1. राष्ट्रवाद के विकास में नाड़े का योगदान : विष्णु नागर

राष्ट्रवादी जी के पजामे को बार-बार नीचे खिसकने की गंदी आदत थी। चाहे वे कितनी ही होशियारी और सावधानी बरतें, पजामा नीचे खिसके बिना मानता नहीं था। शक था कि राष्ट्रवाद के विरुद्ध यह सेकुलरों का षड़यंत्र है, मगर सरकार ने कभी इसकी जांच सीबीआई से करवाने की आवश्यकता नहीं समझी!

खुशकिस्मती से राष्ट्रवादी जी इतने जागरूक थे कि पजामे के नीचे गिरने से ऐन पहले स्थिति संभाल लेते थे। नाड़ा दुबारा कस लेते थे। ऐसी चुनौती घंटे-दो घंटे में एक बार आ जाती थी और सफलतापूर्वक संभाल ली जाती थी!

वे राष्ट्रवादी थे, तो राष्ट्र हित में उन्हें बार -बार भाषण देना पड़ता था। यह उनका राष्ट्रीय कर्तव्य था, लेकिन जब भाषण अपने शिखर पर पहुंचने लगता था, तभी पजामे को न जाने कैसे यह पता चल जाता था और वह नीचे खिसकने के लिए दौड़ने लगता था! उन्हें भाषण बीच में रोक कर नाड़ा कसने पर ध्यान केंद्रित करना पड़ता था।इस दृश्य का आनंद मंच पर बैठे और मंच से नीचे बैठे या खड़े लोग लेते थे, कुछ सीटियां बजाकर अपनी खुशी जाहिर करते थे, मगर ध्यानस्थ होकर वह अपना काम करते रहते और बुरा माने बगैर भाषण पुनः आरंभ कर देते थे।

यहां तक स्थिति आ जाती थी कि जब वह भाषण देने खड़े होते थे, तो नीचे से कुछ श्रोता चिल्लाते थे — ‘पहले नाड़ा कस लो’। कुछ इसका विरोध करते थे, ‘नहीं राष्ट्रवादी जी, अभी नहीं, भाषण के बीचों-बीच उचित समय पर कसिएगा।

वह मुस्कुराते थे और दूसरी तरह के श्रोताओं की मांग को पूरा करते हुए अधबीच में नाड़ा कसते थे। ऐसा भी कभी- कभी होता था कि उनसे पहले के वक्ता को आमंत्रित करने के समय कार्यक्रम का संयोजक उन्हें चेतावनी दे देता था कि इनके बाद आपको बोलना है, इस बीच आप ठीक से नाड़ा कस लें। ऐसा करने पर भी होनी होकर ही रहती थी!

उनके भाषण से पहले भीड़ यह देखने के लिए जुटती थी कि इनका नाड़ा कब ढीला होगा? इस दृश्य को देखने की आशा में श्रोता-दर्शक आते थे और राष्ट्रवादी जी उन्हें निराश नहीं करते थे! राष्ट्रवाद के सामने उपस्थित तमाम दुराशाओं के बीच इस तरह वह आशा के एकमात्र द्वीप बने हुए थे।

कुछ लोग मानते थे कि वह अपनी छवि बनाने के लिए मंच पर जान-बूझकर ऐसी हरकत करते हैं। इस तर्क में भी जान थी।

जनता ने उनका उपनाम नाड़ावाला रख रखा था और राष्ट्रवादी जी इतने अधिक राष्ट्रवादी थे कि उन्होंने इसे सहर्ष कुबूल कर लिया था। अब उनका पूरा नाम नहीं लिया जाता था। नाड़ावाला कहते ही श्रोताओं में हर्ष की लहर दौड़ जाती थी और वह बड़ी शान से मुस्कुराते हुए सब श्रोताओं को नमस्कार करते हुए माइक संभाल‌ लेते थे और तालियों के थमने का इंतजार करते थे। उनके आने पर इतनी तालियां बजती थीं कि इतनी तो प्रधानमंत्री के भाषण के पहले और बाद में भी नहीं बजती थीं!

पार्टी का एक वर्ग इस कारण उनके खिलाफ हो चला था। वह इन्हें पार्टी से निकालने की मांग करने लगा था, मगर इस डर से कि वह कहीं पलटकर धर्मनिरपेक्ष न हो जाएं, इस कारण सुस्त पड़ जाता था। राष्ट्रवादियों ने हाईकमान की चेतावनी के बाद उन्हें निकालने की यह मुहिम बंद-सी कर रखी थी।

प्रधानमंत्री तक उनकी यह ख्याति पहुंची, तो एक सभा में भाषण देने के लिए राष्ट्रवादी जी को बुलाया गया। आश्वस्त हो जाने के बाद कि बंदा इस प्रकार राष्ट्रवाद के प्रचार-प्रसार में राष्ट्रीय स्तर पर उपयोगी साबित हो सकता है, उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया गया। उनसे कहा गया कि आपका एकमात्र काम हर रैली में प्रधानमंत्री के आगमन से पहले अपने भाषण के दौरान कम से कम दो बार नाड़ा कसने के लिए भाषण रोकना और ताली बजवाना है। बाकी मंत्री पद का काम आपको गाड़ी-बंगला की सुविधा प्रदान करने के लिए दिया गया है। काम की आप बिलकुल चिंता न करें और चिंता करेंगे तो पद गंवा बैठेंगे! बस जहां कहा जाए, वहां दस्तखत कर दें! शेष काम प्रभु पर छोड़ें!

अब तो  पूरे देश में उनकी धूम मच गई थी!अनेक राष्ट्रवादी यह शैली अपनाने लगे थे, मगर जो बात ओरिजनल में होती है, वह नकलों में नहीं थी। ऐसे नकलबाजों का विकास जिला स्तर से आगे नहीं हो सका था।

इस तरह पार्टी बढ़ने लगी, राष्ट्रवाद का विकास होने लगा।

*(कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)*
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2. मास्टर स्ट्रोक ही मास्टर स्ट्रोक, गिन तो लें! : राजेन्द्र शर्मा

ये लो, कर लो बात। कहां तो मोदी जी डाइरेक्ट ईरान के  राष्ट्रपति पेजेश्कियां से बात कर रहे हैं। ईद तो ईद, नौरोज तक की बधाइयां दे रहे हैं और वह भी सिर्फ राष्ट्रपति को ही नहीं, ईरान की सरकार और जनता को भी। जिनके सिर पर दिन-रात बम बरस रहे हैं, उनके लिए नये वर्ष के शांति से भरा होने की कामनाएं कर रहे हैं।

और हां! अगर यह सब फोन पर ही झप्पी-पप्पी करने के बराबर ही मान लिया जाए तब भी, मोदी जी इतने पर ही रुक नहीं गए हैं। वह पश्चिम एशिया में तनाव और टकराव बढ़ने पर गहरी चिंता भी जता रहे हैं।

इस इलाके में ऊर्जा के बुनियादी ढांचे पर तमाम हमलों की निंदा कर रहे हैं। चेता रहे हैं कि ऐसी हरकतों से सारी दुनिया की खाद्य तथा ऊर्जा सुरक्षा के लिए और दुनिया भर में कृषि निर्यातों के लिए गंभीर खतरा पैदा हो रहा है। होर्मुज की खाड़ी की सुरक्षा बनी रहना सुनिश्चित करने और फारस की खाड़ी में नौवहन की आजादी सुनिश्चित करने का महत्व समझा रहे हैं। इस सिलसिले में विभिन्न विश्व नेताओं से अपनी बातचीत होने का हवाला भी दे रहे हैं। और तो और इसका ज्ञान भी दे रहे हैं कि युद्ध का रास्ता चुनना किसी के भी हित में नहीं है। आखिर में इसका उपदेश भी दे रहे हैं कि सभी पक्षों को जितना जल्दी हो सके, शांति की ओर बढ़ना चाहिए। और ये नासमझ, बल्कि नालायक विपक्षी उसी बीती बात पर अटके हुए हैं — क्या मोदी जी ने ईरान पर अमरीका-इस्राइल के हमले की निंदा की? क्या मोदी जी ने ईरान के सुप्रीम लीडर समेत कई नेताओं की चुन-चुनकर हत्या किए जाने की निंदा की? क्या मोदी जी ने बच्चियों के एक स्कूल समेत, ईरान में हजारों नागरिक ठिकानों पर अमरीकी-इस्राइली हमलों की निंदा की? नहीं की!

पहले हफ्ते न बात की, न  निंदा की। दूसरे हफ्ते में बात की, पर निंदा नहीं की। तीसरे हफ्ते के आखिरी दिन फिर बात की, पर निंदा फिर भी नहीं की। तीन हफ्ते निकाल दिए, पर निंदा फिर भी नहीं की!

अब मोदी जी का विरोध करने वाले इन पप्पुओं को कोई कैसे समझाए कि यह कोई चूक नहीं, मास्टर स्ट्रोक है, मोदी जी का नया मास्टर स्ट्रोक! देखा नहीं, कैसे हमले के दो दिन पहले, जब मोदी जी ने इस्राइल का दौरा किया, नेतन्याहू के साथ झप्पी-पप्पी की, इस्राइल की संसद में भाषण दिया और बदले में उससे एकदम नया-निकोरा मैडल वसूल किया, तब यही विरोधी क्या कह रहे थे — मोदी जी ने भारत को नेतन्याहू के पाले में भर्ती करा दिया। और जब अमरीका और इस्राइल ने मिलकर ईरान पर हमला कर दिया और उसके कई नेताओं को चुन-चुनकर मार दिया और मोदी जी ने फिर भी निंदा का एक शब्द तक नहीं कहा, तब वही विरोधी शर्म-शर्म के नारे लगा रहे थे। जब मोदी जी ने पहले हफ्ते में नेतन्याहू समेत, खाड़ी देशों के नेताओं से बात की और उन पर हमले की निंदा की, पर ईरान के नेताओं से न बात की और न ईरान पर हमले की निंदा की, तब यही विरोधी इसे विश्वासघात बता रहे थे। लेकिन, जब दूसरे हफ्ते में मोदी जी ने ईरान के राष्ट्रपति से बात तो की, पर बाकी सब किया, लेकिन अमरीकी-इस्राइली हमले की निंदा नहीं की, तब वही विरोधी गैस की तंगी, तेल की तंगी का शोर मचा रहे थे और होर्मुज के फंदे से टैंकर छुड़ाने की गुहार लगा रहे थे।

और अब जब तीसरे हफ्ते में मोदी जी ने फिर बात की है, पर हमले की निंदा अब भी नहीं की है, तो विरोधी इसकी शिकायतें कर रहे हैं कि हमारे ढाई दर्जन टैंकर अब भी होर्मुज में क्यों अटके पड़े हैं? और इसकी शिकायतें भी कि गैस के बाद अब तेल के दाम बढ़ने वाले हैं। बस जरा विधानसभाई चुनावों का अगले महीने वाला चक्र निकल जाए। देखा, मोदी जी ने कैसे तीन हफ्ते में ही विरोधियों के तीरों को विदेश नीति से हटाकर, तेल-गैस के दाम की तरफ मोड़ दिया।

पर असली मास्टर स्ट्रोक इतना ही नहीं है। सब किया पर मोदी जी ने निंदा का एक शब्द अपनी जुबान से नहीं आने दिया, डियर फ्रेंड ट्रंप और डियर फ्रेंड नेतन्याहू की दोस्ती में, बाल बराबर दरार नहीं आने दी। खाड़ी वाले दोस्तों की भी दोस्ती और पुख्ता कर लिया। पर ईरान के राष्ट्रपति को भी फोन किया और उसे भी बहुत नाराज नहीं किया। नतीजा! होर्मुज में फंसे गैस के अपने दो जहाज भी निकलवा लाए। अमरीका से इसकी इजाजत भी ले आए कि भारत, एक महीने तक वह रूसी तेल खरीद सकता है, जो पहले ही जहाजों पर लदा हुआ है और समुद्र में है।

और अब तक तो अमरीका ने ईरान से भी उसका तेल लेने की इजाजत दे दी है, जो पहले से जहाजों पर लदा हुआ है। बल्कि हम तो कहेंगे कि ईद-नवरोज की मुबारकबाद के बाद, मोदी जी होर्मुज से भारत के दो-चार और कंटेनर तो निकलवा ही लाएंगे। यानी लड़ने वाले भले ही लड़ते रहें, भारत तक तेल और गैस आता रहेगा, रूस और ईरान से भी और वह भी ट्रंप साहब की इजाजत से! इससे बड़ा मास्टर स्ट्रोक क्या होगा!

फिर भी मास्टरस्ट्रोक इतना ही नहीं है। ट्रंप-नेतन्याहू से मोदी जी की दोस्ती बनी ही रही है और ईरान वालों से भी उन्होंने ज्यादा दुश्मनी नहीं होने दी है। फिलहाल ब्रिक्स का अध्यक्ष होने से मोदी जी के भारत ने, उसके मंच से अमरीका-इस्राइल के हमले की निंदा नहीं होने दी है। पर ईरान वालों की इसकी उम्मीद भी बनाए रखी है कि ब्रिक्स कम से कम अपने सदस्य के नाते ईरान पर, हमले की निंदा करेगा। और जल्दी न भी सही, तब भी कभी न कभी तो, सुलह की बात चलेगी ही और सुलह के लिए बीच-बचाव करने वाले की जरूरत भी पड़ेगी ही। उस समय बीच-बचाव करने के लिए मोदी जी से बेहतर स्थिति में कौन होगा — जिसे हमला करने वाला भी अपना संगी माने और हमले का मुकाबला करने वाला भी अपना दुश्मन नहीं माने।

आखिरकार, भागवत जी ने एंवें ही थोड़े कह दिया है कि सारी दुनिया कह रही है कि इस युद्ध को कोई रुकवा सकता है, तो मोदी जी का भारत ही रुकवा सकता है। मोदी जी को युद्ध रुकवाने का वैसे भी काफी एक्सपीरिएंस भी तो है। चौबीस घंटे के लिए ही सही, रूस-यूक्रेन युद्ध तो मोदी जी ने रुकवाया ही था, जैसा राजनाथ सिंह तक कह चुके हैं। ऑपरेशन सिंदूर की लड़ाई भी वैसे रुकवायी तो मोदी जी ने ही थी, यह दूसरी बात है कि मोदी जी ने शांति के नोबेल पुरस्कार के चक्कर में ट्रंप को इसका श्रेय छीन लेने दिया। पर इस बार नहीं। वॉर जब भी रुके, इस बार मोदी जी उसे रुकवाना अपने नाम करा के रहेंगे। आखिर, विश्व गुरु की गद्दी का सवाल है। यह होगा सारे मास्टर स्ट्रोकों का मास्टर स्ट्रोक। 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और ‘लोक लहर’ के संपादक हैं।)

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