इंदौर। (लेखक : डॉ. हनीश अजमेरा) ।। आरटीओ कार्यालय में स्टिंग ऑपरेशन के दौरान एक पत्रकार के साथ हुई मारपीट ने न केवल शहर के प्रशासनिक माहौल पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि पत्रकारिता जगत को भी अपने गिरेबान में झाँकने पर मजबूर कर दिया है। मारपीट दुखद है, निंदनीय है, लेकिन यह घटना कई कड़वे सवाल भी पैदा करती है जिन्हें टाला नहीं जा सकता। सबसे पहला सवाल यही है कि जब प्रशासन के बड़े-बड़े धुरंधर, अनुभवी अफसर और विशेषज्ञ वर्षों से किसी विभाग की कार्यप्रणाली को दुरुस्त नहीं कर पाए, तो एक अकेला स्टिंग ऑपरेशन क्या गुल खिलाएगा? अधिकांश मामलों में स्टिंग को अंततः ब्लैकमेल का औजार समझा जाने लगा है। कई विभागों में दलालों और ऐवजियों का इतना मजबूत नेटवर्क है कि बिना उनकी मर्जी के फाइल तक नहीं हिलती। मेनपावर की कमी, लालफीताशाही और ऊपर तक पहुँचा हुआ “सेटिंग” का ताना-बाना इतना जटिल है कि कैमरा लेकर घुसने वाला रिपोर्टर अक्सर उसी सिस्टम की भेंट चढ़ जाता है। शहर की मौजूदा हालत देखें तो स्टिंग की जरूरत कहीं और ज्यादा है। उन नेताओं-जनप्रतिनिधियों पर स्टिंग होना चाहिए जो जिस तरफ मुँह घुमाते हैं, उधर शिलान्यास कर देते हैं और फिर राम ही मालिक। निगम का अमला हजारों में है, लेकिन “मौका ए दस्तूर” के आगे सब बौने साबित होते हैं। कलेक्टर हर मंगलवार को जनता दरबार में फोटो खिंचवाते हैं, एक-दो बुजुर्गों को राहत-अश्वासन देते हैं और हफ्ते-दस दिन में कोई भूमाफिया या संस्था नामजद कर ली जाती है, बस खानापूरी हो गई। अवैध कालोनियाँ फल-फूल रही हैं, सड़कें टूट रही हैं, सीवरेज लबालब, ट्रैफिक जाम आम बात। कुल मिलाकर शहर एक ही नेता के भरोसे चल रहा है, यह बात अब छिपी नहीं है। और हाँ, शाम छह बजे के बाद कुछ पत्रकारों की कुछ नेताओं-अधिकारियों-विधायकों के यहाँ हाजिरी लगभग तय होती है। सवाल वही पुराना है – क्यों? अब बात अपनी कौम की। हमें खुद से पूछना होगा – क्या हर जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि का यह कर्तव्य नहीं होना चाहिए कि वह सुबह सबसे पहले अखबार पढ़े और शहर हित में स्वतः सुधार की योजना बनाए? अखबार पढ़ना उनके लिए अनिवार्य कर दिया जाए तो शायद हालात बदलें। रिटायर्ड इंजीनियर और विशेषज्ञ चुप हैं क्योंकि उन्हें पता है – कुछ होने वाला नहीं, बस टीप (टिप्पणी) के जरिए जनता को किसी दूसरे मुद्दे में उलझा दो, काम बन जाएगा। पुराने जमाने को याद करें तो बिना स्टिंग के भी काम चल जाता था। दामू अन्ना की कचौरी की दुकान पर तीन कालम की खबर तय हो जाती थी। पुलिस में CSP-TI से ऊपर सुबह नौ बजे तक मामले सुलझ जाते थे। ADM-SDM के केबिन में सात-आठ पत्रकार शाम तक खबरें “छान” लिया करते थे। उस दौर का दूसरा पहलू भले विवादास्पद रहा हो, लेकिन सच्ची खबरें बिना कैमरे के भी छपती थीं और शहर के साथ दोस्ती निभाई जाती थी। आज समय है कि हम तय करें – हमें पुख्ता, दमदार और स्वाभिमानी पत्रकारिता चाहिए या यों ही “ऑब्लाइज” करने की प्रथा चलती रहे? स्टिंग की जरूरत तब नहीं पड़ती जब पत्रकार खुद यह तय कर ले कि सही क्या है और गलत क्या। ऊपर से मीडिया को “गोदी” घोषित करने का ठप्पा भी लग चुका है। मारपीट करने वालों को सजा मिलनी चाहिए, इसमें दो राय नहीं। पीड़ित पत्रकार मित्र के साथ पूरी हमदर्दी है और उनके शीघ्र स्वास्थ्य-लाभ की कामना है। लेकिन यह घटना हमें सिर्फ दोषियों को कोसने के लिए नहीं, बल्कि खुद को सुधारने के लिए मजबूर करती है। View this post on Instagram Share this:Tweet Email a link to a friend (Opens in new window) Email Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp PostMoreLike this:Like Loading… Related पोस्ट नेविगेशन नेताओं अधिकारियों के प्रोटोकॉल में आम जनता की सुध कौन लेगा और जब पत्रकार उंगली उठाता है तो मेहरबानी इतनी होती है कि बस अयोध्या कांड : हिन्दू राष्ट्र की ओर बढ़ने की हड़बड़ी में संघी कुनबा