(संजय एम तराणेकर) भारत को समझने के लिए केवल उसके शहरों, बाजारों और आधुनिकता को देखना पर्याप्त नहीं है। भारत को समझना हो तो उसकी जड़ों तक पहुँचना होगा-उसकी आस्था, लोक-स्मृति, संस्कृति और उन कथाओं तक, जिन्होंने सदियों से उसके सामूहिक मन को आकार दिया है। इसी संदर्भ में ‘हनुमान अंश’ जैसी फिल्म का महत्व केवल उसके बॉक्स ऑफिस प्रदर्शन तक सीमित नहीं रह जाता।यह फिल्म इसलिए भी उल्लेखनीय है कि उसने दर्शकों को केवल मनोरंजन नहीं दिया, बल्कि उन्हें उनकी अपनी सांस्कृतिक स्मृति से जोड़ने का भरसक प्रयास किया हैं। हनुमान भारतीय मानस में केवल एक धार्मिक पात्र नहीं हैं; वे शक्ति, समर्पण, साहस, सेवा, निष्ठा और आत्मविश्वास के प्रतीक हैं। इसलिए जब उनकी कथा आधुनिक माध्यम “सिनेमा के रुपहले पर्दे” के जरिए सामने आती है, तो वह नई पीढ़ी और पुरानी सांस्कृतिक चेतना के बीच एक सेतु का काम करती है।फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यही है कि उसका प्रचार केवल पोस्टर, विज्ञापन या बड़े प्रचार-अभियानों से नहीं हुआ। दर्शकों ने स्वयं उसके प्रचार का माध्यम बनना शुरू कर दिया। जिसने भी यह फिल्म देखी, उसने उसके बारे में परिवार, मित्रों और परिचितों से बात की। यही मौखिक प्रचार धीरे-धीरे व्यापक जनरुचि में बदलता गया। यह घटना बताती है कि जब कोई रचना समाज के भावनात्मक संसार को छू लेती है, तो उसके लिए प्रचार का सबसे प्रभावशाली माध्यम स्वयं दर्शक बन जाते हैं।फिल्म की बढ़ती कमाई के आँकड़े निश्चित रूप से आकर्षित करते हैं। साथी नई निर्माता निर्देशको को इस तरह से जमीन से जुड़ी फिल्मों के लिए परेड भी करने का काम करते हैं। बड़े बजट की फिल्मों के सामने टिक पाना भी अपने आप में एक चमत्कार ही है। सोचिए जिस फिल्म को स्क्रीन मिलना दुभर हो रहा था उसे फिल्म की माऊथ पब्लिसिटी ने इसे आज कहाँ से कहाँ तक पहुँचा दिया है। शुरुआती सीमित प्रदर्शन और सामान्य गति से आगे बढ़कर उसका व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुँचना इस बात का संकेत है कि भारतीय दर्शक केवल बड़े बजट, बड़े सितारों और आक्रामक प्रचार से प्रभावित नहीं होता। कहानी में आत्मीयता हो, विषय में भारतीयता हो और प्रस्तुति मन को छूने वाली हो, तो दर्शक उसे स्वयं स्वीकार करने को तैयार बैठा है।यहीं ‘हनुमान अंश’ एक फिल्म से आगे बढ़कर एक सांस्कृतिक संकेत बन जाती है। आज के दौर में सिनेमा मनोरंजन के साथ-साथ समाज की स्मृतियों को सुरक्षित रखने का भी एक प्रभावी माध्यम है। हमारी लोककथाएँ, पौराणिक प्रसंग और सांस्कृतिक प्रतीक यदि आधुनिक भाषा और तकनीक में नई पीढ़ी के सामने आएँ, तो वे केवल अतीत की वस्तु नहीं रहेंगे, बल्कि वर्तमान के अनुभव का हिस्सा बन सकते हैं। इस दृष्टि से धार्मिक या सांस्कृतिक विषयों पर बनने वाला सिनेमा तभी सार्थक है, जब वह आस्था को केवल बाजार न बनाए, बल्कि उसके भीतर छिपे मानवीय मूल्यों को भी सामने लाए।‘हनुमान अंश’ की चर्चा इसी कारण महत्वपूर्ण है। इसके माध्यम से एक बड़ा प्रश्न भी सामने आता है-दर्शक किसी फिल्म से वास्तव में क्या चाहता है? क्या केवल मनोरंजन? क्या केवल भव्य दृश्य? क्या केवल कमाई के रिकॉर्ड? शायद नहीं। वर्तमान में दर्शक ऐसी कहानी भी चाहता है जिसमें उसे अपना अतीत दिखाई दे, अपनी संवेदना सुनाई दे और अपनी पहचान का कोई अंश ह्रदय तक महसूस हो। जब सिनेमा यह अनुभव पैदा करता है, तब पर्दे और दर्शक के बीच की दूरी समाप्त होने लगती है।आज जब भारतीय सिनेमा वैश्विक मंच पर अपनी पहचान मजबूत कर रहा है, तब यह आवश्यक है कि वह अपनी जड़ों से भी उतना ही संवाद करें। आधुनिक तकनीक और भारतीय संस्कृति का मेल एक ऐसी सिनेमाई भाषा तैयार कर सकता है, जो मनोरंजन के साथ-साथ हमारी सांस्कृतिक चेतना को भी समृद्ध करें।अंततः ‘हनुमान अंश’ की सफलता का मूल्यांकन केवल करोड़ों की कमाई से करना उसके प्रभाव को छोटा कर देना होगा। लेकिन इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि दो करोड रुपए में बनी फिल्म 100 करोड़ के आसपास दस्तक दे रही है तो बॉलीवुड फिल्म इंडस्ट्री के लिए चमत्कार ही है। (याद रहें कि इससे पहले सत्तर के दशक में “जय संतोषी माँ” फिल्म का उदाहरण भी हमारे सामने है जो पाँच लाख में बनी थी और उसने पचास लाख का कारोबार किया था। इस फ़िल्म ने भी जनमानस के दिलों पर अमिट छाप छोड़ी थी।) उसकी असली सफलता इस बात में है कि उसने दर्शक को कहानी देखने के बाद अपनी जड़ों की ओर देखने के लिए प्रेरित किया।क्योंकि जिस सिनेमा को देखने के बाद दर्शक केवल टिकट की कीमत नहीं, अपनी संस्कृति का मूल्य समझने लगे, वहीं सिनेमा वास्तव में समाज से संवाद करता है।संजय एम तराणेकर(कवि, लेखक व समीक्षक)इन्दौर-452011 (मध्य प्रदेश)मो. 98260 25986 Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन 1965 युद्ध के शहीद के सम्मान में आयोजित रक्तदान शिविर में एक महिला सहित 86 युवाओं ने किया रक्तदान कान्ह नदी किनारे 100 करोड़ की शासकीय भूमि अतिक्रमण मुक्त, 50 से अधिक दुकानें हटाईं