(आलेख : राम पुनियानी, अंग्रेजी से अनुवाद : अमरीश हरदेनिया) इन दिनों उत्तरप्रदेश के रामपुर में जौहर विश्वविद्यालय के मुख्य प्रवेश द्वार पर धरना जारी है। समाजवादी पार्टी के सदस्य आजम खान, जो वर्तमान में जेल में हैं, इस विश्वविद्यालय का संचालन करने वाले न्यास के अध्यक्ष हैं। विश्वविद्यालय के विद्यार्थी रामपुर विकास प्राधिकरण के उस नोटिस के खिलाफ धरना दे रहे हैं, जिसमें विश्वविद्यालय के 40 में से 38 भवनों को ढ़हाए जाने का आदेश दिया गया है। ऐसा करना विश्वविद्यालय को बंद कर देने जैसा होगा। इंडियन एक्सप्रेस (20 जुलाई 2026) के अनुसार विश्वविद्यालय की विधि संकाय की एक छात्रा मेहरोजा खान ने कहा, ‘‘हमारा करियर और भविष्य दांव पर लगा है। हमने धरने पर बैठने का फैसला इसलिए किया, क्योंकि हम चाहते हैं कि सरकार विश्वविद्यालय के भवनों को ढहाने के अपने फैसले पर पुनर्विचार करे। हम कहीं और अपनी शिक्षा जारी नहीं रख पाएंगे, विशेषकर बहुत दूर के कालेजों में। सबसे बड़ी बात यह है कि यहां हमें विभिन्न शुल्कों में छूट मिलती है। अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्रों को 50 प्रतिशत छूट मिलती है। जिन छात्रों के माता-पिता का देहांत हो चुका है, उन्हें भी छूट मिलती है। यहां बी. फार्मा और डी. फार्मा जैसे व्यावसायिक पाठ्यक्रम भी संचालित होते हैं, जिनकी पढ़ाई हममें से बहुत से छात्र अन्य संस्थानों में नहीं कर पाएंगे।‘‘ रामपुर में मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय का शिलान्यास 18 सितंबर 2006 को हुआ था। इसे मोहम्मद अली जौहर न्यास ने कई सालों में धीरे-धीरे विकसित किया। हालांकि इसमें विभिन्न निर्माण कार्य कब हुए, यह कानूनी एवं प्रशासनिक विवाद का विषय बन गया है। रामपुर विकास प्राधिकरण (आरडीए) के अनुसार जहां विश्वविद्यालय के चिकित्सा महाविद्यालय और एक प्रशासनिक खंड का निर्माण विधिवत अनुमतियां एव स्वीकृतियां हासिल करने के बाद ही किया गया है, वहीं परिसर में स्थित 38 अन्य भवनों का निर्माण सक्षम शासकीय कार्यालयों की अनिवार्य अनुमतियां हासिल किए बगैर कर लिया गया। विश्वविद्यालय का कहना है कि इन भवनों का निर्माण वर्षों पहले किया गया था – उस समय जब यह स्थान (सिंगनखेड़ा गांव) आरडीए के क्षेत्राधिकार में नहीं था – और इन निर्माणों की अनुमति स्थानीय जिला पंचायत से ली गई थी। आरडीए के अनुसार, बगैर अनुमोदन के किए गए इन निर्माणों और भूमि उपयोग के कथित उल्लंघनों के चलते उसने इन 38 भवनों को हटाए जाने या ढहाए जाने का आदेश दिया गया है। विद्यार्थियों और कई सामाजिक कार्यकर्ताओं/राजनीतिज्ञों ने निवेदन किया कि विश्वविद्यालय के भवनों को ढहाया जाना अनुचित होगा, क्योंकि विश्वविद्यालय विभिन्न वर्गों के छात्रों की अमूल्य सेवा कर रहा है, विशेषकर मुस्लिम और अनुसूचित जाति/जनजाति वर्ग के छात्रों की। उन्होंने दावा किया कि सरकार का मुख्य ध्येय मुसलमानों को शिक्षा से वंचित करना है। वैसे शिक्षा उन प्रमुख मुद्दों में से एक है, जिनके प्रति मौजूदा सरकार का उपेक्षापूर्ण रवैया रहा है, जैसा कि इन दिनों चल रही युवाओं एवं विद्यार्थियों की आक्रोश की लहर से पता चलता है। जहां तक अल्पसंख्यकों की शिक्षा की बात है, उसकी राह में तो और अधिक बाधाएं खड़ी की जा रही हैं। दूसरा पहलू है मुस्लिम पहचान वाले भवनों और ढांचों को तोड़ना। जौहर विश्वविद्यालय की इमारतों को ढहाया जाना इस सिलसिले की नवीनतम कड़ी है। काशी, मथुरा, संभल, अजमेर दरगाह और सहारनपुर की मस्जिद आदि वेटिंग लिस्ट में हैं। हाल में हमने देखा कि मध्यप्रदेश में स्थित कमाल मौला मस्जिद इस आधार पर हिन्दुओं को सौंप दी गई कि यह वाग्देवी का मंदिर है। कई अन्य मस्जिदें बाबरी मस्जिद की तर्ज पर निशाने पर हैं। इन पर दावा जताने के लिए रामजन्मभूमि आंदोलन के दौरान अपनाई गई रणनीति ही दुहराई जा रही है। मध्यकालीन इतिहास का दुरूपयोग राजनैतिक और साम्प्रदायिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए किया जा रहा है। मस्जिदों और इसी तरह के अन्य विवाद इन कुतर्कों पर आधारित हैं कि मध्यकाल में मंदिरों को तोड़कर उसी स्थान पर मस्जिदों का निर्माण किया गया था। ये दावे अक्सर इतिहास की बढ़ा-चढ़ाकर की गई या विकृत व्याख्या पर आधारित होते हैं, जिनमें औपनिवेशिक काल की टीका-टिप्पणियों का हवाला दिया जाता है। इस तरह के दावे ‘उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991‘ के प्रावधानों के एकदम खिलाफ होते हैं, जो बाबरी मस्जिद के अलावा सभी उपासना स्थलों के मामलों में 15 अगस्त 1947 की स्थिति बनाए रखने की बात करता है। इस सिलसिले की शुरूआत हिन्दू दक्षिणपंथियों के बाबरी मस्जिद को ढहाने में सफलता हासिल करने के साथ हुई, जिसके संबंध में यह दावा था कि बाबर ने राममंदिर तुड़वाकर उसकी जगह मस्जिद का निर्माण करवाया था। इसके बावजूद कि न्यायालय का फैसला ‘जनभावनाओं‘ और न्यायाधीशों के ‘सपने में भगवान के आने पर‘ आधारित था, फैसले में यह माना गया कि 1949 में वहां रामलला की मूर्ति की स्थापना किया जाना एक अपराध था। इसी तरह 6 दिसंबर 1992 को मस्जिद को ढहाए जाने को भी अपराध माना गया। इस घटना ने भाजपा की चुनावी सफलताओं को कई गुना बढ़ाने का मार्ग प्रशस्त किया, जो अंततः 1996 में पहली बार, उसके बाद 1999 में और अंततः 2014 में केन्द्र की सत्ता पर काबिज होने में कामयाब रही। लेकिन बाबरी मस्जिद ढ़हाए जाने से भाजपा को जो लाभ मिला, उससे भाजपा-आरएसएस के मन में यह लालच आया कि इसी एजेंडे को आगे बढ़ाकर और अधिक कामयाबी हासिल की जा सकती है। इसलिए वह अन्य स्थानों के संबंध में ऐसे ही दावे करती रही और न्यायपालिका 1991 के अधिनियम को नजरअंदाज करते हुए इन दावों के संबंध में जांच-पड़ताल करने का आदेश देती रही, जिससे ध्रुवीकरण बढ़ा और हिन्दू राष्ट्रवादियों को जबरदस्त फायदा हुआ। हिन्दू दक्षिणपंथी विचारकों के उर्वर दिमागों में अब एक विश्वविद्यालय को निशाना बनाने का विचार आया है। इस प्रस्तावित तोड़फोड़ से एक अतिरिक्त उद्धेश्य की पूर्ति होगी — वह है मुसलमानों को बदनाम करना और उसके साथ ही अल्पसंख्यक समुदाय को शिक्षा से महरूम करना, जिसकी उन्हें सख्त जरूरत है। इसी तर्ज पर सहारनपुर की एक बहुत पुरानी छोटी सी मस्जिद को भी नोटिस जारी कर इस आधार पर हटाए जाने को कहा गया है कि उसके निर्माण के लिए जितनी अनुमतियां ली जानीं थीं, वे नहीं लीं गईं। हिन्दू दक्षिणपंथियों की नजरों में प्रतिकूल कब्जे का कानून मुसलमानों पर लागू नहीं होता। इसलिए येन केन प्रकारेण मुस्लिमों के निर्माणों को गैरकानूनी साबित करके उन्हें तुड़वाने का प्रयास निरंतर जारी रहता है। बुलडोजरों का मनमाना उपयोग कर समाज के कुछ वर्गों में अपनी लोकप्रियता बढ़ाना, मुसलमानों को अलग-थलग करने का एक अन्य तरीका है। लगता है, तोड़फोड़ करना उनका ‘राष्ट्र निर्माण‘ का तरीका है। भवनों को इस तरह गिराए जाने से समाज की संपदा की कितनी जबरदस्त हानि होती है, इसकी आरएसएस-भाजपा को रत्ती भर परवाह नहीं है। आजादी के बाद राष्ट्र निर्माण के मायने बिल्कुल अलग थे। भारत के पहले प्रधानमंत्री का नजरिया था कि आईआईटी, एम्स, सार्वजनिक क्षेत्र के कल-कारखानों और सिंचाई की सुविधाओं के निर्माण की अधोसंरचना बनाकर ही हम देश में व्याप्त अभावों से कुछ हद तक छुटकारा पा सकते हैं। ऐसा लगता है कि हिन्दू दक्षिणपंथ के उभार के साथ ही हमारा रास्ता बदल गया है और अब हम मस्जिदों के नीचे मंदिर खोजने और मुस्लिमों के निर्माणों को गैर-कानूनी साबित करने में जुटे हुए हैं जिससे एक पार्टी को राजनैतिक लाभ मिलता है और समाज में ध्रुवीकरण और नफरत बढ़ती है। क्या हमें सद्बुद्धि आएगी? क्या हम दुबारा संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप राष्ट्र निर्माण के मार्ग पर चलना शुरू करेंगे? क्या हम बुलडोजर कार्यवाहियों और छोटी-मोटी बातों को तूल देकर मुसलमानों के निर्माणों के गैरकानूनी होने के दावे करने से बाज आएंगे? (लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड सेकुलरिज्म के अध्यक्ष हैं।) Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन हाईवे पर डकैत का आतंक: ट्रक रोककर मांगा ‘गुंडा टैक्स’, विरोध पर 12 टायरों पर बरसाईं गोलियां धर्मेंद्र प्रधान की विदाई से आरएसएस की शिक्षा परियोजना को बड़ा झटका