1. जय श्रीराम भजो और मस्त रहो : विष्णु नागर

अब तो नीची से लेकर देश की सबसे ऊंची अदालत ने भी यह अच्छी तरह समझा दिया है कि ‘देश‌ के गद्दारों को, गोली मारो सालों को’ जैसा नारा लगाना न तो संज्ञेय अपराध है और न यह किसी समुदाय विशेष के विरुद्ध है! इससे न तो दिल्ली में 2020 में हिंसा भड़की थी, न सार्वजनिक व्यवस्था में बाधा पड़ी थी। सब सामान्य था।वामपंथी विध्नसंतोषियों ने फालतू में बावेला मचाकर केस दर्ज करवाया, सांप्रदायिकता का हल्ला मचाया और अदालत का समय खराब किया! वामपंथी ऐसी हरकतों से पता नहीं, कब बाज आएंगे!

अदालत सही है, क्योंकि नारे में केवल गोली मारने की बात थी। उस समय और वहां किसी को गोली नहीं मारी गई! यह भी ध्यान देनेवाली बात है कि ठाकुर साहब ने गोली मारने की बात स्वयं अपने श्रीमुख से नहीं कही थी! उन बेचारे ने तो केवल इतना कहा था — ‘देश के गद्दारों को’। किसी धार्मिक समुदाय का नाम नहीं लिया था और भीड़ ने भी कहा था — ‘गोली मारो सालों को’! उसने भी किसी धर्म का नाम नहीं लिया था! मामला बिलकुल सेकुलर था!

और भीड़ तो साहब भीड़ होती है! उसने कहा — ‘गोली मारो सालों को’ तो ठाकुर साहब चूंकि नेता हैं, इसलिए उन्हें उपस्थित जनता की इच्छा का सम्मान करते हुए इस नारे को दो-चार बार दोहराना पड़ा — ‘देश के गद्दारों को’।उधर से उत्तर आया ‘गोली मारो सालों को’। इसमें बताइए मुस्लिम कहां हैं, हिंदू कहां है? इसमें तो ईसाई तक नहीं है!

तो बात दरअसल सालों की थी। बात सालियां तक भी नहीं पहुंची थी। जहां तक सालों का सवाल है, यह जीजा और सालों का आपसी मामला है! अदालत ऐसे मामलों में तब तक दखल नहीं दे सकती, जब तक कि पीड़ित पक्ष खुद सामने नहीं आए। इस मामले में ठाकुर साहब केl किसी साले ने उनकी गोली मारने की बात का बुरा नहीं माना, वे जीजा के विरुद्ध सामने नहीं आए। उन्हें अपने जीजा पर पूरा विश्वास था कि जीजा, अपनी राजनीति के लिए सालों को गोली मारने तक के नारे लगवा सकते हैं, मगर गोली नहीं मार सकते, इसलिए ठाकुर साहब के विरुद्ध भी कोई मामला नहीं बनता।साले, जीजा के साथ या जीजा, साले या सालों के साथ क्या सलूक करे, इसका कोई सरकारी नियम नहीं है। संविधान में इसका कोई उल्लेख नहीं है और न सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में कोई निर्णय अभी तक दिया है! तो ठाकुर साहब दोषी नहीं हैं। और जब ठाकुर साहब दोषी नहीं हैं, तो उनकी पार्टी के परवेश वर्मा दोषी को कैसे माना जा सकता है? वैसे भी वे फिलहाल दिल्ली सरकार में उपमुख्यमंत्री हैं। उन्हें दोषी ठहराने से दिल्ली सरकार के सामने समस्या पैदा हो जाती! वैसे भी उन बेचारों ने आज से छह साल पहले मांस-मच्छी की दुकानवालों का दिमाग ठीक करने की बात कही थी! दिमाग तो सबका ठीक रहना चाहिए। इसमें ग़लत बात क्या है! खुद का दिमाग ठीक हो, न हो, मगर दूसरों का ठीक करना तो पुण्य कार्य है और परवेश जी ने वही करने की बात उस समय कही थी!

वैसे भी मांस-मच्छी की दुकान खोलने का ठेका भारत के संविधान ने किसी धर्म-विशेष के लोगों को तो दिया नहीं है, इसलिए भी परवेश जी की बात किसी कोने से सांप्रदायिक नहीं है, इसलिए सेकुलर है! उनकी यह बात जनहित में थी और तुलसीदास जी मोदी युग के आने  से शताब्दियों पहले कह गए थे कि परहित सरिस धरम नहिं भाई ….!

सांप्रदायिकता का ठेका तो दरअसल धर्म विशेष के लोगों ने ले रखा है। हिंदू तो आप जानते हैं और नहीं जानते हैं, तो  सुना तो होगा ही कि वे सांप्रदायिक नहीं हो सकते और अगर संघी हैं, तो फिर तो इसका सवाल ही पैदा नहीं होता, क्योंकि वे ‘सच्चे देशभक्त’ होते हैं! ऐसे ‘देशभक्त’ सांप्रदायिक नहीं हो सकते। यह बात गुरु गोलवलकर से लेकर मोहन भागवत तक और श्यामा प्रसाद मुखर्जी से लेकर नरेन्द्र मोदी तक सबने कही है। यही बात अमित शाह भी कहते हैं!

रही बात दूसरे धर्मवालों की, तो वे ‘सांप्रदायिक’ होते हैं।जैसे उमर खालिद या आल्ट न्यूज़ के मोहम्मद ज़ुबैर को‌ लें! उमर खालिद को नागरिकता संशोधन कानून से क्या तकलीफ़ थी भाई? उसकी नागरिकता तो ख़तरे में नहीं थी। उसे इसका विरोध क्यों करना चाहिए था! मगर वामपंथियों को हर जगह टांग फंसाने की आदत है और भारत को आज भी लोकतांत्रिक देश मानने की टेव है।आप बताइए, क्यों उसे शाहीनबाग जाना चाहिए था? और गये हैं, तो क्या पुलिस को इसमें षड़यंत्र सूंघने की स्वतंत्रता नहीं है? उसे क्यों महाराष्ट्र के अमरावती में भाषण के अंत में ‘इन्कलाब जिंदाबाद ‘ का नारा लगाना चाहिए था? यह ‘षड़यंत्र’ नहीं, तो और क्या है? यह साफतौर पर राष्ट्रद्रोह है! इस देश में इन्कलाब क्यों चाहिए? मोदी जी जो लाए हैं, उससे संतोष क्यों नहीं है!

ठीक है कि हत्या और बलात्कार के दोषी राम रहीम को तो अभी तक पंद्रह बार परोल दी गई है और सोलहवीं बार भी जल्दी ही दी जा सकती है, मगर उमर खालिद को करीब छह साल बाद भी जमानत नहीं दी गई! यही न्यू इंडिया का नया आदर्श  है! इसमें बलात्कार और हत्या संगीन अपराध नहीं रहा, मगर सी ए ए और एन आर सी का विरोध करना देशद्रोह है, क्योंकि देश प्रधानमंत्री से शुरू होकर प्रधानमंत्री पर आकर खत्म होता है!

और ये मोहम्मद ज़ुबैर! इसे तो पता होना चाहिए था कि भले ही यह पत्रकार है, फैक्ट चैकर है, मगर है तो मुसलमान ही! इतनी बड़ी बात वह भूल कैसे गया! 2018 में मोदी जी की हुकूमत आ चुकी थी, तब उसने किस गलतफहमी में पड़कर ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म ‘किसी से न कहना’ के एक सीन को अपने ट्विटर अकाउंट पर चेंप दिया था, जिसमें हनीमून होटल का नाम बदलकर हनुमान होटल कर दिया गया था! ठीक है कि उस समय हिंदुओं की भावनाएं आहत नहीं हुईं। आहत होने में चार साल का समय लगा, मगर भावनाएं आहत होने का अपना कर्तव्य भूल नहीं पाईं! वह पत्रकार था, इसलिए बाल- बाल बच गया, वरना तिहाड़ में उमर खालिद और शरजिल इमाम की संगत कर रहा होता!

तो ‘नये भारत’ में कपिल मिश्रा कदापि सांप्रदायिक नहीं हो सकते, यति नरसिंहानंद भी नहीं हो सकते, महंत बजरंग मुनि भी नहीं हो सकते, आनंद स्वरूप भी नहीं हो सकते और लोगों को कपड़ों से पहचानने वाला 140 करोड़ जनता का प्रतिनिधि भी नहीं हो सकता। बंगाल की मतदाता सूची से 27 लाख नाम काटनेवाले चुनाव आयोग के मुखिया को भी सांप्रदायिक नहीं कहा जा सकता। फिर कौन हो सकता है सांप्रदायिक, यह अब आप अदालत के फैसले से जान गए होंगे। इसलिए आइए, अब भारत के जन-जन जयश्री राम भजें और मस्त रहें, पस्त रहें और व्यस्त रहें!

(कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)
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2. कोई नफ़रती ना कहे मेरे, ‘‘गोली मारो…’’ वालों को! : राजेंद्र शर्मा

इसे कहते हैं– न्याय! अदालत ने क्या दूध का दूध और पानी का पानी किया है। दूध अलग और पानी अलग। मजाल है, जो दूध में पानी का कतरा मिलने दिया हो। और पानी में दूध का एक छींटा रहने देने का तो सवाल ही नहीं उठता है। एक तरफ न्याय और दूसरी तरफ अन्याय। और दोनों के बीच कोई बारीक-सी रेखा नहीं, बल्कि समझिए कि चीन की दीवार की टक्कर की दीवार खींच दी है कि रत्ती भर मिलावट का कोई चांस ही नहीं है।

अदालत ने पहले नफरती बोलों के दूध को छानकर अलग किया। यह तो बहुत ही खतरनाक चीज है। इसको अनदेखा करना देश के लिए बहुत ही नुकसानदेह है। कानून में इससे निपटने के लिए काफी उपाय हैं। पता नहीं क्यों, इससे निपटने में अक्सर ढील देखने को मिलती है, वगैरह, वगैरह।

फिर एक झटके में पानी को इस दूध से अलग कर दिया — ‘‘गोली मारो सालों को’’ का नारा लगाने में तो कोई नफरती बोल है ही नहीं। एक सिंपल नारा है और वह भी चुनाव के टैम का नारा। यह कैसी विडंबना है कि एक तरफ तो सेकुलर वाले चुनावी नारों में नफरती बोल खोज रहे हैं और दूसरी ओर इसकी शिकायतें करते हैं कि मोदी जी-शाह जी के राज में, नफरती बोलों की बाढ़ आयी हुई है। बाढ़ आयी हुई है, तो बाढ़ में से कहीं से भी नफरती बोल का डोल भर लाते, मोदी जी के दो हीरों — अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा — पर ही निशाना लगाने की कोशिश क्यों?

न्यायाधीशों ने तो पहली नजर में ही पहचान लिया कि यह पॉलिटिक्स का मामला है। पॉलिटिक्स का भी क्या, बस मोदी जी के विरोध का मामला है। मोदी जी के विरोधियों को विरोध करने के लिए और कुछ नहीं मिला, तो मोदी जी के चहेते युवा सांसदों पर नफरती बोली बोलने का इल्जाम लगा दिया।

और इल्जाम भी किस ने लगाया? एक विपक्षी नेता ने। और विपक्षी भी ऐसी-वैसी नहीं, कम्युनिस्ट नेता ने। अब कम्युनिस्टों का तो नफरत सूंघने का स्पेशलाइजेशन ही माना जाता है। सात पर्दों में छुपी नफरत भी सूंघ निकालते हैं। और उस पर तुर्रा ये है कि ये खुदाई खिदमतगार हैं।

चुनाव दिल्ली में हो रहा था। ठाकुर जी और वर्मा जी दिल्ली के चुनाव में ‘‘गोली मारो…को’’ का आह्वान कर रहे थे। दिल्ली में चुनाव में उनकी पार्टी का मुकाबला, अरविंद केजरीवाल की पार्टी से था। पर शिकायत हुई लाल झंडे वाली पार्टी की नेता को, जिनकी पार्टी चुनाव में कहीं दूर-दूर थी ही नहीं। सोचने की बात है, अगर ‘‘गोली मारो…को’’ में नफरत के बोल होते, तो क्या केजरीवाल की पार्टी को नहीं सुनाई देते, जिसने उस बार तो चुनाव जीता भी था।

हैरानी की बात नहीं है कि अदालत ने पहली नजर में ही पकड़ लिया कि यह नफरती बोल वगैरह के खिलाफ किसी न्याय-व्याय का नहीं, सिर्फ पॉलिटिक्स का मामला है। सच्ची बात तो यह है कि सबसे ऊंची अदालत ने तो अब पकड़ा, बाकी अदालतें भी शुरू से ही इस सचाई को न सिर्फ जाने बैठी थीं, बल्कि पकड़ के भी बैठी थीं। और अदालतें ही क्यों अमित शाह जी वाली दिल्ली पुलिस भी। तभी तो दिल्ली पुलिस को कभी ‘‘गोली मारो…को’’ में कोई नफरती बोल नहीं सुनाई दिया। वैसे भी दिल्ली पुलिस पर काम का बोझ बहुत ज्यादा है और जो ऊपर से कहा जाता है, उसे ही ठीक से सुन-समझ लें तो ही बहुत है। इधर-उधर के बोल भी सुनने के चक्कर में पड़ेंगे, तब तो शायद कुछ भी सुनने लाइक नहीं रह जाएंगे। अगर इधर-उधर के बोल सुनने लगते, तो क्या उन्हें अमित शाह का वोटिंग मशीन के बटन से शाहीन बाग में करेंट लगाने वाला डाइलॉग भी नहीं सुनना पड़ता! बॉस के नफरती बोल…वह तो कुफ्र हो जाता। उन्होंने कुछ नहीं सुना। और जब शाह जी की पुलिस को कोई नफरती बोल नहीं सुनाई दिये, तो निचली अदालत को कैसे सुनाई देते?

अदालतों पर काम का बोझ कम है क्या? जब निचली अदालत ने नफरती बोल नहीं सुने, तो हाई कोर्ट कैसे सुनती? दिल्ली के ही जस्टिस मुरलीधरन की तरह, रातों-रात जज साहब को दंडात्मक तबादला कराना था क्या? और आखिरकार, सबसे ऊंची अदालत को भी ‘‘गोली मारो…को’’ में कोई नफरती बोल नहीं सुनाई दिए। केस क्लोज्ड, याचिका खारिज!

अब प्लीज ये मत कहने लगिएगा कि अदालत के ही कान बंद थे, इसलिए उसे नफरती बोल सुनाई नहीं दिए। इसमें कान का तो काम ही नहीं था। सारा मामला तो यूं ही एकदम साफ था। अदालत की क्लीन चिट तो बनती थी — ‘‘देश के गद्दारों को, गोली मारो…को’’ के लिए! दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के नौजवान नेताओं का नारा था, उसके लिए क्लीन चिट तो यों भी बनती ही थी। नारा है, आगे भी देश की सेवा के लिए काम आएगा, चुनाव में भी और चुनाव से पहले भी तथा बाद में भी। वैसे भी गोली मारो के आह्वान में नफरत वाली तो कोई बात है ही नहीं। बेशक, इस आह्वान को कोई हिंसक कह सकता है, लेकिन था तो सिर्फ आह्वान ही। गोली किसी को मारी गयी क्या? कहां तो भारतीय ज्ञान परंपरा की नयी पढ़ाई में यह पढ़ाने की तैयारियां की जा रही हैं कि गोडसे ने गांधी को जो तीन गोलियां मारी थीं, वो भी नफरत की वजह से नहीं, बल्कि राष्ट्र से प्रेम की वजह से मारी थीं ; और कहां गोली मारने की सिर्फ पुकार को जबरन नफरत से जोड़ा जा रहा है, जबकि गोली एक भी नहीं चली थी, शाहीन बाग के सिवा।

फिर यह नहीं भूलना चाहिए कि मोदी जी के पार्टी के युवा नेताओं ने गोली किसे मारने की पुकार उठायी थी। देश के गद्दारों को! देश के गद्दारों को गोली मारने का भला नफरत से क्या लेना? यह तो राष्ट्र प्रेम का काम है! माना कि हरेक राष्ट्र प्रेमी गोली मारने लगेगा, तब भी और बड़ी समस्या पैदा हो जाएगी। फिर भी यह नहीं भूलना चाहिए कि इसके पीछे भावना राष्ट्र प्रेम की है, न कि मुसलमानों या और किसी के भी प्रति नफरत की। रही बात ‘‘सालों को’’ की, तो साला शब्द के प्रयोग में जरूर नफरत की आशंका हो सकती है, क्योंकि इस शब्द का प्रयोग कई बार गाली की तरह भी किया जाता है। लेकिन, यह एक प्यारे रिश्ते का नाम भी तो है। यह भी हो सकता है कि नारे में साला शब्द का प्रयोग इस प्यार भरे अर्थ में ही किया गया हो। अदालत संदेह का लाभ देकर, ‘‘गोली मारो सालों को’’ का नारा लगाने वालों को, नफरती बोली के आरोपों से बरी करती है। मोदी जी-शाह जी की पार्टी को चुनाव में, चुनाव से पहले और चुनाव के बाद, हरेक सीजन में अपने इस नारे का प्रयोग करने का अधिकार है। 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)

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