– 10 साल में कम हुए हजारों सरकारी स्कूल– प्राइवेट स्कूलों की संख्या बढ़ी— मुस्ताअली बोहरा,अधिवक्ता एवं लेखकभोपाल (मध्यप्रदेश) करोड़ों रूपये खर्च करने के बाद भी सरकारी स्कूलों की बदतर हालत किसी से छिपी हुई नहीं है। गुणवत्तापूर्ण और सुलभ शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए कई मर्तबा आवाज उठते रही है लेकिन नतीजा सिफर ही रहा। अब, पहले शिक्षाविद सोनम वागंचुक और फिर कॉकरोच जनता पार्टी की देशव्यापी मुहिम ने एक बार फिर सरकारी स्कूली शिक्षा व्यवस्था पर देश भर का ध्यान केन्द्रित किया है। शायद यही वजह है कि यूडाइस की वार्षिक रिपोर्ट पर भी मीडिया में बड़ी खबर बनी। राज्यसभा से लेकर लोकसभा तक सरकार ने सरकारी स्कूलों का विस्तार से ब्यौरा दिया। रिपोर्ट या आंकड़े चाहे जो बताए जाए लेकिन ज़मीनी हकीकत यही है कि आज भी अधिकांश सरकारी स्कूलों मंे बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। कहीं जरूरत के हिसाब से शिक्षक नहीं हैं तो कहीं शिक्षक ज्यादा हैं और बच्चे कम। संविलियनिकरण के नाम पर छोटे स्कूलों का एकीकरण कर दिया गया है जिससे उस क्षेत्र के बच्चों को एक से तीन-चार किलोमीटर तक पैदल आना जाना पड़ रहा है। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने जुलाई 2026 को भारत में स्कूली शिक्षा पर एकीकृत जिला शिक्षा सूचना प्रणाली प्लस (यूडाइस प्लस) 2025-26 रिपोर्ट जारी की। यह रिपोर्ट देशभर में शिक्षकों की संख्या, नामांकन, प्रतिधारण, डिजिटल अवसंरचना और विद्यालयी सुविधाओं में सुधार को दर्शाती है। यूडाईस, शिक्षा मंत्रालय का आधिकारिक डिजिटल डेटाबेस है, जो देशभर के स्कूलों से जुड़ी जानकारी जैसे छात्रों का नामांकन, शिक्षकों की संख्या, बुनियादी सुविधाएं और अन्य शैक्षणिक आंकड़ों का रिकॉर्ड तैयार करता है। इस रिपोर्ट को स्कूल शिक्षा की स्थिति का सबसे विश्वसनीय सरकारी दस्तावेज माना जाता है। यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2025-26 में देशभर में कुल 14,66,682 स्कूल संचालित हैं। इनमें से 10,05,245 सरकारी स्कूल, 79,261 सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल और 3,41,689 निजी गैर सहायता प्राप्त स्कूल हैं। प्री-प्राइमरी से लेकर हायर सेकेंडरी स्तर तक कुल 24,72,19,766 छात्र नामांकित हैं। देश भर के स्कूलों में शिक्षकों की कुल संख्या बढ़कर 1,02,73,020 हो गई है। यह आंकड़ा 2022-23 की तुलना में 8.3 प्रतिशत अधिक है। वहीं, महिला शिक्षकों की भागीदारी भी लगातार बढ़ी है और अब वे कुल शिक्षकों का 54.9 प्रतिशत हिस्सा हैं। वर्ष 2022-23 में 94,83,294, 2023-24 में 98,07,600, 2024-25 में 1,01,22,420 और सन 2025-26 में बढ़कर 1,02,73,020 शिक्षक हो गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, माध्यमिक स्तर पर छात्रों के स्कूल छोड़ने की दर में भी गिरावट आई है। यह दर पिछले वर्ष के 8.2 प्रतिशत से घटकर 7 प्रतिशत रह गई है। इसी अवधि में सेकेंडरी स्तर का ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो भी 68.5 प्रतिशत से बढ़कर 71.7 प्रतिशत हो गया है। वहीं, सेकेंडरी स्तर पर छात्रों का रिटेंशन रेट भी 47.2 प्रतिशत से बढ़कर 51.9 प्रतिशत दर्ज किया गया है। मंत्रालय ने इसका प्रमुख कारण माध्यमिक स्तर के स्कूलों की संख्या और उनकी उपलब्धता में वृद्धि को बताया है। रिपोर्ट के अनुसार 69.9 प्रतिशत स्कूलों में अब कंप्यूटर उपलब्ध हैं, जबकि 2024-25 में यह आंकड़ा 64.7 प्रतिशत था। 67.4 प्रतिशत स्कूलों में इंटरनेट सुविधा उपलब्ध हो चुकी है। 99.5 प्रतिशत स्कूलों में सुरक्षित पेयजल की व्यवस्था है। 98.5 प्रतिशत स्कूलों में छात्राओं के लिए अलग शौचालय उपलब्ध हैं। 95 फीसदी स्कूलों में बिजली कनेक्शन, 90.5 प्रतिशत स्कूलों में पुस्तकालय, 81.9 फीसदी स्कूलों में खेल का मैदान है। 58.2 प्रतिशत स्कूलों में दिव्यांग विद्यार्थियों की सुविधा के लिए रैंप और हैंडरेल की व्यवस्था की गई है। शिक्षा मंत्रालय ने बताया कि सिर्फ एक शिक्षक वाले स्कूलों की संख्या में 3 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। इसके अलावा, जीरो एनरोलमेंट (जहां कोई छात्र नामांकित नहीं था) वाले स्कूलों की संख्या में लगभग 29 प्रतिशत की कमी आई है। एकल शिक्षक वाले स्कूलों की संख्या 2022-23 में 1,18,190, 2023-24 में 1,10,971, 2024-25 में 1,04,125 और 2025-26 में 1,00,843 रह गई है। इसी तरह शून्य नामांकन (जीरो एनरोलमेंट) वाले स्कूलों की संख्या 2022-23 में 10,294, 2023-24 में 12,954, 2024-25 में 7,993 और 2025-26 में 5,663 रह गई है। देश के 90.2 प्रतिशत विद्यार्थियों ने अपना आधार नंबर स्कूलों को दिया है। आंध्रप्रदेश और लक्षद्वीप 99.6 आधार सीडिंग के साथ देश में सबसे आगे हैं। मेघालय में 35.3 प्रतिशत, नागालैंड में 65.1 प्रतिशत और मणिपुर में 69.2 प्रतिशत आधार सीडिंग हुई है। राष्ट्रीय स्तर पर नामांकिन कुल छात्रों में से 48.4 प्रतिशत छात्राएं हैं। शिक्षा व्यवस्था में सामाजिक श्रेणी के आधार पर देखा जाए तो अन्य पिछड़ा वर्ग 44.9 प्रतिशत, सामान्य वर्ग 27.5 प्रतिशत, अनुसूचित जाति 17.7 फीसदी, अनुसूचित जनजाति 10 प्रतिशत छात्र हैं। कुल नामांकन में अल्पसंख्यक समुदायों की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत से ज्यादा है जिसमें मुस्लिम छात्रों का प्रतिशत 16.2 प्रतिशत है। विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की संख्या 22,11,226 दर्ज की गई है। जहां तक स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की बात है तो ये प्राथमिक स्तर पर 0.3 प्रतिशत, उच्च प्राथमिक स्तर पर 3.6 प्रतिशत और माध्यमिक स्तर पर 9.5 प्रतिशत है। यूनिफाईड डिस्ट्रिक्ट इंफरमेशन सिस्टम फाॅर एजुकेशन प्लस (यूडाईस प्लस) 2025-26 रिपोर्ट के अनुसार, पिछले दो वर्षों में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई है, जबकि निजी स्कूलों में दाखिले लगातार बढ़े हैं। आंकड़े बताते हैं कि 2023-24 से 2025-26 के बीच सरकारी स्कूलों में करीब 86 लाख छात्रों की कमी आई है। वहीं, इसी अवधि में निजी स्कूलों में लगभग 88 लाख नए छात्रों का नामांकन हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक 2025-26 में देशभर के सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या घटकर 11.89 करोड़ रह गई, जबकि 2023-24 में यह 12.75 करोड़ थी यानी दो वर्षों में सरकारी स्कूलों ने लगभग 86 लाख छात्रों को खो दिया। इसके विपरीत निजी स्कूलों में छात्रों की संख्या 9 करोड़ से बढ़कर 9.89 करोड़ हो गई, जो करीब 88 लाख की बढ़ोतरी को दर्शाती है। हालांकि, कुल स्कूली छात्रों की संख्या में ज्यादा बदलाव नहीं हुआ है। वर्ष 2023-24 में देशभर के स्कूलों में कुल 24.80 करोड़ छात्र नामांकित थे जबकि 2025-26 में यह संख्या 24.72 करोड़ रही। …………………………… मध्यप्रदेश की हालत बदतर ………………….. साल 2024-25 में सरकारी स्कूलों की संख्या के आधिकारिक राज्यवार आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में 1,37,172, मध्य प्रदेश में 92,250, पश्चिम बंगाल में 82,154, बिहार में 76,320 और राजस्थान में 70,155 सरकारी स्कूल थे। मध्य प्रदेश में वर्ष 2014-15 में 1,21,849 में से 2023-24 में 92,439 तक की 24.1 फीसदी की गिरावट के साथ उन 9 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सूची में सबसे ऊपर रहा जिन्होंने सरकारी स्कूलों में गिरावट के राष्ट्रीय प्रतिशत को पार कर लिया। इन आंकड़ों और रिपोर्ट से मध्यप्रदेश में शिक्षा के स्तर को आसानी से समझा जा सकता है। मध्यप्रदेश में भले ही सरकारें बदलतीं रहीं हो लेकिन सरकारी शालाओं के हालात नहीं बदले। आज भी कई स्कूलों के भवन जर्जर हैं तो कहीं शिक्षकों की कमी। सूबे में सरकारी स्कूलों की संख्या भी लगातार कम हो रही है। पिछले डेढ़ दशक में 49 हजार से ज्यादा स्कूल बंद हुए हैं। इतना ही नहीं शिक्षकों ने करीब सवा लाख पद खाली हैं। इसी साल की शुरूआत में हुए विधानसभा के बजट सत्र के दौरान स्कूल शिक्षा मंत्री ने बताया था कि 49 हजार 477 स्कूलों को एक शाला-एक परिसर योजना के तहत विलय किया गया है। साथ ही सांदीपनि विद्यालयों के एक से पांच किलोमीटर के दायरे में आने वाले कम छात्र संख्या वाले स्कूलों के मर्ज किए जाने की बात भी कही गई थी। ये बात भी सामने आई थी कि 2 लाख 89 हजार स्वीकृत शिक्षकों के पदों में से 1 लाख 15 हजार पद खाली हैं। इतना ही नहीं करीब 19 सौ से ज्यादा स्कूल तो ऐसे थे जहां केवल एक ही शिक्षक के भरोसे पढ़ाई हो रही थी। 46 हजार स्कूलों में दो ही शिक्षक पदस्थ थे। नए शैक्षणिक सत्र में तीन सौ से ज्यादा प्राथमिक और माध्यमिक शालाओं की बंद कर दिया गया है। प्रदेश के बैतूल, छिंदवाड़ा, रीवा, सागर और पन्ना जिलों में से तो करीब 6 हजार से ज्यादा शालाओं का विलय कर दिया गया है। इसके अलावा विद्यार्थियों की संख्या में घट रही है। 15 हजार स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या 20 से कम है। ये तो रही शिक्षकों की बात, छात्र-छात्राओं की बात की जाए तो स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या भी लाखों में है। यदि पिछले साल की बात की जाए तो पिछले साल मध्यप्रदेश के स्कूलों से करीब 15 लाख बच्चे नदारद रहे। हालांकि इस साल ये संख्या कम हुई और करीब 11 लाख बच्चे ऐसे हैं जिन्होंने स्कूल छोड़ दिया है। ये वो बच्चे हैं जिन्होंने किसी कारण से अपनी पिछली शाला छोड़ दी है लेकिन नए स्कूल में दाखिला नहीं लिया है। प्रदेश के इंदौर, भोपाल, ग्वालियर, सागर, मुरैना जिलों मे ही इस साल 2 लाख से ज्यादा बच्चे स्कूलों से कम हो गए हैं। भले ही शिक्षा व्यवस्था के सुधार में दावे किए जाते रहे हो लेकिन व्यवस्था में राजनीति और रसूख हावी होने के कारण शिक्षा विभाग के हालात नहीं बदल रहे हैं। काबिले गौर है कि नीति आयोग की एक केस स्टडी के अनुसार मध्यप्रदेश में ‘एक परिसर एक शाला’ के तहत 35,113 स्कूलों को 16,076 परिसरों में मर्ज किया गया था। यह प्रक्रिया ऐसे स्कूलों के संविलियनीकरण के लिए की गई थी जो एक ही परिसर या करीब डेढ़ सौ मीटर के दायरे में संचालित हो रहे थे। नीति आयोग की रिपोर्ट में बताया गया है कि मध्य प्रदेश में उस समय बड़ी संख्या में छोटे और एकल-शिक्षक स्कूल थे। सरकार का तर्क था कि अलग-अलग छोटे स्कूलों के बजाय एकीकृत स्कूल में शिक्षक, प्रयोगशाला, पुस्तकालय, खेल मैदान और अन्य संसाधनों का अधिक से अधिक और बेहतर उपयोग किया जा सकता है। ……….. इस साल भी एमपी में बंद हुए 2426 स्कूल केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की तरफ से जारी की गई ताजा यू डाइस प्लस रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2025-26 के दौरान देश भर में कुल 4791 सरकारी स्कूल बंद किए गए या उनका आपस में विलय किया गया। देश भर में बंद या फिर विलय किए सभी स्कूलों में अकेले मध्य प्रदेश के 50 फीसदी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक पूरे देश में साल 2025-26 के दौरान कुल 4791 स्कूलों को बंद किया गया या उनका विलय किया गया। मध्य प्रदेश में 2426 स्कूल बंद हुए या विलय किए गए। इसके बाद तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश का स्थान रहा। जहां कई राज्यों में स्कूलों की संख्या घटी, वहीं बिहार, छत्तीसगढ़ और दिल्ली में नए स्कूल शुरू किए गए। बिहार में 946, छत्तीसगढ़ में 234 और दिल्ली में 87 नए स्कूल जुड़े। देश भर में स्कूलों की कुल संख्या 14,71,473 से घटकर 14,66,682 पर आ गई है। रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में सबसे ज्यादा 4.37 लाख से अधिक छात्रों का नामांकन कम हुआ। इसके अलावा छत्तीसगढ़ और दिल्ली में भी पिछले साल की तुलना में छात्रों की संख्या घटी। रिपोर्ट में बतया गया है कि ऐसे स्कूलों की संख्या घटी है, जिनमें एक भी छात्र पढ़ाई नहीं कर रहा था। सन 2024-25 में ऐसे स्कूल 7,993 थे, जो अब घटकर 5,663 रह गए हैं। हालांकि इन स्कूलों में अब भी 20,667 शिक्षक कार्यरत हैं। पश्चिम बंगाल में बिना छात्रों वाले स्कूलों की संख्या बढ़कर 4,133 हो गई है। वहीं उत्तर प्रदेश में ऐसे स्कूलों की संख्या 81 से बढ़कर 313 हो गई। इन स्कूलों में बढ़ी संख्या में शिक्षक पदस्थ हैं। छत्तीसगढ़ में भी पहली बार 149 ऐसे स्कूल दर्ज किए गए, जहां कोई छात्र नामांकित नहीं है।स्कूल भले ही बंद हुए या विद्यार्थी घटे हों लेकिन स्कूली शिक्षा बजट बढ़ा ही है। जारी रिपोर्ट के मुताबिक मध्य प्रदेश का स्कूली शिक्षा बजट बढ़कर 36730 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। साल 2022-23 के मुकाबले इस बजट में करीब 9 हजार करोड़ रुपए की बड़ी बढ़ोतरी हुई है। ………………… इंटरनेट के मामले में भी पीछे था एमपी शिक्षा मंत्रालय की यु डाईस प्लस 2024-25 की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी स्कूलों में इंटरनेट की स्थिति के मामले में मध्यप्रदेश देश में चौथे सबसे नीचे रहा था। रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदेश के सरकारी स्कूलों में केवल 35.3 प्रतिशत स्कूलों में इंटरनेट की सुविधा है। वहीं कई राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में ये आंकड़ा 100 फीसदी है जैसे दिल्ली, चंडीगढ़, लक्षद्वीप और पुडुचेरी। देशभर के 25 से ज्यादा राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में सरकारी स्कूलों में इंटरनेट सुविधा 50 प्रतिशत से अधिक है। केंद्र सरकार के सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के अनुसार, मध्य प्रदेश की साक्षरता दर 2021-22 में 76.7 प्रतिशत थी, जो घटकर 2022-23 में 76.4 प्रतिशत और 2023-24 में 75.2 फीसदी रह गई। विधानसभा में शिक्षा मंत्री उदय प्रताप सिंह ने लिखित जवाब में बताया था कि 2011 की जनगणना के बाद से भारत सरकार ने कोई नई जनगणना नहीं की है, इसलिए वर्तमान साक्षरता दर बताना संभव नहीं है। सन 2011 की जनगणना के अनुसार, एमपी की साक्षरता दर 69.3 प्रतिशत थी। रिपोर्ट के अनुसार मध्यप्रदेश के हजारों सरकारी स्कूल इंटरनेट विहीन हैं। …………………………… सरकारी स्कूल घटे, प्राइवेट स्कूल बढ़ेदेश भर में सरकारी स्कूलों की संख्या साल 2020-21 से 2024-25 के बीच घटी है जबकि इसी अवधि में प्राइवेट स्कूलों की संख्या बढ़ी है। ये जानकारी खुद सरकार ने लोकसभा में दी थी। सरकारी स्कूलों की संख्या में गिरावट का कारण नहीं बताया गया था लेकिन सरकार की ओर से ये कहा गया कि शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची में है और स्कूलों को खोलना, बंद करना और युक्तिसंगत बनाना संबंधित राज्य सरकार और केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में है। जानकारी के अनुसार पूरे देश में 18 हजार से ज्यादा सरकारी स्कूल बंद हुए हैं। सन 2014-15 में देश में कुल 15.16 लाख स्कूल थे। 2024-25 में कुल स्कूलों की संख्या 14.71 लाख रह गई। इसी अवधि में सरकारी स्कूल 11.07 लाख से घटकर 10.13 लाख हुए, जबकि मान्यता प्राप्त निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूल 2.88 लाख से बढ़कर 3.39 लाख हो गए। यानी सरकारी स्कूलों की संख्या जहां घटी, वहीं निजी स्कूलों का नेटवर्क बढ़ा। सन 2014-15 में देश में कुल स्कूली नामांकन 26.95 करोड़ था। वर्ष 2024-25 में यह घटकर 24.69 करोड़ रह गया, यानी करीब 2.26 करोड़ विद्यार्थियों की कमी हुई। वर्ष 2024-25 में सरकारी स्कूल अभी भी देश के कुल स्कूलों का करीब 68.9 प्रतिशत हैं और इनमें लगभग 12.16 करोड़ विद्यार्थी पढ़ते हैं। साल 2014-15 से वर्ष 2023-24 तक के बीते एक दशक में सरकारी स्कूलों की संख्या में 8 प्रतिशत की कमी आई है। इसके विपरीत निजी स्कूलों की संख्या में 14.9 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। साल 2014-15 में देश में 11,07,101 में से साल 2023-24 में 89,441 सरकारी स्कूल घटकर 10,17,660 रह गए। साल 2024-25 में यह संख्या घटकर 10.13 लाख रह गई यानी करीब 94 हजार सरकारी स्कूल कम हुए। इसी अवधि में निजी स्कूलों की संख्या 2,88,164 से 42,944 बढ़कर 3,31,108 तक हो गई। सन 2024-25 में देश के करीब आधे स्कूल केवल प्राथमिक स्तर तक शिक्षा देते हैं। कक्षा 1 से 12 तक लगातार शिक्षा देने वाले स्कूल कुल स्कूलों के केवल 5.4 प्रतिशत हैं। पिछले एक दशक में सरकारी स्कूलों की संख्या में मध्य प्रदेश में 29,410 और उत्तर प्रदेश में 25,126 की कमी आई जो देश में बंद हुए सरकारी स्कूलों की कुल संख्या 89,441 का 60.9 प्रतिशत है। दूसरी ओर निजी स्कूल 14.9 फीसदी बढ़े हैं। अकेले यूपी में 19,305 निजी स्कूलों की वृद्धि हुई, जो देश में बढ़े निजी स्कूलों की कुल संख्या 42,944 का 44.9 फीसदी है। सरकार ने लोकसभा में बताया कि वर्ष 2014-15 से 2023-24 तक के बीते एक दशक में सरकारी स्कूलों की संख्या में 8 फीसदी की कमी आई है, लेकिन निजी स्कूलों की संख्या में 14.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। साल 2014-15 में देश में 11,07,101 में से साल 2023-24 में 89,441 सरकारी स्कूल घटकर 10,17,660 रह गए और इसी अवधि में निजी स्कूलों की संख्या 2,88,164 से 42,944 बढ़कर 3,31,108 तक हो गई। एक रिपोर्ट के अनुसार मध्य प्रदेश में 29,410 और उत्तर प्रदेश में 25,126 की कमी आई है जो कुल मिलाकर सरकारी स्कूलों की संख्या में हुई 89,441 की कमी का 60.9 प्रतिशत है। उत्तर प्रदेश में 19,305 निजी स्कूलों की वृद्धि हुई, जो देश में निजी स्कूलों की संख्या में हुई कुल 42,944 की वृद्धि का 44.9 प्रतिशत है। जम्मू-कश्मीर में सरकारी स्कूलों की संख्या साल 2014-15 में 23,874 से 21.4 प्रतिशत घटकर साल 2023-24 में 18,758 रह गई। इसी अवधि में ओडिशा के सरकारी स्कूलों की संख्या 58,697 से 17.1 प्रतिशत घटकर 48,671 रह गई। अरुणाचल प्रदेश के स्कूलों की संख्या 3,408 से 16.4 प्रतिशत घटकर 2,847, उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों की संख्या 1,62,228 से 15.5 प्रतिशत घटकर 1,37,102 पर, झारखंड में 41,322 से 13.4 प्रतिशत घटकर 35,795 रह गई है। नागालैंड में 2,279 से 1,952 पर 14.4 प्रतिशत की गिरावट देखी गई। गोवा में स्कूलों की संख्या 12.9 प्रतिशत घटकर 906 में से 789 रह गई है जबकि उत्तराखंड में सरकारी स्कूलों की संख्या 8.7 प्रतिशत घटकर 17,753 में से 16,201 रह गई। बिहार में सरकारी स्कूलों की संख्या साल 2014-15 में 74,291 से 5 प्रतिशत बढ़कर साल 2023-24 में 78,120 हो गई।निजी स्कूलों की बात करें तो इस मामले में बिहार सबसे आगे रहा। यहां साल 2014-15 में निजी स्कूलों की संख्या 3,284 से बढ़कर वर्ष 2023-24 में 9,167 हो गई है। इसी अवधि में ओडिशा के निजी स्कूलों की संख्या 3,350 से बढ़कर 6,042 हो गई। उत्तर प्रदेश में निजी स्कूलों की संख्या 77,330 से बढ़कर 96,635 हो गई। वहीं, तीन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में निजी स्कूलों की संख्या में कमी आई, जिनमें सबसे अधिक 5.36 फीसदी की गिरावट मेघालय में आई। यहां निजी स्कूलों की संख्या 2,274 से घटकर 2,152 हो गई। दिल्ली में निजी स्कूलों की संख्या 2,641 से घटकर 2,565 हो गई। हिमाचल प्रदेश में निजी स्कूलों की संख्या 2,614 से घटकर 2,607 हो गई। ……………….. एक दशक में हुए कई फेर बदल साल 2014 से साल 2026 के दौरान भारत में सरकारी स्कूलों की संख्या में बड़े पैमाने पर फेर बदल हुआ है। शिक्षा मंत्रालय के यूडीआईएसई डेटा, नीति आयोग की रिपोर्ट और स्वतंत्र-गैर-सरकारी संगठनों के आकलनों के आधार पर आंकड़े सामने आए हैं। नीति आयोग की मई 2026 में जारी रिपोर्ट के अनुसार, 2014-15 में देश में 11.07 लाख सरकारी स्कूल थे, जो 2024-25 में घटकर 10.13 लाख रह गए। यानी सरकारी स्कूलों की संख्या में करीब 94 हजार की कमी हुई है। नीति आयोग के अनुसार स्कूलों की संख्या में गिरावट मुख्य रूप से कम नामांकन वाले संस्थानों के एकीकरण और संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल से जुड़ी है। नीति आयोग और लोकसभा में पेश आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक दशक में करीब 89 हजार से 94 हजार सरकारी स्कूल बंद या मर्ज (विलय) हुए हैं। सरकार का तर्क है कि स्कूलों का एकीकरण किया गया है। इसके तहत 10-20 से कम बच्चों वाले प्राथमिक स्कूलों को पास के बड़े स्कूलों में मिला दिया गया। पीएम श्री योजना, कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय, केंद्रीय विद्यालय और नवोदय विद्यालयों के तहत नए मॉडल और उच्च-माध्यमिक स्कूल भी खोले गए हैं। सरकार और नीति आयोग का कहना है कि स्कूलों की संख्या बढ़ाना ही शिक्षा की गुणवत्ता का अंतिम पैमाना नहीं है। सरकार का तर्क है कि स्कूल कम हों लेकिन बेहतर संसाधनों वाले स्कूल हों। छोटे स्कूलों को एकीकृत कर बड़े, संसाधनयुक्त स्कूल तैयार करने से शिक्षक उपलब्धता, प्रयोगशाला, पुस्तकालय, खेल सुविधाएं और प्रशासनिक निगरानी बेहतर की जा सकती है। लेकिन क्या शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए स्कूलों की संख्या घटाना सहीं है या फिर हर बच्चे तक शिक्षा सुलभ कराना है… ये अहम सवाल है। दूसरी तरफ, बंद या मर्ज होने वाले अधिकांश सरकारी स्कूल ग्रामीण और आदिवासी इलाकों के थे। कई जगहों पर स्कूल एक से तीन-चार किमी दूर होने के कारण छोटे बच्चों खासकर बालिकाओं और गरीब परिवारों के बच्चों ने शाला जाना छोड़ा है। ये स्थिति किसी एक स्टेट की नहीं बल्कि कमोबेश पूरे देश की है। उत्तर प्रदेश में लगभग 20 हजार प्राथमिक स्कूलों को विलय या बंद या कम नामांकन वाले प्राथमिक स्कूलों को नजदीकी उच्च प्राथमिक स्कूलों में संविलियन किया गया है। मध्य प्रदेश में 15 हजार स्कूल मर्ज या बंद या सीएम राइज योजना के तहत छोटे स्कूलों को मर्ज कर एकीकृत बड़े स्कूल बनाए गए। राजस्थान में 10 हजार स्कूल बंद या विलय या आदर्श विद्यालय योजना के तहत प्राइमरी स्कूलों का सीनियर सेकेंडरी स्कूलों में विलय किया गया है। जम्मू और कश्मीर में 4,300 स्कूलों का विलय कम छात्र संख्या और संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल के लिए किया गया है। ओडिशा में 8 हजार और महाराष्ट्र में 5 हजार स्कूलों को बंद या मर्ज किया गया है जहां 10-15 से कम बच्चों वाले ग्राम-स्तरीय प्राइमरी स्कूलों का एकीकरण किया गया है। ओडिशा में स्कूल एकीकरण की प्रक्रिया सुनियोजित ढंग से हुई। यहां पहले समान परिसर अथवा सौ मीटर के भीतर स्थित स्कूलों के विलय की प्रक्रिया हुई। बाद के चरणों में कम नामांकन वाले स्कूलों को भी एकीकृत करने की योजना बनाई गई। ………………………… एक से चार किमी तक जाना पड़ रहा पैदललोकसभा में शिक्षा मंत्रालय से साल 2013-14 से वर्ष 2025-26 तक नए सरकारी स्कूलों की स्थापना के राज्यवार और श्रेणीवार आंकड़े मांगे गए थे। मंत्रालय के जवाब में सन 2013-14 से सन 2024-25 तक सरकारी स्कूलों की संख्या का विस्तृत ब्यौरा दिया गया है। साल 2014-15 और 2024-25 के बीच मध्य प्रदेश में करीब 29,600, उत्तर प्रदेश में करीब 25 हजार, ओडिशा में लगभग 10 हजार, असम में लगभग 8,200, झारखंड में करीब 5,500, जम्मू-कश्मीर में करीब 5100 और महाराष्ट्र में करीब 2,800 स्कूलों की कमी सामने आई है। हालांकि कुछ राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में साल 2014-15 की तुलना में वर्ष 2024-25 में सरकारी स्कूलों की संख्या अधिक रही। बिहार, तेलंगाना, मणिपुर और दादरा एवं नगर हवेली-दमन एवं दीव में सरकारी शालाओं में बढ़ोतरी हुई है। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में पिछले दशक में बढ़ी तादाद में सरकारी स्कूलों का संविलियन किया गया है। शासन-प्रशासन का तर्क है कि कम छात्र संख्या, संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल और स्कूलों के युक्तियुक्तकरण के लिए ऐसा किया गया है। दूसरी तरफ, शिक्षाविद सरकार सरकारी स्कूलों के विलय या बंद या एकीकरण किए जाने के सरकार के तर्क से पूरी तरह सहमत नज़र नहीं आते। शिक्षाविदों का कहना है कि शिक्षा के अधिकार के तहत हर बच्चे को शिक्षा मुहैया कराना सरकार की जिम्मेदारी है। ऐसे में सरकारी स्कूलांे के विलय या बंद करने से पहले ये सुनिश्चित किया जाना था कि उस क्षेत्र के बच्चों को नजदीक में ही सरकारी स्कूल मिले। एक से तीन-चार किलोमीटर दूर तक आखिर छोटे बच्चे पैदल कैसे जा पाएंगे?, मध्यम या गरीब परिवारों के बच्चे दूर के स्कूलों तक आने-जाने का खर्च कैसे उठा पाएंगे? इसके अलावा सरकारी स्कूल बंद हुए और निजी स्कूल बढ़ गए.. ये भी सरकार की नीति पर सवालिया निशान लगाता है। साल 2014-15 से वर्ष 2024-25 के बीच देश में कुल स्कूली नामांकन 26.95 करोड़ से घटकर 24.69 करोड़ रह गया यानी करीब 2.26 करोड़ बच्चे कम हुए। इनमें से कुछ ऐसे होंगे जिन्होंने निजी स्कूलों में दाखिला ले लिया होगा और कुछ ऐसे होंगे जिन्होंने शायद पढ़ाई ही छोड़ दी हो। जो भी हो, बच्चों का कम होना सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर सवाल खड़ा करता है। ………… कॉकरोच जनता पार्टी चला रही देश भर में मुहिमसरकारी स्कूलों की हालत सुधारने और शिक्षा स्तर के उपर उठाने की कोशिशों के तहत कॉकरोच जनता पार्टी ने देशव्यापी मुहिम शुरू की है। इसी साल स्वाधीनता दिवस पर ये अभियान शुरू किया गया है जो गांव-गांव तक चलेगा। सीजेपी के फाउंडर अभिजीत दीपके ने देशव्यापी स्कूल ठीक करो अभियान शुरू किया है। उन्होंने माता-पिता से बुनियादी सुविधाओं का सोशल ऑडिट करने और सरपंचों से ग्रामीण स्कूलों को बेहतर बनाने की जिम्मेदारी लेने की अपील की है। दीपके ने अपने बयान में कहा था कि हमने नई संसद बनाई है, नया पीएम हाउस बनाया है। हम अपने गांवों में नए स्कूल क्यों नहीं बना पाए? क्या हम किसानों और मजदूरों के बच्चों को अपने देश का भविष्य नहीं मानते? दीपके ने कहा कि गांव के बच्चों को स्कूल जाने के लिए अभी भी लंबी दूरी तय करनी पड़ती है और अक्सर उन्हें पीने का पानी और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं मिलतीं। इस अभियान के तहत, सीजेपी ने देश भर के सरपंचों से अपील की है कि वे अपने-अपने गांवों में सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाएं। इस मुहिम के तहत, सीजेपी उन ग्राम प्रधानों को सबके सामने पहचान देगा जो अपने स्कूलों को बेहतर बनाते हैं। वे अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर स्कूलों की पहले और बाद की तस्वीरें शेयर करेंगे और संबंधित सरपंचों को इसका श्रेय देंगे। बयान में सरकारी स्कूलों के नागरिकों द्वारा किए जाने वाले सोशल ऑडिट की भी घोषणा की गई। जिन माता-पिता के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं, उनसे कहा गया है कि वे स्कूलों में जाकर बिजली, साफ पीने का पानी, ठीक-ठाक वॉशरूम और मिड-डे मील की उपलब्धता की जांच करें। दीपके ने सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के माता-पिता से कहा है कि आप अपने बच्चों के स्कूलों में जाएं और देखें कि क्या बुनियादी सुविधाएं मौजूद हैं। देखें कि क्या वहां बिजली, पानी है या नहीं, क्या आपके बच्चों को वॉशरूम की सुविधा मिलती है? क्या उन्हें मिड-डे मील मिलता है? उन्होंने माता-पिता से यह भी कहा कि अगर सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, तो वे इसके वीडियो बनाएं। उन्होंने कहा कि इस मुहिम का मकसद यह पक्का करना है कि गांवों के स्कूलों में पढ़ने वाले किसानों और मजदूरों के बच्चों को भी वैसी ही सुविधाएं मिलें जैसी शहरों में रहने वाले बच्चों को मिलती हैं। दीपके ने कहा है कि अगर ऐसा नहीं है, तो आप इसके वीडियो बनाएं। क्योंकि आपके बच्चों की पढ़ाई-लिखाई अच्छी होनी चाहिए। यह आपका मौलिक अधिकार है। सीजेपी फाउंड अभिजीत दिपके ने कहा है कि पिछले 10 सालों में देश में करीब 94 हजार स्कूल बंद हो गए हैं। 80 साल बाद भी स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। ……… राजस्थान सरकार ने दिया जवाबकॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के साथ भवन विहीन सरकारी शालाओं को लेकर खींचतान चलती रही थी। इसी बीच चल राजस्थान सरकार ने माना है कि सूबे में 611 सरकारी स्कूलों के पास भवन ही नहीं हैं। इसके अलावा कई स्कूलों में पीने के पानी और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाएं भी नहीं हैं। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष ने एक सवाल के जरिए सरकार से पूछा था कि राज्य में कितने स्कूल बिना इमारत के हैं और इनमें कन्या स्कूल की संख्या कितनी है? इस सवाल पर सरकार की ओर से बताया गया कि था कि राजस्थान में 611 स्कूल बिना इमारत के हैं, इनमें दस बालिका विद्यालय भी शामिल हैं। सरकार ने बताया कि प्रदेश में खुद के भवन वाले 64,484 सरकारी स्कूलों में से 2,047 स्कूलों में बच्चों के लिए शौचालय की सुविधा उपलब्ध नहीं है जबकि 1,049 स्कूलों में पीने के पानी सुविधा उपलब्ध नहीं है। यहां बता दें कि सीजेपी की मुहिम के तहत ही जयपुर के पास रामपुरा-कंवरपुरा गांव के एक स्कूल का निरीक्षण करने सीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता आशुतोष रांका और अन्य कार्यकर्ता पहुंचे थे। निरीक्षण करने के दौरान उनसे मारपीट की गई थी। इस घटना के बाद राजस्थान में राजनीतिक माहौल गर्मा गया था। सीजेपी से संस्थापक अभिजीत दीपके ने हमलावरों को गिरफ्तार करने और बाहरी लोगों के स्कूल में प्रवेश और कैमरा पर बिना अनुमति के पाबंदी को हटाने की मांग की थी। …………….. 1 लाख से ज्यादा स्कूलों में महज़ 1 ही टीचरकहने को तो बेहतर और सुलभ शिक्षा हर किसी के लिए मौलिक अधिकार है और इसे उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी। लेकिन नए स्कूल खुलने और स्कूलों में मूलभूत सुविधाएं मयस्सर होने की बजाए सरकारी स्कूल ही बंद हो रहे हैं। सरकार की ही रिपोर्ट के अनुसार साल भर में हजारों स्कूल बंद हो गए। इतना ही नहीं करीब तीस लाख छात्र ऐसे स्कूल में पढ़ाई कर रहे हैं जहां सिर्फ एक ही टीचर है। शिक्षा मंत्रालय की यूडीआईएसई 2025-26 रिपोर्ट बताती है कि 2025-26 तक देशभर में 14.66 लाख स्कूल हैं, जिनमें 24.72 करोड़ छात्र पढ़ाई कर रहे हैं। इन स्कूलों में 1.02 करोड़ से ज्यादा शिक्षक हैं। साल 2024-25 की तुलना में छात्र और शिक्षक तो बढ़े हैं लेकिन स्कूल कम हो गए हैं। यूडीआईएसई की रिपोर्ट के मुताबिक एक साल में लगभग 4,791 स्कूल बंद हो गए। साल 2024-25 तक देशभर में 14.71 लाख स्कूल थे, जिनकी संख्या 2025-26 में घटकर 14.66 लाख हो गई। साल 2024-25 तक देशभर में 10.13 लाख सरकारी स्कूल थे। साल 2025-26 में इनकी संख्या घटकर 10.05 लाख हो गई यानी एक साल में 8,077 सरकारी स्कूल बंद हो गए। देखा जाए तो हर दिन औसतन 22 सरकारी स्कूल बंद हुए। आश्चर्य बात ये है कि सरकारी स्कूल भले ही कम हुए हों लेकिन निजी स्कूलों की तादाद बढ़ गई। साल 2025-26 तक 3.41 लाख प्राइवेट स्कूल हैं, जबकि 2024-25 तक 3.39 लाख ही स्कूल थे। एक साल में प्राइवेट स्कूलों की संख्या 2,106 बढ़ी है। इस हिसाब से रोजाना औसतन 6 प्राइवेट स्कूल खुले हैं। ये राहत की बात है कि स्कूलों में शिक्षक और विद्यार्थियों की संख्या बढ़ी है। 4 साल में स्कूलों में शिक्षकों की संख्या 8 फीसदी तक बढ़ी है। वर्ष 2022-23 में 94.8 लाख शिक्षक थे और 2025-26 तक बढ़कर 1.02 करोड़ हो गए। 51 लाख से ज्यादा शिक्षक सरकारी और 41 लाख से ज्यादा शिक्षक प्राइवेट स्कूलों में पढ़ा रहे हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुसार हर 30 छात्रों पर एक शिक्षक होना चाहिए। मिडिल लेवल पर हर 17 छात्रों पर तो सेकेंडरी लेवल पर हर 21 छात्रों पर एक टीचर है। देखा जाए तो हर 24 छात्रों पर एक शिक्षक है। रिपोर्ट के अनुसार देशभर में एक लाख से ज्यादा स्कूल ऐसे हैं, जहां सिर्फ एक ही टीचर है। सिंगल टीचर वाले स्कूलों में थोड़ी कमी भी आई है। एक साल में ऐसे स्कूल 3,282 स्कूल कम हुए हैं। यूडीआईएसई की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2025-26 तक देशभर में 1,00,843 स्कूलों में सिर्फ एक ही टीचर है। इन स्कूलों में 29.12 लाख से ज्यादा छात्र पढ़ रहे हैं। यानी, एक टीचर 29-29 बच्चों को पढ़ा रहा है। हैरत वाली बात ये है कि जहां 1 लाख से ज्यादा स्कूलों में सिर्फ एक ही टीचर है तो वहीं 5,663 स्कूल ऐसे भी हैं जहां टीचर तो है लेकिन कोई छात्र नहीं है। बिना छात्रों वाले स्कूल में ही 20,667 शिक्षक हैं। सिंगल टीचर वाले सबसे ज्यादा 16,357 स्कूल आंध्र प्रदेश में है। साल 2024-25 की तुलना में वर्ष 2025-26 में स्कूल जाने वाली लड़कियों की संख्या बढ़ी है लेकिन दूसरी ओर लड़के कम हो गए हैं। एक साल में 9,208 लड़के कम हो गए हैं जबकि, इसी दौरान 2.96 लाख से ज्यादा लड़कियां बढ़ी हैं। …………………… बिना कंप्यूटर कैसे होगी ऑनलाइन एजुकेशनऐसा नहीं है कि स्कूलों में सिर्फ खामियां ही खामियां हैं। रिपोर्ट के अनुसार स्कूलों में बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर में भी थोड़ा सुधार हुआ है। अब 95 फीसदी स्कूलों में बिजली है। 99.5 प्रतिशत स्कूलों में पीने के पानी की व्यवस्था है। 98.5 प्रतिशत स्कूलों में गर्ल्स टॉयलेट और 96.9 फीसदी में हाथ धोने की सुविधा है। वहीं 90.5 प्रतिशत स्कूलों में अब लाइब्रेरी भी बन गई है। लेकिन अभी भी बहुत से स्कूल कंप्यूटर और इंटरनेट जैसी सहूलियत नहीं हैं। साल 2025-26 तक लगभग 70 फीसदी स्कूलों में ही कंप्यूटर है। वहीं, 67.4 प्रतिशत स्कूलों में ही इंटरनेट की सुविधा है। जहां एक ओर सरकार शालाओं में आॅन लाइन और डिजिटल एजुकेशन को बढ़ावा दे रही है वहीं स्कूलों में कम्प्यूटर और इंटरनेट न होने से सरकार की इस मंशा को पलीता लग रहा है। ………………. पढ़े-लिखे शहरों में चंडीगढ़ अव्वल, एमपी लिस्ट से बाहरअगर भारत में सबसे पढ़े-लिखे शहर की बात की जाए तो इसमें चंडीगढ़ अव्वल है। स्कूल एजुकेशन डेवलपमेंट इंडेक्स (सेडी) 2025-26 की लिस्ट में चंड़ीगढ़ पहले और केरल दूसरे स्थान पर है। दोनों ने 2024-25 में भी यही स्थान हासिल किया था। स्कूल एजुकेशन डेवलपमेंट इंडेक्स 2025-26 में देश के पढ़े-लिखे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की लिस्ट हाल ही में जारी की है। इस रैंकिंग में टाॅप एजुकेटेड स्टेट या शहर की बात की जाए तो दिल्ली या मुंबई नहीं बल्कि चंडीगढ़ का नाम है। यह लिस्ट कई पैरामीटर्स को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई है। स्कूल एजुकेशन डेवलपमेंट इंडेक्स 2025-26 के तहत देश में स्कूल की शिक्षा के प्रदर्शन का आकलन पांच पैरामीटर्स पर किया गया है। इसमें पहुंच, भागीदारी, रिटेंशन, गुणवत्ता और इंफ्रास्ट्रक्चर को शामिल किया गया है। इसमें स्कूलों की उपलब्धता, छात्र नामांकन और समान अवसर, छात्रों की पढ़ाई जारी रखने की दर, सीखने के परिणाम और स्कूलों में उपलब्ध सुविधाओं जैसे कई महत्वपूर्ण पहलुओं को शामिल किया गया है। रैंकिंग में टाॅप-10 वाले राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों ने बेहतर स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर, मजबूत डिजिटल सुविधाओं और उच्च रिटेंशन रेट के मामले में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है। सरकारी स्कूलों की बेहतर स्थिति, सीखने के अच्छे परिणाम और सभी छात्रों के लिए समान शैक्षणिक अवसर इसकी प्रमुख उपलब्धियों में शामिल हैं। स्कूल एजुकेशन डेवलपमेंट इंडेक्स 2025-26 में भारत के सभी 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के स्कूलों में शिक्षा प्रदर्शन का राज्यों के अनुसार असेसमेंट किया गया है। इस रिपोर्ट में क्वालिटी डोमेन के लिए एनएएस 2021 (एनसीईआरटी) के लर्निंग आउटकम स्कोर का इस्तेमाल किया गया है क्योंकि 2021 के बाद नेशनल अचीवमेंट सर्वे का नया राउंड आयोजित नहीं हुआ है। रिपोर्ट की मेथोडोलॉजी, इंडिकेटर्स, डोमेन वेट और नॉर्मलाइजेशन प्रोसीजर को सेडी 2024-25 के समान रखा गया है। स्कूल एजुकेशन डेवलपमेंट इंडेक्स (सेडी) 2025-26 की लिस्ट के अनुसार स्कूली शिक्षा में टाॅप-3 की बात की जाए तो दिल्ली या मुंबई जैसे बड़े महानगर शामिल नहीं है। इसमें सबसे ज्यादा पढ़ा-लिखा चंडीगढ़ 0.826 है और यह सेडी स्कोर के साथ पहले स्थान पर है, जबकि केरल दूसरे स्थान पर है। चंडीगढ़ पहले रैंक पर है और इसका सेडी स्कोर 0.826 है जिसकी वजह है मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल पहुंच, बेहतर रिटेंशन और सीखने के परिणाम। 0.798 सेडी स्कोर के साथ केरल दूसरे नंबर है, वजह है स्कूली शिक्षा में बेहतर गुणवत्ता, पहुंच, भागीदारी और छात्र रिटेंशन। 0.737 सेडी स्कोर के साथ पुडुचेरी तीसरे नंबर है। शिक्षा तक अच्छी पहुंच, बेहतर भागीदारी और स्कूल सुविधाओं में मजबूत प्रदर्शन लिस्ट में टॉप थ्री में आने की वजह है। 0.713 सेडी स्कोर के साथ गोवा चौथे नंबर है। शिक्षा की गुणवत्ता और इंफ्रास्ट्रक्चर में अच्छा प्रदर्शन करने के कारण गोवा को ये स्थान मिला है। 0.709 सेडी स्कोर के साथ दिल्ली पांचवें नंबर पर है। बेहतर स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर, शिक्षा तक पहुंच और गुणवत्ता संबंधी प्रदर्शन की वजह से लिस्ट में दिल्ली को जगह मिली है। 0.707 सेडी स्कोर के साथ और स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता, भागीदारी और उपलब्ध सुविधाओं में मजबूत स्थिति के कारण पंजाब को छटवां नंबर मिला है। 0.706 सेडी स्कोर और पहुंच, भागीदारी और शिक्षा गुणवत्ता में अच्छा प्रदर्शन के कारण तमिलनाडु को लिस्ट में सांतवा नंबर मिला है। 0.690 सेडी स्कोर और स्कूल शिक्षा की पहुंच, रिटेंशन और इंफ्रास्ट्रक्चर में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन की वजह से अंडमान और निकोबार द्वीप समूह आठवें नंबर पर है। 0.670 सेडी स्कोर और शिक्षा तक पहुंच, भागीदारी और स्कूल सुविधाओं से जुड़े संकेतकों में मजबूत प्रदर्शन के कारण लक्षद्वीप ने लिस्ट में नौवीं जगह प्राप्त ली। 0.656 सेडी स्कोर और शिक्षा की पहुंच, भागीदारी, गुणवत्ता और इंफ्रास्ट्रक्चर के संयुक्त प्रदर्शन के आधार पर टाॅप-10 में हरियाणा ने भी जगह बना ली, हरियाणा दसवें नंबर पर रहा। खैर, इस लिस्ट में गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे राज्य अपनी जगह नहीं बना पाए।बहरहाल, बारिश में नदी-नाले पार करते स्कूली बच्चे तो कहीं टपकती छतों के नीचे या जर्जर भवनों में पढ़ते बच्चों की तस्वीर और खबरें मीडिया में आतीं रहतीं हैं। सरकारी स्कूलों में पिछले कुछेक सालों में कई सुधार हुए हैं। बावजूद इसके शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार की दरकार अभी भी बनी हुई है। निजी स्कूलों की मंहगी शिक्षा के बावजूद और हर साल शिक्षा विभाग में बढ़ते बजट, सरकारी स्कूलों में स्मार्ट क्लास, डिजिटल शिक्षा, मिड-डे मील, मुफ्त किताबें और यूनिफॉर्म, मेधावी बच्चों को लेपटाॅप-स्कूटी जैसी कई योजनाओं के बाद भी सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या कम हो रही है, ये चिंता और चिंतन का विषय है।— मुस्ताअली बोहराअधिवक्ता एवं लेखकभोपाल (मध्य प्रदेश) Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन आत्मनिर्भरता के नाम पर लूट-खसोट लाल किले की VIP गैलरी में स्वतंत्र भारद्वाज की मौजूदगी पर बवाल, निमंत्रण को लेकर उठे गंभीर सवाल