यिकीय बदलावों को हिसाब में लिया जा सके। इन बदलावों के लिए दो अलग-अलग स्तरों पर, परिसीमन के जरिए परिवर्तन किए जाते हैं। राज्यों के स्तर पर यानी राज्यों के अंदर परिवर्तन और राज्यों के बीच में परिवर्तन। इसी आधार पर, दशकीय जनगणना को आधार बनाकर, पहला परिसीमन 1952 में हुआ था और उसके बाद 1963 तथा 1973 में परिसीमन हुआ था और इसके जरिए लोकसभा की सीटों की संख्या क्रमश: 494, फिर 522 और फिर 543 तय की गयी थी।

बहरहाल, 1976 में एक संविधान संशोधन के जरिए, परिसीमन की प्रक्रिया को 25 साल के लिए स्थगित कर दिया गया और लोकसभा की सीटों की संख्या को तब तक के जहां का तहां रोक दिया गया। इसके पीछे विचार यह था कि जिन राज्यों में आबादी ज्यादा बढ़ रही थी, उन्हें इसी के बल पर लोकसभा सीटों की संख्या में बढ़ोतरी के जरिए प्रोत्साहित नहीं किया जाए। बहरहाल, इसके बाद यानी 2001 की जनगणना के बाद भी दक्षिण भारतीय राज्यों के कड़े विरोध के सामने, अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को भी सीटों की कुल संख्या के लिहाज से परिसीमन पच्चीस साल और यानी 2026 तक रोके रखने और सीटों की संख्या जहां की तहां बनाए रखने का कदम उठाना पड़ा था। इसके बाद, परिसीमन आयोग का गठन तो किया गया, लेकिन उसे जनगणना के आंकड़ों के आधार पर राज्यों की सीमाओं के अंदर ही सीमित परिसीमन करना था।

2026 के बाद होने वाले इसी पूर्ण परिसीमन ने दक्षिण भारतीय राज्यों और अन्य गैर-हिंदीभाषी राज्यों की भी इसकी आशंकाओं को भड़का दिया है कि यह परिसीमन, लोकसभा की उनकी सीटों की संख्या के रूप में, उनका राजनीतिक वजन घटाने का औजार बनने जा रहा है। इसका कारण आसानी से समझा जा सकता है। आबादी में वृद्घि की दर कम करने के मामले में, दक्षिण भारतीय राज्यों और उत्तर भारतीय राज्यों के बीच अब भी बहुत भारी अंतर बना हुआ है। यह अंतर बेशक घटा है, फिर भी उल्लेखनीय रूप से बड़ा बना हुआ है और इन पचास वर्षों में आबादी वृद्घि दरों से आबादियों के बीच का फासला बहुत ज्यादा बढ़ गया है।

ऐसे हालात में यदि आबादी के आधार पर ही परिसीमन किया जाता है, तो संसदीय प्रतिनिधित्व के अनुपात के लिहाज से गैर-हिंदी प्रदेशों का राजनीतिक वजन उल्लेखनीय तरीके से घट जाएगा और हिंदी भाषी क्षेत्र का राजनीतिक वजन उसी अनुपात में बढ़ जाएगा। ऐसा होने में आज केंद्र में सत्ता में बैठे संघ-भाजपा को राजनीतिक फायदा नजर आ रहा है, क्योंकि गैर-हिंदी क्षेत्र ही उनका मजबूत राजनीतिक गढ़ है, जबकि खासतौर पर दक्षिणी भारत में उनकी ताकत बहुत ज्यादा नहीं है। इस संबंध में वर्तमान सत्ताधारियों की नीयत को लेकर संदेह इसलिए और भी बढ़ जाते हैं कि उनके पसंदीदा प्रोजैक्ट के रूप में बनाये गए नये संसद भवन में, जिसकी संकल्पना में किसी व्यापक राजनीतिक परामर्श का कोई दखल नहीं था, भविष्यदृष्टि के नाम पर लोकसभा में 800 से ज्यादा सीटों की व्यवस्था रखी गयी है। यह इसका स्पष्ट संकेत करता है कि वर्तमान सरकार, परिसीमन के फलस्वरूप लोकसभा की सीटों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होने का अनुमान लगाकर चल रही है। और जैसा कि हमने पीछे कहा, आबादी पर आधारित परिसीमन के जरिए सीटों की बढ़ोतरी का अर्थ होगा, हिंदी-भाषी क्षेत्र का संसदीय वजन उल्लेखनीय रूप से बढ़ जाना और विशेष रूप से दक्षिण का वजन उसी अनुपात में घट जाना।

इस सिलसिले में विशेष रूप से दक्षिण भारतीय राज्यों की गंभीर आशंकाओं तथा चिंताओं को एक हद तक शांत करने की कोशिश में, केेंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कुछ ही हफ्ते पहले, तमिलनाडु के अपने एक दौरे के क्रम में यह आश्वासन दिया था कि यह सुनिश्चित किया जाएगा कि परिसीमन से किसी भी राज्य की सीटें घटेंगी नहीं बल्कि सभी की सीटों में बढ़ोतरी होगी। उन्होंने ”आनुपातिक आधार पर” सीटें तय किए जाने का भरोसा दिलाया था। लेकिन, शाह का यह आश्वासन भी गैर-हिंदी राज्यों की आशंकाओं को दूर करने के लिहाज से नाकाफी ही साबित हुआ है। इसकी सबसे बड़ी वजह यही है कि शाह के आश्वासन से यह स्पष्ट नहीं है कि ”अनुपात के आधार पर” से उनका ठीक-ठीक आशय क्या है? मुद्दा यह नहीं है कि हिंदी राज्यों की सीटें बढ़ जाएंगी और गैर-हिंदी राज्यों की सीटें घट जाएंगी। मुद्दा यह है कि सीटों की संख्या में बढ़ोतरी किस आधार पर होगी। अगर यह बढ़ोतरी चालू आबादी के आधार पर की जाती है, तो कुल मिलाकर गैर-हिंदी राज्यों की सीटों का अनुपात, उसके वर्तमान अनुपात से घट जाएगा।

गैर-हिंदी राज्य लोकसभा की कुल सदस्य संख्या में अपने वर्तमान अनुपात को बनाए रखे जाने की मांग कर रहे हैं और अमित शाह और उनके संगी, इसी का आश्वासन देने के लिए तैयार नहीं हैं। जाहिर है कि वे आबादी पर आधारित परिसीमन के अनार्जित फायदे हाथ से जाने नहीं देना चाहते।

इसी पृष्ठभूमि में 22 मार्च को चेन्नैई में मुख्यमंत्री एम के स्टालिन की पहल पर, प्रस्तावित परिसीमन से चिंतित राज्यों के नेताओं का जमावड़ा हुआ। इस मुद्दे पर तमिलनाडु की, अपवादस्वरूप भाजपा को छोड़कर अन्य सभी राजनीतिक पार्टियों को एकजुट करने के बाद, स्टालिन ने और वृहत्तर राजनीतिक एकता के लिए पहल की है। यह पहल कोआर्डीनेशन कमेटी फॉर फेअर डिलिमिटेशन नाम के मंच के माध्यम से की गयी है। यह इस मंच की पहली ही बैठक थी, जिसमें तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना तथा पंजाब के मुख्यमंत्रियों के अलावा कर्नाटक के उप-मुख्यमंत्री और ओडिशा की मुख्य विपक्षी पार्टी, बीजू जनता दल के सुप्रीमो, नवीन पटनायक और तेलंगाना की प्रमुख विपक्षी पार्टी, बीआरएस के शीर्ष नेताओं ने हिस्सा लिया।

इस बैठक ने एक स्वर से यह मुद्दा उठाया है कि आबादी के अनुपात के आधार पर राज्यों का लोकसभा का प्रतिनिधित्व तय करना, विशेष रूप से दक्षिण भारत के उन राज्यों को दंडित करना होगा, जिन्होंने राष्ट्रीय आबादी नीति के पालन में और अन्य अनेक मानकों पर प्रगति में, हिंदी-भाषी राज्यों के मुकाबले बहुत बेहतर प्रदर्शन किया है। उन पहलुओं से अच्छा प्रदर्शन करने वाले राज्यों को सजा देना और खराब प्रदर्शन करने वाले राज्यों को सीटों या उनके अनुपात में बढ़ोतरी के रूप में ईनाम दिया जाना, तो न्यायपूर्ण परिसीमन नहीं है। बैठक ने सर्वानुमति से मांग की है कि लोकसभा की सीटों की संख्या की बढ़ोतरी पर पचास साल से चली आ रही रोक, और 25 वर्ष के लिए बढ़ा दी जाए।

बेशक, यह समस्या का आदर्श समाधान नहीं है। सत्ताधारी पार्टी का कुल मिलाकर जो रुख नजर आता है, उसके चलते ही विपक्ष को, एक बचाव-उपाय के रूप में ही यह रुख अपनाना पड़ा लगता है। वर्ना होना तो यही चाहिए था कि इस दिशा में किसी भी तरह के कदम उठाने से पहले, केंद्र सरकार सभी राजनीतिक शक्तियों के साथ खुली चर्चा कर, गैर-हिंदी राज्यों की चिंताओं का समाधान खोजती। राज्यों के लोकसभा सीटों के अनुपात को यथावत बनाए रखते हुए, लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने और राज्यों के अंदर चुनाव क्षेत्रों का पुनर्सीमांकन करने के जरिए, राजनीतिक प्रतिनिधित्व के पीछे आबादी के असंतुलन को भी कम किया जा सकता था, जो समस्या को 25 और साल के लिए टालने से कहीं बेहतर होता। लेकिन, चूंकि सत्ताधारी पार्टी से अन्य राजनीतिक पार्टियों को विश्वास में लेने की किसी को उम्मीद ही नहीं, समस्या को फिलहाल टाल देना ही बेहतर विकल्प नजर आता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि सत्ताधारी पार्टी, कम से कम अब गैर-हिंदी भाषी क्षेत्र की चिंताओं को समझेगी, सुनेगी और भाषा के प्रश्न की तरह, इस मामले में अपने हठ से, उत्तर-दक्षिण की फॉल्ट लाइन को और उग्र बनाने से बाज आएगी।

*(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)*

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