(आलेख : राजेंद्र शर्मा)

देश की 23 विपक्षी पार्टियों ने संयुक्त रूप से चिट्ठी लिखकर देश के सर्वोच्च न्यायालय से देश में जनतंत्र को बचाने के लिए हस्तक्षेप करने की गुहार लगायी है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह शायद पहला ही मौका है, जब विपक्ष ने इस तरह सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। विपक्ष के इस कदम में, एक प्रकार की लाचारी भी छुपी है। चिट्ठी का अंत इस यथार्थ स्थिति के बयान पर होता है कि अगर इस अदालत के दरवाजे से भी न्याय नहीं मिलता है, तो शायद न्याय के लिए खटखटाने के लिए और कोई दरवाजा ही नहीं रह जाएगा! याद रहे कि जिन विपक्षी पार्टियों ने मिलकर यह गुहार लगायी है, संसद में भले ही अल्पमत में हों, पर वास्तव में जनमत में सत्ता पक्ष के मुकाबले कुछ न कुछ बड़े हिस्से का ही प्रतिनिधित्व करती हैं, छोटे हिस्से का नहीं। जनमत के उल्लेखनीय हिस्से की इस गहरी चिंता से इसका बखूबी अंदाजा लगाया जा सकता है कि मोदी राज में भारत में जनतंत्र पर कितना भारी खतरा छाया हुआ है।

हैरानी की बात नहीं है कि विपक्षी पार्टियों की इस चिट्ठी में सबसे प्रमुख रूप से चुनाव आयोग की भूमिका का सवाल उठाया गया है, जिसने जनतांत्रिक चुनाव के निष्पक्ष एंपायर की अपनी संविधान में कल्पित भूमिका का करीब-करीब त्याग ही कर दिया है और एक तरह से सत्ताधारी टीम में ही शामिल हो गया है। इस संदर्भ में चिट्ठी में यह भी याद दिलाया गया है कि किस तरह, अनूप बरनवाल बनाम भारतीय संघ के यूमामले में सर्वोच्च न्यायालय के ही संसदीय पीठ ने, चुनाव आयोग की कार्यपालिका से स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के पक्ष में जो फैसला दिया था और इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, देश के प्रधानमंत्री और नेता विपक्ष के तीन सदस्यीय पैनल द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त तथा चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति किए जाने का जो आदेश दिया था, उसे मोदी राज ने संसद में अपने बहुमत के बल पर, एक नया कानून लाकर पूरी तरह से ही उलट दिया। अब तीन सदस्यीय पैनल में से मुख्य न्यायाधीश को हटाकर, उनकी जगह पर प्रधानमंत्री द्वारा नामजद उनके एक मंत्रिमंडलीय सहयोगी को लाया जा चुका है और इस तरह चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया पर कार्यपालिका का पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो चुका है। नतीजा यह है कि आज चुनाव आयोग की भूमिका जितनी विवादास्पद हो गयी है, इससे पहले कभी भी नहीं थी।

चुनाव आयोग की विवादास्पद भूमिका के संबंध में जहां स्वाभाविक रूप से विधानसभाई चुनावों के हाल के चक्र में और विशेष रूप से प. बंगाल तथा असम में उसके अनेक विवादास्पद निर्णयों की ओर इशारा किया गया है, वहीं आयोग के जिस एक निर्णय की इस संयुक्त पत्र में अपेक्षाकृत विस्तार से चर्चा की गयी है, वह है मतदाता सूचियों का विशेष सघन पुनरीक्षण कराने का चुनाव आयोग का इकतरफा फैसला। याद रहे कि मतदाता सूचियों को शुद्घता सुनिश्चित करने के नाम पर, चुनाव आयोग द्वारा बिहार में विधानसभा चुनाव से चंद महीने पहले हड़बड़ी में जब यह प्रक्रिया शुरू की गयी थी, तभी से इस प्रक्रिया की जरूरत, उपयुक्तता तथा वैधता पर सवाल उठ रहे थे। जिस तरह लगभग असंभव समय सीमाओं के साथ, मतदाता सूचियां लगभग नये सिरे से तैयार कराए जाने का प्रयास किया जा रहा था, उस हड़बड़ी के अलावा और उससे भी महत्वपूर्ण रूप से, इस पूरी प्रक्रिया को दस्तावेजी साक्ष्यों के सहारे नागरिकता परीक्षण यानी पिछले दरवाजे से राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर थोपे जाने में तब्दील किए जाने पर, शुरू से गंभीर सवाल उठाए जा रहे थे।

बहरहाल, इन सभी सवालों को इस झूठे सांप्रदायिक प्रचार से दबाने की कोशिश की गई कि यह कसरत वास्तव में मतदाता सूचियों से ‘विदेशियों’ को छानकर निकालने के लिए जरूरी थी। लेकिन, जब बिहार में एसआईआर की प्रक्रिया पूरी हो गयी, इस प्रक्रिया में छनकर निकले ‘विदेशियों’ की संख्या सैकड़ों, तो क्या दर्जनों में भी नहीं थी, जिसकी वजह से पत्रकारों के बार-बार पूछने के बावजूद, चुनाव आयोग से यह बताते नहीं बना कि बिहार में कितने विदेशी नागरिक मतदाता बने पाए गए थे। इसके बावजूद, चुनाव आयोग ने बिहार के बाद दूसरे चरण में देश के करीब आधे राज्यों पर, जिनमें इसी साल के पूर्वार्द्घ मेें विधानसभाई चुनावों की तैयारी कर रहे बंगाल समेत चार राज्य तथा एक केंद्र शासित प्रदेश शामिल थे, न सिर्फ एसआईआर थोप दिया, बल्कि एक ओर केंद्रीय सत्ता व सत्ताधारी संघ-भाजपा और दूसरी ओर चुनाव आयोग की जुगलबंदी के सहारे, एसआईआर की प्रक्रिया को ‘घुसपैठियों’ को निकालने के लिए मतदाता सूचियों की गहरी ‘छनाई’ के रूप में पेश किया जाना जारी रहा।

बिहार में जब एसआईआर की प्रक्रिया शुरू हुई, तभी से यह ध्यान दिलाया जा रहा था कि दस्तावेजी साक्ष्यों से नागरिकता को प्रमाणित करने को प्राथमिकता देने वाली यह प्रक्रिया, आर्थिक व सामाजिक रूप से कमजोर तबकों यानी भूमिहीनों, अनपढ़ों, दलितों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों आदि को, मतदाता सूचियों से बाहर करने और उनका मताधिकार छीनने का काम करेगी। और ठीक यही हुआ भी। हालांकि, आशंकाओं के विपरीत, मुस्लिम अल्पसंख्यकों की बहुत बड़ी संख्या को बाहर नहीं किया जा सका और दूसरी ओर, प्रवासी मजदूरों की खासतौर पर बड़ी संख्या पर इस छंटाई की गाज गिरी, फिर भी इस प्रक्रिया में जो 65 लाख नाम मतदाता सूचियों से हटाए गए, उनमें से मृतकों की श्रेणी के 22 लाख और एक से ज्यादा जगह नाम की श्रेणी के 7 लाख नामों को छोड़ भी दें तो, 36 लाख यानी कुल मतदाताओं के 5 फीसद से ज्यादा के नाम, उनके जिंदा होते हुए काट दिए गए। इनमें आर्थिक तथा सामाजिक रूप से कमजोर तबकों के यानी भूमिहीनों, अनपढ़ों, दलितों, महिलाओं तथा मुसलमानों के नाम, आबादी में उनके अनुपात की तुलना में उल्लेखनीय रूप से ज्यादा थे। यानी यह अपनी संरचना से ही, कमजोर तबकों के मताधिकार छीनने का हथियार है।

बहरहाल, दूसरे चरण में और खासतौर पर बंगाल में, एसआईआर को चुनाव को और सीधे-सीधे प्रभावित करने के हथियार में तब्दील कर दिया गया। चूंकि इस राज्य में केंद्र की सत्ताधारी पार्टी की विरोधी पार्टी सत्ता में थी, संभावित विपक्षी मतदाताओं पर सामान्य रूप से बड़े पैमाने पर कैंची चलाना मुश्किल था। इसलिए, एसआईआर के पहले चरण के बाद, चुनाव आयोग ने समूची प्रक्रिया को बाहर से लाए गए केंद्रीय शासन के वफादार अधिकारियों के हाथों में सौंपने के अलावा एक ऐसे अमोघ अस्त्र का प्रयोग किया, जिसका एसआईआर की प्रक्रिया में भी इससे पहले प्रयोग नहीं किया गया था। एक अपरीक्षित साफ्टवेयर के सहारे, सवा करोड़ से ज्यादा मतदाताओं को ‘तार्किक विसंगति’ की एक नयी ईजाद की गयी श्रेणी में डाल दिया गया। बेशक, बाद में यह संख्या यहां से नीचे आयी, फिर भी करीब 87 लाख लोगों का मताधिकार खतरे में बना रहा और सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद, न्यायिक सुनवाईयां शुरू होने के बाद भी, अपना नाम काटे जाने को चुनौती देने वाले 27 लाख मतदाताओं के मामले में मतदान की तरीख तक भी कोई फैसला नहीं हो सका और अपने नाम न्यायाधीन होने के चलते वे मताधिकार से वंचित हो गए। याद रहे कि न्यायिक ट्रिब्यूनलों द्वारा ऐसे जिन कुछ सौ नामों का फैसला मतदान की तारीख तक किया जा सका था, उनमें से करीब 95 फीसद मामलों में फैसला, मताधिकार के पक्ष में गया था। साफ था कि यह बिना किसी आधार के, अंधाधुंध तरीके से मताधिकार छीने जाने की कोशिश थी।

इसमें भी बंगाल में वह भी हुआ, जो मिसाल के तौर पर बिहार में नहीं हो पाया था। इस तरह मताधिकार गंवाने वालों में और उससे भी बढ़कर तार्किक विसंगति के नाम पर मताधिकार गंवाने वालों में, कुल मिलाकर मुस्लिम अल्पसंख्यकों का हिस्सा, आबादी में उनके अनुपात से उल्लेखनीय रूप से ज्यादा था। कई ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले चुनाव क्षेत्रों में तो यह साफ तौर पर मुस्लिम वोटों की लक्षित छंटाई का मामला था, जिसने कई सीटों पर तो चुनावी उलट-फेर भी किया लगता है। अब जबकि चुनाव हो चुका है और बंगाल में भाजपा की  सरकार भी बन चुकी है, 27 लाख न्यायाधीन मतदाताओं के मताधिकार पर अनिश्चितता बनी ही हुई है। इसी दौरान, बंगाल में तथा बिहार आदि अन्य भाजपा शासित राज्यों में भी, सरकारों ने मतदाता सूचियों से हटाए गए नामों को नागरिक सुविधाओं व  सरकारी योजनाओं के दायरे से भी बाहर करने का सिलसिला शुरू कर दिया है। यह मताधिकार छीने जाने के बाद, नागरिकता छीने जाने तक जा सकता है। बंगाल, असम आदि बांग्लादेश से लगती सीमाओं वाले अन्य भाजपा-शासित राज्यों में, गरीब मुसलमानों को साक्ष्यों की कमी के आधार पर घुसपैठिया करार देकर, जबरन सीमा पार धकेले जाने का सिलसिला भी जारी है।

लेकिन, इस सब की ओर से आंखें मूंदे चुनाव आयोग ने, एसआईआर का तीसरा चरण शुरू कर दिया है, जिस चरण में तेलंगाना जैसे राज्यों में तार्किक विसंगति की श्रेणी का जमकर इस्तेमाल किया जा रहा है। उधर ओडिशा में चुनाव आयोग के दावे के अनुसार 20 लाख और विपक्षी पार्टियों के दावे के अनुसार 27 लाख नाम काटे गए हैं, जिनमें आधे से ज्यादा तथाकथित अनुपस्थित या स्थानांतरित की संदिग्ध श्रेणी में ही हैं। यहां तक कि सिक्किम में भी 4,71,018 मतदाताओं में से 37,724 के नाम काट दिए गए हैं। एसआईआर के दूसरे चरण तक 6 करोड़ मतदाताओं के नाम काटे जाने के बाद, तीसरे चरण के आखिर तक, यह आंकड़ा 10 करोड़ के करीब हो जाने का अनुमान है।

इस तरह, अगर करीब 10 फीसद मतदाताओं को, जिनमें वंचित व कमजोर तबकों के मतदाताओं का हिस्सा ही ज्यादा है, चुनाव से पहले ही मताधिकारहीन कर दिया जाता है, तो वंचित और कमजोर तबके, अमीरपरस्त और सांप्रदायिक-सवर्णवादी वर्तमान सत्ता के शिकंजे से वर्तमान जनतांत्रिक व्यवस्था में राहत की कैसे उम्मीद कर सकते हैं? यह तो जनतंत्र का ही किस्तों में मारा जाना है। विपक्षी पार्टियों ने एसआईआर के रोके जाने की मांग की है। उन्होंने चुनाव आयोग के निष्पक्षता-त्याग के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के सामने गुहार लगायी जरूर है, लेकिन क्या सुप्रीम कोर्ट यह पुकार सुनेगा? क्या सुप्रीम कोर्ट इस पुकार को सुनने के काबिल रहा भी है या वह भी मीडिया से लेकर चुनाव आयोग तक की गति को प्राप्त हो गया है?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)

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