(आलेख : प्रभात पटनायक, अनुवादक : राजेंद्र शर्मा)

हम अगर भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के विशिष्ट प्रावधानों को अलग भी रख दें, तब भी इस समझौते की दो ऐसी असामान्य विशेषताएं हैं, जो इस समझौते के उस प्रकार की एक ग़ैर-बराबरी की संधि होने को दिखाती हैं, जिस तरह की संधियां सामराजी ताकतें वैश्विक दक्षिण या पिछड़ी दुनिया के ऐसे देशों पर थोपा करती थीं, जिन पर वे सीधे-सीधे राज नहीं करती थीं।

इनमें पहली तो यही व्यवस्था है कि जिन माल को पूरी तरह से ही इस समझौते के दायरे से बाहर रखा गया है, उन्हें छोड़ दिया जाए तो, जहां अमेरिका भारतीय मालों पर 18 फीसद आयात शुल्क लगाएगा, डोनाल्ड ट्रंप के बयान के अनुसार मोटे तौर पर भारत, अमेरिकी मालों पर शून्य आयात शुल्क लगाएगा। इस तरह का समझौता करना, जो आधिकारिक रूप से टैरिफ की दरों में इस तरह के अंतर को संस्थागत रूप से स्थापित करता है, बहुत ही अजीबो-गरीब है।

इसका अर्थ तो यही है कि अमेरिका तो ‘पड़ौसी जाए भाड़ में’ की नीति अपनाएगा, लेकिन जिस पड़ौसी को इस नीति के जरिए वास्तव में ‘कंगाल’ बनाया जा रहा होगा, वह वास्तव में अमेरिका के साथ एक समझौते पर दस्तखत कर के, अपने साथ ऐसा किए जाने के लिए ‘मंजूरी’ दे रहा होगा।

दूसरी असामान्य विशेषता, इस प्रावधान में है कि भारत को अगले पांच साल तक, हर साल कम से कम 100 अरब डालर के अमेरिकी माल खरीदने होंगे। एक ऐसा व्यापार समझौता, जो इसका प्रावधान करता है कि किसी देश को, हर सूरत में दूसरे देश से कम से कम कितने मूल्य के माल खरीदने होंगे, मुक्त बाजार की समूची विचारधारा के ही खिलाफ जाता है, जो कि पूंजीपति वर्ग को इतनी प्यारी है। इस विचारधारा के अनुसार तो वास्तव में कितने मूल्य का व्यापार होगा, खरीददारों के चयनों से तय होगा। उन्हें सरकारों द्वारा थोपा नहीं जा सकता है और इसलिए ये सरकारों के फैसले नहीं हो सकते हैं। इसलिए, खरीद के इस वादे का एक समझौते में शामिल किया जाना, पूरी तरह से अजीबो-गरीब है।



और इससे भी ज्यादा अजीब है यह तथ्य कि यह न्यूनतम आंकड़ा, इस समझौते के एक पक्ष के लिए तो तय किया गया है, लेकिन दूसरे पक्ष के लिए तय ही नहीं किया गया है, जो साफ तौर पर इसे एक ग़ैर-बराबरी की संधि बना देता है।

इस तरह की ग़ैर-बराबरी की संधि तो किसी देश द्वारा दूसरे देश पर थोपी ही जा सकती है। भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार चाहे कुछ भी दिखावा क्यों न करे, अमेरिका ने उसकी बाहें मरोड़ कर उसे इस समझौते पर दस्तखत करने के लिए मजबूर किया है। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहला ही मौका है, जब हमारे स्वतंत्र देश की सरकार इतनी कायरता का प्रदर्शन कर रही है कि उसने, एक ऐसी ग़ैर-बराबरी की संधि पर दस्तखत कर दिए हैं, जो औपनिवेशिक दौर में याद दिलाती है।

रूसी तेल का मुद्दा : मेहनतकशों पर चोट

इस ग़ैर-बराबरी की संधि के दो सबसे स्वत:स्पष्ट निहितार्थ हैं। पहला, रूसी तेल की खरीद के संबंध में। और दूसरा, कृषि क्षेत्र के संबंध में।

एक सवाल जो सबसे पहले उठता है, वह तो यही है कि भाजपा के नेतृत्ववाली सरकार यह कैसे सुनिश्चित करेगी कि अमेरिका से भारत के आयात, जो इस समय 40 अरब डालर के करीब पर हैं, आने वाले वर्ष में कम से कम 100 अरब डालर हो जाएं। जाहिर है कि सरकार इसकी तो उम्मीद कर ही नहीं सकती है कि भले ही अमेरिकी मालों पर टैरिफ घटाकर शून्य कर दिया जाए, तमाम तरह की अमेरिकी सेवाओं तथा मालों का आयात, कुछ ही महीनों में बढ़कर दोगुने से ज्यादा हो जाएगा।

जाहिर है कि वह इसी के भरोसे होगी कि रूसी तेल के आयात में कमी की जाएगी और उसकी जगह अमेरिकी तेल खरीदा जाएगा, क्योंकि यही ऐसी चीज है, जो आयात में ऐसी बढ़ोतरी को संभव बना सकती है। लेकिन, ऐसा करना न सिर्फ अमेरिकियों के उस फरमान को लागू करना होगा, जिसकी मांग अमेरिकी काफी अर्से से करते आ रहे थे, बल्कि यह हमारे देश के तेल आयात के बिल को बढ़ाने का भी काम करेगा और देश में मुद्रास्फीतिकारी दबावों को और बल देने का काम करेगा। इसकी वजह यह है कि अमेरिकी तेल, रूसी तेल के मुकाबले कम से कम 20 फीसद के करीब महंगा बैठेगा।

औसतन भारत के कुल तेल आयात का एक-तिहाई रूस से आता है। बेशक, यह तब की बात है, जब तक भाजपा-नीत सरकार ने रूस से तेल की खरीद में कटौती शुरू नहीं की थी, जैसी कटौती पिछले कुछ महीनों से जारी है। लेकिन, यह कटौती तो अपने आप में ही, इस व्यापार समझौते की पूर्व-भूमिका थी, ताकि इसके प्रभाव को अलग से देखकर नहीं, बल्कि व्यापार समझौते के साथ जोडक़र ही देखा जाए। अब अगर हमारा तेल का कुल आयात 120 अरब डालर के करीब माना जाए, तो इस तरह रूसी तेल की जगह अमेरिकी तेल को अपनाने से, हमारे तेल आयात के बिल में करीब 8 अरब डालर की बढ़ोतरी हो जाएगी।

यह तो उस औपनिवेशिक किस्म की ‘निकासी’ या ड्रेन का सिर्फ एक तत्व है, जिसे इस नये व्यापार समझौते के जरिए भारत पर अमेरिका थोप रहा है। और यह ‘निकासी’ कोई भारतीय तेल की कंपनियों की जेब से नहीं आ रही होगी। ये कंपनियां तो इस बोझ को, घरेलू बाजार के लिए अपने मालों की बढ़ी हुई कीमतों के जरिए, सीधे-सीधे जनता के ऊपर डाल देंगी।

इसका अर्थ होगा, अर्थव्यवस्था को मुद्रास्फीतिकारी धक्का लगना, जिसकी असली मार मेहनतकश जनता पर पड़ेगी, क्योंकि उसकी रुपयों में जो आय होती है, वह किसी भी तरह से कीमतों के बढ़ने के साथ बंधी हुई नहीं है। इसलिए, रूसी तेल की जगह पर अमेरिकी तेल का लाया जाना, सिर्फ अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति का ही मामला नहीं है, यह बहुत ही महत्वपूर्ण वर्गीय प्रश्न भी है।

किसानों की बर्बादी

जहां तक कृषि क्षेत्र का सवाल है, सरकार दावा कर रही है कि चूंकि चावल तथा गेहूं जैसे कुछ महत्वपूर्ण अनाजों को इस समझौते के दायरे से बाहर रखा गया है, इसलिए इस समझौते का खेती पर असर नहीं पड़ने जा रहा है। लेकिन, जैसा कि वाणिज्य मंत्री ने खुद कबूल किया है, हालांकि उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह कबूल नहीं किया है, कृषि के क्षेत्र के एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्से के या डॉउनस्ट्रीम गतिविधियों के लिए दरवाजे खोल दिए गए हैं। सेब, कपास, ट्री नट्स, ताजा तथा प्रोसेस्ड फल, सोयाबीन का तेल और वाइन तथा स्प्रिट्स, इसके उल्लेखनीय उदाहरण हैं। इसके अलावा डीडीजी तथा लाल ज्वार जैसे पशु आहारों के लिए भी दरवाजे खोल दिए गए हैं, जो अमेरिकी कंपनियों को भारतीय बाजारों में करीब-करीब इजारेदारी की हैसियत दिलाने जा रहा है। जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, महाराष्ट्र तथा गुजरात जैसे राज्यों पर इस सबकी खासतौर पर भारी मार पड़ने जा रही है।

बेशक, यह दलील दी जाएगी कि देश में पशु आहार की तंगी है और इसलिए इसका आयात बढ़ना तो देश के लिए फायदे का ही होगा। लेकिन, अपनी तंगी के लिए आवश्यक मात्रा में आयात लाना एक बात है और इस तरह के आयात के लिए, वह भी जीरो टैरिफ पर, अपने पूरे के पूरे बाजार के ही दरवाजे खोल देना, बिल्कुल अलग ही बात है।

इसी प्रकार, वाणिज्य मंत्री के इस इस दावे से कोई खास संतोष नहीं मिल सकता है कि भारत-अमेरिका समझौते में दुग्ध उत्पादों को तो बाहर ही रखा गया है, जबकि यूरोपीय यूनियन, न्यूजीलैंड तथा यूनाइटेड किंगडम के साथ हाल ही में किए गए मुक्त व्यापार समझौतों में तो दुग्ध क्षेत्र शामिल है।

यह उल्लेखनीय है कि ट्रंप प्रशासन इस समझौते के चलते अमेरिकी किसानों की आय में अरबों डालर की बढ़ोतरी की बातें कर रहा है, जबकि भारत सरकार देश की खेती के लिए इस समझौते के किसी भी तरह के नकारात्मक प्रभावों से इंकार ही कर रही है। अगर अमेरिकी किसानों को भारत में बढ़ा हुआ बाजार हासिल होने जा रहा है, तो अनिवार्य रूप से इसका अर्थ यही है कि भारतीय किसानों को इस बाजार से धकिया कर बाहर किया जा रहा होगा। इसका इकलौता अपवाद होगा, पशु आहार जैसी लागत सामग्री के रूप में इस्तेमाल होने वाले कुछ कृषि उत्पादों की ताजा ऋणों की वित्त व्यवस्था से संचालित खरीददारी। लेकिन, इस तरह की खरीददारी तो इस समझौते के चलते भारत के लिए कृषि निर्यातों में कुल बढ़ोतरी का एक छोटा सा अंश भर होगी।

औपनिवेशिक दौर की प्रतिध्वनि

पुन:, यहां भी हमें औपनिवेशिक दौर की प्रतिध्वनि सुनाई देती है। तब किसान तथा खेत मजदूर, अर्थव्यवस्था पर औपनिवेशिक अतिक्रमण के बदतरीन शिकार हुए थे। इसीलिए, उपनिवेशविरोधी संघर्ष के बैनर पर अंकित नारों में सबसे ऊपर यही नारा अंकित था कि स्वतंत्र भारत में किसानों और मजदूरों को कभी भी ऐसी दुरावस्था का मुंह नहीं देखना पड़ेगा। लेकिन, स्वतंत्रता संघर्ष के इस वादे के साथ पूरी तरह विश्वासघात करते हुए, एक बार फिर उनके ऊपर वही मुश्किलें ढहायी जा रही हैं और हैरानी की बात नहीं है कि यह एक ऐसी पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा किया जा रहा है, जिसका भारत की आजादी की लड़ाई से कुछ भी लेना-देना ही नहीं था।

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर आलोचनात्मक टिप्पणियां भी आम तौर पर इसका दोष पूरी तरह से मोदी सरकार के ही सिर पर डालने की कोशिश करती हैं। लेकिन, यह सतही समझ है। सरकारें और इसमें फासीवादी सरकारें भी आती हैं, जो खास वर्गों के ही हितों में काम करती हैं। और यह उल्लेखनीय है कि इस समझौते की खबर से, भारतीय शेयर बाजार में बड़ा भारी जोश पैदा हुआ है। भारत का बड़ा पूंजीपति वर्ग और वेतनभोगी तबके के ऊपर वाले हिस्से और पेशेवर लोग, अमेरिका के साथ इस तरह के गठजोड़ के पक्ष में हैं, भले ही यह देश के मेहनतकशों की कीमत पर किया जा रहा हो। भारतीय बड़े पूंजीपति वर्ग की वैश्विक बनने की तलाश को, अमेरिकी बाजार की उपलब्धता से बढ़ावा मिलता है, भले ही इसके लिए 18 फीसद टैरिफ ही क्यों नहीं चुकाना पड़ रहा हो। इसी प्रकार, वेतनभोगी वर्ग के ऊपर वाले हिस्से और पेशेवर लोग, अपने बच्चों को अमेरिका में सैटल होते देखना चाहते हैं। उनकी इस इच्छा को ट्रंप के बै र-भाव से एक धक्का लगा था और अब उन्हें अपनी इस इच्छा के पूरा होने की ज्यादा संभावना नजर आ रही है।

साम्राज्यवाद के सामने इस समर्पण के पीछे है, आजादी की लड़ाई के दौरान बने उपनिवेशवादविरोधी वर्गीय गठबंधन का दरकना, जिसका नतीजा यह हुआ है कि बड़ा पूंजीपति वर्ग और वेतनभोगियों का ऊपरी संस्तर तथा पेशेवर, अपने ही स्वार्थों को आगे बढ़ाने के लिए, मेहनतकश जनता के हितों को कुर्बान करने के लिए तैयार हैं।

नव-उदारवाद से शुरू रणनीति अब अगली मंज़िल पर

बहरहाल, उपनिवेशविरोधी वर्गीय गठबंधन का दरकना  तो भाजपा के नेतृत्ववाली सरकार के सामने आने से पहले से ही शुरू हो चुका था। वास्तव में नव-उदारवादी रणनीति का अपनाया जाना अपने आप में, इस दरकने को ही अभिव्यक्त करता था। दूसरे शब्दों में, अन्य आर्थिक मामलों की ही तरह यहां भी, फासीवादी ताकतों के नेतृत्व में चल रही सरकार मेहनतकश जनता के प्रति निर्मम उपेक्षा के साथ उस प्रवृत्ति को आगे ले जा रही है, जिसे नव-उदारवाद के अपनाए जाने के साथ पहले ही शुरू किया जा चुका था।

अमेरिकी साम्राज्यवाद के सामने मोदी सरकार के इस समर्पण और उससे पहले रही एक प्रधानमंत्री के रुख में, हालांकि वह भी एक पूंजीपति वर्ग के नेतृत्ववाली सरकार ही चला रही थीं, हमें जमीन-आसमान का अंतर नजर आता है। भारत की उस प्रधानमंत्री ने अमेरिका के दबाव को इतनी दृढ़ता से ठुकराया था कि एक अमेरिकी राष्ट्रपति ने खुद कबूल किया था, उसे उनकी आंखों में देखकर बात करने से डर लगता था। लेकिन, इन दो सूरते हाल में अंतर इस तथ्य में निहित था कि वह एक नियंत्रणात्मक आर्थिक निजाम की नेता थीं, जो उपनिवेश-विरोधी संघर्ष के बीच से उभरा था और देश में पूंजीवादी विकास लाने के बावजूद यह निजाम, मेहनतकश जनता के हितों की ओर से आंखें मूंदकर नहीं चलता था।

(लेखक दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आर्थिक अध्ययन एवं योजना केंद्र में प्रोफ़ेसर एमेरिटस हैं।)

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