-मुस्ताअली बोहरा
अधिवक्ता एवं लेखक
भोपाल, मप्र

भारत रत्न, महान मर्मज्ञ, अर्थशास्त्री, संविधान शिल्पी, आधुनिक भारत की नींव रखने वाले, इतिहास के ज्ञाता, तत्वज्ञानी, मानव शास्त्र के ज्ञाता, कानूनविद, मानवाधिकार के संरक्षक, पाली साहित्य के अध्ययनकर्ता, महान लेखक, समाज सुधारक, राजनीतिज्ञ, संपादक, बौद्ध साहित्य के अध्ययनकर्ता, मजदूरों के मसीहा, इतिहासविद, प्रोफेसर, शिक्षाविद, आजाद भारत के पहले कानून मंत्री डाॅ. भीमराव आंबेडकर जिन्हें पूरी दुनिया प्यार और सम्मान के साथ बाबा साहब के नाम से पुकारती है। वह अपने युग के सबसे ज्यादा पढ़े लिखे राजनेता और एवं विचारक थे। 1990 में उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया है। उनका मूल नाम भीमराव है। यूं तो इतिहास में कई महापुरुष हुए लेकिन बाबा साहब जैसा शायद ही कोई हुआ हो। बाबा साहेब ने अपने विचार और काम, दोनों केे जरिए समाज को जो दिया वैसा योगदान किसी और का नहीं है। सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक, संवैधानिक, शैक्षणिक सहित शायद ही ऐसा कोई क्षेत्र हो जिसमें बाबा साहब का योगदान ना हो। बाबा साहब चाहते थे कि दलितों को जो अधिकार मिलने चाहिए, वे उन्हें हासिल हों, देश-समाज में उनका सम्मान बढ़े, दलितों का स्तर ऊँचा उठे और उन्हें बराबरी का दर्जा हासिल हो। बाबा साहब ने कहा कि उनका जीवन तीन गुरुओं और तीन उपास्यों से कामयाब बना है। उन्होंने जिन तीन महान व्यक्तियों को अपना गुरु माना, उसमे उनके पहले गुरु थे तथागत गौतम बुद्ध, दूसरे थे संत कबीर और तीसरे गुरु थे महात्मा ज्योतिराव फुले थे। उनके तीन उपास्य थे ज्ञान, स्वाभिमान और शील। आज भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के और भी कई देशों में आम्बेडकरवाद का प्रचार और प्रसार हो रहा है। स्वतंत्रता, समानता, भाईचारा, बौद्ध धर्म, विज्ञानवाद, मानवतावाद, सत्य, अहिंसा ही आम्बेडकरवाद के सिद्धान्त हैं। छुआछूत को खत्म करना, दलितों में सामाजिक सुधार, भारतीय संविधान में निहीत अधिकारों तथा मौलिक हकों की रक्षा करना, जाति मुक्त समाज की रचना ही इसका मकसद है। आम्बेडकरवाद सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक विचारधारा है। बता दें कि वह कुल 64 विषयों में मास्टर थे, 32 डिग्रियों के साथ 9 भाषाओं के जानकार थे, इसके साथ ही उन्होंने विश्व के सभी धर्मों के बारे में पढ़ाई की थी। उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में मात्र 2 साल 3 महीने में 8 साल की पढ़ाई पूरी की थी। वह लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से ‘डॉक्टर ऑल साइंस’ नामक एक दुर्लभ डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त करने वाले भारत के ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के पहले और एकमात्र व्यक्ति हैं।  
बाबा साहेब का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के महू नगर में हुआ था। उनके पिता का नाम रामजी मालोजी सकपाल और उनकी माता का नाम भीमाबाई सकपाल है। डॉ बाबा साहेब का जीवन संघर्षों से भरा रहा है। उन्होंने बचपन से ही जाति भेदभाव और असमानता का सामना किया। वे ज़िंदगी भर समाज में अधिकार, समानता और न्याय के लिए संघर्ष करते रहे। उन्हें बचपन से ही पढ़ने का शौक था। उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की और अंततः लंदन के अंग्रेजी विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने के बाद भारत लौटे। उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स दोनों ही विश्वविद्यालयों से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधियाँ प्राप्त कीं तथा विधि, अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में शोध कार्य भी किये थे। भारत लौटने के बाद उन्होंने अपना जीवन सामाजिक सुधार कार्यों में लगा दिया। वे अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे एवं वकालत भी की। इसके बाद का जीवन राजनीतिक गतिविधियों में अधिक बीता। डाॅ अम्बेडकर ने आजादी मंे भी अहम योगदान दिया। साथ ही पत्रिकाओं को प्रकाशित करने, राजनीतिक अधिकारों की वकालत करने के साथ ही दलितों के लिए सामाजिक स्वतंत्रता की वकालत की। डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जी व उनका का परिवार संत कबीर की विचारधारा से खासा प्रभावित था और संत कबीर के ज्ञान को आधार बनाकर जीवन जीता था। हिंदू पंथ में व्याप्त कुरूतियों और छुआछूत की प्रथा से तंग आकार सन 1951 में बाबा साहब ने बौद्ध धर्म अपना लिया था। 14 अप्रैल को उनका जन्म दिवस आम्बेडकर जयंती के तौर पर भारत समेत दुनिया भर में मनाया जाता है। बाबा साहब का महापरिनिर्वाण 6 दिसंबर 1956 को राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में हुआ, इस दिन को महापरिनिर्वाण दिवस के रूप में मनाया जाता है।  
भीमराव आंबेडकर वर्ष 1948 से मधुमेह बीमारी से पीड़ित थे। वर्ष 1954 में जून से अक्टूबर तक काफी बीमार रहे और उन्हें देखने में भी परेशानी होने लगी थी। बावजूद इसके वे 1955 तक काम करते रहे। 3 दिसंबर 1956 को डॉ भीमराव अंबेडकर ने अपनी अंतिम पांडुलिपि बुद्ध और धम्म उनके को पूरा किया। इसके तीन दिन बाद ही 6 दिसम्बर 1956 को बाबासाहेब का महापरिनिर्वाण दिल्ली स्थित उनके घर में हो गया। निधन के समय उनकी आयु 64 वर्ष और सात महीने की थी। दिल्ली से विशेष विमान द्वारा उनका पार्थिव मुंबई में उनके घर राजगृह में लाया गया। बाबा साहेब का अंतिम संस्कार 7 दिसंबर को मुंबई में दादर चैपाटी समुद्र तट पर बौद्ध शैली में किया गया।उनके अंतिम संस्कार के समय उनके पार्थिव को साक्षी रखकर उनके 10,00,000 से अधिक अनुयायियों ने भदन्त आनन्द कौसल्यायन द्वारा बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी। दरअसल, डाॅ अम्बेडकर ने 16 दिसंबर 1956 को मुंबई में एक बौद्ध धर्मांतरण कार्यक्रम आयोजित किया था, इसी का स्मरण करते हुए लोगों ने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। मालूम हो कि अंबेडकर जयंती पर सार्वजनिक अवकाश रखा जाता है। बाबा साहब की जयंती (14 अप्रैल), महापरिनिर्वाण यानी पुण्यतिथि (6 दिसम्बर) और धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस (14 अक्टूबर) को चैत्य भूमि (मुंबई), दीक्षा भूमि (नागपूर) तथा भीम जन्मभूमि (महू) में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने लाखों लोग एकत्रित होते हैं। अनुमान के मुताबिक इन मौकों पर 20 लाख से ज्यादा लोग इकट्ठा होते हैं।

डाॅ भीमराव अम्बेडकर का जन्मदिन समानता दिवस और ज्ञान दिवस के रूप में मनाया जाता है। डॉ. आम्बेडकर को ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। भारत सहित दुनिया के 100 से ज्यादा देशों में 14 अप्रैल को अम्बेडकर जयंती या भीम जयंती पर कार्यक्रम होते हैं। बाबा साहब विश्व भर में मानवाधिकार आंदोलन, संविधान निर्माता और प्रकांड विद्वता के लिए जाने जाते हैं। बाबा साहब ने समानता और मानवता आधारित भारतीय संविधान को 2 साल 11 महीने और 17 दिन में तैयार करने का महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक काम किया। बाबा साहब की पहली जयंती सदाशिव रणपिसे ने 14 अप्रैल 1928 में पुणे में मनाई थी। हाथी और उंट को सजाकर उनकी पीठ पर बाबा साहब की प्रतिमा और फोटो रखकर शोभा यात्रा निकाली गई थी। डाॅ अम्बेडकर के जन्मदिन पर हर साल उनके करोड़ों अनुयायी उनके जन्मस्थल महू (मध्य प्रदेश), बौद्ध धम्म दीक्षा स्थल दीक्षाभूमि, नागपुर, उनकी समाधी स्थल चैत्य भूमि, मुंबई सहित अन्य स्थानों पर इकट्टा होते है। सरकारी दफ्तरों और बौद्ध-विहारों में भी आम्बेडकर की जयंती मनाकर उन्हें नमन किया जाता है। गूगल ने डॉ. अम्बेडकर की 125वीं जयंती 2015 पर अपने गूगल डूडल पर उनकी तस्वीर लगाकर उन्हें अभिवादन किया था। तीन महाद्वीपों के देशों में यह डुडल था। सन 2016 में भारत सरकार ने भव्य तौर पर बाबा साहब की 125 वी जयंती मनाई थी। इस दिन पूरे देश में सार्वजनिक अवकाश के रूप में घोषित किया गया। 125 वीं जयंती 102 देशों में अम्बेडकर जयंती मनाई गई थी। इसी वर्ष पहली बार संयुक्त राष्ट्र ने भी भीमराव आंबेडकर की जयंती मनाई जिसमें 156 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। संयुक्त राष्ट्र नेे भीमराव आंबेडकर को विश्व का प्रणेता बताते हुए गुणगान किया। संयुक्त राष्ट्र के 70 वर्ष के इतिहास में वहां पहली बार किसी भारतीय व्यक्ति का जन्मदिवस मनाया गया था। बाबा साहब के अलावा विश्व में केवल दो ऐसे व्यक्ति हैं जिनकी जयंती संयुक्त राष्ट्र ने मनाई हैं मार्टिन लूथर किंग और नेल्सन मंडेला। आंबेडकर, किंग और मंडेला ये तीनों लोग अपने अपने देश में मानवाधिकार संघर्ष के सबसे बडे नेता के रुप में जाने जाते हैं। महाराष्ट्र के बौद्धों के लिए यह सबसे बड़ा त्यौहार है। महाराष्ट्र सरकार द्वारा आम्बेडकर जयंती को ज्ञान दिवस के रूप में मनाया जाता हैं। महाराष्ट्र सरकार द्वारा डाॅ आम्बेडकर का स्कूल प्रवेश दिवस यानि 7 नवम्बर को विद्यार्थी दिवस घोषित किया गया है। क्योंकि प्रकांड विद्वान होते हुए भी आम्बेडकर जन्म भर विद्यार्थी बनकर ही रहे। डाॅ आंबेडकर के सम्मान में भारतीय संविधान दिवस (राष्ट्रीय कानून दिवस) 26 नवम्बर को मनाया जाता है। भारत सरकार के निर्देशों के अनुसार, आंबेडकर के 125वें जयंती वर्ष के रूप में 26 नवम्बर 2015 को पहला औपचारित संविधान दिवस मनाया गया। 26 नवंबर का दिन संविधान के महत्व का प्रसार करने और डॉ. भीमराव अम्बेडकर के विचारों और अवधारणाओं का प्रसार करने के लिए चुना गया हैं।  
बाबा साहब ने यूं तो हर वर्ग और तबके की भलाई के लिए काम किया। खासकर अपने समाज को उंचा उठाने, दलित समाज के लोगों की शिक्षा, उनके सामाजिक और आर्थिक विकास, समाज में उनके सम्मान और बराबरी के हक के लिए ताउम्र संघर्ष करते रहे। बाबा साहेब दलितों में चेतना जगाने में तो सफल रहे। बाबा साहब दलितों के मन से हीन भावना को निकालने में कामयाब रहे लेकिन सवर्ण समाज के लोगों के मन से श्रेष्ठ या बेहतर होने की मानसिकता को खत्म नहीं कर सके। सवर्ण समाज ने उनके बराबरी के सिद्धांत को नहीं स्वीकारा। बाबा साहब ने दलित और शोषित समाज के लिए संविधान में भी कई चीजों को शामिल किया, वे ये चाहते थे कि कानून को सहीं तरीके से लागू किया जाए ताकि अंतिम व्यक्ति तक लाभ पहुंच सके। इसी से पता चलता है कि बाबा साहब केवल अपने समाज या दलितों के लिए ही नहीं सोचते थे बल्कि सभी शोषित, मजलूम और कमजोर वर्ग के तबके के लिए उनकी चिंता थी। बाबा साहब ने तो सवर्ण महिलाओं के लिए भी चिंता जताई थी। ये भी विडम्बना ही है कि समाज का उच्च वर्ग बाबा साहब की नेक मंशा और उनके उसूलों को समझ नहीं पाया। इसके अलावा बाबा साहब ने जो अलख जगाई थी उसे दलित समाज का ही कोई अन्य नेता प्रज्वलित नहीं रख सका। समाज के अंदर की खेमेबाजी, राजनीतिक कूटचाल, भीतरी कलह, पदलोलूपता की वजह से दलित समाज को काशीराम के बाद कोई नेतृत्व नहीं मिल सका। काशीराम ने खासी मेहनत की और वे कुछ हद तक कामयाब रहे। एक बड़े राजनीतिक मंच के तौर पर काशीराम ने राष्ट्रीय स्तर पर बहुजन समाज पार्टी को स्थापित किया। हालांकि, आरपीआई सहित लगभग सभी पार्टियाँ कुछ कामयाबी के बाद ही अपने रास्ते से भटक गईं और अपने मूल मकसद में कामयाब नहीं हो सकीं। एक खास बात और, दलित समाज में उंच-नींच का भेद पनपने लगा। इस समाज के जो लोग उच्च पदों पर आसीन हो गए उन्होंने अपने ही समाज के लोगों को आगे बढ़ाने की बजाए उनसे ही भेदभाव शुरू कर दिया। उच्च शिक्षित या आर्थिक रूप से सम्पन्न लोग समाज के ही कमजोर लोगों को कमतर समझने लगे हैं। आज जरूरत इस बात की है कि सिर्फ बाबा साहब को ही नहीं मानें बल्कि बाबा साहब की भी मानें। जय भीम का नारा लगाकर हम खुद को उनका अनुयायी तो बता सकते हैं लेकिन बाबा साहब का सपना तो तभी साकार होगा जब हम उनके बताए रास्ते पर चलेंगे, हम उनके आर्दशों को आत्मसात करेंगे, हम कमजोर-शोषित-पीड़ित और आर्थिक रूप से पिछड़े तबके इस इस तबके के लोगों का हाथ पकड़कर उसे सहारा देगें। अन्यथा हर बाबा साहब की जयंती और महापरिनिर्वाण दिवस मनाकर ही इतिश्री हो जाएगी।      

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