2047 तक हम विकसित भारत का ख्वाब देख रहे हैं, विश्व की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था के दावे किए जा रहे हैं लेकिन इसके इतर भारत के अंदर ही एक और भारत है जिसकी 90 फीसदी आबादी के पास अतिरिक्त खर्च के लिए पैसे नहीं हैं। हाल ही में आई एक रिपोर्ट के अनुसार भारत की जो समस्या आज से कई दशक पहले थी आज भी वही है कि अमीर और अमीर होता जा रहा है, गरीबों की हालत किसी छिपी नहीं है। ब्लूम वेंचर्स की ‘इंडस वैली एनुअल रिपोर्ट 2025’ के मुताबिक भारत की 90 फीसदी आबादी यानी करीब 100 करोड़ लोगों के पास अतिरिक्त खर्च करने के लिए पैसा ही नहीं है। यानी वह किसी तरह अपने मासिक खर्च पूरे कर रहे हैं और उतने में ही उनकी आमदनी खत्म हो जा रही है। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत के शीर्ष 10 प्रतिशत लोग ही देश की खपत और आर्थिक वृद्धि को चला रहे हैं। यह समूह लगभग 13-14 करोड़ लोगों का है, जो मेक्सिको की कुल आबादी के बराबर है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में उपभोक्ता वर्ग “विस्तृत” होने के बजाय “गहरा” हो रहा है यानी अमीर लोग और अमीर हो रहे हैं, लेकिन देश में अमीरों की कुल संख्या में कोई खास इजाफा नहीं हो रहा है। इसके अलावा करीब 30 करोड़ लोग “उभरते” या “आकांक्षी” उपभोक्ता की श्रेणी में आते हैं, लेकिन ये खर्च करने में झिझकते हैं।
भारत के उपभोक्ता बाजार में ब्रांड्स अब सस्ते प्रोडक्ट्स के बजाय प्रीमियम उत्पादों पर ध्यान दे रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, देश के अफोर्डेबल रियल एस्टेट सेगमेंट में गिरावट आई है, जो पांच साल पहले 40 प्रतिशत था और अब सिर्फ 18 प्रतिशत रह गया है। हाल ही में हुए कोल्डप्ले और एड शीरन के हाउसफुल कॉन्सर्ट्स को “एक्सपीरियंस इकोनॉमी” के बढ़ते प्रभाव का उदाहरण बताया गया है। रिपोर्ट में कहा गया कि भारत की खपत वृद्धि दर दुनिया की कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं से बेहतर है, लेकिन देश अभी भी चीन से 13 साल पीछे है। सन 2023 में भारत की प्रति व्यक्ति खपत $1,493 थी, जबकि चीन में यह 2010 में ही $1,597 पर पहुंच गई थी।


इंडस वैली रिपोर्ट 2025 इस रिपोर्ट में कई चैंकाने वाले दावे सामने आए हैं। मसलन, एक ही भारत में लगभग तीन भारत हैं। इनमें से एक हिस्सा सिर्फ 10 प्रतिशत यानी लगभग 14 करोड़ लोगों का है। भारत के कुल खर्च का लगभग दो-तिहाई हिस्सा इसी वर्ग के हिस्से आता है। दूसरे हिस्से में लगभग 30 करोड़ लोग यानी 20 परसेंट जनसंख्या आती है, ये लगभग एक-तिहाई खर्च करते हैं यानी बाकी जो 100 करोड़ लोग हैं, उनके पास खर्च करने को कुछ नहीं है। इस रिपोर्ट में भारत की आबादी 140 करोड़ के आसपास बताई गई है। इंडस वैली रिपोर्ट से पता चलता है कि भारत का सकल घरेलू उत्पाद मुख्य रूप से उपभोक्ता खर्च पर निर्भर है। जीडीपी में इनवेस्टमेंट का योगदान बहुत कम है। रिपोर्ट के मुताबिक पहली श्रेणी में 10 प्रतिशत यानी लगभग 14 करोड़ लोग आते हैं। ये हिस्सा देश में दो-तिहाई या 66ः खर्च के लिए जिम्मेदार है। रिपोर्ट बताती है कि ये वर्ग सिर्फ गहरा हो रहा है, व्यापक नहीं. यानी इन लोगों की संपत्ति बढ़ती जा रही है, लेकिन इस वर्ग में और लोग नहीं जुड़ रहे हैं। इनके पास मौजूद पैसों का बाकी के वर्गों में बंटवारा नहीं हो रहा है यानी सबसे अमीर वर्ग, और भी अधिक अमीर हो रहा है। इस वर्ग की प्रति व्यक्ति आय 15 हजार डॉलर यानी करीब 13 लाख रुपये बताई गई है। इस बात की पुष्टि ऐसे भी होती है कि हवाई यात्रा, दोपहिया वाहनों की खरीद, ऑनलाइन फूड डिलीवरी जैसी सेवाओं का इस्तेमाल करने वालों की संख्या में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई है। ये वर्ग पॉश इलाकों में ही रहना पसंद करता है, जहां सिक्योरिटी को लेकर किसी भी तरह की चूक ना हो। अगर सिर्फ इसी वर्ग को भारत मानकर चला जाए, तो भारत एक विकसित देश बनने से पहले ही, एक एडवांस्ड इकॉनमी बन जाएगा। वहीं, प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत दुनिया में 63वें स्थान पर होगा, जो कि अभी के 140वें स्थान से बहुत बेहतर है। दूसरी श्रेणी में 20 प्रतिशत यानी लगभग 30 करोड़ लोग आते हैं। इन लोगों को उभरते या आकांक्षी कंज्यूमर कैटगरी में रखा गया है। इन व्यक्तियों ने हाल में ज्यादा खर्च करना शुरू किया है लेकिन वो अपने खर्चों को लेकर सतर्क रहते हैं। इनकी प्रति व्यक्ति आय 3 हजार डॉलर यानी लगभग 2.5 लाख रुपये है। तीसरा वर्ग, जिसमें 100 करोड़ लोग शामिल हैं यानी भारत की आबादी का लगभग दो तिहाई भाग। इन लोगों के पास खर्च करने के पैसे ही नहीं हैं। इनकी प्रति व्यक्ति आय लगभग एक हजार डॉलर यानी लगभग 85 हजार रुपये। इनके पास उतने ही पैसे होते हैं, जितने अफ्रीका के गरीब देशों के लोगों के पास। यहां ये बताना लाजमी होगा कि भारत सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है, लेकिन सही ये भी है कि सहीं है कि प्रति व्यक्ति आय में हमारा रैंक 149 वां है। भारत तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था है, इसके बाद भी यहां गरीब पीछे छूट गए हैं। अमीर और गरीब के बीच का अंतर बड़ा होता जा रहा है। अमेरिका, जर्मनी, जापान और चीन के बाद भारत दुनिया में पांचवां सबसे बड़ा कंजम्प्शन मार्केट है। बीते दस सालों में भारत के कंजम्प्शन में बढ़ोतरी, इन अन्य देशों की तुलना में अधिक रही है लेकिन जब बात प्रति व्यक्ति कंजम्प्शन एक्सपेंडिचर पर आती है, तो भारत, चीन तो क्या, इंडोनेशिया से भी बहुत पीछे है। ये बताता है कि भारत में आर्थिक असमानता की खाई चैड़ी होती जा रही है। इंडस वैली रिपोर्ट 2025 में बीते पांच सालों में महामारी के बाद की अर्थव्यवस्था के संदर्भ में भारत में स्टार्टअप इकोसिस्टम का विश्लेषण किया गया है। अलग-अलग सरकारी और प्राइवेट डेटा सोर्सेज के आधार पर क्विक कॉमर्स में बढ़ोतरी और लोकल कनविनियंस स्टोर्स पर इसके क्या प्रभाव होंगे, इस पर भी प्रकाश डाला गया है।

किस पर कितना खर्च करते हैं भारतीय
     भारत के अमीरों की संख्या देश की आबादी के 10 प्रतिशत से भी कम है, लेकिन वे खर्च का दो-तिहाई हिस्सा करते हैं जबकि भारत के मध्यम वर्ग की आबादी देश की आबादी का 23 प्रतिशत है, लेकिन वे खर्च का केवल एक-तिहाई हिस्सा ही देते हैं। भारत के एक अरब गरीब लोगों के पास विवेकाधीन खर्च में कोई हिस्सा नहीं है और वे खर्च करने के लिए अपनी बचत में से पैसे निकालते हैं। शहरी 10 प्रतिशत आबादी अन्य दो समूहों या प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय की तुलना में उपभोग में बहुत अधिक खर्च करती है। शहरी शीर्ष 10 प्रतिशत लोग भोजन पर प्रति व्यक्ति छूट से तीन गुना अधिक खर्च करते हैं। ईंधन-प्रकाश के लिए उनका खर्च ऐसी वस्तुओं पर प्रति व्यक्ति व्यय से 4 गुना अधिक है। घर और व्यक्तिगत देखभाल उत्पादों के लिए उनका खर्च इन वस्तुओं पर प्रति व्यक्ति व्यय से 4.5 गुना अधिक है। जैसे-जैसे कोई भोजन और ईंधन जैसी बुनियादी और आवश्यक चीजों से आगे बढ़ता है, तो यह अंतर और भी अधिक बढ़ जाता है। शहरी शीर्ष 10 प्रतिशत लोग कपड़ों पर औसत से पांच गुना अधिक पैसा खर्च करते हैं और पैकेज्ड फूड पर छह गुना अधिक पैसा खर्च करते हैं। गैर-पैकेज्ड फूड पर यह खर्च तीन गुना अधिक है। इसी तरह, शहरी शीर्ष 10 प्रतिशत लोग उपभोक्ता सेवाओं पर औसत से सात गुना अधिक खर्च करते हैं। वे परिवहन पर औसत प्रति व्यक्ति व्यय से 8 गुना अधिक और शिक्षा पर 9 गुना अधिक खर्च करते हैं। जैसे-जैसे कोई आभूषण और टिकाऊ वस्तुओं पर खर्च जैसे बड़े खर्च की ओर बढ़ता है, व्यय पैटर्न में अंतर और भी अधिक हो जाता है। उदाहरण के लिए, शहरी शीर्ष 10 प्रतिशत लोग आभूषणों पर औसत से 10 गुना अधिक पैसा खर्च करते हैं, वे घर से बाहर खाने पर प्रति व्यक्ति औसत से 11 गुना अधिक पैसा खर्च करते हैं। इसी तरह, अस्पताल के खर्च जैसे संस्थागत चिकित्सा व्यय पर, ये शीर्ष 10 प्रतिशत शहरी लोग औसत प्रति व्यक्ति व्यय से 11 गुना अधिक पैसा खर्च करते हैं। टेलीविजन, फ्रिज, वॉशिंग मशीन, कंप्यूटर, फोन और अन्य सामान जैसे टिकाऊ उत्पादों के मामले में, ये लोग औसत प्रति व्यक्ति व्यय से 13 गुना अधिक पैसा खर्च करते हैं।

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