गाजियाबाद के हरीश राणा को AIIMS में अंतिम विदाई… माँ-पिता ने 4700 दिनों तक बेटे की सांसें थामीं, आज दर्द से मुक्ति की प्रार्थना के साथ छोड़ा हाथ दिल्ली के AIIMS के उस शांत पैलिएटिव केयर वार्ड में आज एक ऐसा दृश्य लिखा जा रहा है, जो किसी भी माँ-बाप के दिल को चीर दे। 13 साल से कोमा में पड़े 32 वर्षीय हरीश राणा को अब जीवन-रक्षक उपकरणों से मुक्त किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद यह प्रक्रिया शुरू हुई है—पैसिव यूथेनेशिया, यानी सम्मानजनक मृत्यु का अधिकार। तेरह साल।यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं। यह 4700 से ज्यादा दिनों की वो जागती रातें हैं, जब माँ निर्मला देवी हर सुबह बेटे के माथे पर हाथ फेरतीं और फुसफुसातीं, “आज शायद आँखें खुल जाएँ…”। पिता अशोक राणा दिन-रात अस्पतालों के चक्कर काटते रहे, डॉक्टरों से उम्मीद की एक किरण माँगते रहे। हरीश 2013 में पंजाब यूनिवर्सिटी के अंतिम सेमेस्टर में थे—एक हादसा, चौथी मंजिल से गिरना, और फिर कभी वो मुस्कुराता चेहरा नहीं लौटा। ब्रेन इंजरी, वेजिटेटिव स्टेट, क्वाड्रिप्लेजिया… और 100% अक्षमता। फिर भी माता-पिता ने हार नहीं मानी। हर दिन एक ही कमरा, एक ही बिस्तर, एक ही शरीर—जो सांस लेता था, लेकिन जीता नहीं था। कोई संवाद नहीं, कोई मुस्कान नहीं, कोई सपना नहीं। सिर्फ मशीनों की आवाज और माँ के आँसुओं की चुप्पी। समाज भूल गया, न्यूज चैनल आगे बढ़ गए, लेकिन माँ का दिल रुक गया था। वह रोज बेटे के सिरहाने बैठतीं, हाथ थामतीं, और प्रार्थना करतीं—चमत्कार की। लेकिन आज वही माँ कह रही हैं, “अब उसकी तकलीफ नहीं देखी जाती… हमने उसे जाने की इजाजत दे दी।”यह वाक्य कितना छोटा, कितना भारी। सुप्रीम कोर्ट ने माता-पिता की याचिका पर कहा, “यह छोड़ना नहीं, बल्कि सम्मान के साथ विदा करना है। प्रेम का असली अर्थ देखभाल है, और कभी-कभी मुक्ति देना ही सबसे बड़ी देखभाल होती है।” जब हरीश को गाजियाबाद से AIIMS लाया गया, तो माँ ने ब्रह्मकुमारी की एक बहन के साथ बैठकर बेटे से कहा—“सबको माफ करते हुए, सबसे माफी मांगते हुए अब जाओ… ठीक है।”यह सिर्फ आध्यात्मिक शब्द नहीं थे। यह उस पल का बयान था, जहाँ प्रेम और जीवन आमने-सामने खड़े हो जाते हैं। पकड़ना प्रेम है, लेकिन कभी-कभी छोड़ना उससे भी बड़ा प्रेम होता है। उसी कलयुग में, जहाँ बेटे संपत्ति के लिए पिता मार देते हैं, भाई-भाई दुश्मन बन जाते हैं, रिश्ते तेरह मिनट में टूट जाते हैं—वहाँ गाजियाबाद के एक घर में माँ-पिता ने तेरह साल तक एक सांस को टूटने नहीं दिया। बच्चे माँ-बाप को बोझ समझते हैं, लेकिन ये माता-पिता बेटे को बोझ नहीं, अपना जीवन मानते रहे। सवाल अब इच्छा-मृत्यु का नहीं रहा। सवाल यह है—क्या हम किसी के लिए इतने लंबे समय तक बिना किसी गारंटी के खड़े रह सकते हैं? क्या हम किसी के दर्द को अपना दर्द बना सकते हैं? हरीश राणा की कहानी सिर्फ कानूनी बहस नहीं। यह उस माँ की कहानी है, जिसने 13 साल तक मौत को दरवाजे पर रोका, और जब समझ आया कि जीवन अब सिर्फ पीड़ा है, तो उसी माँ ने मौत को गले लगाया।कोई गुस्सा नहीं, कोई शिकायत नहीं। बस एक प्रार्थना—“भगवान, मेरे बेटे को अब दर्द से आजादी दे देना।” कलयुग कितना भी कठोर हो जाए, माँ का दिल अभी भी सतयुग से चलता है।हरीश की आत्मा को शांति मिले। और ऐसे माता-पिता को प्रणाम, जिन्होंने प्रेम को सबसे कठिन परीक्षा में भी जीत दिलाई। View this post on Instagram View this post on Instagram Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन इंदौर में तिलक नगर पुलिस ने 8.30 ग्राम MD ड्रग के साथ युवक को किया गिरफ्तार, अंतरराष्ट्रीय बाजार मूल्य करीब 80 हजार रुपये महिला उद्यमियों से सांसद शंकर लालवानी का संवाद: इंदौर की जीडीपी डबल करने में महिलाओं की अहम भूमिका पर चर्चा