(आलेख : सत्येंद्र रंजन)

ईरान पर हमला कर अपनी वैश्विक प्रभुता को जताने का अमेरिका का दांव उलटा पड़ चुका है। देखते-देखते यह युद्ध विश्व शक्ति संतुलन में आ चुके आमूल बदलाव को हम सबके सामने उजागर करता जा रहा है। सामरिक विशेषज्ञ तो अब यहां तक कह रहे हैं कि रणनीतिक सोच और सैन्य ढांचे — दोनों मामलों में अमेरिका बीसवीं सदी में सिमटा रह गया। नतीजतन, 21वीं सदी की नई व्यूह रचना और इसमें उभरे नए मोर्चों पर हो रहे मुकाबलों में उसके लिए वर्चस्व बनाए रख पाना कठिन हो गया है।

यह समझ ठोस रूप ले रही है कि जब कभी अमेरिका-ईरान युद्ध खत्म होगा, वैश्विक संचालन के नए ढांचों के आकार लेने की प्रक्रिया गति पकड़ लेगी। जाहिरा तौर पर संचालन के इन नियमों को अब वॉशिंगटन (यानी अमेरिका) में नहीं लिखा जाएगा, जैसा कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद हुआ था। उन नियमों को तय करने में संभवतः अमेरिका की अब भी भूमिका होगी, लेकिन वह महज एक भागीदार के रूप में होगी। इस मामले में उसे अन्य समकक्ष भागीदारों के साथ तालमेल बैठाना होगा।

हमारे लिए महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या उन “समकक्ष” भागीदारों में भारत भी एक होगा? पिछली बार जब विश्व संचालन के नियम तय हुए और उनके अनुरूप संस्थाएं बनाई गईं, तब भारत अभी ब्रिटेन का गुलाम था। ग्लोबल साउथ के ज्यादातर देशों की तब वही स्थिति थी। मगर इस बार इस प्रक्रिया में उनमें से कई देशों की महत्त्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। क्या भारत उनमें से एक होगा?

बहरहाल, इस प्रश्न पर विचार के पहले उचित होगा कि पश्चिम एशिया के मौजूदा युद्ध के बाद किन बड़े परिवर्तनों का अनुमान है, उन पर हम एक नज़र डाल लें :

*यह लगभग तय-सा है कि इस युद्ध के बाद पश्चिम एशिया की संचरना में एक बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। ईरान (अगर निर्णायक रूप से पराजित नहीं हुआ तो) उस क्षेत्र की प्रमुख ताकत के रूप में स्थापित होगा। खाड़ी देश देर-सबेर ईरान के साथ बेहतर संबंध बना कर चलने की राह अपनाएंगे। ओमान और कतर ने ऐसे संकेत अभी से दे दिए हैं।

*सऊदी अरब और यूएई अभी असमंजस में हैं। वे ईरान का प्रभाव रोकना चाहते हैं, लेकिन अपनी ताकत से ऐसा करना उनके लिए संभव नहीं है। अपनी जनता में प्रतिकूल प्रतिक्रिया के डर से वे उस युद्ध का हिस्सा भी नहीं बनना चाहते, जिसकी डोर इजराइल के हाथ में हो। बहरीन और कुवैत का अस्तित्व आगे चल कर खतरे में पड़ सकता है। (1971 तक बहरीन ईरान का हिस्सा था, जिस पर से तत्कालीन शाह रज़ा पहलवी शासन ने ब्रिटेन के दबाव में अपना दावा छोड़ दिया था। कुवैत पर इराक का पारंपरिक दावा रहा है।)

*फिलहाल ईरान ने होरमुज जलडमरुमध्य पर अपना नियंत्रण दिखा दिया है। वह चाहता है कि इस जल मार्ग पर उसकी संप्रभुता को दुनिया मान्यता दे। ऐसा होने का मतलब दुनिया भर में मुक्त नौवहन के उस कायदे का खत्म होना होगा, जिस पर अमल को महाशक्तियां सुनिश्चित करती रही हैं। आधुनिक युग में अमेरिकी वर्चस्व का एक आधार ऐसा कर सकने की उसकी सैन्य शक्ति भी रहा है। लेकिन अब अमेरिका ऐसा कर सकने में खुद को अक्षम पा रहा है। राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप कई बार कह चुके हैं कि जिन देशों को होरमुज जल मार्ग बंद होने से दिक्कत है, वे उसे खुलवाने की हिम्मत दिखाएं!

*क्या यूरोपीय देश, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया आदि ऐसा करने की पहल करेंगे? इस सवाल को बेहतर ढंग से ऐसे पूछा जा सकता है कि क्या वे ऐसा करने में सक्षम हैं? यह तो तय है कि चीन ऐसी पहल नहीं करेगा। इसलिए कि ईरान ने चीनी जहाजों के लिए वह मार्ग खोल रखा है। फिर होरमुज पार करने के लिए चीनी मुद्रा युवान में भुगतान की शर्त लगा कर वह असल में चीन के हित में काम कर रहा है। युवान में भुगतान की शर्त के साथ ईरान ने पेट्रो-डॉलर सिस्टम को चुनौती दी है। अमेरिकी मुद्रा को वैश्विक मुद्रा बनाए रखने का आधार पेट्रो-डॉलर सिस्टम ही है। तेल उत्पादक देशों ने पेट्रोलियम पदार्थों को सिर्फ डॉलर में बेचने के चलन को छोड़ दिया, तो तमाम देशों के लिए अपने विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर को रखने की अनिवार्यता खत्म हो जाएगी। यह अमेरिकी समृद्धि पर जोरदार प्रहार होगा।

*काबिल-ए-गौर है कि डॉलर से अपने कारोबार को अलग करने की कोशिशें इस युद्ध के पहले ही जोर पकड़ चुकी थीं। 2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने पर रूस को पश्चिमी देशों ने डॉलर सिस्टम से बाहर किया, तो उसे विभिन्न देशों ने अपने लिए चेतावनी के रूप में देखा। तब से विदेशी मुद्रा भंडार में स्वर्ण की मात्रा बढ़ाने का रुझान जोर पकड़ता गया है। सोना अब वैश्विक केंद्रीय बैंक भंडार का 24 फीसदी हिस्सा बन चुका है, जो पहली बार 1990 के दशक के मध्य के बाद अमेरिकी ट्रेजरी (21 फीसदी) से अधिक हुआ है। पिछले एक दशक में केंद्रीय बैंकों के भंडार में सोने का प्रतिशत लगभग तीन गुना हो गया है, जिसका कारण विभिन्न देशों के सेंट्रल बैंकों का सोना खरीदारी की मुहिम में जुटना और उसके परिणामस्वरूप सोने की कीमत में तेजी से हुई बढ़ोतरी है।

*इसी दौरान सेंट्रल बैंकों ने अमेरिकी सरकारी ऋण में अपनी हिस्सेदारी लगातार घटाई है। यह बदलाव डॉलर-आधारित परिसंपत्तियों से दूरी बनाने का संकेत देता है।

इन्हीं परिघटनाओं पर गौर करते हुए जर्मनी स्थित ड्यूश बैंक ने पिछले महीने एक रिपोर्ट में कहा — ‘यह युद्ध पेट्रो-डॉलर के वर्चस्व में क्षय की गति तेज कर सकता है और इसके साथ पेट्रो-युवान की शुरुआत हो सकती है।’
मौजूदा युद्ध के परिणामस्वरूप दुनिया में ऊर्जा के उपयोग में भी आमूल बदलाव आ सकता है।

इस वक्त प्राकृतिक गैस एवं पेट्रोलियम की किल्लत के कारण भारत सहित अनगिनत देश जिस मुसीबत से गुजर रहे हैं, उसे देखते हुए अनुमान है कि वे खाड़ी क्षेत्र एवं जीवाश्म ऊर्जा पर अपनी निर्भरता घटाने के लिए प्रेरित होंगे। कोयले का चलन फिर बढ़ सकता है, मगर विभिन्न देश उससे कहीं ज्यादा परमाणु ऊर्जा एवं ग्रीन एनर्जी की तरफ जाने को प्रेरित हो सकते हैं। परमाणु ऊर्जा उच्च विशेषज्ञता और महंगे यूरेनियम पर आधारित है, जबकि पन बिजली, सौर, एवं पवन ऊर्जा अधिक सुलभ हैं।

विडंबना यह है कि जिस तरह पेट्रो-युवान का लाभ चीन को मिल रहा है, वैसे ही ऊर्जा संक्रमण की प्रवृत्ति भी चीन और उसके साथ रूस के लिए सबसे लाभदायक होगी। अक्षय ऊर्जा उत्पादन में चीन का आज कोई सानी नहीं है। जिस किफायती दर पर वह इस ऊर्जा के उत्पादन में सहायक हो सकता है, वैसा करने में कोई अन्य देश सक्षम नहीं है। इसी तरह बांध बनाने एवं अन्य निर्माण कार्यों में उसने अपनी खास पहचान बनाई है।
परमाणु रिएक्टर लगाने में रूस की विशेषज्ञता है। वैसे, इस समय दुनिया में सबसे ज्यादा परमाणु रिएक्टर चीन में लगाए जा रहे हैं।

इन परिघटनाओं को ध्यान में रखते हुए ब्रिटेन के मशहूर अखबार फाइनेंशियल टाइम्स ने मार्च के आखिर में अपने एक विस्तृत विश्लेषण में कहा कि अपनी औद्योगिक शक्ति के कारण चीन आर्थिक एवं कूटनीतिक लाभ प्राप्त करने की स्थिति में है। ये विश्लेषण ‘ईरान युद्ध से महाशक्ति के रूप में चीन की की स्थिति और मजबूत होगी’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ है।

कूटनीतिक प्रभाव का सीधा संबंध किसी देश की आंतरिक शक्ति से होता है। इसलिए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि युद्ध के बाद की दुनिया में वे मंच अधिक प्रभावशाली होंगे, जिनमें चीन की प्रमुख भूमिका है।
बेशक, ईरान युद्ध ने ब्रिक्स+ के सामने पहचान और यहां तक कि प्रासंगिकता का प्रश्न भी खड़ा कर दिया है। ऐसा, कुल मिलाकर भारत के रुख से हुआ है, जिसने बतौर ब्रिक्स+ का अध्यक्ष होने के बावजूद इस संगठन के सदस्य देश ईरान पर हुए अमेरिकी-इजराइली हमले की निंदा नहीं की। बाद में ईरान ने ब्रिक्स+ के सदस्य यूएई को भी अपने निशाने पर लिया, जिससे बात और उलझ गई।

शंघाई सहयोग संगठन भी दो टूक ढंग से अमेरिका-इजराइल के खिलाफ रुख तय नहीं कर पाया।
इन घटनाओं से चीन की दुविधा बढ़ी है। इससे उसकी छवि भी प्रभावित हुई। इसके बावजूद उसने युद्ध के बारे में स्पष्ट रुख लेकर अपनी भूमिका को संदिग्ध नहीं होने दिया है। संभवतः इसका लाभ उसे आगे चल कर मिलेगा।

मगर भारत किस भूमिका में होगा?

नरेंद्र मोदी सरकार ने खुद को अमेरिका-इजराइल के खेमे से जोड़ कर ग्लोबल साउथ के बहुत बड़े हिस्से में भारत की साख कमजोर कर दी है। इसका नुकसान युद्ध के दौरान भी उठाना पड़ा है, जब ईरान ने होरमुज जल मार्ग से नौवहन के लिए भारत को विशेष लाभ देने से इनकार कर रखा है। युद्ध के बाद की परिस्थितियों में यह पहलू भारत के सामने बड़ी चुनौती बनेगा। बहरहाल, भारत की सबसे बड़ी मुश्किल वह नहीं है। उस स्थिति को भारत अभी भी संभाल सकता है। मगर, भारत के नीति-निर्माताओं की सोच का सिकुड़ा होना वह समस्या है, जिसका कोई समाधान अभी नजर नहीं आता।

अपनी अल्प-दृष्टि के कारण भारत के शासकों ने ताकत निर्माण के बजाय शक्ति प्रदर्शन को तरजीह दी, जिसने भारत को विश्व मंच पर आज अलग-थलग खड़ा कर दिया है। अगर शक्ति अपनी हो, तो उसके प्रदर्शन में कोई बुराई नहीं होती। लेकिन किसी अन्य ताकतवर से जुड़ कर उसे अपनी शक्ति मान लेना हमेशा हानिकारक होता है। नरेंद्र मोदी सरकार इसी रास्ते पर चली। अमेरिका से जुड़ने और इजराइल को प्राथमिकता देने की नीतियां संभवतः इसी सोच पर आधारित थीं। अमेरिका की इंडो-पैसिफिक रणनीति से जुड़ कर भारत ने खुद को चीन के प्रतिद्वंद्वी के रूप में पेश किया। मगर अब हालात क्या हैं, इसकी मिसाल देखिए :

बीते 28 मार्च को नीति आयोग ने अपने पूर्व सीईओ बी.वी.आर. सुब्रह्मण्यम और नैसकॉम की अध्यक्ष देबजानी घोष के एक अखबार में छपे लेख को अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल से पोस्ट किया। इस लेख का शीर्षक है — चीन का तकनीकी क्षेत्र में बड़ा कदम : भारत के लिए सबक।

लेख में चीन की 15वीं पंचवर्षीय योजना में आधुनिक तकनीक में नेतृत्व हासिल करने के लिए शामिल रोडमैप का जिक्र है। मुख्य संदेश है कि चीन अलग-अलग तकनीकी क्षेत्रों में नेतृत्व करने के बजाय एक एकीकृत और संगठित तकनीकी इको सिस्टम बनाने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। लेखकों ने दलील दी है कि “विकसित भारत” के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए इसी मॉडल को अपनाया जाना चाहिए। यानी भारत को चीन से सीखना चाहिए! 

विडंबना यह है कि लेख ने चीन की पंचवर्षीय योजना से सीखने की नसीहत दी है। इसे उस संस्था के पूर्व सीईओ ने लिखा और उस संस्था ने अपने आधिकारिक हैंडल से जारी किया, जिसे भारत में योजनाबद्ध विकास के मॉडल को दफनाने के क्रम में बनाया गया था। याद करना उचित होगा कि प्रधानमंत्री बनने के बाद लाल किले से अपने पहले संबोधन में नरेंद्र मोदी ने योजना आयोग को खत्म कर नीति आयोग के गठन का एलान किया था। हालांकि पंचवर्षीय योजना का मॉडल भारत ने 1991 के बाद ही छोड़ दिया था, फिर भी 2014 तक ये संस्था संसाधन आबंटन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थी।

जहां के कर्ता-धर्ताओं का नजरिया इतना भटका हुआ हो कि वे सिर्फ चमक देख पाएं, जबकि उस चमक को हासिल करने के पीछे की तैयारियां और मेहनतें उनकी दृष्टि से ओझल रहें, तो समझा जा सकता है कि वह देश अपनी कैसी पहचान एवं कैसा प्रभाव कायम कर पाएगा! अमेरिका से जुड़ना और चीन से मोहित होना — ये भारत के नीति-निर्माताओं का नजिरया है। मगर कोई देश ना तो किसी अन्य की ताकत से जुड़ कर मजबूत बनता है, और ना ही किसी अन्य की सफलता से अचानक आकर्षित होकर कहीं पहुंच सकता है।

जिस देश से जुड़ कर महाशक्ति बनने को सोचा गया, उसका एक मंत्री भारत आकर यह कह गया कि चीन के विकास में सहयोगी बनने की जो गलती अमेरिका ने की, वह भारत के मामले में नहीं दोहराएगा। इसके बाद भी भारत में किसी को अमेरिका से कोई उम्मीद बची हो, तो उसे उसका भोलापन ही समझना चाहिए। उधर चीन का मॉडल भी फिलहाल काम नहीं आएगा, क्योंकि भारत के आर्थिक ढांचे पर एकाधिकारवादी पूंजीपतियों ने कुंडली मार रखी है, जो किसी भी तरह का नियोजन नहीं होने देंगे।

ऐसे में यह दुर्भाग्यपूर्ण, लेकिन हकीकत है कि बड़े वैश्विक परिवर्तन के इस दौर में भारत की भूमिका एक दर्शक या अधिक से अधिक साइड हीरो से अधिक कुछ नहीं है। साइड हीरो का रोल भी भारत तभी निभा पाएगा, जब वह आत्म-वंचनाओं से उबरे और अपनी असल स्थिति को स्वीकार करे। 

वैसे, भारत के नीति-निर्माता चाहें, तो वे अभी से उस समय की तैयारी शुरू कर सकते हैं, जब फिर से युग परिवर्तन का दौर आएगा। भारत अपने अवाम को केंद्र में रखते हुए अपनी राष्ट्रीय शक्ति विकसित करे, तो उस दौर में वह मुख्य भूमिका वाले देशों में संभवतः शामिल हो सकेगा। मगर फिलहाल तो देश उलटी दिशा में है!

(साभार : जनचौक। सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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