(आलेख : राजेंद्र शर्मा)


वास्तव में मेघालय में पिछले चुनाव के बाद भाजपा ने,चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर आयी कांग्रेस को सबसे बढ़ कर केंद्र की सत्ता के बल पर, सरकार से दूर रखने के बाद, उसे ही नहीं अपने साथ सत्ताधारी गठजोड़ में शामिल अन्य पार्टियों को भी अस्थिर करने का खेल, जमकर खेला था। इसी प्रकार, नगालेंड में पिछले चुनाव के बाद सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आयी एनडीपीपी के साथ गठजोड़ करने के बाद, उसके अधिकांश विधायकों का उसने सत्ताधारी एनडीपीपी में विलय कराया और उसके बाद एनडीपीपी के साथ गठजोड़ किया, जिस गठजोड़ को हाल के चुनाव में बहुमत मिल गया है। केंद्र में सत्ता के सहारे इतनी जोड़-तोड़ के बाद भी, दोनों राज्यों में भाजपा की सीटें जस की तस ही बनी रही हैं। इसके बावजूद, 2 मार्च के चुनाव नतीजे के आधार पर नरेंद्र मोदी के यह दावा करने को कि अब तक बनी रही आम धारणा के विपरीत, अल्पसंख्यक भाजपा के साथ आ चुके हैं, शुद्ध हवाबाजी की कहा जा सकता है। हैरानी की बात नहीं है कि पहले गोवा में तथा अब उत्तर-पूर्व में, अल्पसंख्यकों के समर्थन के ऐसे ही ‘संकेतों’ के बल पर, प्रधानमंत्री मोदी ने आगे केरल में भी सरकार बनाने का जो दावा किया था, उसे केरल की एलडीएफ सरकार के मुख्यमंत्री, पिनरायी विजयन ने उनका ‘‘दिन में सपने देखना’’ करार देकर, हाथ के हाथ खारिज भी कर दिया।

बहरहाल, त्रिपुरा के चुनाव नतीजों पर लौटें, जहां चुनावोत्तर हिंसा से हमने अपनी यह टिप्पणी शुरू की थी। वास्तव में तीनों राज्यों में एक त्रिपुरा ही है, जहां भाजपा अपनी सरकार बचाने में कामयाबी का दावा कर सकती है। लेकिन, यह कामयाबी भी कम से कम भाजपा या उसकी सरकार की लोकप्रियता बढऩे या उसके लिए जनसमर्थन बढऩे का, दूर-दूर तक कोई इशारा नहीं करती है। उल्टे 2018 के चुनाव के मुकाबले भाजपा के नेतृत्ववाले गठजोड़ की सीटों में पूरे 11 की गिरावट हुई है और उसका आंकड़ा 33 पर आ गया है, जो पिछले कम से कम चार दशकों में पहली बार, सत्तापक्ष का बहुमत इतना कम रह जाने को दिखाता है। इसी प्रकार, सत्ताधारी गठजोड़ के मत फीसद में भी लगभग 11 फीसद की गिरावट आयी है। इसी का नतीजा है कि भाजपा ने त्रिपुरा में अपनी सरकार तो जैसे-जैसे कर के बचा ली है, पर इस सचाई को वह चाहकर भी छुपा नहीं सकती है कि 16 फरवरी को हुए मतदान में, राज्य के मतदाताओं में से 60 फीसद ने, उसकी सरकार के खिलाफ ही वोट दिया था। यानी विपक्ष के वोटों के विभाजन की कृपा से ही, भाजपा त्रिपुरा में मामूली अंतर से अपनी सरकार बचा पायी है वर्ना राज्य की जनता के स्पष्ट बहुमत का जनादेश तो उसकी सरकार के खिलाफ ही था।

स्वाभाविक रूप से राज्य में विपक्ष की सबसे बड़ी ताकत होने के नाते, सीपीआइ (एम) के नेतृत्व में वाम मोर्चे ने, भाजपा गठजोड़-विरोधी मतों के विभाजन को टालने की अपनी ओर से पूरी कोशिश की थी। इसी क्रम में उसने कभी इस राज्य में अपनी मुख्य विरोधी रही, कांग्रेस पार्टी के साथ ही नहीं, पिछले चुनाव के बाद की अवधि में त्रिपुरा के आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिए विशेष प्रयत्न करने का दावा करने वाली, नवोदित त्रिपुरा मोथा पार्टी के साथ भी तालमेल का प्रयास किया था, जिसे इससे पहले त्रिपुरा आदिवासी स्वायत्त जिला परिषद के चुनाव में तथा उसके बाद हुए विधानसभाई उपचुनाव में भी, आदिवासियों का काफी समर्थन मिला था। लेकिन, विपक्षी वोट को एकजुट करने में उसे पूरी सफलता नहीं मिली और वाम मोर्चा तथा कांग्रेस के एकजुट मंच के अलावा, त्रिपुरा मोथा ने करीब 41 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार कर मुकाबले को बहुत हद तक तिकोना कर दिया। इसके अलावा तृणमूल कांग्रेस ने विधानसभा की करीब सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े कर दिए, हालांकि आमतौर पर मतदाताओं ने उसके उम्मीदवारों को खारिज कर दिया।

इस त्रिकोणीय मुकाबले में ही, 40 फीसद के करीब वोट के बल पर, भाजपा का गठजोड़, बहुमत का आंकड़ा पार करने में कामयाब हो गया। इस तिकोने मुकाबले की भी, एक अतिरिक्त विशेषता ने, भाजपा की खासतौर पर मदद की। 20 सुरक्षित आदिवासी सीटों पर, त्रिपुरा मोथा की स्थिति मुख्य दावेदारों में रही और उसने इनमें से 13 सीटों पर जीत भी दर्ज करायी। लेकिन, इसके अलावा 21 और गैर-आदिवासी बहुल सीटों पर उसके उम्मीदवार, मुख्य मुकाबले के लिहाज से ज्यादातर अगंभीर उम्मीदवार ही साबित हुए और उनमें से अनेक ने विपक्ष के वोटों में थोड़ा-बहुत जो भी विभाजन किया, उसने भाजपा की राह हमवार करने का ही काम किया।

एक अध्ययन के अनुसार धानपुर, बिशालगढ़, चंडीपुर, पबियाचारा में वाम मोर्चा-कांग्रेस के उम्मीदवार, त्रिपुरा मोथा के उम्मीदवारों द्वारा लिए गए वोट से भी कम अंतर से, भाजपा के उम्मीदवार से हार गए, जबकि मोहनपुर, तेलियामुरा,पेंचरथाल तथा पानीसागर आदि में भी विपक्ष का वोट भाजपा से ठीक-ठाक ज्यादा होने के बावजूद, उनके वोट के बंटने से भाजपा के उम्मीदवार जीत गए। इसी प्रकार, अगरतला में रामनगर से वाम मोर्चा-कांग्रेस समर्थित, निर्दलीय मानवाधिकार कार्यकर्ता, पुरुषोत्तम रायबर्मन, भाजपा उम्मीदवार से कुल 897 वोट से हार गए, जबकि यहां टीएमसी उम्मीदवार 2,079 वोट ले गया! यानी त्रिपुरा तक में भाजपा का कम से कम बड़े जनसमर्थन कोई दावा नहीं बनता है, फिर नगालेंड तथा मेघालय की तो बात ही क्या है?

लेकिन, चुनाव के इस चक्र में भाजपा की जीत के इस खोखलेपन का त्रिपुरा में उठे चुनावोत्तर हमलों के ज्वार से क्या संबंध है? दोनों में संबंध वास्तव में काफी सीधा और सरल है। अर्ध-सत्य व असत्य पर टिके अतिशय प्रचार के सहारे, भाजपा की जीत के खोखलेपन को छुपाते हुए, नरेंद्र मोदी की अजेयता का जो नैरेटिव प्रचारित किया जा रहा है, उसकी असलियत से जाहिर है कि खुद संघ-भाजपा पूरी तरह से बेखबर तो नहीं ही हो सकते हैं। इसीलिए, जहां उनका मुकाबला वामपंथ जैसी कडिय़ल, वास्तविक हितों के आधार पर जनता को गोलबंद करने में समर्थ ताकतों से है, फासीवादी हथकंडों के सहारे वे सीधे-सीधे विरोधी ताकतों को पंगु बनाने की ही कोशिश करते हैं। त्रिपुरा में आज वही हो रहा है।

वास्तव में त्रिपुरा में वामपंथविरोधी हिंसा का सिलसिला तो 2018 के चुनाव में जीत के बाद ही शुरू हो गया था। भाजपा के राज के पांच साल में राज्य में एक भी चुनाव स्वतंत्र व निष्पक्ष तरीके से नहीं होने दिया गया था। इसी के चलते, आम लोगों के बीच इसकी भारी आशंकाएं थीं कि क्या इस बार उन्हें मर्जी से अपना वोट डालने। दिया जाएगा? इन्हीं आशंकाओं के दबाव में, चुनाव आयोग के कुछ कदमों से किसी हद तक लोगों का विश्वास जमा और धीरे-धीरे लोग वोट करने के लिए बाहर भी निकले। इसी ने भाजपा गठजोड़ को सब कुछ के बावजूद, हार के करीब पहुंचा दिया था। अब सत्ता में वापसी के साथ ही भाजपायी सरकार एक बार फिर, विपक्ष के इस बढ़ते खतरे को हिंसक हथकंडों से कुचलने की कोशिशों में जुट गयी है। मगर यह तो उसकी जीत का नहीं, बल्कि हार के उसके डर का ही इशारा है।

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