भोपाल, मप्र । मुस्ताअली बोहरा,अधिवक्ता एवं लेखक एक बार फिर जश्न-ए-आज़ादी का पुरखुलुस मौका आया है। 15 अगस्त 1947 को भारत ब्रितानियों की हुकुमत से आज़ाद हुआ था और तब से लेकर अब तक आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, रक्षा, तकनीक, शिक्षा, स्वास्थ्य, सैन्य, खेल सहित सभी क्षेत्रों में तरक्की की है। आज पूरी दुनिया हिन्दुस्तान की तरफ हसरत भरी निगाहों से देख रही है। आज मुल्क की पहचान एक सशक्त और आत्मनिर्भर राष्ट्र के रूप में है। बीते साढ़े सात दशकों में देश के भीतर चुनौतियों और समस्याओं के बीच जो कुछ हासिल किया है और देश जिस मुकाम पर है वो हरेक भारतीय को गौरवान्वित कर सकता है। हमें आज़ादी यूं ही नहीं मिली। आज़ादी के साथ ही विभाजन का दंश भी झेलना पड़ा, विभाजन के साथ पाकिस्तान अस्तित्व में आया। नए देश के अस्तित्व में आने से भारत की एक बड़ी जमीन और लोगों को खोना पड़ा। इसके बाद कश्मीर और अक्साई चिन में हमें अपनी जमीन खोनी पड़ी। हालांकि, सिक्किम को सरकार ने देश में जोड़े रखा। तब से लेकर अब तक भारत अपनी सीमा की हिफाजत करता आया है। अलगाववादी ताकतों, नक्सलवाद, आतंकवाद की चुनौती से निपटते और सरहद पर पाकिस्तान और चीन से लड़ते हुए भारत ने अपनी सशक्त्ता को दुनिया के सामने साबित कर रखा है। तमाम चुनौतियों और सामाजिक सदभाव को बिगाड़ने की कोशिशों के बावजूद देश में धर्मनिरपेक्षता बरकरार है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के रूप में भारत ने एक समृद्ध, शक्तिशाली, सम्पन्न, संप्रभु और आत्मनिर्भर देश के रूप में अपनी पहचान बनाई है। देश की अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ी है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है और दुनिया के विकसित देश भारत में निवेश करना चाहते हैं। सैन्य क्षेत्र, मिसाइल तकनीक और आईटी क्षेत्र में देश ने अपना लोहा मनवाया है। चाहे सत्ता पक्ष में कोई राजनीतिक पार्टी रही हो और विपक्ष में कोई, चाहे कभी सत्ता पक्ष, विपक्ष में रहा हो या फिर विपक्ष कभी सत्ता में रहा हो, सरकारों ने जनकल्याणकारी नीतियां और योजनाएं बनाई हैं। योजनाओं का लाभ गरीबों और कमजोर वर्गों तक पहुंचाने की हर मुमकिन कोशिश की गई है। हालांकि, तमाम योजनाओं के बावजूद गरीबी, पिछड़ापन, बेरोजगारी दूर नहीं हुई है, अभी भी देश के कई गांवों में पीने का साफ पानी मुहैया नहीं हो रहा है तो कई गांवों में बिजली नहीं है। कई छोटे शहर अभी भी रेल मार्ग से नहीं जुड़े हैं तो कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां पक्की सड़कें नहीं हैं। आज़ादी के इतने बरसों बाद भी न गरीबी से आजादी मिली, न बेरोजगारी से, न जातिगत मतभेदों से और न कुप्रथा से। कौन क्या खाएगा क्या नहीं, क्या पहनेगा क्या नहीं, इन सब चीजों पर भी विवाद होते रहते हैं। कहीं किसान अपनी मांगों को लेकर आंदोलित हैं तो कहीं साम्प्रदायिक उन्माद होता रहता है। जम्मू कश्मीर से लेकर पश्चिम बंगाल तक, असम और मिजोरम से लेकर छत्तीगढ़ तक ज्यादातर राज्यों में गंभीर समस्याएं हैं कहीं सीमा विवाद है तो कहीं साम्प्रदायिक उन्माद तो कहीं आतंकवाद तो कहीं नक्सल समस्या। आजादी के बाद से अब तक सरकारें तो बदलती रहीं लेकिन व्यवस्था नहीं बदली। ये बात भी सच है कि हर बात के लिए सरकार पर निर्भर रहना भी गलत है, यदि हम अपने अधिकारों के लिए सचेत हैं तो हमें अपने कर्तव्यों के प्रति भी ईमानदार होना होगा। जिस आजाद भारत का सपना हमारे पूर्वजों, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और बलिदानियों ने देखा था क्या वो सपना पूरा हुआ या हो रहा है। क्या संविधान के अनुरूप आर्दश देश की परिकल्पना साकार हो रही है, क्या स्वस्थ और सजग समाज की स्थापना हुई है, ऐसे ही कई सवाल हैं जिनके जवाब तलाशने जरूरी हैं। ये तो बात हुई आजादी के बाद से अब तक हमने क्या हासिल किया और क्या गंवाया। अब बात सामाजिक भेदभाव की। पिछले कुछ सालों में जिस तरह से जातिगत भेदभाव उभरा है उससे ये बात भी ज़हन में आती है कि क्या पिछड़े वर्ग के लोगों, दलित जातियों के लोगों ने उतनी तरक्की कर ली जितनी की करनी चाहिए थी। आज भी दलित समाज अपनी अस्मिता, अपने हक और अपनी भागीदारी के लिए सरकार की ओर मुंह ताक रहा है। आजादी के बाद से ही दलित जातियों लोगों के लिए अनेक योजनाएं बनाई गईं और आज भी बनाई जाती हैं लेकिन ये योजनाएं पूरी तरह से इस समाज के हितग्राहियों तक नहीं पहुंच पातीं। यहां महज दलित समाज के हित के लिए योजनाओं तक की ही बात नहीं है बल्कि आजादी के इतने सालों बाद भी दलित समाज शोषित-पीड़ित है। कभी इस समाज के व्यक्ति पर लघुशंका करने या कभी किसी दलित के घोड़ी चढ़ने पर उसके साथ मारपीट किए जाने की खबरें आतीं रहतीं हैं। यहां बाबा साहब की बात याद आ जाती है, वो कहते थे अक्सर हिंदु नेता ये कहते हैं कि हमें दलितों के लिए कुछ करना है लेकिन वो कभी ये नहीं कहते कि सवर्ण हिंदुओं को बदलने के लिए कुछ करना है। दरअसल, दलितों और सवर्णों के बीच परस्पर समभाव नहीं होता और होता भी है तो महज राजनीतिक विवशता की वजह से। दलितों को अभी भी पराया माना जाता है। दलितों के मंदिर जाने और पूजा करने पर आज भी ऐतराज जताया जाता है। हालांकि, जब अयोध्या मंदिर आंदोलन चल रहा था तब दलितों को भी हिंदु बताकर इस आंदोलन से जोड़ा गया था। जो भी हो, आरक्षण की वजह से दलितों को शिक्षा हासिल करने और शासकीय पदों पर नौकरी करने का मौका मिला इससे इंकार नहीं किया जा सकता। पिछड़े-दलित वर्ग के लिए तो अभी भी मुफलिसी, शोषण, उत्पीड़न, अत्याचार आदि से आजादी हासिल करना बाकी है।तमाम सफलताओं-असफलताओं के बीच ये भी सच है कि सामाजिक और नैतिक मूल्यों का ह्रास हुआ है। व्यक्ति से लेकर समाज, राजनीति सभी क्षेत्रों में मूल्यों का पतन देखने को मिला है। कभी वह भी दौर हुआ करता था जब एक वोट से सरकार गिर गई थी, वह भी दौर था जब रेल हादसे की जिम्मेदारी लेते हुए केंद्रीय मंत्री ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था, लेकिन आज स्थितियां विपरीत हैं। सत्ता के लिए समझौते हो रहे हैं जिनके दामन दागदार हैं वह पावर में बने हुए हैं। खैर, इसके लिए किसी एक को दोष नहीं दिया जा सकता। लोकतांत्रिक देश में बेहतर समाज और सशक्त राष्ट्र बनाने की जिम्मेदारी हम सभी की है। इसके लिए हम सभी को आगे आना होगा। —- दलितों को उनका हक दिलाना ज्यादा जरूरी मानते थे बाबा साहब ——आजादी की बात हो और दलित आंदोलनों की बात हो लेकिन बाबा साहब की बात ना हो ऐसा हो ही नहीं सकता। असल में आजादी को लेकर बाबा साहब का नज़रिया थोड़ा अलग था। यूं तो बाबा साहब संविधान निर्माता और दलित समाज के रहनुमा माने जाते हैं लेकिन दूसरी तरफ स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा न लेने की बात भी सामने आती रहती है। दरअसल, बाबा साहब का असल मकसद था सत्ता में पिछड़े वर्ग की हिस्सेदारी। डाॅ आंबेडकर का मानना था कि अगर किसी शख्स को समाज में सिर उठाकर चलने की आजादी नहीं तो उसके लिए देश की आजादी के कोई मायने नहीं। वह सत्ता में पिछड़े तबके की हिस्सेदारी चाहते थे। दलितों की दुर्दशा, शोषण और उत्पीड़न के लिए बाबा साहब हिंदू धर्म की ऊंच-नीच वाली व्यवस्था को जिम्मेदार मानते थे। उनका कहना था कि हिंदू धर्म मनुस्मृति के हिसाब से चलता है, जिसमें ऊंच-नीच कूट-कूटकर भरा है। द फिलॉसफी ऑफ हिंदुइज़्म में डाॅ आंबेडकर ने लिखा है, मनु ने चार वर्णों की वकालत की। फिर चारों वर्णों को अलग-अलग रखने के लिए जाति व्यवस्था बनी। बाबा साहब भी अपनी कौम के लिए उसी तरह की सोच रखते थे जैसे कि उस वक्त की कांग्रेस। सन 1880 से 1900 के दौर में कांग्रेस और उस जैसे अन्य संगठन अपने समुदाय के लिए अधिकारों की मांग करते थे। जैसे कि सती प्रथा और बाल विवाह का अंत करवाना। इसके बाद मराठा रेजिमेंट, जाट रेजिमेंट और महार रेजिमेंट बनाने की मांगें भी उठने लगी। इन मांगों और ब्रितानिया हुकूमत की दिगर नीतियों के खिलाफ लोग संगठित होकर आंदोलन करने लगे। बाद में ये मांगें सामूहिक आंदोलन के रूप में तब्दील हो गईं जो सन 1929 में पूर्ण स्वराज और फिर वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन तक जा पहुंचीं। बाबा साहब लगातार इस दलितों को उनके हक दिलाने के लिए कोशिशें करते रहें। तब वो वक्त था जब दलितों को ना तो पढ़ने-लिखने का हक था, ना जमीन-जायदाद खरीदने या हिस्सेदारी करने का। दलितों का शोषण और जातीय तिरस्कारों को लेकर बाबा साहब लगातार अपनी किताबों, लेखों में लिखते रहे। बाबा साहब का मानना था कि जब तक जातिगत व्यवस्था खत्म नहीं होती तब तक दलितों को वो सम्मान नहीं मिल पाएगा जिसके वो हकदार हैं। बाबा साहब मानते थे कि दलितों की सत्ता में हिस्सेदारी होनी चाहिए इससे ही उनके खिलाफ अत्याचार और शोषण को रोका जा सकता है। यही वजह है कि बाबा साहब दलितों के हक के लिए उनकी मांगों को लेकर लगातार आवाज उठाते रहे। जो लोग बाबा साहब के आलोचक थे उनका तर्क था कि आजादी मिलने के बाद दलितों के साथ जातीय भेदभाव खत्म हो जाएगा, उन्हें उनके अधिकार भी मिलने लगेंगे। जबकि, बाबा साहब का कहना था कि जातीय भेदभाव या छुआछूत ब्रितानियों की देन नहीं है जो उनके जाने के बाद या आजादी मिलने के बाद खत्म हो जाएगी। इसी वजह से डाॅ आंबेडकर ने शोषितों और वंचितों को अधिकार दिलाने की मुहिम जारी रखी। इसी मुहिम का नतीजा रहा कि साइमन कमिशन वंचित तबके को प्रतिनिधित्व देने को राजी हुआ। दूसरी तरफ कांग्रेस ने साइमन कमिशन के खिलाफ आंदोलन चला रखा था। अंग्रेज हुकूमत ने अगस्त 1932 में दलितों को पृथक निर्वाचन का अधिकार दिया। इसमें दलितों को दो वोट देने का अधिकार था। एक वोट से वे अपने समुदाय का प्रतिनिधि चुन सकते थे और दूसरे से किसी सामान्य वर्ग का। महात्मा गांधी ने पृथक निर्वाचन का विरोध किया। उनका मानना था कि इससे दलितों और सवर्णों के बीच की दूरियां और ज्यादा बढ़ जाएगी। उन्होंने इसके खिलाफ आमरण अनशन शुरू कर दिया। महात्मा गांधी की तबीयत बिगड़ने के साथ डाॅ आंबेडकर के पुतले जलाए जाने लगे। आखिरकार डाॅ आंबेडकर को झुकना पड़ा और 24 सितंबर 1932 को महात्मा गांधी और बाबा साहब आंबेडकर के बीच पूना पैक्ट हुआ। इससे दलितों के पृथक निर्वाचन और दो वोट का अधिकार खत्म हो गया। हालांकि दलितों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या राज्यों के विधानमंडलों में 71 से बढ़ाकर 147 और केंद्रीय विधानमंडल में कुल सीटों का 18 फीसदी कर दी गई। डाॅ आंबेडकर, वायसराय की एग्जिक्यूटिव काउंसिल के सदस्य थे। सदस्य का दर्जा आज के कैबिनेट मंत्री के बराबर होता था। उन्हें श्रम विभाग की जिम्मेदारी दी गई थी। डाॅ आंबेडकर ने वायसराय काउंसिल के सदस्य के रूप में कई अहम काम किए। उन्होंने भारतीय ट्रेड यूनियन (संशोधन) विधेयक पारित कराया, जिसने हर कंपनी में एक ट्रेड यूनियन को अनिवार्य बना दिया। ब्रिटिश शासन में वेतन भुगतान (संशोधन) विधेयक और कई कारखाने (संशोधन) विधेयक भी उन्हें पास करवा दिए। उन्होंने ब्रिटिश सेना में बड़ी संख्या में दलितों की भर्ती करवाई और विशेष रूप से महार बटालियन को बहाल करवाया। बाबा साहब अपने रसूख का इस्तेमाल अपने समाज की भलाई के लिए करना चाहते थे। उनका मानना था कि वे देश की आजादी से पहले ब्रिटिश सरकार में ही दलितों के लिए कुछ कर देंगे जिससे जातिवाद की खाई और लोगों की सोच बदल जाए। उनका कहना था कि पहले दलितों को उनका अधिकार मिलना चाहिए तभी उनके लिए आजादी के कोई मायने होंगे। बाबा साहब का मानना था कि आजादी के बाद भी दलितों के साथ भेदभाव जारी रहेगा। इसलिए वह कानूनी प्रावधानों के जरिए दलितों को ज्यादा से ज्यादा अधिकार दिलाना चाहते थे। डाॅ आंबेडकर को लगता था कि दलितों को उनका हक दिलाना आजादी से ज्यादा जरूरी है। ———— स्वराज में हमें भी हिस्सा चाहिए ————-15 फरवरी 1946 को सतारा में भाषण देते हुए बाबा साहब ने कहा था कि स्वराज के लिए मेरा बिलकुल विरोध नहीं है, हां स्वराज में हमें भी हिस्सेदारी मिलनी चाहिए। उन्होंने महात्मा गांधी से अपने संबंधों पर खुलकर कहा कि भारत के अखबारों में बार-बार मेरे और गांधी के बीच झगड़े को उछाला जा रहा है। गांधी का तिलक के साथ झगड़ा था, गांधी का गोखले का साथ भी झगड़ा था, गांधी का सर चिमणलाल सीटलवाड़ के साथ भी झगड़ा था। अब बाकी झगड़े खत्म हो गए लेकिन मेरा और गांधी का झगड़ा अब भी जारी है। बाबा साहब ने कहा था, मै एक दरिद्र परिवार में जन्मा हूं। बड़ी मेहनत और लगन के साथ मैने पढ़ाई की। आगे बड़ोदा सरकार की मदद से विलायत जाकर उपाधियां प्राप्त कीं। फिर नौकरी की। दो साल बाद नौकरी छोड़कर फिर विलायत गया और बैरिस्टर तथा डीएससी की उपाधियां हासिल कीं। तब से समाज कार्य और व्यवसाय दोनों मै बड़ी ईमानदारी से करता आया हूं। बैरिस्टर की पढ़ाई जब मैने शुरू की थी तब हाईकोर्ट के सभी वकील ब्राम्हण और सभी साॅलीसिटर्स गुजराती थे। उसी वक्त गांधी के पास जाकर मै अपने लिए कुछ मांग सकता था। सम्मान, केसेस और रूपया-पैसा भी पा सकता था। औरों की तरह ही मेरा निजी विवाद होता तो वह मिटा कर मैं गांधी की शरण में जा सकता था लेकिन गांधी और मेरे बीच का विवाद अभी तक मिटा नहीं है। इसकी वजह यह है कि मै गांधी से अपने लिए कुछ भी मांगना नहीं चाहता। मै अपनी बुद्धि अपने पुरूषार्थ तथा अपने बल के सहारे जीवन बीता रहा हूं। गांधी से मै जो मांग रहा हूं वह आप लोगों की तरफ से और न्याय है वही मांग रहा हूं। गांधी के साथ मेरा यह झगड़ा अपने पूरे समाज की ओर से है और समाज के उज्जवल भविष्य के लिए है। बाबा साहब ने कहा था कि आजकल तो सब लोग स्वराज की मांग कर रहे हैं लेकिन सोचिए कि स्वराज किसका ? स्पृश्यों से हमारा सवाल है कि आपका राज हम पर ही क्यों है ? क्या हमें भी स्वराज और न्याय तथा अधिकार नहीं मिलनें चाहिए ? हिंदुओं का स्वराज कहें तो शुद्र पेशवाई, पेशवाई भी स्वराज ही था ना ? उसमें हम पर अनगिनत जुल्म ढाए गए। अछूत व्यक्ति का थूक रास्ते पर ना गिरे इसलिए उसके गले में मिट्टी का मटका बांधा गया और उसके चलने पर मिट्टी पर होने वाले उसके पैरों के निशान से छुआछूत ना फैले इसके लिए उसकी कमर में पीछे झाड़ू लटकाई गई। पहचान के लिए एसके गले में काला धागा बांधा गया। दोबारा ऐसी स्थितियां पैदा न हों इसलिए मै संघर्ष कर रहा हूं। स्वराज से मेरा बिल्कुल विरोध नहीं है लेकिन उस स्वराज में हमें भी हिस्सा चाहिए। अधिकार की जगहों, मौके की जगहों पर हमारे लोगों का भी हक होना चाहिए। पाकिस्तान के पक्ष में नहीं थे बाबा साहब ———–डाॅ आम्बेडकर ने भारत की आजादी की लड़ाई में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया था। वो भारत के बटवारे के पक्ष में भी नहीं थे। पाकिस्तान की मांग कर रहे मुस्लिम लीग के लाहौर रिजोल्यूशन (1940) के बाद, बाबा साहब ने थॉट्स ऑन पाकिस्तान नामक चार सौ पेजों की एक किताब लिखी। इस किताब में डाॅ आंबेडकर ने पाकिस्तान की अवधारणा का विश्लेषण करते हुए सभी पहलुओं का जिक्र किया। इसमें उन्होंने मुस्लिम लीग की मुसलमानों के लिए एक अलग देश पाकिस्तान की मांग की आलोचना की। बहरहाल, एक तरह से देखा जाए तो दलित राजनीति की शुरूआत पूना पैक्ट से हो गई थी। इसके बाद इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी, शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन, भारतीय रिपब्लिकन पार्टी और बहुजन समाज पार्टी आदि तक के जरिए दलितों की राजनीति परवान चढ़ते रही। दलित वर्ग का अच्छा खासा वोट बैंक होने के बावजूद सत्ता में उनकी वो हिस्सेदारी नहीं हो पाई जिसका ख्वाब बाबा साहब ने देखा था। इसकी वजह ये भी रही महाराष्ट्र को छोड़ देश के बाकी हिस्सांे या खासकर हिन्दीभाषी क्षेत्रों में बाबा साहब के विचारों, उनके उसूलों, उनके नजरिए का पर्याप्त प्रचार प्रसार नहीं हो पाया। सरकारों ने भी दलित वर्ग को कुछेक योजनाओं तक ही सीमित करके छोड़ दिया। यही वजह रही कि दलित वर्ग इन योजनाओं का लाभ पाकर ही खुद कृतार्थ मान लेता है। डॉ. आंबेडकर भी दलितों को कमजोर वर्ग के रूप मानते थे। बाबा साहब और कम्युनिस्टों के बीच भी मतभेद इसी बात को लेकर थे। कम्युनिस्ट समाजवाद की अवधारणा को लेकर आगे बढ़ रहे थे लेकिन बाबा साहब का मानना था कि कमजोर वर्ग को दबाकर समाजवाद नहीं या जा सकता। बाबा साहब का मानना था कि अंग्रेजों के चले जाने के बाद भी भारत में जमींदार, मिल मालिक, साहूकार और ब्राह्मणवाद रहेगा, जो गरीब जनता का खून चूसता रहेगा। आज भी दलित बाहुल्य बस्तियों के हालात ज्यादा नहीं बदलें हैं। आजादी के इतने बरसों बाद भी यही सवाल है कि क्या दलितों को उनको हक मिल रहा है ? क्या वे खुद को उतना ही अधिकारसम्पन्न मान रहे हैं जितना कि दिगर समाज ? क्या उनका शोषण-उत्पीड़न, अत्याचार आजादी के पहले से कम हुआ है ? क्या वे खुद को सुरक्षित महसूस कर रहे हैं ? बहरहाल, बाबा साहब ने कितना सही कहा था कि स्वतंत्रता अगर किसी का लक्ष्य है, तो सिर्फ दलित वर्ग का है। Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन मंत्रियों को प्रभार के 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