(आलेख : सुबिनॉय मौलिक, अनुवाद : संजय पराते)खेती-किसानी में बढ़ते संकट को ज़ोरदार तरीके से उजागर करते हुए, पश्चिम बंगाल के सभी ज़िलों से हज़ारों किसानों ने सोमवार 28 सितंबर को कोलकाता के रानी राशमोनी रोड पर एक दिन का धरना दिया। संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) के राज्यव्यापी आंदोलन के आह्वान के बाद यह आयोजन किया गया था। दोपहर के समय सेंट्रल कोलकाता के बीचों-बीच भारी हलचल देखी गई, क्योंकि हावड़ा और सियालदह रेलवे स्टेशनों से निकले दो बड़े जुलूस एवेन्यू में आ गए थे, जिससे विरोध स्थल खचाखच भर गया था। एकजुट समावेश को संबोधित करते हुए, एसकेएम के नेतृृत्व ने प्रशासन को कड़ी चेतावनी दी कि व्यवस्था की मार से देश के अन्नदाता अब चुपचाप भुखमरी नहीं सहेंगे और लगातार अनदेखी के विरोध में और सरकार की ताकत को झुकाने के लिए सड़कों को पूरी तरह से जाम करने पर मजबूर हो जाएंगे। सांस्थानिक हमलासंवैधानिक मशीनरी पर सीधा निशाना साधते हुए, एसकेएम पश्चिम बंगाल के संयुक्त संयोजक अमल हालदार ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को तुरंत गिरफ्तार करने की मांग की। उन्होंने कहा कि देश ने उन्हें भाजपा के एक छद्मवेशी कार्यकर्ता के रूप में पहचान लिया है, जिसे नरेंद्र मोदी ने देश की लोकतांत्रिक नींव को खत्म करने के लिए चुनाव आयोग के मुखिया के रूप में भेजा है। हालदार ने कहा कि लाखों असली नागरिकों को मतदाता सूची से मनमाने ढंग से बाहर करना, सत्ताधारी सरकार द्वारा किए जा रहे चौतरफ़ा हमलों का हिस्सा है, जो न केवल लोगों की रोजी-रोटी और बुनियादी आजीविका को, बल्कि पूरे देश में उनके रोजमर्रा के बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकारों को भी निशाना बना रहा है।‘डबल इंजन’ का पर्दाफाशगहरे कृषि संकट को स्पष्ट करते हुए, एसकेएम के संयुक्त संयोजक कार्तिक पाल ने टिप्पणी की कि कथित “डबल इंजन सरकार” कामकाजी आबादी के लिए एक क्रूर धोखा साबित हुई है। पाल ने कहा कि लाभदायक मूल्य हासिल करना तो दूर की बात है, किसान आलू, धान और जूट जैसे प्रमुख खाद्य पदार्थों के लिए उत्पादन की मूल लागत भी वसूलने में असमर्थ हैं, जबकि सब्जी उत्पादक किसान बिना किसी न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था के पूरी तरह से वंचना के शिकार हो रहे हैं। पहले के ऐतिहासिक समावेशों की याद दिलाते हुए, पाल ने कहा कि जिस तरह दिल्ली के चारों ओर दृढ़ घेराबंदी ने मोदी शासन को पीछे हटने के लिए मजबूर किया था और जीवंत युवा प्रतिरोध ने उसे झुकने के लिए मजबूर किया है, उसी तरह बंगाल में किसानों को अपनी वैध मांगों को हासिल करने के लिए एक जुझारू, एकजुट आंदोलन में शामिल होना चाहिए।किसान नेताओं ने कृषि की इनपुट लागत को जान बूझकर महंगा करने की कड़ी आलोचना की। अखिल भारतीय किसान सभा (एआईकेएस) के नेता सैयद हुसैन ने बताया कि कैसे महंगे विदेशी आयात के लिए घरेलू उर्वरक उत्पादन को कृत्रिम तरीके से कम करके एक खतरनाक काला बाजार को बढ़ावा दिया गया है, जिससे किसानों के लिए खेती की लागत बहुत ज़्यादा बढ़ गई है। एआईकेएस के राज्य सचिव परेश पाल ने कृषि व्यापार का निजीकरण करने का तीखा आरोप लगाया और पूछा कि जब भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई ) के गोदाम बिना किसी रोक-टोक के निजी कार्टेल को सौंप दिए गए हैं, तो कृषि बाज़ार को असल में कौन नियंत्रित कर रहा है? पाल ने कहा कि राज्य की किसान मंडियां, जो तृणमूल के नीले और सफेद निशान से रंगी हुई हैं, भाजपा के मवेशियों के लिए खुली चरागाह बन गई हैं, जहाँ असली किसानों को अपना धान बेचने के लिए लगातार कागजी परेशानी झेलनी पड़ती है, और आखिर में उन्हें बिचौलियों के चंगुल में जाने के लिए मजबूर होना पड़ता है। बैलेंस शीट को बढ़ाने के लिए इन्ही बिचौलियों से सरकार चुपचाप धान खरीदती है — इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। इससे कर्ज़ में डूबे किसानों को बहुत ज़्यादा नुकसान उठाना पड़ता है।प्रतीकात्मक बिक्रीएक शानदार, प्रतीकात्मक हस्तक्षेप ने किसानों की इस आर्थिक तबाही को दिखाया, जब हुगली और हावड़ा के आलू उत्पादकों ने सीधे सड़कों पर कामचलाऊ स्टॉल खोले, और बहुत कम कीमत पर ताज़ी उपज बेची — ज्योति आलू 8 रूपये प्रति किलोग्राम और चंद्रमुखी आलू 10 रूपये प्रति किलोग्राम की दर से। यह बताते हुए कि खेत से निकासी मूल्य में गिरावट के कारण हाल के महीनों में पूरे राज्य में बारह हताश किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हुए हैं, वक्ताओं ने बढ़ते खर्चों और बाज़ार में अलाभकारी आय के बीच की गहरी खाई के बारे में बताया। किसान आंदोलन के संगठनकर्ताओं मेघनाद भुइया, जयतु देशमुख, गोपाल बिस्वास, फ़रीद मोल्ला, मिहिर पॉल और कल्पतरु दत्ता की अध्यक्षता में हुई इस रैली में लोक कलाकारों और भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) के प्रतिरोध गीत गूंज रहे थे। सांप्रदायिक राजनीति का कड़ा जवाब देते हुए, एसकेएम के प्रतिनिधियों ने ऐलान किया कि भाजपा द्वारा सांप्रदायिक दरारें पैदा करने की कोशिश बंगाल में कामयाब नहीं होंगी। यहां खेती-बाड़ी की मिली जुली संस्कृति है, जिसके ताने बाने में पवित्र तुलसी की वेदी पर शाम को दीये जलाए जाते हैं और उसी गाँव के आँगन में नमाज़ अदा की जाती हैं। उन्होंने अपना यह संकल्प दोहराया कि किसान अपनी सामूहिक इच्छा शक्ति के साथ एक अविभाज्य मोर्चे के रूप में अपने अस्तित्व और लोकतांत्रिक सम्मान की लड़ाई लड़ेगा।(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650) Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन संघ मेहरबान तो चढ़ावा चोर से वोट चोर तक सबको अभयदान चुनावी तानाशाही से खालिस तानाशाही की ओर!